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१६८० में इंदिरा गांधी सत्ता में दुबारा लौटी थीं। सत्ता में वापसी के साथ इंदिरा गाँधी ने मीडिया के क्षेत्रा में जो सबसे महत्त्वपूर्ण काम किया था, वह था, जन-माध्यम के रूप में टेलीविजन का विस्तार। वैसे तो टेलीविजन भारत में छठे दशक में आ चुका था। लेकिन अस्सी के बाद ही इसे भारत के हर हिस्से में पहुंचने का अवसर मिला था। इन पचीस सालों में यह माध्यम अन्य सभी माध्यमों की तुलना में सबसे ज्यादा शक्तिशाली, व्यापक और प्रभावशाली नजर आता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि प्रिंट और रेडियो का प्रभाव या विस्तार कम हुआ है। अभी हाल में प्रसारित आंकडों से तो यह भी प्रतीत होता है कि भारत में प्रिंट मीडिया का भी उल्लेखनीय विस्तार हुआ है। यही नहीं, थोडे समय तक पीछे हटने के बाद अब रेडियो भी बदले हुए रूप-रंग और अंदाज के साथ अपना विस्तार कर रहा है। एफ.एम. के कारण अब सामुदायिक माध्यम के रूप में रेडियो की उपयोगिता बढी है। लेकिन इसी अवधि में जिस एक और माध्यम ने अपनी उपस्थिति तेजी से दजर् कराई है वह है इंटरनेट। इस माध्यम ने संदेशों को किसी भी रूप में निर्मित करना, भंडारित करना और सम्प्रेषित करना आसान बना दिया है। इंटरनेट अंतर्वैयक्तिक माध्यम है यानी जिसमें एक साथ एक ही समय में अलग-अलग स्थानों पर बैठे लोग परस्पर संवाद कर सकते हैं। अंतर्वैयक्तिकता का यह गुण अब रेडियो और टेलीविजन माध्यमों में भी व्यक्त होने लगा है। इंटरनेट जैसे लगभग क्रांतिकारी माध्यम का इसी अवधि में आगमन भी हुआ और धीरे-धीरे शिक्षित और मध्यवर्गीय हिस्से के लिए इसने एक जरूरी माध्यम के रूप में अपनी जगह भी बना ली है। अब भी इस माध्यम पर अंग्रेजी भाषा का वर्चस्व है लेकिन यह वर्चस्व भी धीरे-धीरे कम हो रहा है और हिन्दी सहित दूसरी भाषाओं के लिए भी पर्याप्त गुंजाइश निकल रही है। ध्यान देने की बात यह है कि इन नये माध्यमों ने पुराने माध्यमों को बाहर नहीं किया है बल्कि पहले की तुलना में पुराने माध्यमों की पहुंच और प्रसार में विस्तार किया है। मसलन, प्रिंट मीडिया को ही लें। किसी भी परिवार के लिए एक-दो या अधिकतम तीन अखबारों से अधिक खरीदना लगभग असंभव है। लेकिन अब कोई भी व्यक्ति तीन से भी अधिक अखबारों को उनकी वेबसाइट के जरिए पढ सकता है। यही नहीं वह रेडियो, टेलीविजन और इंटरनेट के जरिए हर समय दुनिया के नवीनतम समाचारों से अवगत हो सकता है। इसी तरह टेलीविजन के आगमन ने फिल्मों की दर्शक संख्या को सीमित नहीं किया है बल्कि उनकी संख्या कई गुना बढा दी है। सिनेमाघरों में जाकर फिल्म देखने वालों की संख्या यदि बहुत नहीं बढी है तो इतनी कम भी नहीं हुई है कि इससे फिल्म निर्माताओं के लिए फिल्म बनाना जोखिम प्रतीत होने लगे। इसके विपरीत संदेशों के भंडारण और प्रतिलिप्यंतरण की जो नयी प्रौद्योगिकी विकसित हुई है वह उनकी गुणवत्ता को दीर्घावधि तक और अधिकतम स्तर तक सुरक्षित रखने वाली तो है ही, वह सस्ती भी है और उसका उपयोग करना भी अपेक्षाकृत आसान है।
