आपका फोन।‘ ’कहते हुए मेरे सहायक ने मुझे कॉर्डलेस पकडा दिया। हाथ में फोन लेकर मैंने कहा, ’मैं बोल रहा हूँ। आप कौन? उधर से स्पष्ट उच्चारण कान में घुला, ’सर प्रणाम। मैं मोना सइकिया बोल रही हूँ। जेएनयू, नई दिल्ली से। ’प्रसन्न रहो‘ मैंने कहा। पूछा, ’फोन किसलिए किया?‘ उधर से आती आवाज मधुरतर हुई-’सर आफ कथा-साहित्य में संघर्ष-चेतना‘ पर पीएच.डी. के लिए शोध कर रही हूँ। आपसे कुछ समय चाहती हूँ।‘ मैंने उसके गाइड का नाम पूछा। जो नाम उसने बताया, उसे सुनकर अच्छा लगा। जानता हूँ, उन्होंने मेरा अधिकांश साहित्य पढा है। ऐसा वे मिलने पर बताते रहते हैं। कभी-कभी सन्देह होता है कि वे शीलवश ऐसा कहते हैं, क्योंकि अपने लेखन में उन्होंने उपन्यासों या कहानियों की चर्चा करते हुए कहीं मेरा या मेरी किसी रचना का नाम नहीं लिया है।‘ मैंने हँसकर मोना से पूछा-’तुम्हारे गाइड ने मेरे उपन्यास पढे हैं? मेरी कहानियों को पढा है उन्होंने? चहकती हुई आवाज आई-’पढा ही होगा, तभी तो यह विषय उन्होंने मेरे लिए निश्चित किया है।‘ मैंने पूछा-’तुम्हें कितना समय मुझसे चाहिए‘। जवाब आया-’कम से कम एक सप्ताह का।’ मैंने कहा-’यह तो कठिन लगता है। आज के पन्दरहवें दिन मैं दो सप्ताह के लिए उडीसा जा रहा हूँ। वहाँ से लौटकर तुम्हारी यूनीवर्सिटी में एक दिन के लिए आने का समय निकालूँगा। एक मौखिक परीक्षा में परीक्षक हूँ। तुम उस यात्राा में कुछ घंटे का समय ले सकती हो।‘ मोना सइकिया ने जवाब में फिर सवाल कर दिया, ’सर, आप उडीसा के किस शहर तक जा रहे हैं? किस तारीख्ा को? किस गाडी से रिजर्वेशन है आपका? किस क्लास में हैं? कहाँ चढेंगे गाडी पर?‘ फोन पर उसके सवालों की गोलाबारी से चिढ हुई। हँसी भी आई। चिढ को हँसी में घोलकर मैंने कहा-’तुम सी.आई.डी. अफसर हो क्या?‘ वह खुलकर हँसी। उसने कहा-नहीं, मैं मीडिया पर्सन हूँ। ख्ाबरों के लिए सीआईडी वालों से मुकाबला करने की हिम्मत रखती हूँ। आपसे यह सब इसलिए पूछ रही हूँ कि मैं भी आफ साथ उडीसा की यात्राा कर लूँगी। मुझे कई दिन तक आफ साथ रहने, आफ साहित्य को समझने का सुनहरा मौका मिल जाएगा। आपका समय भी बरबाद नहीं होगा।‘ मुझे अजीब लगा। कैसी दुस्साहसी लडकी है। मेरे साथ हफ्तों ट्रेन में और उडीसा में बिताना चाहती है। मैंने उसके दुस्साहस पर कुठाराघात करते हुए कहा, ’मैं बाइस तारीख को नीलांचल एक्सप्रेस के ए.सी. फर्स्ट क्लास में वाराणसी स्टेशन पर चढूँगा और पुरी तक जाऊँगा। वहाँ स्टेट बैंक के गेस्ट हाउस में रुकूँगा। ब्रह्मपुर यूनीवर्सिटी में कुछ गोपनीय कार्य करूँगा और अगले महीने की पाँच तारीख को पुरी से उसी ट्रेन के उसी क्लास में चढकर वाराणसी तक वापस आऊँगा।‘ एक साँस में इतनी बात कहकर अपनी समझ से मैंने उसे हडका दिया। उधर से जो जवाब आया, उसने मुझे हतप्रभ कर दिया-’ठीक है सर!