अम्मा के कमरे में मनहूसियत तारी थी। ये मनहूसियत तो पूरे घर में डेरा डाले है। जब कुछ नहीं था, तब ये घर कितना गुलजार हुआ करता था और आज जब सब कुछ है तो फिर जाने क्यों, मनहूसियत के सिवा इस घर में कुछ नजर नहंी आता। तब घर में इतने कमरे कहाँ थे? इतनी सुविधाएँ कहाँ थीं? नगरपालिका के सार्वजनिक नल से तब पानी बाल्टियों में भरकर घर की टंकी में जमा किया जाता था। बिजली नहीं थी। लालटेन और चिमनी के जरिए रात गुजारी जाती थी। आज एक छत के नीचे सब सुविधाएँ मौजूद हैं। कदम-कदम पर नल की टोंटियाँ हैं। बस, नल खोलो और पानी हाजर! दोनों तल्लों में बाथरूम और पैखाना है। दो कमों में बाथरूम अटैच है। बस कमी ये है कि अब घर में रहने वाले कम हो गए। पंछियों के पर उगे नहीं कि सब अपने नए घरौंदे बना कर चले गए। बचा रहा सिर्फ यादों का मकबरा.... वाकई ये घर अब यादों का मकबरा ही तो है। इसी घर से सब भाई-बहनों ने तालीम हासिल की। अच्छी-अच्छी जगहों पर काम पा कर टा-टा, बाय-बाय कर विदा हो लिए। उसका मन बेहद उदास हो रहा था। वह अम्मा के पास बिस्तर पर बैठ गया। बाबूजी पान का पिटारा लेकर बैठे पान का बीडा बना रहे थे। अम्मा के चेहरे पर झुर्रियां बढ गई हैं। उसने अम्मा की हथेली को अपने हाथ पर रखकर सहलाया। ’लगता है अब इस घर में तिलचट्टे और मकडयां ही रहेंगी...।‘‘ कहकर अम्मा रोने लगीं। वह बहुत दिनों के बाद घर आया था। अम्मा के पास दुखों की लम्बी फेहरिस्त थी। बेटे की समझ में न आया कि अम्मा को कैसे सांत्वना दे। वाकई घर की छत पर और दीवारों पर मकडयों के बेशुमार जाले हैं और किचन के सिंक के नीचे तो तिलचट्टों ने अड्डा बना लिया है। सम्भवतः रात-बिरात ये तिलचट्टे पूरी आजादी से घर में आवारागर्दी करते होंगे। अम्मा को मोतियाबिन्द के कारण धधला दिखाई देता है। कहते हैं रात-बिरात तिलचट्टे उडते भी हैं। अंधेरे का हर धब्बा उन्हें तिलचट्टे के रूप में दिखता होगा। बाबूजी ने बताया कि आजकल बहुत चिडचिडी हो गई हैं, तुम्हारी अम्मा। बात-बेबात रोती रहती हैं। उसने सोचा कि रोए क्यों न! इतना बडा घर और रहने के लिए सिर्फ दो प्राणी। दो टाइम नौकरानी आकर खाना पका जाती है। अम्मा परसों पैखाना जाते समय गिर गई थीं, जिससे उनके कंधे की हड्डी उखड गई थी। डॉक्टर ने हाथ मोड कर झुला दिया था और कहा था कि एक माह ’बेड रेस्ट‘ करवाइये। बाबूजी ने उसे फोन किया और वह दौडा चला आया। मंझला और छोटा भाई भी आते, लेकिन काम की अधिकता के कारण वे तत्काल नहीं आ सके थे। मोबाइल के जरिए ऐसी ही मजबूरी तो बतलाई थी, दोनों ने। उसकी पत्नी ने कितना रोका था उसे कि आप अपनी सेहत पर ध्यान दिया कीजिए। बस, खबर सुनी नहीं कि दौडे चले जाते हैं। क्या आपने ठेका ले रखा है? वह पत्नी का तर्क सुन गुस्सा गया और बिना खाए-पिये उसने घर छोड दिया था। व दवा की दुकान में भीड बहुत थी दो-तीन धंधे ही तो ऐसे हैं, जहाँ आजकल भीड के दर्शन होते हैं। एक तो दवाई की दुकान, दूजी पेट्रोल-टंकिया और तीसरे, धर्म-आस्था से सम्बंधित व्यवसाय.... दवाई-दुकान के काउण्टर पर कई सेल्समेन व्यस्त थे। उसने एक पतले-दुबले सेल्समैन से पूछा, जिसके दांत जबडे सहित बाहर नजर आ रहे थे-’’काकरोच मारने की दवा चाहिए?