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Vartmaan Sahitya ::April, 2007
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दावानल का ताप और पहाडी जीवन की त्रासद सच्चाइयाँ - नमिता सिंह
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नवीन जोशी का हाल में प्रकाशित उपन्यास ’दावानल‘ कथा साहित्य के क्षेत्रा में न केवल एक नयी जमीन तैयार करता है बल्कि साहित्य और समाज के अनिवार्य रिश्ते को आत्मसात् करने वाले रचनाकारों और पाठकों के लिये एक आवश्यक पाठ भी प्रस्तुत करता है। सामाजिक संघर्षों के विभिन्न आयामों की जानकारी हमें समाजशास्त्रा और राजनीति की मोटी पोथियों से मिलती है। वहाँ कानूनों की जानकारी मिलती है। सामाजिक विकास के नियम मिलते हैं। जनता के संघर्षों के विवरण पाठ्यपुस्तकों, संदर्भग्रंथों अथवा शोध प्रबंधों में मिल जाते हैं। लेकिन इन्हें रचनात्मक साहित्य का विषय बना कर एक गहरी संवेदना और मानवीय जीवन के भीतर-बाहर की उथल-पुथल से जोड कर एक उत्कृष्ट कृति में बदल देना.... यह महारत बिरलों को हासिल होती है। नवीन जोशी का उपन्यास ’दावानल‘ एक ऐसी ही कृति है जो गहन मानवीय संवेदनाओं को पूरे सामाजिक सन्दर्भों से न सिर्फ जोडती है बल्कि पाठक को मन और मस्तिष्क के स्तर पर उद्वेलित करती है, स्तब्ध करती है और सामाजिक यथार्थ के विशद् आयामों का उद्घाटन करती है। नयी सच्चाइयाँ पाठकों के सामने प्रस्तुत करती है जो अब तक सामान्य रूप से न केवल राष्ट्रीय बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक गहरे कोहरे से ढकी छुपी हैं। मिथ्या चेतना का खंडन करके सच्चाई को उसकी पूरी तथ्यात्मकता के साथ प्रस्तुत करना न केवल नैतिकता का तकाजा है बल्कि आज के प्रचार और प्रायोजित विज्ञापन आधारित समाज में धारा के विरूद्ध जाने का अदम्य साहस भी है। घोर बाजारवाद के इस समय में सामाजिक मल्यों का, तथ्यों का और विकास की प्रक्रिया में संलग्न विचार और क्रियाओं का भी मोल-भाव होता है। प्रचार का युग स्याह को सफेद में तब्दील कर देता है। भूख से ऐंठ रहे चेहरे को सौन्दर्य का नया मानक बनाकर दुनियां में भूख का सौन्दर्य स्थापित कर सकता है। प्रचार और विज्ञापन का यह युग मानव समाज की त्राासदी और उसकी बेबसी को बेजान पत्थरों की डिजाइन में बदल देता है। दुनिया की आँखों से एक भरेपूरे समाज को ओझल कर देता है। पहाड के जंगलों में धधकते दावानल को कैमरे के लेंस में कैद करके स्क्रीन को सजाने के काम में लाया जा सकता है। यह उपन्यास घोर उपेक्षा में जी रहे पहाड के लोगों के जीवन के विभिन्न आयामों को पर्त दर पर्त खोलता चलता है। जंगलों में धधक रहे दावानल का ताप पाठक भीतर तक महसूस करता है। उपन्यास के पात्राों का जीवन संघर्ष, संवेदना के स्तर पर हमारी चेतना का हिस्सा बन जाता है। उन अनजान