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05 July 2008
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क्यों नायक से खलनायक बना मीडिया? - मुकेश कुमार

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न्यूज चैनलों की दर्शक संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है, उनकी आय बढ रही है और नए-नए चैनलों का आगमन भी हो रहा है। मगर इतने सारे सकारात्मक संकेतों के बावजूद सबसे ज्यादा आलोचना का शिकार भी वही हो रहा है। जहाँ भी जाइए यही शिकायतें सुनने को मिलती हैं कि ये चैनल वाले ख्ाबरों को बढा-चढाकर दिखाते हैं या फिर बेसिर-पैर की ख्ाबरों को तूल देते हैं। सामाजिक सरोकारों से उनका कोई ताल्लुक नहीं रह गया है और उनका एकमात्रा मकसद पैसा पीटना हो गया है। वे टीआरपी के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं वगैरा वगैरा। आलम ये हो गया है कि अगर कोई जनमत सर्वेक्षण करवाया जाए तो पता चलेगा कि नेताओं के बाद लेाग सबसे ज्यादा लानत-मलानत मीडिया की ही कर रहे हैं। लोगों की निगाह में मीडिया नेताओं से बडा नहीं तों उनके बाद सबसे बडा खलनायक तो बन ही गया है। ऐसा नहीं है कि आम दर्शक ही न्यूज चैनलों को कोस रहा हो बल्कि इनमें काम करने वाले पत्राकार तक आत्मग्लानि से भरे हुए हैं। चैनल जो कुछ कर रहे हैं वे उनसे घोर असहमत नजर आते हैं। उनकी खुद की नजरों में न्यूज चैनल अब न्यूज चैनल नहीं रह गए हैं, उनका मकसद येन केन प्रकारेण दर्शकों को चैनल पर खींचना और खींचने के बाद बाँधकर रखना हो गया है। इसके लिए वे किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं भले ही उससे पत्राकारिता के व्यवसाय या चैनल की विश्वसनीयता को ही कोई हानि क्यों न पहुँचती हो। एक असहायताबोध उन पर काबिज है। इसीलिए वे टीआरपी के दुष्चक्र को कोसते नहीं थकते। न्यूज चैनलों के प्रति फैल रही इस चौतरफा नाराजगी की वजहें छिपी हुई नहीं हैं। फिर भी चैनल दर्शकों की अपेक्षाओं को नहीं समझ पा रहे या फिर उन्हें पूरा करने में खुद को असमर्थ पा रहे हैं। दरअसल लोग हमेशा से मीडिया में एक आदर्श की खोज करते रहे हैं। शायद ऐसा पत्राकारिता की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की वजह से है। आजादी के आंदोलन के दौरान पत्रा-पत्रिाकाएँ एक अलग भूमिका में थी। उनके लिए अख्ाबार ख्ाबर बताने के जरिया भर नहीं थे। वे उपनिवेशवाद और सामाजिक बुराईयों से लडने के हथियार थे। हालाँकि सभी पत्रा-पत्रिाकाएं इन उद्देश्यों के साथ लडाई के मोर्चे पर तैनात रही हों ऐसा नहीं था। धन्ना सेठ अपने धंधे को चमकाने और राजनीति पर अपना प्रभाव बढाने या खुद की राजनीति चमकाने के मकसद से प्रेरित थे। अंग्रेजी प्रेस तो मोटे तौर पर सत्तापरस्त था ही। स्वतंत्राता प्राप्ति के बाद की पत्राकारिता को विरासत में यही सब कुछ मिला, मगर उसमें आदर्शवाद वाली प्रवृत्ति हावी रही। वह नए भारत के निर्माण के आदर्शों से प्रेरित थी। हालाँकि ज्यादातर पत्रा-पत्रिाकाएँ सत्ता समर्थक हो गई थीं। ये स्वाभाविक भी था क्योंकि लोगों में तब यह एहसास था कि अंग्रेज चले गए अब हम देश चला रहे हैं, हमारी सरकार है। लेकिन जाहिर है कि मोहभंग का दौर जैसे ही शुरू हुआ प्रेस बदला और उसके बारे में राय भी बदलनी शुरू हो गई। लेकिन आम जनता में फिर भी यह भरोसा बना रहा कि चौथा खंभा उनकी आवाज उठाने वाला है, सचाई के लिए लडने वाला है। आपातकाल के दौरान और उसके तुरंत बाद