‘ मैं लगभग आपे से बाहर हो गया। अपने पर काबू पाता हुआ बोला, ’तुम क्या कहीं की राजकुमारी हो कि मेरा समय लेने के लिए इतने रुपये खर्च करोगी? मैं तो सरकारी काम से जा रहा हूँ। सारा खर्च वे भरेंगे। और दूसरी बात यह कि तुम क्या समझती हो, ऐसी किसी अकेली लडकी को मैं अपने साथ इतनी लम्बी यात्राा में साथ रहने की अनुमति दूँगा?‘ बहुत कंट्रोल करने पर भी मेरी आवाज में तल्ख्ाी आ ही गयी। उधर की आवाज सहमी हुई सी थी, ’नहीं सर ऐसी कोई बात नहीं। अच्छा सर प्रणाम।‘ कहकर उसने फोन काट दिया। सच कहूँ तो मेरे वार्धक्य को हल्की ठेस सी लगी। उसने न क्षमा माँगी, न सारी सर कहा, न सफाई देने जैसा कुछ कहा-’नहीं सर ऐसी कोई बात नहीं। अच्छा सर प्रणाम।‘ चलो पिण्ड छूटा। कैसे-कैसे लोग कैसे-कैसे प्रस्ताव लेकर आ जाते हैं? भीतर का कुतूहली लेखक कुछ कुलबुलाया-’बुढऊ! तुम रसिक ही नहीं हो तो लेखक क्या ख्ााक बने फिरते हो? भीतर के कुलीन बुजुर्ग ने हडका लिया-’चुप, लेखक की औलाद। लम्पट बनाना चाहता है मुझे लेखक बनाने की आड में? सातवाँ दशक पूरी करने वाली अपनी उम्र नहीं दिख रही? अपने पोते-पोतियाँ और, दोहते-दोहतियों की बढती उम्र की लाज भी नहीं तुझको। बेशरम कहीं का, बडा आया लेखक की औलाद।‘ इस तरह डाँट खाकर कुलबुलाता लेखक ठंडा पड गया। दो वाराणसी कैन्ट स्टेशन पर कुछ मित्रा, कुछ शिष्य, कुछ श्रद्धालु, कुछ ईर्ष्यालु छोडने आए थे। नीलांचल एक्सप्रेस समय से आधा घंटा विलम्ब कर धडधडाती हुई आ पहुँची। ए.सी. फर्स्ट क्लास में चढा। दो नहीं, चार बर्थ वाला कूपा था। कुछ लोग बैठे थे। अपना ब्रीफकेस नीचे वाली बर्थ पर रख कर मैं बाहर गैलरी में आकर उन लोगों को विदा करने लगा, जो मना करने के बावजूद चढ आए थे। वे लोग ज्यों ही नीचे उतरे, गाडी चल पडी। अपनी बर्थ पर आया। एक बंगाली चेहरे वाले प्रौढ बैठे थे। मैं भी बैठ गया। बंगाली दिखने वाले सज्जन ने ऊपर की ओर इशारा करते हुए बहुत शिष्ट लहजे में कहा, ’मेरी बर्थ ऊपर है।‘ मैंने मुस्कुरा कर उनके बैठे रहने के सहज अधिकार का स्वागत किया। सामने वाली बर्थ की ओर निगाह गयी। एक सुन्दर युवा-खूब स्वस्थ चेहरे और वैसी ही शालीन वेशभूषा-सादे किन्तु आकर्षक पैंट-शर्ट में दिखा। बगल में उतनी ही सुन्दर स्वस्थ युवती गहरे धानी रंग की रेशमी साडी पहने बैठी थी। अपनी ओर मुझे देखते पाकर दोनों ने एक आत्मीय मुस्कान के साथ नमस्कार के लिए हाथ जोडे। वैसी ही मुस्कान के साथ मैंने भी हाथ जोड दिये। अपरिचय मेरी आँखों में झलका होगा, तभी युवक ने कहा, ’सर मैं आनन्द और यह मोना, मेरी वाइफ। नाम सुना हुआ लगा। अगले ही क्षण अपने समूचे व्यक्तित्व से मुस्कुराती हुई मोना बोल पडी-’मोना सइकिया। आपसे फोन पर बात हुई थी। लेकिर सर आप फक्र न करें। फालतू पैसे मैंने नहीं खर्च किए हैं। मेरे हजबैण्ड रेलवे में बडे अफसर हैं। हम दोनों को ए.