रास्तों से उतरते-चढते हमें अहसास होता है कि इधर हम कभी नहीं आये थे..। नवीन जोशी एक संवेदनशील रचनाकार हैं। उनकी कहानियों में भी पहाड किसी न किसी रूप में जरूर उपस्थित रहता है। वातावरण में विस्तारित अथवा मन के भीतर गहरे धंसा हुआ। मन और वचन के साथ घुला मिला कभी चट्टान सा सख्त तो कभी ठंडी हवा जैसा.... नौलों से टपकते... बहते ठंडे पानी जैसा! पहाडी जीवन में पहले से कहा जाता था कि जो लोग मैदानों की तरफ निकल भागते हैं (दो जून अन्न का ग्रास मुंह में डालने के लिये) वे मैदानों की हवा से जल्दी संक्रमित होकर तपेदिक का शिकार हो जाते हैं। इस उपन्यास में संक्रमित होने वाला यह पर्वतीय समाज जो मैदानों में अपनी पूरी दुनिया बसाये हुए है, पहली बार किसी रचना में अपना विषय बनाया गया है। यह विस्थापित समाज जो दडबेनुमा कोठरियों में रहता है। दो मुट्ठी दाल-भात पका-खा कर सब तरह के मानापमान सहता है, छोटे से छोटा काम करता है ताकि दो मुट्ठी दाल-भात वहां पहाड की खोलियों में बैठा परिवार भी खा सके। मैदानों में दौडने-पिसने वाला यह पहाडी मर्दों का समाज और दूर वहां छूट गयी, ढिबरी जलाकर बैठी पहाडी औरतों-बच्चों का परिवार.... उनके बीच का फासला, संवेदना की हिलती झटकती डोर.... यह मार्मिक गाथा पहली बार नवीन जोशी अपने इस उपन्यास में कहते हैं। शेखर जोशी, हिमांशु जोशी या शैलेश मटियानी ने शहरों के जीवन पर लिखा है; पहाड के चरित्राों पर, वहां के जीवन पर भी सशक्त लिखा है। मनीआर्डर संस्कृति में जीते हुए, पहाडी जीवन पर भी बहुत लिखा गया है। यह आयाम नवीन जोशी की कहानियों में भी मिलता है। लेकिन पहली बार नवीन जोशी ने पहाड के उन लोगों पर लिखा है जो शहरों में प्रवासी जीवन बिता रहे हैं। यहां रोजी-रोटी के लिये खट रहे नेगियों, जोशियों, तिवारियों, पंतों और पांडेयों का पूरा समाज है। ये जोशी, पांडे, तिवारी... रात दिन खटते पिसते हैं। सबेरे से रात तक दौडते-भागते हैं कि उनकी डोर दूर पहाड की चोटियों से बंधी है..... उनके छूटे हुए परिवारों से बंधी है जिनकी खुशहाली, जिनका जीवन ही उनका अभीष्ट है। वहां रात के अंधेरे में कोई माँ छुट्टी में घर आये चाख पर सोते अपने बेटे का सर सहलाते हुए पूछती है..... ’’पुष्करऽ... तेरे बाबू को बहुत साइकिल चलानी पडती है ना! -हां इजा! -पुष्करऽ, आजकल वहां कितनी लू चल रही होगी। -बहुत इजा, बहुत! माँ फिर चुप हो जाती मगर पुष्कर के बालों में घूमती उंगलियों के साथ उसका मन भी सुदूर लखनऊ की उन गलियों, सडकों में घूमता रहता जहाँ उसके पिता मुंह-अंधेरे घर-घर अखबार डाला करते और दिन की लू व धूप में दफ्तर-दफ्तर चक्कर लगाते हैं। (दावानल, पृ. २९) दिन भर घर-खेत-जंगल एक करती, व्यस्त रहने वाली, अकेले पहाड सा जीवन व्यतीत करने वाली अनगिनत पुष्करों की मांएं अपनी ही जैसी औरतों से बोलती, हंसती, झगडा