|
आधुनिक उर्दू शायरी में मजाज और उनके काव्य-संग्रह ’आहंग‘ की क्या जगह है यह आज हिन्दी-उर्दू के साहित्यकारों को बताने की जरूरत नहीं है। जनता के शायर मजाज को मैं एक प्रेमी-स्वभाव और शिद्दत से चाहने वाले भाई की हैसियत से जानती हूँ। उन्हें अपने एक आदरणीय शिक्षक, एक मानवता-प्रेमी और सौन्दर्योपासक व्यक्ति की हैसियत से जानती हूँ। वह सौन्दर्य जो केवल नाक-नक्श या रूप-रंग तक ही सीमित नहीं होता बल्कि जो ईमानदारी और मुहब्बत में होता है, जो निर्मल एवं निर्दोष विचार में होता है, जो जीवन के प्रत्येक मनोरम क्षण में होता है और प्रकृति के प्रत्येक मनमोहक निखार में होता है।
मेरी नजर में उनके व्यक्तित्त्व की एक झलक उनकी ही एक नज्म ’तआर्रुफ‘ की चंद पंक्तियों में मिल जाएँगी ः
खूब पहचान लो ’इसरार‘ हूँ मैं, जिन्से उल्फत का तलबगार हूँ मैं
इश्क ही इश्क है दुनिया मेरी, फतनए अक्ल से बेजार हूँ मैं
छेडती है जिसे मिजराबे अलम, साजे फतरत का वही तार हूँ मैं।
आगे कहते हैं-
ऐब जो हाफज व ख्ौय्याम में था, हाँ कुछ उसका भी गुनहगार हूँ*मैं
जिंदगी क्या है गुनाहे आदम, जंदगी है तो गुनहगार हूँ मैं
कुफ्र व अल्हाद से नफरत है मुझे, और मजहब से भी बेजार हूँ*मैं
हूर व गलमा का यहाँ जक्र नहीं, नौए इंसाँ का परस्तार हूँ मैं।
अपने इस भाई से जुडी मेरी बहुत सी यादें हैं। कुछ स्पष्ट तथा कुछ सुनी-सुनाई। हम दोनों की उम्र में १२ साल का अन्तर था। अतः उनके बचपन की बातें बुजुर्गों की देन है। इन यादों में लज्जत भी है लेकिन साथ-ही-साथ कसक भी और एक प्रकार का अपराध-बोध भी। हम उस वक्त अपनी मध्यवर्गीय रूढयों से जकडे हुए थे। वक्त वापस नहीं आता। केवल पछतावा ही होता है।
हम दोनों बहन उन्हें जग्गन भैया कहती थीं। उचित होगा कि मैं यह बताती चलूँ कि उनका नाम ’जग्गन‘ क्यूँ पडा। उनका नाम पिता जी के नाम ’सिराजुल हक‘ की तजर् पर ’इसरारुल हक‘ रखा गया था। दूसरे भाई का नाम ’अन्सारुल हक‘ था जो घर में ’अन्सू‘ कहलाते थे। सफया आपा ’सफ्फो‘ और मैं ’मद्दो‘। उनका नाम ’अस्सू‘ होना चाहिए था किन्तु जग्गन रखने की वजह मुझे यह बतलाया गया कि प्रायः नवजात शिशु चौबीस घंटे में से अठारह घंटे सोता है लेकिन इस बच्चे का मामला इससे उल्टा था। रात के अंधेरे में उसकी नजरें ज्यादातर जच्चाखाने की टिमटिमाती हुई लालटेन पर जमी रहती थीं। इस कारण लालटेन यदि बन्द होती तो पौ फटने के बाद ही। जैसे जन्दगी में रोशनी से मुहब्बत और तलाश वह अपने स्वभाव में ही लेकर आया हो। भले आगे जाकर उनका निजी जीवन अंधेरे से उलझता रहा हालाँकि वे जीवन भर वह रोशनी की तलाश करते रहे।