मीडिया पर स्वामित्व का स्वरूप
मीडिया के इस विस्तार के साथ यह जरूरी था कि मीडिया से जुडे संस्थानों, सेवाओं और उद्योगों का विस्तार भी हो। मीडिया के मौजूदा परिदृश्य की जब बात की जाएगी तो इन पक्षों पर भी बात करना जरूरी हो जाता है। मसलन, जब भारत में टेलीविजन का विस्तार हो रहा था तब यह विस्तार सिर्फ दूरदर्शन का हो रहा था। दूरदर्शन ही अपने विस्तार के साथ एक से दो चैनलों और दो से तीन चैनलों की तरफ बढ रहा था। लेकिन जैसे ही सैटेलाइट की उपलब्धता बढी और इस बात का दबाव बढा कि इस क्षेत्रा को देशी और विदेशी निजी कंपनियों के लिए भी खोल दिया जाए और जब ऐसा कर दिया गया तो दूरदर्शन का वर्चस्व भी धीरे-धीरे घटने लगा। आज भारत में दूरदर्शन अन्य बहुत सी टेलीविजन कंपनियों की तरह एक टेलीविजन कंपनी है जिसका स्वामित्व भारत सरकार के पास है। इसी तरह रेडियो के क्षेत्रा में भी निजी कंपनियों का वर्चस्व तेजी से बढता जा रहा है। अलबत्ता प्रिंट मीडिया और सिनेमा पहले की तरह सरकारी स्वामित्व से पूरी तरह मुक्त है और इंटरनेट अपनी प्रकृति में ही हर तरह के स्वामित्व से मुक्त दिखाई देता है। स्वामित्व के संदर्भ में मीडिया के पूरे परिदृश्य को देखें तो इस बात को आसानी से समझा जा सकता है कि पहले के किसी भी समय से आज विभिन्न संचार माध्यम सरकारी नियंत्राण से ज्यादा स्वतंत्रा दिखाई देते हैं।
लेकिन स्वतंत्राता की इस दृष्टि समझने के लिए मीडिया के स्वामित्व की प्रकृति को समझना आवश्यक है। जनसंचार माध्यमों के स्वामित्व को इस ढंग से नहीं समझा जा सकता है कि संदेशों का निर्माण और संप्रेषण करने वाली कंपनी का स्वामित्व किसके पास हैं। संदेशों का निर्माण करने वाली कंपनी निजी भी हो सकती है, सार्वजनिक भी। इसी तरह टेलीविजन, रेडियो या और कोई भी उपकरण जो ग्रहीता तक संदेशों को पहुँचाता है वह कंपनी भी स्वदेशी और विदेशी हो सकती है। लेकिन इस बात को समझना जरूरी है कि निर्माण से लेकर संप्रेषण तक हर क्षेत्रा जिसमें पूंजी चाहे देशी लगी हो या विदेशी, निजी लगी हो या सार्वजनिक, और प्रसारण और वितरण के अधिकार किसी के भी हाथ में क्यों न हों, अंततः उस राष्ट्र में सत्ता का वर्ग चरित्रा क्या है इससे स्वामित्व का प्रश्न तय होगा। इसमें पूंजी और प्रौद्योगिकी की उपलब्धता भी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। यदि देश में न पर्याप्त पूंजी है और न ही आवश्यक प्रौद्योगिकी तो मीडिया के विस्तार के लिए उसे उन देशों की मदद लेनी होगी जहाँ से इन्हें हासिल किया जा सकता है। इस संदर्भ में भारत न तो अमेरिका की तरह विकसित देशों की श्रेणी में आता है और न ही अफ्रीका और एशिया के ऐसे देशों की श्रेणी में जो प्रौद्योगिकी के लिए पूरी तरह विकसित देशों पर निर्भर हैं। इसके विपरीत भारत ने कृत्रिाम उपग्रह प्रणाली, कम्प्यूटर सोफ्टवेयर और टेलीविजन, रेडियो और सिनेमा माध्यमों के लिए उत्पादों के निर्माण में काफी हद तक आत्मनिर्भर है और इसने धीरे-धीरे एक विश्व-बाजार भी विकसित किया है।