करती हैं। मगर दिन ढल जाने के बाद, रात के अंधेरे में बिस्तर में पडी देह के भीतर छटपटाते मन से अपने-अपने पुष्करों को पुकारा करती हैं। रात में अचानक मन उचाट हो जाने पर पानी में तेल की बूंद तैराती हुई मां पुष्करों और उनके बाबुओं (पिताओं) की कुशल कामना करती हुई तेल की हिलती-तैरती बूंद को देखती अपने मन को आश्वस्त करती हैं। वहां शहर में नहर के दफ्तर के पास अंग्रेजों के जमाने में बने घुडसाल के दडबे जैसी कोठरियों की कतारें इस प्रवासी समाज का संसार है। उनके सुख-दुख, आपसी भावनात्मक संबंध और परस्पर हिस्सेदारी करती मानवीय संवेदनाएं उन्हें एक सूत्रा में बांधती हैं और संबल प्रदान करती है। उपन्यास के कथा नायक पुष्कर के पिता नंदाबल्लभ तिवाडी अपने जैसे अन्य अनेक जोशियों, नेगियों, तिवाडयों की तरह नीचे मैदान में उतर आये हैं-रोजी रोटी जुटाने के लिये। पीछे छूट गये परिवारों को हर महीने मनीआर्डर भेजकर भी न तो वे सुख चैन से हैं और न पहाडों पर छूट गये उनके परिवारीजन। नंदाबल्लभ तिवाडी नहर के चीफ इंजीनियर के चपरासी हैं जो सबेरे चार बजे से अखबार बांटते हैं। फिर लौट कर दाल-भात पका कर खुद खाकर दफ्तर भागते हैं। पढने वाले बेटे पुष्कर के लिये यह दाल-भात एक बडे कटोरे में अंगीठी के ऊपर रखा रहता है। वे कुमांऊँ के कुलीन ब्राह्मण ह। दफ्तर में कभी-कभार होने वाली चाय पार्टी में अपने हिस्से में आने वाली बर्फी या समोसा कागज में लपेट कर साइकिल के हैंडिल में हमेशा लटके रहने वाले झोले में संभाल कर ले आते हैं और उमंग से बेटे के सामने परोस देते हैं। वे अगर उसे चखते तक नहीं तो इसलिये नहीं कि उनका कुलीन ब्राह्मणत्व खतरे में पड जायेगा बल्कि इसलिये कि साथ में एक छोटा-सा बेटा भी है जिसे एक रुपये की मिठाई खरीदकर खिला सकना भी उनके लिये लक्जरी है। (पृ. ३२) वहां जईदत्त जी जैसे लोग भी हैं जो पठान से उधार ले कर नहीं चुका पाते हैं और जल्लाद-सा पठान जईदत्त जी को गरदन से पकड कर लटका लेता है। भोलाराम, शिवसिंह और कुंदन जैसे लोग पठान की गंध पाकर टट्टियों में जा घुसते हैं लेकिन पठान का बच्चा उन्हें वहां से भी खींच लाता है। वहां बिनवाल जी जैसे लोग हैं, जिन्होंने अपने घर का दरिद्र भगाने के लिये जुए के फड की शरण ले रखी है। वहां लाला की चाय की दुकान पर बर्तन मांजने वाला पहाड का मोहन है जो दो-दो तीन-तीन रुपये जोडकर माँ के नाम मनीआर्डर फार्म भरवाता रहता है। मोहन की बहन के साथ जंगल के पतरौल की बदफेली के बाद उसकी मां ने खुद को फांसी लगा ली। नहर के दफ्तर या दूसरे दफ्तरों में काम कर रहे ये कुलीन ब्राह्मण परिवार या अन्य, दो जिन्दगियां तो बसर कर ही रहे हैं साथ ही साहबों की कोठी में घरेलू नौकर की भूमिका निभाने के लिये विवश ह। उन्हें ईमानदार पहाडी नौकर का खिताब भी मिला हुआ है। जिन्दगी की तलाश में