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मजाज लखनवी की कुछ चुनिन्दा शायरी

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मजाज हिन्दुस्तान के नौजवानों के शायर हैं। वह अपने जमाने के सबसे ज्यादा मकबूल शायर थे। उनके यहाँ जन्दगी के हर रंग मिलते हैं। रूमानियत, यथार्थ-बोध और गहरी संवेदना तीनों का मेल मजाज की शायरी है। उनकी मोहब्बत के नज्म एवं गजल पढकर फख्र और गुरूर का अनुभव होता है।
मजाज प्रगतिशील आंदोलन के पुरोधाओं में से हैं। प्रगतिशील आंदोलन से वह इस कदर जुडे हुए थे कि जब तक जिए प्रगतिशील आंदोलन से जुडे रहे कभी पीछे नहीं हटे। इसलिए असर लखनवी (राजा मिर्जा जाफर अली खाँ) ने जब यह कहा कि मजाज उर्दू शायरी के कीट्स है लेकिन इन्हें प्रगतिशील आंदोलन रूपी भेडया उठा ले गया तो मजाज ने स्वयं इस के विरोध बहुत जबर्दस्त लेख लिखा था।
मजाज का अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय से भी गहरा रिश्ता रहा। उन्होंने मुस्लिम विश्वविद्यालय की शान में नजरे अलीगढ लिखा जो आज इस विश्वविद्यालय का मकबूल तराचा है। मजाज ने मजदूरों की प्रशंसा में भी मजदूर है हम ’गीत लिखा जो बाद में मजदूर यूनियन का तराना बना है।
 
नन्ही पुजारन
इक नन्ही मुन्नी सी पुजारन, पतली बाहें, पतली गर्दन।
भोर भये मन्दिर आयी है, आई नहीं है माँ लायी है।
वक्त से पहले जाग उठी है, नींद भी आँखों में भरी है।
ठोडी तक लट आयी हुई है, यूँही सी लहराई हुई है।
आँखों में तारों की चमक है, मुखडे पे चाँदी की झलक है।
कैसी सुन्दर है क्या कहिए, नन्ही सी एक सीता कहिए।
धूप चढे तारा चमका है, पत्थर पर एक फूल खिला है।
चाँद का टुकडा, फूल की डाली, कमसिन सीधी भोली-भाली।
कान में चाँदी की बाली है, हाथ में पीतल की थाली है।
दिल में लेकिन ध्यान नहीं है, पूजा का कुछ ज्ञान नहीं है।
कैसी भोली और सीधी है, मन्दिर की छत देख रही है।
माँ बढकर चुटकी लेती है, चुफ-चुफ हँस देती है।
हँसना रोना उसका मजहब, उसको पूजा से क्या मतलब।
खुद तो आई है मन्दिर में, मन में उसका है गुडया घर*में।

नजरे अलीगढ
सरशारे निगाहें नरगिस हूँ, पाबस्तए गेसुए सुंबुल हूँ।
यह मेरा चमन है, मेरा चमन, मैं अपने चमन का बुलबुल*हूँड्ड
हर आन यहाँ सुहबाए कुहन, एक सागरे नौ में ढलती है।
कलियों से हुस्न टपकता है, फूलों से जवानी उबलती हैड्ड
इस्लाम के इस बुतख्ााने में, असनाम भी हैं और आजर*भी।
तहजीब के इस मयख्ााने में, शमशीर भी है और सागर*भीड्ड
यॉ हुस्न की बकर् चमकती है, याँ नूर की बारिश होती है।
हर आह यहाँ एक नगमा है, हर अश्क यहाँ मोती हैड्ड
फतरत ने सिखायी है है हमको, उफ्ताद यहाँ परवाज यहाँ।
गाए हैं वफा के गीत यहाँ, छेडा है जुनू का साज यहाँड्ड
आ-आ के हजारों बार यहाँ, खुद आग भी हमने लगाई है।
फिर सारे जहाँ ने देखा है, यह आग हमीं ने बुझाई हैड्ड
हर आह है खुद तासीर यहाँ, हर ख्वाब है खुद तदवीर यहाँ।
तदवीर के पाए संगी पर, झुक जाती है तकदीर यहाँड्ड
जर्रात का बोसा लेने को, सौ बार झुका आकाश यहाँ।
खुद आँख से हमने देखी है, बातिल के शिकस्तेफाश यहाँड्ड
इस गुल कदा पारीना में फिर आग भडकने वाली है।
फिर अब्र गरजने वाले हैं, फिर अब्र कडकने वाली हैड्ड
जो अब्र यहाँ से उठेगा, वो सारे जहाँ पर बरसेगा।
हर जूए रवाँ पर बरसेगा, हर कोहे गिरॉ पर बरसेगाड्ड