हमें इस बात को स्वीकार करना चाहिए कि सभी उपलब्ध माध्यम विकास के एक खास चरण में अपरिहार्यता में बदल जाते हैं। रोटी, कपडा और मकान की तरह टेलीविजन और इंटरनेट बुनियादी जरूरतों में न गिने जाएं लेकिन इसी वजह से उनकी उपेक्षा नहीं की जा सकती। हमें इस सच्चाई को समझना होगा कि जिन देशों में आबादी के एक अच्छे-खासे हिस्से की बुनियादी जरूरते भी पूरी नहीं हो रही है वे देश जनसंचार माध्यमों के मामले में भी काफी पिछडे हुए हैं। दरअसल, माध्यमों के विकास के प्रश्न को इस रूप में भी देखा जाना चाहिए कि किसी देश की राजसत्ता उसे आबादी के कितने हिस्से तक पहुंचाने में कामयाब रही है। यदि लोग व्यक्ति-स्तर पर इन्हें हासिल नहीं कर पाते हैं तो क्या सामुदायिक-स्तर पर इनकी उपलब्धता को सुनिश्चित किया गया है? इसी से जुडा हुआ सवाल यह भी है कि उपलब्धता के बावजूद क्या आबादी के हर हिस्से को इनकी जरूरत है और क्या ये माध्यम उनके रोजमर्रा के जीवन के अंग बन गये हैं। भारत जैसे देश में, आज रेडियो, टेलीविजन, टेलीफोन, मोबाइल और सिनेमा को सिर्फ मध्यवर्ग और उच्च वर्ग के माध्यम नहीं कहा जा सकता। टेलीफोन के विस्तार ने उन मजदूरों के लिए भी अपने घर वालों से निरंतर संफ में रहना मुमकिन कर दिया है, जिनसे सिर्फ कुछ साल पहले तक चिट्ठी-पत्राी के अलावा संफ का कोई रास्ता नहीं था। इसी तरह शहरों और कस्बों में रहने वाले कामगारों और मजदूरों के रोजगार के लिए भी मोबाइल एक अच्छा सम्फ साधन बनता जा रहा है।
उपग्रह प्रणाली और डिजिटल टेक्नोलॉजी ने जनसंचार माध्यमों की लागत को कम कर दिया है और उसकी प्रकृति कुछ इस तरह की बन गई है कि इनका अधिकाधिक विस्तार ही इनमें लगाई गई पूंजी के लिए लाभप्रद हो सकता है। स्वामित्व के प्रश्न को तीन चरणों में विभाजित कर देखा जा सकता है। पहले चरण में उपग्रह प्रणाली की स्थापना, टेक्नॉलाजी की उपलब्धता आदि आते हैं और आमतौर पर इस चरण का नियंत्राण सीधे सरकार के हाथ में होता है और यदि ऐसा नहीं भी होता है तो इस स्तर पर किसी भी तरह का व्यवसाय सरकार की निगरानी और अनुमति के बिना नहीं होता। इस स्तर पर लगाई गई पूंजी और टेक्नोलाजी दोनों की प्रायः मध्यम स्तर के पूंजीपति-वर्ग की क्रय-शक्ति से परे होती है। दूसरे चरण में अन्य मीडिया से संबंधित उपकरणों का निर्माण और तीसरे चरण में मीडिया उत्पादों को ग्रहीताओं तक पहुंचाने की गतिविधियाँ शामिल हैं। दूसरे चरण और तीसरे चरण में निजी पूँजी की भूमिका महत्त्वपूर्ण हो जाती है। किसी मीडिया कंपनी की स्थापना चाहे वह अखबार समूह हो या टेलीविजन और / या रेडियो कंपनी हो। स्पष्ट ही निजी पूंजी का पहला उद्देश्य लाभ कमाना होता है। इसी वजह से वह इस क्षेत्रा में प्रवेश करता है। लगायी गई पूँजी की सुरक्षा और लाभ की बढती मात्राा इस बात से तय होती है कि व्यावसायिक प्रतिद्वंद्विता, टेक्नोलॉजी में बदलाव, कानूनी और राजनीतिक अडचनें और ग्रहीताओं की बदलती रुचि व्यवसाय की बढोतरी में अवरोध बनकर उपस्थित हो सकते हैं। इसलिए निजी कंपनियां निरंतर ऐसे प्रयत्न करती हैं कि चुनौतियों का सामना करते हुए वे इस व्यवसाय में सफलतापूर्वक टिके रह सकें। यदि वे इन प्रयत्नों में नाकामयाब रहते हैं तो अंततः वे व्यवसाय से बाहर हो जाते हैं।