निकला पुष्कर और उसका यह समाज पहाड की जिन्दगी और शहरों तक पसरी उनकी त्राासदी के साथ पूरी शिद्दत से उपन्यास में मौजूद हैं। इसके बावजूद शहरों में प्रवासी जीवन बिताने वाले पहाड के लोगों की त्राासद गाथा भर नहीं है यह उपन्यास। मूलतः यह समानांतर रूप से राजनैतिक उपन्यास है जो पहली बार ’चिपको आन्दोलन‘ के छद्म को उद्घाटित करता है। आज भी कक्षा पांच या छह से जब पर्यावरण पर अध्ययन शुरू होता है, पहाड के चिपको आंदोलन का विस्तार में वर्णन किया जाता है। सारी पाठ्य पुस्तकें तथा पर्यावरण संबंधी ग्रंथ गौरादेवी के साहसिक नेतृत्व की गौरवगाथा से भरे हुए हैं। सुन्दरलाल बहुगुणा चिपको आन्दोलन तथा पर्यावरण बचाओ अभियान के प्रतीक पुरुष के रूप में राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय जगत में मूर्तिमान हो चुके हैं। इस प्रचलित स्थापना के विपरीत यह उपन्यास समूचे संदर्भों के साथ मूर्ति भंजक के रूप में उत्तराखंड के जनजीवन की करुण गाथा को न सिर्फ प्रस्तुत करता है बल्कि तथ्यात्मक रूप से चिपको आन्दोलन के साठ-पैंसठ साल के इतिहास का कलात्मक दस्तावेजीकरण भी करता है। अपनी वनसम्पदा, अपने पेडों को बचाने के लिये औरतें इकट्ठा हैं। गौरा देवी महिला मंडल की प्रधान है। उसे मालूम है कि इलाहाबाद की कोई बडी भारी कंपनी है जो खेल का सामान बनाती है। सरकार ने अंगू के पेड उसे बेच दिये हैं। ’’इन पेडों से क्रिकेट का सामान, बैडमिण्टन के रैकेट बनायेगी और ऊंचे दामों पर बेचेगी। शहरों के सेठों के बच्चे चौका-छक्का लगायेंगे मगर हम लोगों को बैलों के जोतने के लिये एक जुआ भी नहीं मिलेगा। वे रुपया कमायेंगे और हम लकडी, पानी, घास बिना मरेंगे।‘‘ गौरा देवी, लक्ष्मी देवी, बूढी देवी, जवान देवी, विधवा देवी, सधवा देवी.... सब जुलूस बनाकर जा रहे हैं, ठेकेदार के आदमियों को रोकने के लिये। अस्सी साल की बूढी आमा जिन्होंने बरसों से दराँती को हाथ नहीं लगाया, वे भी साथ हैं। कोई गोदी के बच्चे को छाती से लगाये-लगाये दौडी जा रही है। ठेकेदार के आदमियों के पास आरी, कुल्हाडे हैं। बन्दूके हैं। लेकिन उन औरतों ने पेडों पर अंग्वाल्ठा (आलिंगन) डाल दिया है। एक-एक पेड पर एक-एक अंग्वाल्ठा... ठेकेदार के मुंशी और औरतों के बीच धक्का मुक्की... लोग गिरे-भागे... मोर्चा औरतों के हाथ रहा। औरतों ने फिलहाल मोर्चा जीत लिया। लेकिन यही जन-जंगल और जीवन की लडाई दूसरे धरातल पर चली गयी। जान की बाजी लगा कर औरतों ने जब अपना जंगल, अपना जीवन बचा लिया तब बाबा जीवनलाल अनशन पर बैठ गये। कहा कि वनो के कटान पर रोक लगाने तक अनशन जारी रहेगा। उनका प्रचार माध्यम सक्रिय है। देश-प्रांत के अखबारों में बाबा जीवनलाल के फोटो छपने लगे। उनके फोटो के साथ बडे-बडे नारे.... ’’क्या हैं जंगल के उपकार। मिट्टी, पानी और बयार। जिन्दा रहने के आधार।