नौजवान ख्ाातून से
हिजाबे फतना परवर अब उठा लेती तो अच्छा था।
खुद अपने हुस्न को परदा बना लेती तो अच्छा थाड्ड
तेरी नीची नजर खुद तेरी अस्मत की मुहाफज है।
तू इस नश्तर की तेजी आजमा लेती तो अच्छा थाड्ड
यह तेरा जर्द रुख, यह खुश्क लब, यह वहम, यह वहशत।
तू अपने सर से यह बादल हटा लेती तो अच्छा थाड्ड
दिले मजरुह को मजरुहतर करने से क्या हासिल?
तू आँसू पोंछ कर अब मुस्कुरा लेती तो अच्छा थाड्ड
तेर माथे का टीका मर्द की कस्मत का तारा है।
अगर तू साजे बेदारी उठा लेती तो अच्छा थाड्ड
तेरे माथे पे यह आँचल बहुत ही खूब है लेकिन।
तू इस आँचल से एक परचम बना लेती तो अच्छा था।

आवारा
शहर की रात और मैं नाशाद व नाकारा फिरूँ,
जगमगाती, जागती, सडकों पर आवारा फिरूँ
गैर की बस्ती है, कब तक दर बदर मारा फिरूँ,
ऐ गमे दिल क्या करूँ, ऐ वहशते दिल क्या करूँ।
ये रूपहली छाँव, यह आकाश पर तारों का जाल
जैसे सूफी का तसव्वुर, जैसा आशिक का ख्याल
आह! लेकिन कौन जाने, कौन समझे जी का हाल,
ऐ गमे दिल क्या करूँ, ऐ वहशते दिल क्या करूँ।

रात हँस-हँस कर यह कहती है, मयख्ााने में चल
फिर किसी शहनाज ए लाल ए रुख के काशाने में*चल
यह नहीं मुमकिन तो फिर ऐ दोस्त वीराने में चल
ऐ गमे दिल क्या करूँ, ऐ वहशते दिल क्या करूँ।

रास्ते में रुककर दम ले लूँ, मेरी आदत नहीं
लौट कर वापस चला जाऊँ, मेरी फतरत नहीं
और कोई हमनवॉ मिल जाये, यह मेरी कस्मत नहीं
ऐ गमे दिल क्या करूँ, ऐ वहशते दिल क्या करूँ।

मुन्तजर  है  एक  तूफाने  बला  मेरे  लिए
अब भी जाने कितने दरवाजे हैं वा मेरे लिए
हर  मुसीबत  है मेरा  अहदे  वफा  मेरे  लिए
ऐ गमे दिल क्या करूँ, ऐ वहशते दिल क्या करूँ।

इक महल की आड से, निकला वह पीला माहताब,
जैसे मुल्ला का इमामा, जैसे बनिए की किताब,
जैसे मुफलिस की जवानी, जैसे बेवा का शबाब
ऐ गमे दिल क्या करूँ, ऐ वहशते दिल क्या करूँ।