के कालखंड में मीडिया की तेजतर्रार भूमिका ने इस विश्वास को और पुख्ता किया। राजनीति में आई गिरावट के बाद लोगों को लगता रहा कि मीडिया ही तमाम बुराईयों से लडने में उनका नेतृत्व कर सकता है। भारतीय जनमानस में आज भी कहीं न कहीं यह बात पैठी हुई है। यह और बात है कि ऐसा संभव नहीं है क्योंकि मीडिया भी एक उद्योग है और उद्योगों को चलाने के अपने कायदे-कानून होते हैं। पूंजी के भूमंडलीकरण और नई आर्थिक नीतियों की वजह से जो माहौल बना है और इसी के साथ-साथ मीडिया का जो तेजी से विस्तार हुआ है उसने मीडिया के एक नए रूप को सबके सामने रख दिया है। इसमें प्रिंट एवं इलैक्ट्रानिक दोनों माध्यम शामिल हैं मगर न्यूज चैनलों का प्रभाव-क्षेत्रा सबसे व्यापक है। इसीलिए न्यूज चैनलों पर लोगों की निगाहें सबसे ज्यादा जाती हैं और वे ही निंदा का शिकार भी होते हैं। मुनाफावाद का सबसे अधिक नग्न रूप इसी माध्यम में नजर आ रहा है। चैनल मुनाफा कमाएं क्योंकि वे इसी के लिए चलाए जा रहे हैं। मगर यह भी सही है कि मीडिया दूसरे उद्योगों से अलग है इसलिए उसे विशुद्ध रूप से मुनाफा कमाने वाले जरिए के रूप में न देखेजाने की जरूरत स्वीकारी गई है। शायद इसीलिए जन-अपेक्षाओं का रिश्ता भी उससे जुड जाता है। यहीं से उसके नायक या खलनायक बनने की प्रक्रिया भी जुडी हुई है। अगर हम गौर करें तो पाएंगे कि भले ही मोहभंग का सिलसिला पिछले कई वर्षों से लगातार चल रहा था मगर, लोगों की नाराजगी पिछले पाँच-सात वर्षों में ही ज्यादा बढी है। चैनलों की संख्या बढने के साथ-साथ प्रतिस्पर्धा बढी। आगे बढने या आगे बने रहने की होड अगर अच्छी चीजों को दिखाने के लिए होती तो न्यूज चैनल दर्शकों की निगाहों में गिरते नहीं। मगर हुआ इसका उल्टा। उन्होंने एक-एक करके नकारात्मक चीजों को महिमामंडित करना शुरू किया। वे सेक्स, सिनेमा, सनसनी और क्रिकेट का डेली डोज बढाते गए। ऐसे में ये स्वाभाविक ही था कि जनहित की खबरें पीछे छूटती चली गईं। ब्रेकिंग न्यूज की अंधी दौड, अघटनाओं को घटना बनाकर दिखाने के तमाशे और ख्ाबरों के अनावश्यक विस्तार ने दर्शकों को और भी खिझा दिया। उनमें एक तरह की अरुचि पैदा होती गई। बेशक वे न्यूज चैनल देखते रहे और देखने वालों की तादाद में भी इजाफा होता गया। मगर विश्वास की नींव दरकने लगी। दर्शक-संख्या बढाने के चक्कर में न्यजू चैनलों ने मनोरंजन चैनलों की सामग्री को भी शामिल कर लिया, इससे खबरों में ज्यादा दिलचस्पी न रखने वाले दर्शक भी उसकी तरफ खिंचे। मगर इन्हें जोडे रखने के लिए यह जरूरी हो गया कि वैसी चीजें लगातार परोसी जाएं। यानी यह शेर की सवारी बन गई। इस तरह चैनल अपने ही बुने जाल में फँसते चले गए। उन्हें दर्शक तो मिले मगर एवज में साख गवाँनी पडी। वह साख जो मीडिया की ख्ाास पहचान है और एक विशेष तरह की भूमिका अदा करने से ही उसे हासिल होती है, उसे नायकत्व प्रदान करती है। उनके लोभ-लालच में नायकत्व की ये मूर्ति खंडित होती चली गई है और लगातार होती जा रही है। अखबार हों या न्यूज चैनल उनका व्यक्तित्व आख्ारकार उनके कलेवर और प्रस्तुतिकरण के अंदाज से ही बनता है। कलेवर मे विभिन्न तत्वों का अनुपात कैसा और कितना है। उससे उनके बारे में राय बनाई जाती है। न्यूज चैनलों में यह अनुपात जैसे ही गडबडाया लोगों की राय भी उनको लेकर बदलनी शुरू हो गई। ये कहना गलत होगा कि ऐसा केवल पत्राकारों की गैर जिम्मेदारी या चूक से हुआ। इसमें टीआरपी (टेलीविजन रेटिंग पाइंट) के अजीबोगरीब