उनके व्यक्तित्व की एक अन्य विशेषता जो आखिरी साँस तक उनके साथ रही वह था उनका निर्दोष स्वभाव जो उन्हें हर दौर में बच्चों में बच्चा बना देता था। मेरी गुडयों की शादी में काजी का काम वह अंजाम देते थे। सावन आता तो आँगन के पेड पर झूला डालना तथा झूलाने की जिम्मेदारी भी उन्हीं की थी। खूब तेज-तेज और ऊँचा-ऊँचा झुलाते तो हम चीखते-चिल्लाते और वह कहकहे लगाते। कोई खेलकूद ऐसा न था जिसमें उन्हें दिलचस्पी न हो। बाहर गली के बच्चों के साथ गुल्ली-डंडा खेलते तो साथियों के साथ हाकी और क्रिकेट। अन्दर होते तो हमारे साथ लूडो और साँप-सीढी खेलते। माँ के साथ पच्चीसी और पडोसन के साथ शतरंज खेलते। लौंग जम्प और हाई जम्प में न जाने कितनी चारपाईयाँ शहीद होतीं। कैरम खेलते तो पलक झपकते सारी गोटियों का सफाया हो जाता। पतंगबाजी में उनका जवाब न था। मेरे हमउम्र भाँजे के हाथ में और बाद में उसके बच्चों के हाथ में चरखी होती और सब चिल्लाते यह काटा, वह काटा। यह बच्चे बिना किसी निर्देश के ही उनको दादा कहते थे और अब तक इसी नाम से याद करते हैं। यकीन नहीं करेंगे कि एक समय तो उनके पास व्यायाम के सभी सामान थे। आस्तीन ऊपर करके हमसे अपनी हथेली दबवाने की शर्त लगाते और हम उसमें असफल ही रहते।
जाति-पाँति, ऊँच-नीच से उन्हें कोई मतलब नहीं था। गाँव जाते तो वहाँ चमार और कोरियों के बच्चों के साथ निकट के तालाब में तैराकी का मुकाबला करते। उनके साथ कोई ऐसा वैसा काम करता या कुछ कहता तो उन्हें बहुत नागवार गुजरता था।
मैं आज जो कुछ भी हूँ अपने इसी भाई की बदौलत हूँ। मैं शरारती तो न थी लेकिन मेरी सारी दिलचस्पी गुड्डों और गुडयों से थी। मौलवी साहब आते तभी मैं या तो पडोस में गायब हो जाती या मेरा कायदा खो जाता था। अगर दोनों हाजर होते तो याद किया पाठ दिमाग से गायब हो जाता। आखिर, मौलवी साहब तंग आ गए और एक चाँटा मारकर मुझे यह कहकर अंदर भिजवा दिया कि इस लडकी को पढाना उनके वश में नहीं है। मैं रोने लगी। इसरार भाई यह तमाशा देख रहे थे। आगे बढकर बोले कि मौलवी साहब को मनाकर दीजिए। कल से इसे मैं पढाऊँगा। मेरे इस उस्ताद में न जाने क्या जादू था कि दो साल बाद मेरा दाख्ाला अलीगढ में हो गया। आज भी याद है कि स्नातकोत्तर की पढाई के लिए जब अलीगढ वापस लौटी तो उनकी राय थी कि मैं उर्दू विषय चुनूँ। मेरा जवाब था कि जग्गन भैया आप को बहुत शर्मिन्दगी उठानी पडेगी। उनकी इस इच्छा को अस्वीकार कर मैं एक ऐसे अपराध-बोध से ग्रस्त हो गयी जिसने मुझे इस उम्र में कलम उठाने को मजबूर कर दिया।
इसरार भाई की दसवीं तक की शिक्षा अमीनाबाद हाईस्कूल में हुई। गणित में पूरे अंक आए। लिखाई मोती जैसी थी। उनकी ड्राँइग भी गजब की थी साफ-सुथरी थी। बच्चों की फरमाइश पर एक से एक चिडयाँ, हाथी, घोडे, पेसिंल से कागज पर अपना रूप ले लेते थे। उनके रुझान को देखते हुए पिताजी का ख्याल था कि बेटा यूनिवर्सिटी जाएगा और इंजीनियर बनेगा। माँ का सपना था कि चाँद सी दुल्हन लाएंगी और आँगन पोते-पोतियों की किलकारियों से भर जाएगा। उनके बेटे में कमी भी क्या थी। रूप-रंग का अच्छा, शरीफ और खाता-पीता घराना था। अनेक लोगों ने तो अपनी बेटियों के लिए हाथ भी फैला दिए थे। किन्तु पिता जी की राय थी कि बेटा जब तक अपने पैरों पर खडा नहीं होगा तब तक शादी का कोई सवाल ही नहीं उठता। पर किसे मालूम था कि माँ का ख्बाब कभी पूरा नहीं होगा। तन्हाई उसकी कस्मत में लिखी थी।
पिता जी का स्थानान्तरण आगरा हो गया। बेटों का सेंट जॉन्स कॉलेज में दाख्ाला करवा दिया गया। इसरार भाई के लिए केमिस्ट्री, फिजक्स और गणित का चयन किया गया। यहाँ पडोस में फानी बदायूँनी रहते थे। कालेज में जज्बी भाई सहपाठी थे और सुरूर साहब शायद दो साल सीनियर थे। ताजमहल की इस नगरी में खिलंदडे तथा नेकदिल भाई के मासूम स्वभाव का रुझान मनोहर तथा मुग्ध कर देने वाली चीजों की ओर हुआ। इसे देख कर संतोष हुआ। वस्तुतः यह हम लोगों के लिए चौंकाने वाली बात थी। यहाँ शायरी का रूप भी देखा। उनकी कविता ’एक दोस्त की खुशनदामती पर‘ की चंद पक्तियाँ इस तब्दीली की गवाही के लिए काफी हैं-
हो नहीं सकता तेरी इस बदनदामती का जवाब
शाम का दिलकश समाँ और तेरे हाथ में किताब
रख दे अब इस किताबे खुश्क को बाला-ए-ताक पर
उड रहा है रंगो-बू की बज्म में तेरा मजाक
सब्जा दिल देख कर तुझे खुशी होती नहीं
उफ्फ! तेरे अहसास में इतनी भी रंगीनी नहीं
हसीं फितरत की लताफत का जो तू कायल नहीं
मैं यह कहता हूँ तुझे जीने का हक हासिल नहीं।
अपने भीतर हो रहे इस परिवर्तन से वह खुद ही परेशान थे। दिल कुछ कहता, दिमाग कुछ और। कहाँ जाएँ, क्या करें। इस स्थिति में पिताजी का स्थानान्तरण अलीगढ हो गया और घर का प्यार भरा तथा सुरक्षित माहौल भी छूटा।
सौन्दर्यप्रेमी व्यक्ति को साइंस और गणित के फार्मूले क्यों रास आते। खैर, खुदा-खुदा करके इंटरमीडिएट पास किया। वह परीक्षा कक्ष में होते और माँ बेचारी अलीगढ में जानमाज पर। फिर उन्हें भी अलीगढ बुला लिया गया।
अलीगढ में उनके पसंदीदा सब्जेक्ट मौजूद थे। रशीद साहब, महमूद साहब, बख्तयार साहब जैसे साहित्यकार और कला-मर्मज्ञ की छत्राछाया थी। मेरी नजर में यह उनकी जदगी का सबसे सुनहरा दौर था। अपने ख्याल के साथियों की संगत मिली। इस यूनिवर्सिटी के छात्रा-छात्रााओं में प्रसिद्धि मिली। इस संस्था से उन्होंने बहुत कुछ पाया और इसे बहुत कुछ दिया भी। इससे उन्हें जो लगाव था, जो प्यार था उसका सबूत उनका लिखा तराना है जिससे यहीं नहीं बल्कि अलीगढ के सिलसिले से होने वाले देश-विदेश के किसी भी कार्यक्रम की शुरूआत या समापन आज भी इसी तराने से होता है।