बढ के इस इन्द्र सभा का साजो सामा फूँक द,
इस का गुलशन फूँक दूँ, इसका शबिस्तां फूँक दूँ,
तख्ते सुल्ताँ क्या मैं सारा कस्रे सुल्ताँ फंक दूँ,
ऐ गमे दिल क्या करूँ, ऐ वहशते दिल क्या करूँ।

सरमाएदारी
कलेजा  फुक  रहा  है  और  जबाँ  कहने से आरी है,
बताऊँ  क्या  तुम्हें  क्या  चीज  यह  सरमाएदारी  है,
यह वह आँधी है जिसके रो में मुफलिस का नशेमन*है,
यह वह बिजली है जिसकी जद में हर दहकान का ख्ारमन*है
यह  अपने  हाथ  में  तहजीब  का  फानूस  लेती  है,
मगर   मजदूर  के  तन  से  लहू  तक  चूस लेती  है
यह इंसानी बला खुद खूने इंसानी की गाहक है,
वबा से बढकर मुहलक, मौत से बढकर भयानक है।
न  देखें   हैं  बुरे  इसने,  न  परखे  हैं  भले  इसने,
शिकंजों  में  जकड  कर  घोंट  डाले  है  गले  इसने।
कहीं यह खूँ से फरदे माल  व  जर तहरीर करती है,
कहीं यह हड्डियाँ चुन कर महल तामीर करती है।
गरीबों  का  मुकद्दस  खून  पी-पी कर  बहकती  है
महल  में  नाचती  है  रक्सगाहों  में  थिरकती  है।
जिधर  चलती  है  बर्बादी  के  सामां  साथ  चलते हैं,
नहूसत  हमसफर  होती  है  शैतान साथ  चलते  हैं।
यह  अक्सर  टूटकर  मासूम  इंसानों  की  राहों  में,
खुदा  के  जमजमें  गाती  है,  छुपकर  ख्ाानकाहों   में।
यह  गैरत  छीन  लेती  है,  हिम्मत  छीन  लेती  है,
यह इंसानों से इंसानों की फतरत छीन लेती है।
गरजती,  गूँजती  यह  आज  भी  मैदाँ  में  आती  है,
मगर  बदमस्त  है  हर  हर  कदम पर  लडखडाती  है।
मुबारक  दोस्तों  लबरेज  है  इस  का  पैमाना,
उठाओ  आँधियाँ  कमजोर  है  बुनियादे  काशाना।

ख्वाबे सहर
मेहर सदियों से चमकता ही रहा अफलाक पर,
रात  ही  तारी  रही  इंसान  की  अदराक  पर।
अक्ल  के  मैदान  में  जुल्मत  का  डेरा ही रहा,
दिल  में  तारिकी दिमागों में अंधेरा ही  रहा।
आसमानों  से  फरिश्ते  भी  उतरते  ही  रहे,
नेक  बंदे  भी  खुदा  का  काम  करते  ही  रहे।
इब्ने  मरियम  भी  उठे  मूसाए  उमराँ भी उठे,
राम व गौतम भी उठे, फिरऔन व हामॉ  भी  उठे।
मस्जिदों  में  मौलवी  खुतवे  सुनाते  ही  रहे,
मन्दिरों  में  बरहमन  श्लोक  गाते  ही  रहे।
एक न एक दर पर जबींए शौक घिसटती ही रही,
आदमियत जुल्म की चक्की में पिसती ही रही।
रहबरी  जारी  रही,  पैगम्बरी  जारी  रही,
दीन  के  परदे  में,  जंगे  जरगरी  जारी  रही।
अहले बातिन इल्म के सीनों को गरमाते ही रहे,
जहल  के  तारीक साये  हाथ  फैलाते  ही  रहे।
जहने  इंसानी  ने  अब, औहाम के जुल्मान में,
जिंदगी  की  सख्त  तूफानी  अंधेरी  रात  में।
कुछ नहीं तो कम से कम ख्वाबे सहर देखा तो है,
जिस तरफ देखा न था अब तक उधर देखा तो है।



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