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Vartmaan Sahitya ::April, 2007 Sponsered by : Decor Home, Bikaner माँ नौशाना अनवर शुबी
न जाने माँ
मैं तुमको कैसे भूल गयी?
पत्नी बनना तुमने सिखाया
तुमने ही सिखाया माँ बनना
फिर भी न जाने माँ
मैं तुमको कैसे भूल गयी?
घर को बनाया जाता कैसे
रिश्ते कैसे सँवारे जाते
यादों को सँजोना
तुमने ही सिखाया
फिर भी न जाने माँ
मैं तुमको कैसे भूल गयी?
रातों की नींद गंवा कर
बचपन में पाला था तुमने
और दिन का चैन लुटाकर
अल्हड जवानी को मेरे
सम्भाला था तुमने
तुम्हारी कुर्बानियों के ही सदके
सब सुख मैं भोग रही
फिर भी न जाने माँ
मैं तुमको कैसे भूल गयी?
’’हमें भूल जाना
बस रखना हमारे संस्कारों
को ही याद‘‘
विदा करते-करते
समझाया था मुझको
और मुझे पता है
तुम्हारे जीवन का
यही सबसे बडा सुख होगा
बस इसीलिए माँ
मैं तुमको भूल गयी।
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