संगम पर कुम्भ
संगम पर
उमड रहा है आस्था का सैलाब।
उत्तरायण होते सूर्य के स्वागत में
श्रद्धावनत है त्रिावेणी।
मोक्ष की कामना लिये
आ रहा है रेले पर रेला।
उपासना के सपनों से गुलजार है परिक्षेत्रा,
आराधना के स्वरों से गुंजायमान है परिवेश।
मंत्राों का चल रहा है जाप, तंत्राों की चल रही है साधना।
प्रवचनों की मच गयी है धूम।
स्वर्ग-नर्क पर चल रही हैं चर्चायें,
पाप-पुण्य की सुनायी जा रही हैं कथायें-अंतर्कथायें।
अभिभूत भीड को, भव्य मँच से
बारम्बार बताया जा रहा है कि यह जगत तो मिथ्या है।
क्या लेकर आये थे, क्या लेकर जाना है।
यह जनम तो पिछले जन्मों का हरजाना है।
पुराणों की धूल झाडकर
बाहर निकाले जा रहे हैं संदर्भ,
विस्मृति की कन्दराओं से बाहर आ रही हैं स्मृतियाँ।
धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष पर
अलग-अलग कोणों से डाला जा रहा है प्रकाश।
धर्मभीरूओं को
पुनः-पुनः समझाया जा रहा है दान-पुण्य का महात्म्य।
दुरुस्त किए जा रहे हैं वर्णाश्रम के हिलते पाये,
सनातनी मन को दी जा रही है आवाज।
किंवदंतियों के श्रीमुख से प्रसारित हो रही हैं
देव-देवांगनाओं के स्वर्ग से धरती पर उतरने की सूचनायें।
चमक उठी हैं साधुओं की आँखें,
महामण्डलेश्वरों की बाँछें खिल गयी हैं,
प्रदीप्त हो उठे हैं जगद्गुरुओं के मुखमण्डल,
उफान पर है परम्परागत अखाडों की शान।
धर्म संसद की हकार में
सुनायी दे रहा है मनुष्य की जगह, मंदिर का संकल्प।
जोर-शोर से लगाया जा रहा है ’हम दो, हमारे दस‘ का नारा,
हिन्दुओं के वर्चस्व पर संकट की दी जा रही है दुहाई।
उधर, चाक्षुष बिम्ब पर
लगी हुई है चैनलों की निगाह।
सद्यःस्नाताओं पर पड रहा है अतिरिक्त फोकस
आपादमस्तक कीचड में सनी
एक निर्वस्त्रा विदेशी युवती, बन गयी है आकर्षण का केंद्र
पुष्ट उरोजों-नितम्बों के लिये जा रहे हैं क्लोजअप,
नामी पत्रिाकाओं के लिए।
’ड्रीम गर्ल‘ के नृत्य को मिल रहा है यथोचित कवरेज।
मौज में आ गये हैं संत-महंत।
बिंदास भक्त-भक्तिनों पर बरस रहा है आशीर्वाद, बाबाओं की ही चाँदी ही चाँदी है।
चिमटा गाडे, भस्म लपेटे, चिलम फूँकते
जटाजूटों की जुगुप्साजनक मुद्राओं के जारी हो रहे हैं चित्रा।
दिखाए जा रहे हैं हठयोग के चमत्कार।
मीडिया में छाया है शाही स्नान।
नागा बन गये हैं ब्रांड एम्बेसडर,
’लोगो‘ बन गये हैं उनके लिंग।
उनकी उग्रता को मिल रही है अग्रता।
कुम्भ सींच रहा है धर्म की जडें।
घर-गृहस्थी से होकर बिसभोर
लाखों कल्पवासी तपा रहे हैं अपनी देह
बना रहे हैं कल्पना में स्वर्ग की सीढी।
परलोक सुधरने की लालसा में
लोग लगा रहे हैं गोते पर गोते,
इहलोक के संकट कटने की भी कर रहे हैं कामना।
मन में है विश्वास
कि दूर हो जायेंगे दैहिक, दैविक, भौतिक ताप।
हालांकि बारम्बार नहानों के बाद भी
कम नहीं हो रहे इनके दुःख-दर्द।
इनके जीवन में बढती जा रही है रेत।
बिगडती ही जाती है इनकी दीन-दशा।
महाकुम्भ से छलककर
इनके अपने हिस्से में, अब तक
कहाँ आयी अमृत की कोई बूँद!