‘‘ जन-जंगल बचाने की इस लडाई में सिर्फ औरत नहीं, वह त्रिालोक सिंह है और उस जैसे अनेक हैं। वह छाती खोल कर ताजा कटे पेड के पास लेट गया है-’’मारो मुझे गोली। ’’रंगोडी-ध्याडी-पपोली के जंगल में भी जनता ने मोर्चा लिया है और पुलिस वालों की बंदूकें नीची हुई हैं।‘‘ यहाँ अनशन करने वाले बाबा जीवन लाल के अलावा ग्राम-स्वराज की स्थापना करने वाले रामप्रसाद भी हैं। वे जंगल की लकडी से काष्ठकला इकाई चलाते थे जो नये वन कानून की वजह से बन्द हो गई। उनकी परिकल्पना जंगल की लकडी को काटकर काष्ठकला के आइटम और कृषि उपकरण बनाकर बेरोजगार युवाओं को काम पर लगाना है। लेकिन बने हुए वन नियम के अंतर्गत उनकेा जंगल काटने और लकडी प्राप्त करने का परिमट नहीं मिला। बहुत दौड भाग की लेकिन उन्हें अंगू के पेडों का परमिट नहीं मिला। अधिकारी चीड के पेडों का परमिट दे रहे थे। क्षुब्ध रामप्रसाद भी प्रसन्न हुए कि अंगू का जंगल औरतों ने बचा लिया। यह विडंबना ही थी कि पेडों पर अंग्वाल्ठा डाल कर जन-जीवन-जंगल बचाने की लडाई ’हग द ट्रीज‘ आन्दोलन में बदल गयी। विदेशी पत्राकार और फिल्मकार बाबा के आश्रम में आ रहे हैं। डाक्यूमेंट्री फिल्म का प्रोड्यूसर और कैमरामैन बाबा के चित्रा खींच रहे हैं। बाबा को पेड से चिफ रहने का निर्देश दे रहे हैं और कह रहे हैं कि हमारी ओर मत देखिये। पेड की ओर देखिये.... चेहरे पर परेशानी लाइये... वैसी ही जैसी गौरा देवी...., लक्ष्मी देवी... के चेहरों पर थी। बार-बार बाबा का चेहरा कैमरा देखने लगता है....। विदेशी चैनल के लिये बाबा की फिल्म बन रही है और आम पहाडी जनता को नहंी मालूम है यह सब गोरखधंधा। जंगलों में दौडती-नारे लगाती जनता का फुटेज बाद में जोडा जायेगा जिसका इंतजाम हो चुका है। एक बुढया को भी पकड लाये हैं फिल्माने के लिये। गीत-संगीत की रिकॉर्डिंग स्टूडियों में चल रही है। पुष्कर अपनी बीमार मां के पास नहीं गया। लखनऊ अपने पिता के पास भी नहीं। वह पहाड की व्यथा-कथा से उद्वेलित है और सैकडों नौजवानों की तरह आन्दोलन में कूद पडा है। उसकी वैचारिकता को आधार मिला है अध्ययन से, आन्दोलनों के अनुभव से, पहाड के जीवन को विधिवत रूप से पढ सकने से, अपने साथियों के सहयोग और संवेदना से.. पुष्कर और उसके साथी हैरान, परेशान हैं आन्दोलन के विचलन से। अपने जीवन के लिये लडी जा रही लडाई के भटकाव से। ’’चिपको‘‘ जैसे एक धार्मिक संप्रदाय हो गया है..। बाबा जीवनलाल ने अब हिन्दी के साथ-साथ अंग्रेजी में लिखना शुरू कर दिया है... ’’पेड बचाओ। पर्यावरण बचाओ। एक पेड, दस पुत्राों के समान हैं-वेद पुराण में कहा गया है....‘‘ पुष्कर अचंभित हैं। उसके साथ आंदोलनरत संस्कृति कर्मी, कार्यकर्ता हतप्रभ हैं। उसके पत्राकार मित्रा चिंतित हैं। पुष्कर अखबारों में लिख र

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