भारत जैसे देश में जहाँ मीडिया में सार्वजनिक और निजी दोनों तरह का स्वामित्व रहा है, आज चुनौती कुछ अलग तरह की है। टेलीविजन और रेडियो में जहाँ सिर्फ सार्वजनिक स्वामित्व ही था, आज निजी और विदेशी कंपनियां भी मौजूद हैं। लेकिन ऐसा नहीं है कि सभी के लिए समान स्वतंत्राता और अवसर प्राप्त हैं। निजी और सार्वजनिक और देशी और विदेशी का प्रश्न अब भी मौजूद है। मसलन, टेलीविजन प्रसारण के क्षेत्रा में निजी कंपनियों के वर्चस्व में बढोत्तरी दूरदर्शन की कीमत पर भी हुई है। इसलिए अब भी देश की आबादी का वह हिस्सा जो टेलीविजन प्रसारण के लिए दूरदर्शन पर ही निर्भर है कई ऐसे महत्त्वपूर्ण प्रसारणों से वंचित रह जाता है जिनके प्रसारण अधिकार किसी निजी कंपनी ने हासिल किए हों। क्रिकेट का प्रसारण इसका ज्वलंत उदाहरण है। ऐसे में सरकार कानून द्वारा भी निजी कंपनियों को इस बात के लिए मजबूर करती है कि वे प्रसारण में दूरदर्शन को भी भागीदार बनाएँ। दूसरा तथ्य यह है कि टेलीविजन का एक चैनल स्थापित करना बहुत महंगा नहीं है लेकिन उसे प्रतिद्वंद्विता में टिकाए रखना बहुत चुनौतीपूर्ण काम हो जाता है। ऐसी प्रतिद्वंद्विता में छोटी कंपनियां प्रायः बडी कंपनियों के मुकाबले में ज्यादा देर तक टिक नहीं पाती। यह महज संयोग नहीं है कि टेलीविजन के क्षेत्रा में पांच-छह बडी कंपनियां ही अपना वर्चस्व बनाए हुए हैं और विविध तरह के चैनल उन्हीं कंपनियों के द्वारा चलाए जा रहे हैं। इस तरह टेलीविजन कंपनियां भी निरंतर बडी और बहुराष्ट्रीय पूंजी के नियंत्राण में जाने के लिए अभिशप्त हो जाती है। आज भारत में टेलीविजन प्रसारण दूरदर्शन के अलावा मुख्य रूप से न्यूज कार्पोरेशन, सोनी, सीएनएन आदि विदेशी प्रसारण कंपनियों और जी., इनाडु आदि देशी कंपनियों के नियंत्राण में है। इंडिया टुडे और एनडीटीवी आदि भारतीय कंपनियां भी विदेशी कंपनियों के साथ गठजोड करके अपना विस्तार करने में सक्रिय हैं।
मीडिया के क्षेत्रा में इस प्रवृत्ति को भी ध्यान में रखना होगा कि किसी एक मीडिया क्षेत्रा में स्वामित्व का विस्तार दूसरे मीडिया क्षेत्राों में भी अपने पाँव फैलाने के लिए संभवनाएं पैदा कर देता है। टेलीविजन से रेडियो और फिर प्रिंट मीडिया में इस तरह के विस्तार की संभावनाएं भी बढती जा रही है। फिर भी, प्रत्येक क्षेत्रा में शक्तिशाली समूह ऐसे किसी प्रतिद्वंद्वी को प्रवेश से रोकने का प्रयत्न करते हैं जो उनके वर्चस्व के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। टेलीविजन के क्षेत्रा में विदेशी कंपनियों का स्वागत करने वाली भारतीय कंपनियां प्रिंट मीडिया के क्षेत्रा में विदेशी अखबारों के आगमन का लगातार विरोध करती रही हैं। दूसरी तरफ, इस बात को भी ध्यान में रखना होगा कि न्यूज कार्पोरेशन जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियां प्रति वर्ष सौ करोड डालर का नुकसान उठाकर भी भारत सहित एशिया के देशों में अपना विस्तार करने में जुटी हैं ताकि वे दीर्घावधि के लिए इसके विशाल बाजार पर अपना नियंत्राण कायम कर सकें। नुकसान उठाने की यह क्षमता किसी भारतीय मीडिया कंपनी के लिए आसान नहीं है।
