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सिमटता आकाश
आज तो पनघट सूना है
न गागर है और न हैं पनिहारनें,
छाया है मौन सन्नाटा
प्रकृति के भाल को रौंदते
सभ्यता के पहिए।
जारी है औद्योगिक सभ्यता का ताण्डव नृत्य
निर्वृक्ष होते वन
सूखते तालाब
हवाओं में तैरता विष भरा संगीत
दीखते हैं कंक्रीट के जंगल
उडते हैं हिंसक कबूतर
रक्तिम हैं नदियाँ
सिमट रहा गाँव
दुर्लभ है पीपल की छाँव।
हर तरफ बाजार है
हर वस्तु बिकाऊ है
कुछ नहीं बदलेगा
मर गयी हैं संवेदनाएँ,
नई-नई दुकानों में
नये-नये सामान हैं
नये-नये सपने हैं,
अफसोस! बिना विज्ञापन के
कुछ नहीं बिकता है
बिना आकर्षण के
कुछ नहीं टिकता है
हर तरफ बाजार है
हर तरफ दुकानें हैं
दुकानें किसिम-किसिम की
दुकानें धर्म की, दुकानें साहित्य की
सूचनातंत्रा का मकडजाल है
शब्दों के संसार का बुरा हाल है
साहित्य साधना जरूरी नहीं
जरूरी है चर्चा में बने रहना
जरूरी है शिगूफे छोडना
साधना फजूल है
साधना बकवास है
अब तो सच्चाई ’हमाम‘ से
जानी जाती है
बडे आदमी की पहचान
मोबाइल से की जाती है।
उपभोक्ता-संस्कृति का भयावह चेहरा
व्याप्त है धडकनों में
व्याप्त है रगों में
कितना भयावह होगा वह समय
जब आदमी आदमी नहीं
महज मशीन बनकर रह जायेगा।
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पुस्तकें
पुस्तकें पुस्तकालयों की शोभा
बढायेंगी
जम जायेगी उन पर
धूल की परत
अक्षरों की अमूर्त दुनिया में
रमेंगी दीमकें,
वे रोयेंगी अपनी नियति पर
सुबकेंगी-सिसकेंगी
कभी-कभी सोचेंगी
उपभोक्ता संस्कृति के
उपेक्षित दौर में भी
मशाल जलेगी
आयेगा दुर्लभ प्राणी
दबे पाँव
आहिस्ते से हटायेगा
धूल की परत
पन्नों को टटोलेगा
अक्षरों को निहारेगा
अमूर्त संसार में रमेगा
लौट जायेगा चुपचाप।
फिर भी क्या होगा?
जीवन में वस्तुओं का
हस्तक्षेप है,
भौतिकता की अंधी दौड है
वे कहते हैं-
जरूरी नहीं हैं पुस्तकें
भोग-विलास नहीं हैं पुस्तकें
वे नहीं जानते कि पुस्तकें
भूत, वर्तमान और भविष्य हैं,
आत्मा का इतिहास हैं
अनतर्जगत का रहस्य हैं
पुस्तको! देखना
कोई न कोई साधक आयेगा
ज्ञान की अलख जगायेगा
पुस्तको! हर साँसो का
जीवन्त इतिहास हो तुम
संवेदना का विकास हो तुम।
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