उम्मीद पर
उम्मीद पर
चल पडे हैं कामगार
कि मिल ही जाएगा न कोई काम।
उम्मीद पर
जुते हैं मजदूर
कि देर-सबेर मिलेगी ही दिहाडी।
उम्मीद पर
चले जा रहे हैं दफ्तरों की ओर कार्मिक
कि आज नहीं तो कल
मिलेगी ही पगार, एरियर के साथ।
उम्मीद पर
भरते जा रहे हैं फार्म-दर-फार्म युवा बेरोजगार
कि कैसे भी एक दिन
लग ही जाएगी उनकी नौकरी।
उम्मीद पर
बढ रहे हैं बुनकर कारखानों की ओर
कि आधा-तिहा ही मिले, बैठकी से बेहतर है लगे रहना।
उम्मीद पर
किसान कर रहे हैं बावग और पलेवा
कि इतनी तो हो ही जाएगी फसल
कि कतर ब्यौंतकर बची रहे मरजाद।
हालांकि
सरकारों के पुण्य,
वैश्वीकरण के प्रताप,
और उदारीकरण की कृपा से,
बह रही है छँटनी की हवा झकझोर
और नौकरी की शर्तें हो चली हैं काफी कठोर।
भंग होते जा रहे हैं सरकारी भर्ती बोर्ड
और शिथिल पडता जा रहा है ट्रेड यूनियनों का जोर।
फिर भी, गनीमत है
कि सरकारी बयानों और अनुमानों में
बढ रही है सरकारी नौकरियाँ, अवसरों की भरमार है।
बुनकर-कल्याण का जैसे-जैसे बढ रहा है शोर
वैसे-वैसे खामोश होते जा रहे हैं करघे
और बढती जा रही है गद्दियों की रौनक।
उपहार में मिल रही है राजयक्ष्मा।
ईनाम में मिल रही है भुखमरी।
किसानों के मुनाफे के लिए
सरकारों ने इतना कुछ कर दिया है
कि खेती हो चुकी है घाटे का सौदा
और किसान थक-हारकर
करने लगे हैं बंद रास्तों का चुनाव,
जबकि मृत्यु कभी नहीं हो सकती जीवन का विकल्प।
उधर,
एक शीर्षक विहीन नाटक के मनमोहक दृश्य में
सत्ताएं पूरी रौ में कर रही हैं कदमताल।
किसानों की चिंता में दुबले हुए जा रहे हैं सारे दल।
खाद-पानी, बीज-सीज और समर्थन मूल्य की तख्तयाँ लिए
चहलकदमी कर रहा है सरकारी अमला
और व्यवस्था एकदम चाक-चौबंद है।
इसी बीच दर्शकों के बीच से
कोई खडा हो गया है और जोर-जोर से कुछ बोलने लगा है।
सभी उसे चुप कराने की कोशिश कर रहे हैं
किसी को सुहा नहीं रहा यह व्यवधान।
कि तभी मँच पर गूँजता है संवाद,
कृपया शाँति से काम लीजिए
परेशान होने की कोई बात नहीं,
अब काहे की चिंता और कैसी समस्या!
लाख दुःखों की एक दवा की जा चुकी है ईजाद,
कारपोरेट खेती का सूर्य उदित हो रहा है।
कुछ इसके आगाज पर फिदा हैं
कुछ इसके अंजाम पर सशंकित,
बहुतेरे बूझ ही नहीं पा रहे यह पहेली
कि तबतक पर्दा गिर जाता है।
घडयाली आँसुओं की बरसात के इस मौसम में,
नाउम्मीदी से भरी इस बेहाल दुनिया में,
ताज्जुब है,
अभी उठा नहीं है लोगों का सरकारों पर से भरोसा,
जिन हाथों को उठा लेना चाहिए संघर्ष का परचम
वे उठ रहे हैं मदद या मृत्यु की याचना में,
गरीबी ऐसी है मजबूरी, भूख ऐसी है जरूरत, कर्ज ऐसा है महाजाल!
अभी हर बार वे आस भरी नजरों से देखते हैं उधर ही
जिधर कोई नहीं रह गया है उनका।
अभी अँधेरे में झिलमिला रही है शायद
कहीं रोशनी की कोई लकीर।
मुहावरे में नहीं,
सचमुच, अभी उम्मीद पर कायम है दुनिया।
जबकि झूठी उम्मीदों से बाहर निकलकर
हक की खातिर, उठ खडे होने का सही समय है यह।
यह समय डूबते हुओं को बचाने के लिए
किनारे से शोर मचाने का नहीं,
पानी में उतर जाने का भी है।
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