सी. फर्स्ट का पास मिला है।‘ मोना का वाक्य पूरा होते ही हम तीनों खिलखिला कर हँस पडे। अपरिचय का विन्ध्यांचल लाँघा जा चुका था। वे दोनों दिल्ली से आ रहे थे। शायद तीसरे सहयात्राी भी दिल्ली से ही आ रहे थे। वाराणसी से चढने वाला अकेला मैं। ’कोई बात नहीं। अच्छा सर, प्रणाम‘, कहकर उस दिन उसके फोन काट देने का अर्थ मेरी समझ में अब आया। मेरी दोनों आशंकाएँ निर्मूल सिद्ध हो गयीं-न मेरे साथ ए.सी. फर्स्ट में यात्राा करना उसके लिए मँहगी फजूलखर्ची थी, न वह अकेली मेरे साथ यात्राा करने का दुस्साहस कर रही थी। इतना खुलकर हँस लेने के बाद सब कुछ बहुत सुखद लगने लगा। मैंने चुपचाप बैठे बंगाली सज्जन से कहा-’अब आप भी परिचितों की जमात में शामिल हो लें। इन दोनों का परिचय आप को मिल ही गया। मैं...., मेरा वाक्य अधूरा छूट गया, क्योंकि मोना मेरा नाम बताकर मेरी विद्वता और शराफत का कसीदा काढने लगी थी। उसके रुकते ही बंगाली सज्जन ने हाथ जोडकर अपना परिचय दिया, ’अभिजित भट्टाचार्य, ओडसा में स्टेट बैंक में अधिकारी हूँ।‘ अब उस कक्ष में सब सबके परिचित थे। अटेन्डैन्ट आया। बिस्तर बिछा देने की अनुमति चाहता था। मैंने कहा-’अभी रहने दो। खाना-पीना हो जाने के बाद बिछा देना।‘ मोना ने कहा-’टेबल्स निकालकर लगा दो।‘ उसने निचली बर्थ के नीचे रखी तिपाइयाँ खींचकर दोनों बर्थों के बीच की जगह में लगा दीं। मोना ने एक पर थर्मस निकालकर रखा। स्टील के चार छोटे गिलासों में कॉफी डाल कर लेने का आग्रह किया। कॉफी की खुशबू से ही तबियत खुश हो गयी। मैंने अटेन्डेन्ट के लिए घंटी बजाई। उसके आने पर कहा’ ’पैंट्रीकार के इंचार्ज को बुला लाओ।‘ इंचार्ज आया तो मैंने उससे कहा-’यह असली और अच्छी कॉफी है। सूँघकर और चखकर देखो।‘ वह लजाया हुआ खडा रहा। उसको बुलाने का रहस्य मैंने सहयात्रिाय को बताया। पिछले महीने इसी में यात्राा कर रहा था। कॉफी मँगायी। जो काफी आई उसमें दूध, चीनी और कॉफी को छोडकर पता नहीं, किस किस चीज के मिश्रण का गंदा स्वाद था। उसे बुलाकर पूछा तो उसने कहा था-’असली काफी है साब। नेस्कैफे।‘ मैंने सोचा इसे बता और दिखा दूँ। असली और अच्छी कॉफी क्या होती है। तीन दूसरे दिन सबेरे मोना आनन्द के साथ आया नाश्ता करके चारों सहयात्राी तृप्त हुए। उसके बाद दिनभर वह मेरी कहानियों और मेरे उपन्यासों के विषय में एक-एक बात खोद-खोदकर पूछती रही। नोट्स लेती रही। उसी बीच बातचीत में पता चला कि उसके अफसर पति आनन्द की भी साहित्य में गहरी रुचि है। कभी-कभी वे भी बहुत अच्छी टिप्पणी करते। कभी बहुत अच्छे सार्थक प्रश्न पूछते। यहाँ तक कि अभिजित भट्टाचार्य भी साहित्य-रसिक निकले। शाम तक लगने लगा कि वह ट्रेन का केबिन न होकर उच्चकोटि की साहित्यिक संगोष्ठी का कक्ष है। मोना ने कहा-’सर आपकी एक कहानी है ’फैसला‘। वह आफ किसी संग्रह में नहीं है। शायद किसी पत्रिाका में भी वह कहानी नहीं छपी। मेरे गाइड का कहना है कि उन्नीस सौ पिच्चानवे छियानबे में उन्होंने किसी कहानी-संगोष्ठी में उस कहानी का आफ मुख से पाठ सुना है। वे उस कहानी से बहुत प्रभावित हैं। उन्होंने आपसे, ’फैसला‘ कहानी लेकर पढ लेने का मुझे आदेश दिया है। वह कहानी मुझे कहाँ और कब मिलेगी?‘ यह सवाल मेरी दुखती रग को छेड गया। मैंने मोना से कहा, ’मुझे स्वयं नहीं मालूम वह कहानी तुम्हें कब और कहाँ मिलेगी। मिल पायेगी ही ऐसा कहना भी मेरे लिए मुमकिन नहीं है। मेरे पास उसकी प्रति भी नहीं है। ’उदास होते हुए मैंने यह बात मोना को बताई। वह भी उदास हो गयी। आतुर होकर पूछने लगी, ’ऐसा कैसे हो गया, सर?‘ मैंने उसे उस और उस जैसी अनेक अच्छी कहानियों के एक तथाकथित प्रकाशक के पेट में समा जाने की कथा संक्षेप में सुना दी। अपने अध्यक्ष काल में मैंने पत्राकारिता का डिग्री कोर्स आरम्भ कराया। मुख्य समन्वयक मुझे ही बनना पडा। जिस बेरोजगार पी-एच.डी. डिग्रीधारी युवक को सहायक समन्वयक नियुक्त किया वह एक दिन आया। उन दिनों मेरे उपन्यास ’ग्राम देवता‘ के एक भाग पर दूरदर्शन ने एक घंटे की एक फिल्म बनाकर प्रदर्शित की थी। फिल्म इतनी खराब बनी थी कि अन्य भागों पर आगे फिल्म निर्माण की अनुमति मैंने नहीं दी। मगर उसी कारण ’ग्राम देवता‘ की माँग बढ गयी थी। मेरे सहायक समन्वयक ने उस समय अपने किसी मित्रा का प्रस्ताव सामने रखा कि वह मेरे उपन्यास का दूसरा संस्करण प्रकाशित करना चाहता है। साथ ही मेरी कहानियों का एक संग्रह प्रकाशित करने की इच्छा भी है उसकी। मेरे सहायक समन्वयक ने अपने प्रकाशक मित्रा की सहृदयता का प्रमाण प्रस्तुत करते हुए पूछा, ’वह जानना चाहता है कि आप कितनी एडवांस रॉयल्टी लेंगे।‘ दिल्ली के प्रकाशकों की रायल्टी नीति का शिकार हिन्दी का कौन लेखक नहीं है? मैं भी चकित हुआ लेकिन अपने सहायक से कहा, ’एडवांस रॉयल्टी की जरूरत नहीं है। किताबें ले जाओ। वह प्रकाशित करे। बेचे। मुझे पन्द्रह प्रतिशत रॉयल्टी वार्षिक रूप से दिया करे। अति प्रसन्न होकर मेरे सहायक समन्वयक दोनों पुस्तकों की पाण्डुलिपियाँ लेकर गये। दो महीने के बाद मुझे दोनों पुस्तकों के फाइनल प्रूफ दे गये। जब प्रूफ देखकर मैंने लौटा दिया तो मेरे सहायक समन्यक ने कहा, पन्द्रह दिन बाद दोनों किताबें छपकर आ जायेंगी। पन्द्रह दिन के बदले शायद पन्द्रह सप्ताह निकल गये तो एक दिन मैंने सहायक समन्वयक से पूछा कि मेरी दोनों पुस्तकों का क्या हुआ? चकित होने का अभिनय करते हुए उसने मुझसे पूछा-’किताबें आपको नहीं मिलीं।