इस दौर का हमारे राजनीतिक, सामाजिक और साहित्यिक जीवन पर गहरा असर था। यह राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन का समय था। राजनीतिक तथा सामाजिक चेतना उन रास्तों की खोज में थी जिसका लक्ष्य एक ऐसी व्यवस्था का स्वप्न था जिसमें गरीबी न हो, निरक्षरता न हो, बेरोजगारी न हो और जाँत-पाँत एवं धार्मिक भेदभाव न हो। अफसोस कि यह सपना अब तक एक सपना ही है। उस सपने को हकीकत में बदलने के लिए शायर मजाज ने नौजवानों को लक्षित किया है। कौन नहीं जानता कि देश के भविष्य नौजवान ही होते हैं। उनकी नज्म ’आहंगे नौ‘ के कुछ शेर देखिए-
ऐ जवानाने वतन रूह जवाँ है तो उठो
आँख इस महशरे नौ की निगराँ है तो उठो
खौफ बेहुरमती और फक्रो जुबाँ है तो उठो
पास नामूसे निगाराने जहाँ है तो उठो
उठो नक्कारे अफ्लाक बजा दो उठकर
एक सोते हुए आलम को जगा दो उठकर
चंद-शेर उनकी नज्म ’नौजवान से‘
(आखिरी शेर हैं)
जलाल, आतिश व बर्को सहाब पैदा कर
अजल भी काँप उठे वह शबाब पैदा कर
तेरे ख्ाराम में है जलजलों का राज निहाँ
हर एक गाम पर रुक इन्कलाब पैदा कर
तू इन्कलाब की आमद का इंतेजार न कर
जो हो सके तो अभी इन्कलाब पैदा कर।
मैं समझती हूँ कि इस ललकार की जरूरत कल की अपेक्षा आज ज्यादा है और आने वाले दिनों में आज से भी ज्यादा होगी।
अफसोस उनकी अलीगढ की जंदगी का सुहावना दौर देर तक न रहा। अलीगढ में थे तभी आल इण्डिया रेडियो में उपसम्पादक की जगह का विज्ञापन आया। साथियों की सलाह पर वहाँ अर्जी दे दी और चुन लिए गए। इसके साथ ही उनके कदम दिल्ली की ओर उठे। यह वह कदम था जो उन्हें बेचैनी तथा मुहब्बत की ओर लेता ही चला गया। इस शहर में उन्होंने मुहब्बत के खेल में ऐसी मात खाई कि पूछिए नहीं। दिल में जगह दी तो ऐसी लडकी को दी जो खिलती हुई कली की तरह सुन्दर एवं तरोताजा थी। इतनी चंचल और मासूम कि रास्ते की रुकावटों से बेपरवाह थी। उसका घराना बहुत ऊँचा था। उसका दामन पहले से ही किसी और को थमाया जा चुका था। अत्यन्त संवेदनशील तथा कला-प्रेमी उभरते हुए नेक दिल एवं मासूम तबियत के शायर मजाज की उस घर में खूब आवभगत होती लेकिन कब तक। अनुभवी बुजुर्गों ने दिल की हालत को समझ लिया और एक वक्त ऐसा आया कि उस घर के दरवाजे हमेशा के लिए बंद कर दिए गए। यह चोट, यह जख्म मेरे भाई के दिल पर ऐसे लगा कि इसने धीरे-धीरे नासूर का रूप ले लिया।
उनकी नज्म ’मजबूरियों‘ के चंद अश्आर से दिल की हालत का अन्दाजा हो सकता है ः
न तूफाँ रोक सकते हैं, न आँधी रोक सकती है
मगर फिर भी मैं इस कस्रे हसीं तक जा नहीं सकता
वह मुझको चाहती है और मुझ तक आ नहीं सकती
मैं उसको पूजता हूँ और उसको पा नहीं सकता
यह मजबूरी सी मजबूरी, यह लाचारी सी लाचारी
कि इसके गीत भी जी खोल कर गा नहीं सकता
हदें खींच रखी हैं हरम के पासबानों ने