मीडिया पर वर्चस्व ः
मीडिया के स्वामित्व से ही मीडिया पर वर्चस्व का सवाल भी जुडा हुआ है। मीडिया के संसाधनों पर जिनका स्वामित्व होगा, वर्चस्व भी उन्हीं का होगा, इसे समझना मुश्किल नहीं है। लेकिन यह सवाल इतना सरल भी नहीं है। मीडिया में यह वर्चस्व न तो बहुत स्पष्ट रूप से व्यक्त होता है और न ही यह वर्चस्व चुनौतीहीन होता है। लोकतांत्रिाक देश में मीडिया अपनी एक लोकतांत्रिाक छवि बनाने और बनाए रखने की कोशिश करता है। यदि वह अपने मालिकों के हितों का वाहक बनकर रह जाता है तो उसकी साख नहीं बनी रह सकती। साख का न बना रहना मीडिया व्यवसाय के लिए घातक साबित हो सकता है। इसलिए मीडिया अपने को किसी भी तरह के वैचारिक नियंत्राण से मुक्त होने का दावेदार बनकर उपस्थित होता है। वैचारिक नियंत्राण से मुक्त होने के दावे का लाभ यह होता है कि वह सब तरह के विचारों के एक स्वतंत्रा मंच की तरह अपने को पेश करने में कामयाब हो जाता है। लेकिन इस प्रक्रिया में वह न सिर्फ बडी सहजता से जनविरोधी विचारों को प्रचारित करने की गुंजाइश निकाल लेता है बल्कि जनपक्षीय विचारों को भी महज एक तरह के विचार के रूप में पेश करने में कामयाब हो जाता है। इस तरह वह अपने को अधिक तटस्थ और अधिक स्वतंत्रा होने के दावेदार के रूप में मनवाने में कामयाब हो जाता है।
मीडिया जन-समर्थन हासिल करने के लिए ऐसी विचारधाराओं का भी सहारा लेता है जो व्यापक जनमानस की चेतना का हिस्सा बने हुए हैं और जो अंततः उन्हें यथास्थितिवादी बनाए रखने या एक वर्ग के रूप में संगठित होने से रोकने में मददगार होते हैं। इस दृष्टि से राष्ट्र और धर्म के प्रति लोगों की जडबद्ध चेतना को उकसाने की मीडिया की कोशिशों को देखा जा सकता है। यदि अमरीका के लोग राष्ट्र के नाम पर न केवल एकजुट हो जाते हैं बल्कि इराक और अफगानिस्तान पर हमले की अनुमति भी अपने शासकों को दे देते हैं तो इसके पीछे राष्ट्रवाद की उस विचारधारा का भी हाथ है जिसे पूंजीवाद के विकास के साथ लगातार जनचेतना का हिस्सा बनाए जाने की कोशिश की जाती रही है। जिस राष्ट्रवादी भावनाओं ने भारत जैसे औपनिवेशिक देशों की जनता को एकजुट होकर संघर्ष करने और इस तरह दासता से मुक्त होने के लिए प्रेरित किया था वही राष्ट्रवाद पडोसी देशों के प्रति शत्राुता की भावना को जिंदा रखने, उन पर हमला करने और लाखों-लाख निरीह लोगों के कत्लेआम को जायज ठहरा देता है। धर्म, राष्ट्र और जातीयता के झूठे गौरव के नाम पर दुनिया में कितने युद्ध लडे गये और युद्ध की तैयारियों के नाम पर कितनी जनशक्ति और