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Vartmaan Sahitya ::April, 2007
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दो कविताएँ
उद्भ्रान्त

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आँगन-बाडी सम्मेलन

वे आयीं धीरे-धीरे एक-एक
और अभेद्य दीवार में बदल गईं
वे आई थीं अकेले लेकिन
कुछ के पति अभी इनके साथ
चलने की कोशिश में लगे थे,
जो आये थे वे अपना पति होना
दूर छिपाये खडे थे
वे इनके पीछे घिसटते से
आये हुये लग रहे थे

वे आगे थीं और
आगे की तरह चल रही थीं
यहाँ वे जो बोल रही थीं
उसके शब्दों में कहीं दूर-दूर तक
किसी तथाकथित पति की छाया नहीं थी
यहाँ केवल वे थीं और उनका होना था।
जो हो रहा थावे उसके ख्ालाफ
तेजी से सोच रही थी,

वे जहाँ थी वहाँ से आगे और आगे
जाने के लिए तैयार हो रही थीं और
उनकी छाया में खडे होने के मोहताज पति
उजबक की तरह उन्हें ताके जा रहे थे,

जो रह गये थे घर में,
वे इनकी तरह घर में
घर सँभाल रहे थे
वे वैसे ही डुगर-डुगर डोलते हुये
उनका कर रहे थे इंतजार
जैसे हजारों साल पहले ये
लौटती थीं अपने वृषभ कंधों में
लादे हुये चीतल।
 
विद्वज्जन ऐसा ही कुछ

उम्र तो मेरी कोई ख्ाास नहीं थी
दस-बारह का रहा हूँगा
तीसरी-चौथी कक्षा की विद्यार्थी थी
होशियार तो अधिक नहीं था लेकिन
पढने की इच्छा रखने के कारण
रट्टू बन गया था और भय भी था कि
पढेरी न कहे जाने पर पिता बन्द न करा दें पढना
क्योंकि वे मुझसे भी बडे दो भाइयों के पढाने का
जुगाड मुश्किल से कर पा रहे थे

इस रटन्त के कारण ही
मुंशी रामविशाल का मेरी पीठ ठोकना भी
मेरी पढाई चलते रहने का बहुत बडा कारण था
और थी चाचा और बडे भाइयों की
फौज की वर्दी और टोपी जो
उनकी छुट्टी के दिनों में पूरे समय
मेरे सिर पर धरी रहती थी
सिर पर टोपी और पाँव में
ढीले फौजी चमकदार जूतों का नाप लेते-लेते मैं
दसवीं पार कर गया

इस बीच मेरी कुछ-कुछ फूलों की
सुन्दरता और सुगन्ध से अलग
गन्ध और सुन्दरता की पहचान भी
होना शुरू हो गयी थी
कोई ख्ाास-ख्वास तो नहीं बन पायी थी
लेकिन खुद टूटकर अपनी ओर आती
पंतग की डोर थामने के लिए
मेरे हाथ उठने लगे थे

स्कूल से तो उनका ख्ाास नाता नहीं बन पाया था
क्योंकि रामायण पढने लेने वाली लडकियों को
पढेरी लडकियाँ मान उनकी इतिश्री हो गई थी
अब गली के मीड, कुँए और नदियों के घाट न बचते थे
जिनमें समय और भाग्य दोनों साथ होते तो ही
कभी कुछ होने की गुंजाइश बनती थी
आगे की पढाई में किताबों के अक्षरों के साथ
गरियार बैल की तरह नधे रहने के कारण
मेरी कॉपियों के पन्नों में उनके कोई खास
नाम भी अंकित नहीं हो पाये थे

कभी किसी के खाली घडे में
कुँए से खींचकर पानी भर देने से
या नदी के घाट पर किसी का भारी घडा
उठाकर सिर पर रख देने से
इतना जरूर हुआ कि उनकी आँखों की
मूक इबारत पढने की कोशिश में
अब कविता लिख रहा हूँ

न अभी तक उन्हें भूल पाया
न वे जगहें जहाँ वे मिलती थीं
हालांकि अब मेरी ही तरह उनके भी बाल
सफेद होने लगे हैं लेकिन मुझे जब भी मिलती हैं
उसी मुकाम पर वैसी ही खडी दिखाई देती हैं
इन्हीं के लिए तो कभी तारे तोड लाने की
मेरी कोशिश होती थी
वैसा ही कहीं कुछ अब भी बचा है
इन्हीं के लिए नदी की धार में डूबते-डूबते बच
और पेड से गिर जाने पर भी
मेरी आँखों में मौत का ख्ाौफ नहीं
बल्कि उनके लिए कुछ कर पाने की खुशी
महीनों आँखों में तैरती रही थी

क्या करूँ उनकी आँखों का जिन्हें
बाँचने के लिए दुनियाँ की किसी भी भाषा में
अभी शब्द ही नहीं बने
ऐसा मेरे ही साथ नहीं दुनिया में
हर किसी के साथ घटा है
अन्तर सिफर् इतना ही कि कोई अटकता है
और किसी के भीतर अटने की जगह नहीं होती

वे भी तो छोडकर चली जाती हैं हमारी ही तरह
नदी और कुँए के पर अपना सब कुछ
तभी तो एक महाकवि ने अपनी नाँव तक
वहाँ बाँधने से मना कर दिया था
और उनके मन के साथ दूसरे
महाकवि के मन का जहाज पल-पल डोल रहा था
विद्वज्जन! यही कुछ मैं भी
अपनी इस कविता में कह रहा था
जिसकी गवाही दो महाकवि
पहले ही दे गये हैं।



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