‘‘ सेल्समेन ने बडी मासूसियत से उसे घूर कर देखा और अपने हाथ की पर्ची के मुताबिक दवा लगाने में मशगूल हो गया। उसे समझ में न आया कि सेल्समेन ने ऐसा बर्ताव क्यों किया? शायद उसने काकरोच शब्द को न समझा हो, सो उसने हाथ की अंगुलियों से तिलचट्टे का बिम्ब बनाते हुए स्पष्ट करना चाहा-’’काकरोच यानी वो घर की अंधेरी जगहों में नहीं लग जाते हैं.... तिलचट्टे....।‘‘ सेल्समेन, दूसरे ग्राहक की दवा-पर्ची पढते हुए बोला-’’यहाँ नहीं मिलता।‘‘ ऐसा लगा कि मसूडों सहित दांत बार निकल आएंगे। उसने शांत स्वर में पूछा-’’तो फिर कहाँ मिलेगी?‘‘ तब तक दवा खरीदते, बगल में खडे मोटे से ग्राहक ने मुस्कुराते हुए हस्तक्षेप किया-’’खेती-किसानी वाली जो बस-स्टेंड में दुकान है न, वही लोग चूहा, तिलचट्टा, खटमल मारने वाली दवा रखते हैं।‘‘ वह समझ गया। पैदल ही था। उसने घडी पर निगाह डाली। दिन के बारह बज रहे थे। कई दिनों से बारिश नहीं हुई थी, सो गुस्सैल आसमान से सूरज की किरणें कोडे बरसा रही थीं। बदन पसीने से चिपचिपा रहा था। सितम्बर का शुरूआती हफ्ता था। आसमान पर कभी बादल आते और कभी ऐसी धूप कहर बरसाती कि जान निकल जाए। कहते हैं कि ऐसा मौसम डॉक्टरों का ’सीजन‘ कहलाता है। इस मौसम में मच्छर और मरीजों की बेतहाशा बढत होती है। उसने जेब से चश्मा निकाला। धूप-छांव वाला चश्मा। चश्मा पहनने से कुछ राहत मिली। यदि वह टकला न होता और सिर पर प्रचुर मात्राा में बाल होते तो धूप उसका कुछ न बिगाड पाती। जिस बात पर उसका बस नहीं, उसके लिए वह क्या कर सकता था? मन में ख्याल आया कि जेब से रूमाल निकाल कर सिर पर डाल लें, लेकिन इससे नमूना बनने का खतरा था। इसलिए रूमाल से माथे का पसीना पोंछते हुए वह तेज कदमों से बस-स्टेंड की तरफ चल पडा। फव्वारा चौक से स्कूल चौराहा तक भीड बहुत थी, उसके बाद भगतसिंह तिराहा का रास्ता सूना मिला। उसने दांए-बांए की दुकानें देखीं। वे ग्राहकों के बिना पहले जैसी ही वीरान नजर आई। जाने क्यों ये दुकानें सदियों से क्यों अभिशप्त हैं। इनके ग्राहक क्यों नहीं आकर्षित होते? तिराहे पर विक्की की पान की दुकान दिखी। विक्की दुकान पर था। गोल-मटोल वैसे का वैसा विक्की। उसके न बाल उडे थे और न चेहरा बदला था। उसे लगा कि कभी फुर्सत में पत्नी से विक्की की मुलाकात करवाएगा और बताएगा कि विक्की उसका सहपाठी है। वह दोनों समवयस्क हैं। जाने क्यों वह असमय बूढा दिखने लगा था। उसके बाल सफेद हुए और जल्दी झड भी गए। बत्तीस में से पांच दांत अब तक शहीद हो चुके हैं। मूंछ, दाढी के अलावा परसों जब वह घर से चलने लगा था तो पत्नी ने टोका था कि रुकिए जी। आपने गौर किया है? आपकी भौंह का एक बाल आधा काला और आधा सफेद है।