धनशक्ति का अपव्यय किया गया, न केवल इसे समझना जरूरी है बल्कि इस झूठे गौरव को फैलाने में मीडिया किस तरह हथियार बनता रहा है, इसे भी समझना जरूरी है। मीडिया तो क्रिकेट जैसे खेलों के माध्यम से भी इस गौरव का प्रचार करने से बाज नहीं आता और वह क्रिकेट में हार-जीत को राष्ट्र के लिए जीवन-मरण का प्रश्न बना देता है। इसलिए वर्चस्व के प्रश्न को सही वैचारिक परिप्रेक्ष्य में समझना भी जरूरी है।
वर्चस्व का तीसरा पहलू यह है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों या बडी पूंजी का विस्तार मीडिया को साम्राज्यवादी हितों का पोषक बनने के लिए मजबूर कर देता है। राष्ट्र और साम्राज्य के हितों की टकराहट में वह हमेशा राष्ट्र के हितों को साम्राज्य के हितों का अनुचर बनाकर पेश करता है। यह महज संयोग नहीं है कि इराक पर अमरीकी हमले की धमकिय के समय दुनिया के अधिकांश देशों के कथित स्वतंत्रा न्यूज चैनलों में केाई भी इराक का पक्ष रखने को तैयार नहंी था। उनकी खबरों का जरिया साम्राज्यवादी ऐजेसियां थीं, उनका राजनीतिक दृष्टिकोण अमरीकी प्रशासन तय कर रहा था, यहाँ तक कि मीडिया की भाषा का चयन भी अमरीकी प्रशासन द्वारा हो रहा था। यह स्थिति इसलिए बनी क्योंकि दुनिया के अधिकांश न्यूज चैनल या तो अमरीकी मीडिया कंपनियों के सीधे नियंत्राण में थे या इन मीडिया कंपनियों के साथ उनका गठजोड था। अल जजीरा जैसे कुछ अपवादों को छोड दें तो अधिकांश न्यूज चैनलों के लिए अपनी स्वतंत्राता को बनाये रखना नामुमकिन है। यहां यह नहीं भूलना चाहिए कि अल जजीरा को भौतिक रूप से खत्म करने के लिए अमरीका क्या-क्या नहीं करता रहा है।
मीडिया की अंतर्वस्तु :
जनसंचार माध्यमों द्वारा जिन संदेशों का उत्पादन और संप्रेक्षण होता है वह कोई भौतिक वस्तु नहीं है। ये संदेश दरसअल सांस्कृतिक उत्पाद हैं। इनके द्वारा लोगों की मानसिक जरूरतों को पूरा किया जाता है। जिस प्रकार भौतिक वस्तुओं के उत्पादों के लिए कुशल मजूदरों और प्रशिक्षित इंजीनियरों आदि की नियुक्ति की जाती है उसी तरह संदेशों के उत्पाद के लिए भी इस क्षेत्रा में कुशल और प्रशिक्षित व्यक्तियों की मदद ली जाती है। ये लोग पत्राकार, लेखक, कलाकार आदि के रूप में जाने जाते हैं। समाज का यह वर्ग बौद्धिक रूप से अधिक सजग और स्वाभिमानी होता है और अपने कार्य को करने के लिए अधिक स्वतंत्राता भी चाहता है। लेकिन जब कोई पत्राकार, लेखक या कलाकार किसी अन्य के लिए अपनी लेखनी या कला का उपयोग करता है तो उसे कुछ हद तक अपनी स्वतंत्राता का परित्याग करना पडता है। यदि वह किसी और के लिए नहीं लिख रहा है, तब भी अपने पाठकों तक पहुंचने के लिए उसे प्रकाशकों की जरूरत होती है। स्पष्ट ही प्रकाशक के लिए पुस्तक का प्रकाशन और वितरण एक व्यवसाय है और पुस्तक में प्रकाशित सामग्री का महत्त्व उसके लिए इतना ही है कि वह उस पुस्तक की बिक्री में मददगार हो। यही बात फिल्मकारों पर भी लागू होती है। फिल्म निर्माण में लगने वाली पूंजी और उसके वितरण की जो व्यवस्था