पैमाने और उसी का नियंता बन जाना एक बडा कारक रहा है। लेकिन सारा दोष उसी पर मढ देना भी जम्मेदारी से पल्ला झाड लेना है और एक दूसरे तरह के नियतिवाद को स्वीकार कर लेना है। इस मसले पर इस नजरिए से भी सोचा जाना चाहिए कि टीआरपी के इस दबाव के बावजूद हिन्दी और अंग्रेजी के दो-तीन चैनल कैसे अपनी विषय-प्रस्तुति को ठीक-ठाक बनाए हुए हैं। ये चैनल बिल्कुल पिट गए हों ऐसा भी नहीं है। उनकी रेटिंग बुरी नहीं है और दर्शक मिसाल के तौर पर इन चैनलों का जक्र करना नहीं भूलते। मीडिया नायक उसी समय बना है जब उसने सत्ता प्रतिष्ठानों को चुनौती दी है। उनके काले कारनामों को साहस के साथ बेनकाब किया है। उनकी विसंगतियों की तरफ ध्यान खींचा है। बोफोर्स कांड हो, तहलका हो या फिर सांसद रिश्वत कांड, हर बार उसने अपनी ताकत का एहसास कराया है और लोकतंत्रा में चौथे खंभे की भूमिका को पुनर्प्रतिष्ठित भी किया है। अब अगर नए आर्थिक-राजनीतिक परिदृश्य में बाजार अपने आप में एक सत्ता प्रतिष्ठान के तौर पर उभरा है तो उसे उसके अंदर की कालिमा भी दिखानी पडेगी। बाजार में ’तहलके‘ करने पडेंगे। बाजार की गोद में बैठकर न्यूज चैनल नोट छापने की मशीन तो बन सकते हैं मगर न तो अपनी भूमिका के साथ न्याय कर सकते हैं और न ही वह ताकत और रुतबा हासिल कर सकते हैं जिसके लिए वे जाने जाते थे। इसके अलावा जिस तरह से उसने खुद को मध्यवर्ग के विलासी चरित्रा से जोड लिया है उससे मुक्त होना होगा। उसे विकराल रूप से फैल रही गरीबी, विषमता और अभाव में दम तोडते कमजोर वर्ग की तरफ अपना ध्यान खींचना ही होगा तभी वह मानवीय और आदरणीय बन सकेगा। हम जानते हैं कि भूमंडलीकरण की हवा में बह रहे और बाजार के इशारों पर चल रहे चैनलों के लिए ये सब करना बहुत ही मुश्किल है। इसके उलट अगर दर्शक ही खुद को खुशफहमियों से आजाद कर लें तो ज्यादा यथार्थवादी होगा। किसी भी पूँजीवादी समाज में मीडिया की भूमिका शासक-वर्ग के सहयोगी की होती है। हमारा शासक-वर्ग अब उपनिवेशवाद से मुक्ति की खुमारी और एक हद तक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा से खुद को मुक्त कर चुका है और मीडिया भी इससे पिंड छुडाने में लगा हुआ है। नव पूंजीवाद के इस दौर में मीडिया अपने वर्ग-चरित्रा के अनुसार ही अपनी भूमिका का निर्वाह कर रहा है। इसलिए उसमें नायक तलाशना एक तरह की मृगतृष्णा ही होगी। फिर भी कुछ चीजें हैं जिन पर मीडिया गौर सकता है। इससे थोडी बहुत साख और लाज तो बच ही सकती है। एक तो उसे सोचना होगा कि टीआरपी के भूत से कैसे निपटा जाए क्योंकि ये स्क्रीन पर कई तरह के भूत-प्रेतों को जन्म दे रहा है। टीआरपी मापने की प्रक्रिया को ज्यादा सुसंगत बनाया जाना चाहिए ताकि वह केवल लोकप्रियता का ही नहीं प्रतिष्ठा एवं विश्वसनीयता का बैरोमीटर भी बन सके। इससे लोगों को पता चलेगा कि विभिन्न चैनलों की साख क्या है। दूसरे, मीडिया अपने लिए खुद आचार संहिता बनाने की पहल करे। इससे स्वेच्छाचारिता पर कुछ तो लगाम लगेगी ही। ये दोनों काम सामूहिक तौर पर ही किए जा सकते हैं, क्योंकि दौड में कोई पीछे नहीं छूटना चाहता। भले ही, जीतन के लिए प्रतिबंधित दवाओं का सेवन ही क्यों न करना पडे। एक बार सारे चैनल आपसी सहमति से खुद को अनुशासन में बाँधने को तैयार हो जाएंगे तो मीडिया के सामने विश्वसनीयता का जो विराट संकट खडा हो गया है उसे ख्ात्म नहीं तो कम जरूर किया जा सकता है।



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