‘‘ अब भौंह के बाल भी सफेद होने लगे। वह घबरा गया। उसकी निगाह के सामने मध्यप्रदेश के भूतपूर्व स्पीकर श्रीनिवास तिवारी का चेहरा आ गया। क्या वह कुछ सालों बाद उन्हीं जैसा दिखने लगेगा? नहीं, वह तत्काल आईना लेकर आंगन में चला गया। वहाँ तेज धूप में उसने जब ध्यान से अपनी बाई भौंह का निरीक्षण किया तो पाया कि वाकई एक बाल सफेद हो रहा है। उसके हाथ में तेज धार वाली पतली कैंची थी। उसने कैंची की नोक का सावधानी से इस्तेमाल किया और इस बाल को जड से उडा दिया। उस पर बुढापे का हमला बहुत तेजी से हुआ था। जब कि आज वह एक बैंक का सफल प्रबंधक है। रायपुर शहर में अपना एक शानदार डुप्लेक्स बंगला है। नई चमचमाती कार है। अच्छा बैंक-बैलेंस है। पत्नी, बच्चे, स्वयं और अन्य जरूरी सामानों का उसने बीमा करवाया हुआ है। कहीं किसी रिस्क का सवाल ही नहीं। बच्चों को बोर्डिंग में डाला हुआ है। पत्नी घर के पास ही एक संस्था में म्यूजिक टीचर है। तकरीबन पचास-साठ हजार रुपये हर साल वह भारत सरकार को आय-कर के रूप में अदा करता है। सभी कुछ ’सेटल्ड‘ है। कोई कमी नहीं, सिवाए सिर के इस उजडे चमन के। जो बाल उडे वे अब सफेद होते जा रहे हैं। वह तो भला हो ’हेयर-डाई‘ करने वालों का! वरना अब तक तो वह मुहल्ले के बच्चों का नानाजी-दादाजी कहलाता। उसका स्वास्थ्य भी ठीक नहीं रहता। काम की अधिकता और शहरी जीवन की आपाधापी के कारण दिन में देा बार गैस की दवा लेनी पडती है। सुबह नाश्ते के बाद ब्लड-प्रेशर की एक गोली खाना जरूरी होता है। सप्ताह में दो-तीन बार सिर-दर्द की गोली का इस्तेमाल न करे तो सिर से भेजा निकल कर हाथ में आ जाया करे। ऐसा खतरनाक सिरदर्द होता है उसे। उसने अपनी कई आदतें बिगाड ली हैं। मसलन, देसी स्टाईल वाले पैखाने में वह, खुलासा नहीं कर पाता। कुर्सी वाले कमोड की आदत पड चुकी है। घर मे इत्मीनान से आधा घण्टा अखबार पढते हुए शौच करता है वह तब जाकर दिन ठीक गुजरता है। इसीलिए नाते-रिश्ते में यदि जाना पड जाए तो वह बीमार हो जाता है। पैतृक मकान में भी उसने कुर्सी वाला कमोड लगवा रखा है। अम्मा को जब घुटने के दर्द की शिकायत थी, तब उसने पांच हजार का चेक बाबूजी के नाम भेज दिया था कि वह घर में एक पैखाने को ’मॉडिफाई‘ करवा लें। वाकई कमोड लग जाने से अम्मा को काफी आराम मिल गया था। पहले वह पैखाना-पेशाब जाने के नाम से घबराया करती थीं कि एक बार बैठ जाने के बाद उठ पाएंगी भी या नहीं। वैसे पत्नी उसकी इस फिजूलखर्ची पर बहुत चिडचिडाई थी। पति अपने परिवार