बनी हुई है उसके कारण फिल्मकार को कई तरह के समझौते करने पडते हैं। इन दोनों की तुलना में प्रिंट मीडिया और न्यूज चैनल कम स्वतंत्रा होते हैं। वहां तो पत्राकार प्रायः वेतनभोगी होते हैं और इन्हें उसी नीति के तहत अपना काम करना होता है, जिस नीति का निर्माण मालिकों ने किया होता है। इस नीति के तहत ही उन्हें अपनी स्वतंत्राता का उपयोग करना होता है। फिर भी, इस बात को समझने की जरूरत है कि मीडिया में काम करने वाले लेखक और कलाकार पूरी तरह अपनी स्वतंत्राता नहीं खोते। मीडिया कंपनियों को भी उनकी जरूरत होती है। इसलिए वे भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में सौदेबाजी कर सकने की स्थिति में होते हैं। यह सौदेबाजी मिलने वाले वेतन के लिए भी होती है और काम करने की स्वतंत्राता के रूप में भी।
इसके बावजूद कुछ मामलों में मीडिया कंपनी के मालिकों और उन निष्पादकों के बीच हितों की एकता कायम हो जाती है। दोनों का हित इस बात में होता है कि ये माध्यम बने रहें और फलते-फूलते रहें। इसके लिए वे ऐसे प्रयास करते हैं जिनसे उनका चैनल, उनका अखबार, उनकी फिल्में और उनकी पुस्तकों का बाजार बना रहे। इस संदर्भ में पिछले डेढ दशक में हुए परिवर्तनों को ध्यान में रखना जरूरी है। अखबार में पाठकों की संख्या की भूमिका होती है। लेकिन इसके बावजूद यह भी सही है कि बडे अखबार समूहों की आय का जरिया अब अखबार की खरीद पर निर्भर नहीं है। उनकी आय का बडा जरिया विज्ञापन है। यही कारण है कि बहुत से अखबार लागत मूल्य से काफी कम कीमत पर अखबार बेच रहे हैं और पाठकों से होने वाली आय का बडा हिस्सा हॉकरों के कमीशन पर चला जाता है। लेकिन यह भी सही है कि अखबार केा मिलने वाले विज्ञापन इस बात से तय होते हैं कि इस अखबार के पाठके कितने हैं। इसी तरह टेलीविजन के चैनल भी अपने दर्शकों पर प्रत्यक्ष रूप में बहुत कम निर्भर है। यहां भी विज्ञापनों की बडी भूमिका है और विज्ञापनों को हासिल करने के लिए दर्शकों की संख्या का महत्त्व है।
इसका अर्थ यह नहीं लगाया जाना चाहिए कि पाठक और दर्शक अखबारों और टेलीविजन की अंतवर्स्तु निर्धारित करने में न्याय पर आधारित एक आधुनिक समतावादी समाज बनाने के लक्ष्य को अपने एजेंडे का हिस्सा नहीं बना पाता।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्राता और सूचना का अधिकार ः
किसी भी देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्राता और सूचना प्राप्त करने के अधिकार से ही उसके लोकतांत्रिाक होने का प्रमाण मिलता है। लोकतांत्रिाक देशों में कानून द्वारा लोगों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्राता प्रदान की जाती है। लेकिन प्रायः यह देखा गया है कि सरकारें इस स्वतंत्राता को नियंत्रिात करने की कोशिश करती रहती हैं। यह कोशिश जनता के बीच शांति और सद्भावना बनाए रखने के नाम पर की जाती है। लेकिन देखा गया है कि सत्ताहीन लेाग जनता के बीच अपनी छवि को बचाने के लिए भी ऐसा करते हैं। इस बात से इंकार नही |