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धर्म
अपने अपने
धर्म के
चप्पे...
अपने-अपने
धर्म की
उंगलियाँ
हम चाट-चाट
कर खा रहे हैं...।
स्वाद-स्वाद में
पता नहीं चलता-
किसकी उंगलियाँ-
किसका भेजा
और किसका जगर
हम उडा रहे हैं...
हम अपना धर्म निभा रहे हैं।
अच्छा होता
कोई धर्म
न होता!
अच्छा होता-
कोई अपना
न होता-
अपना न होता
तो कोई पराया
नहीं होता...।
कोई धर्म
न होता तो
ईश्वर न होता
और ईश्वर न
होता तो धर्म
के नाम पर
शहर-शहर पर
कहर
न होता...।
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कविता-एक
अभिशापों
से मैं बहुत
अभिशप्त हुई
पर मेरी
मुक्ति न हुई।
हर सुबह
मेरे हाथ
अखबार की
काली स्याही
में डूबकर
खून से लथपथ
क्यों निकलते हैं!
आज हर घर
सरहद बन गया है
मिट्टी और बालू
का रंग
बदरंग हो गया है।
ऊपर उठने को
क्यों संबल चाहिए...
मुफ्त का
कंबल चाहिए...।
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कविता-दो
कोपलें
निकल आई हैं-
और रंग दिखाने
लगी हैं...!
सपनों का रंग
तितली
के पंखों पर
धर.... और
बस उड जा....।
धानी रंग
लिपटा ले
शहर आ
गया है!
मूल्यों पर
शहर बरसे है
कहर
बनकर...।
कविता-तीन
चहचहाटें...
और पैजनियों-सी
आहटें...
जहाँ कल तक
रून झुन
ठुमकती थी....।
आज सब कुछ
अकेलेपन के
सन्नाटे की
दस्तक
हो गई है...।
ऊब अनाहट-सी
आहट भी
अनहत-नाद
बन ठनकती है।
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