वालों पर एक भी धेला खर्च करे तो पत्नियां बिना टोके रह ही नहीं सकती। जब उसने समझाया कि फिर हमें अम्मा को यहीं रायपुर ले आना होगा। तभी उनकी सही देखभाल हो पाएगी। पत्नी का गुस्सा भडक गया। ’’काहे, क्या हमारी ही जिम्मेदारी है, उनकी देखभाल की। मंझले और छोटे भइया काहे उनका खयाल नहीं रखते। उनकी क्या कोई जिम्मेदारी नहीं। और वो जो चटर-चटर मुँह चलाती है आपकी बहनें, और जब भी आती है, घर से कुछ न कुछ ले ही जाती है, उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं बनती। एक आपई श्रवन-कुमार हैं का?‘‘ इस लडाई का केाई अंत नहीं हेाता। हाँ, गुस्से और तनाव को नियंत्राण न कर पाने के कारण वह भी पत्नी से काफी लड लेता और फिर एक-दो टाईम का खाना नहीं खाता। फिर जब स्थिति सामान्य होती, तब कहीं जाकर वह खाना खाता। उसे मालूम है कि सब कुछ पास होने के बावजूद उसे पास बहुत कुछ नहीं है। इसी ’बहुत कुछ‘ को पाने के लिए वह परेशान रहता है। अम्मा-बाबूजी की सेवा करके उसे बहुत सुकून मिलता है। उसे लगता है कि वह खोया हुआ ’बहुत कुछ‘ यही तो है। लेकिन क्या इस जीवन में यह सम्भव हो पाएगा? फिर भी वह पत्नी से छिपाकर अम्मा-बाबूजी के नाम पर हर माह दो हजार रुपये भेज दिया करता है। एक हजार तो नौकरानी ले जाती है, बाकी से अम्मा सब्जी वगैरा खरीदा करती है। बाबूजी की पेंशन से घर के अन्य खर्च चलते हैं। मंझला भाई भी छठे-छमाहे चार-पांच हजार रुपये अम्मा के हाथ में रख जाता है। हाँ, छोटू निकम्मा है। वह पूरी तरह अपनी ससुराल पर आश्रित हो गया है। वह अपने जन्म-स्थान तक को भूल चुका है। दो बहनें हैं तो अपनी-अपनी ससुराल में हैं। साल डेढ साल में ’एक्को‘ बार मैके का दौरा लगा जाती हैं। पत्नी उन्हें क्यों कोसती है, वह आज तक समझ नहीं पाया। हाँ, एक बार मूड ठीक देख उसने पत्नी से पूछ ही लिया था कि तुम अपनी ननदों से क्यों इतना खार खाए रहती हो। तब उसने बताया-’’अम्मा के शरीर पर आपने कभी ध्यान दिया है?‘‘ पत्नी का चेहरा उससे देखा नहीं गया। जब भी उसके दिल में नफरत के शोले भडकते हैं तो उसका सुंदर-सा चेहरा चुडैलों जैसा हो जाता है? उसने अनभिज्ञता प्रकट की। ’’उनके हाथ में सोने की चार चूडयां हुआ करती थीं, अब सिर्फ दो बची हैं। उनके गले में मंगल-सूत्रा के अलावा सोने की चैन हुआ करती थी, वह कहां गायब हो गई। करधन और पायल की कोई गिनती न थी, लेकिन अब उनके सारे जेवरात कहां गए? गहना ले जाएं बेटियां और उनका गू-मूत साफ करें बहुएं। ऐसा होगा नहीं। बेटियां काहे उनकी सेवा नहीं करतीं।‘ सिर्फ बटोरना जानती हैं वे लोग।