‘ मैंने कहा-’कौन देता? देने वाले तो तुम्हीं ठहरे। प्रकाशक के तो दर्शन भी नहीं।‘ आश्चर्य पीडत होते हुए सहायक समन्यवयक ने दुख का अभिनय किया। बोले-’मैं कल आपको किताबें लाकर दूँगा।‘ अगले दिन वे आए। अपने प्रकाशक मित्रा के ऊपर एक के बाद दूसरी आफतवियत की गाथा सुनाते रहे। मैं धैर्यपूर्वक उस झूठ-गाथा को सुनता रहा। अंत में उन्होंने बताया-’उसने कहा है कि दोनों किताबें दिल्ली में छपकर रखी हुई हैं। पन्द्रह दिन का समय उसने माँगा है। रुपये जुटाकर ले जायेगा और किताबें बाइंड करवा कर ले आयेगा। वर्षों बीत गये। मेरे सहायक समन्वयक को मेरे पास आने की विवशता से भी मुक्ति मिल गयी। मैं सेवानिवृत्त हो गया। वैसे वे जब कभी मिल जाते हैं तभी सलज्ज वादा करते हैं कि अगली बार किताबें लेकर के ही आयेंगे। सुनकर आनन्द मुस्कुराते रहे। बोले-’आप की इतनी किताबें‘ छपीं हैं। एक-दो के साथ ऐसा हो गया तो आपको फर्क नहीं पडेगा मगर नये लेखक के साथ ऐसा हो जाय तो बेचारे का हौसला ही पस्त हो जायेगा। मैंने कहा फर्क तो ख्ाास कुछ नहीं पडा। कुछ कहानियों की प्रतियाँ नहीं हैं। उन्हीं के लिए दुख है। जहाँ तक किताबें छपने का प्रश्न है, एक-एक प्रति के हिसाब के साथ रॉयल्टी ठीक समय पर प्रतिवर्ष भेजने वाले मैकमिलन प्रकाशन से लेकर एक भी पैसे रॉयल्टी और कोई हिसाब, यहाँ तक कि रजिस्टर्ड पत्रा तक का उत्तर न देने वाले वाणी प्रकाशन तक ने मेरी किताबें प्रकाशित की हैं। ऐसा विलक्षण अनुभव कभी नहीं हुआ कि किताबें छापकर उनके फाइनल प्रूफ एप्रूव करवा कर केाई प्रकाशक चुप लगा गया हो। हो सकता है, प्रकाशक का ज्यादा दोष न हो, जिनको मेरे हाथों आजीविका प्राप्त हुई उन्होंने ही उस उपकार का बदला विलक्षण तरीके से चुका दिया हो। सर हम लोग तो दिल्ली में ही रहते हैं। यह भी हो सकता है कि उस प्रकाशक ने दिल्ली के करोडपति प्रकाशकों की तरह पुस्तकों के पूरे संस्करण किसी सरकारी थोक ख्ारीद में बेच दिए हों। इस तरह सरकारी थोक ख्ारीद वाली पुस्तक उपहार स्वरूप विदेशों में या देश के अहिन्दी भाषी प्रदेशों में भेज दी जाती है। वहाँ गोदामों में पडी दीमकदार बन जाती हैं। प्रकाशक और सरकारी अधिकारी की गाँठें कुछ और पुष्ट हो गयी। लेखक और पाठक दोनों उनके लिए बेमानी हैं। मोना की इस बात पर चकित होने का कोई कारण नहीं था। दिल्ली के प्रकाशकों और उनको करोडपति बनाने में सहायक अनेक महान विद्वानों और सरकारी अधिकारियों के किस्से मैंने भी सुने हैं। एक किस्सा तो मेरे ही एक प्रकाशक ने बताया था। नये बने राज्य झारखण्ड में पुस्तक सप्लाई करने के लिए वह सरकारी अधिकार
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