‘‘ वह क्या जवाब देता। बेटियां तो पराया धन होती हैं। और दुनिया के तमाम दामाद उसकी तरह बेवकूफ तो नहीं होते कि पत्नी के दबाव में आकर ससुराल में महीनों पडे रहें। इसी से चिढकर उसने एक बार अपनी पत्नी से कह दिया था कि जितने दिन मैं अपनी ससुराल में रहा हूँ, उतना दिन तुम अपनी ससुराल में नहीं गुजारी हो। कि लेकिन वही बात अंधे के आगे रोए, अपने दीदा खोए। वह अपने जीवन से कतई संतुष्ट न था... और अक्सर ’मदर-इंडिया‘ का वह गीत गुनगुनाया करता- ’’दुनिया मे जो आए हैं तो जीना ही पडेगा। जीवन है अगर जहर तो पीना ही पडेगाड्ड‘‘ व और ये विक्की, उसके बचपन का देास्त, जिसका ध्ंाधा उतना जमा नहीं है लेकिन फिर भी कितना बिंदास, कितना स्वस्थ, कितना टनाटन दिखता है। विक्की उसे देख कर मुस्कुराया-’’और मुकेश भाई, दूज का चंाद हो गए हो भईया?‘‘ वह जवाबन मुस्कुराया। वह जानता है कि उसकी मुस्कान काफी हद तक पेशेवराना मुस्कुराहट है। उसमें आत्मीयता का पुट डालने की कला उससे क्या छिन चुकी है??? उसने विक्की से एक सिगरेट मांगी। उसने सोचा कि गर्मी का मुकाबला गर्मी से किया जाए। जिस तरह से लोहा लोहे को काटता है, उसी तरह से गर्मी, गर्मी को काटेगी। ’’इस बार बहुत दिनों के बाद....!‘‘ विक्की उसी तरह मुस्कुराते हुए बोला। ’’हाँ यार! नौकरी और बाल-बच्चों के कारण इधर आना नहीं हो पाता।‘‘ ’’तो इसी तरफ ट्राँसफर क्यों नहीं करवा लेते?‘‘ प्रश्न तो अतिसाधारण था। लेकिन क्या यह सम्भव है? पत्नी इस छोटे से कस्बे में रहना ही नहीं मांगती। बच्चों के लिए यहाँ वैसा स्कूल कहाँ, जैसा कि रायपुर में है। उसने मन ही मन सोचा कि यहाँ कोई लाईफ है। सब कुछ वैसा ही ठहरा-ठहरा सा। कहीं कोई परिवर्तन नहीं। कहीं मनोरंजन का साधन नहीं। पैसा कमाए भी तो आदमी खर्च कहाँ करे। ऊपर से बूढे माता-पिता की मान्यताएँ... बहू नौकरी नहीं करे। सिर्फ घर सम्भाले और अस्तित्वहीन बन कर जीवन गुजारे। वो तो जब ख्ाबर मिली कि अम्मा का पैर फिसला है और वह गिर पडी हैं तो उसे आना पड गया। अम्मा के कंधे की हड्डी उखड गई थी। बाबूजी ने नीचे वाले मुहल्ले के एक पुराने पहलवान केा बुलाकर उसे बैठवा दिया था। अम्मा को आराम था। लेकिन मोतियाबिन्द और मधुमेह के कारण उन्हें अब दिखलाई कम देता है। जब मुकेश घर पहुंचा तो अम्मा उसे देखते ही रो पडी थीं। बाबूजी ने बतलाया कि अब इसे तेज रोशनी में ही ठीक दिखलाई पडता है। थोडा भी अंधेरा हो तो कुछ नहीं दिखता है। उसने कहा कि अम्मा को रायपुर ले जाता हूँ। वहाँ आँख के अच्छे-अच्छे डॉक्टर हैं। लेकिन बाबूजी तैयार नहीं हुए। बोले, अब इसे और कितना देखना है। दोनों आँखों का मोतियाबिंद का आपरेशन हो चुका है। जब नगर में कांटेक्ट-लेंस नहीं आया था, तब आपरेशन हुआ था। परिणामतः आँखों पर मोटे-मोटे काँच का भारी चश्मा लगाना पडता है। चश्मा आँख पर न रहे तो फिर सब कुछ अंधेरा ही अंधेरा रहता है। बाबूजी ने बतलाया कि चूंकि मधुमेह पर नियंत्राण हो
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