कि बिन मुजरिम बने पैगाम भी पहुँचा नहीं सकता।
दिल में सुलगती हुई इस आग को शराब के छींटे से बुझाते रहे और यह आदत बढती ही गयी। इसी दौरान रेडियो की नौकरी भी ख्ातरे में पड गयी।
जेब खाली और शराब की लत, सो नर्वस ब्रेक डाउन का हमला भी हुआ। लखनऊ वापस लाए गए। अपनी औकात भर इलाज करवाया गया। कुछ अरसा राँची हास्पिटल में गुजरा। स्वस्थ होकर वापस लौटे। रोजी-रोटी की समस्या जंदगी की सबसे बडी समस्या है। इसकी तलाश में उनके कई साथी बंबई जा चुके थे। मेरे भाई को भी ले गये लेकिन उनके गीत तो हृदय की गहराईयों से निकलते थे, तबले की थाप से नहीं। इसके परिणामस्वरूप कुछ ही हफ्तों में वापस लौट आए। कुछ दिन दिल्ली हार्डिंग लाइब्रेरी में काम किया। सुबह नौ बजे से लेकर शाम पाँच बजे तक एक कुर्सी पर बैठकर किताबों की गिनती करना और इस शहर में जहाँ उनकी हर साँस उनके दिल पर लगे जख्म को हरा करती थी उन्होंने यह नौकरी झेली, क्योंकि बाप की ख्वाहिश थी कि एल.एल.बी. में दाखिला ले लें। जिसने कभी अपने छोटों को भी मना न किया हो वह अपने बाप की बात कैसे टालता? शायरी कहाँ और कानून के दाँव-पेच कहाँ। इस शायर की तो नौजवानों में ख्याति बढती ही गई। लोग उनकी गायन शैली और गंभीर शायरी को सहज ढंग से पेश करने का आनंद लेते और बदले में सस्ती शराब और ठर्रे से उनका स्वागत करते।
ख्ाानदान वालों की राय थी कि उनके पैरों में शादी की बेडयाँ डाल दी जाएँ। एक वक्त ऐसा भी था कि जब उनकी माँग हर तरफ थी। इसी अलीगढ की जमीन पर एक ऊँचे खानदान की खुले विचारों वाली लडकी ने सफया आपा द्वारा अपनी इच्छा को प्रकट भी किया था। मेरे भाई का जवाब था कि सफया मुझे कागजी फूल पसन्द नहीं हैं। अब तो वह गरीब था वह भी शराब का आदी। मेरी माँ के भाँजे शायद सहानुभूति में अपनी बेटी का रिश्ता लेकर आ गए। भाई कई दिन तक माँ को टालते रहे। आखिर एक दिन जवाब दिया कि आप क्यूँ किसी गरीब की कस्मत खराब करना चाहती हैं। उनके दिल में एक ऐसी हस्ती अभी भी शेष थी, जिसका नाम उनके जबान से केवल नर्वस ब्रेक डाउन के समय ही निकला था।
इस प्रकार जीवन की असफलताएँ और मायूसियाँ बढती ही गयीं। दुःख बढता ही गया। चेहरे का लावण्य उदासी में डूबता गया। रोज शाम को नहाकर साफ-सुथरा कुर्ता-पाजामा पहनकर बाहर निकल जाते और फिर देर रात गए घर लौटते। उनका खाना-पानी और रिक्शेवाले का पारिश्रमिक चवन्नी उनके कमरे में रख दिया जाता। तकिये के नीचे ग्यारह पैसे भी रख दिए जाते जो उनका सुबह से शाम का ख्ार्चा था। माँ-बाप सो पाते थे या नहीं, कह नहीं सकती। मैं कह चुकी हूँ कि हम सब अपनी रूढयों से जकडे हुए थे। झूठ, छल-कपट, मक्कारी और इसी तरह के न जाने कितने दोष हमारे अन्दर थे किन्तु उनका शराब पीना सबसे बडा गुनाह था जैसे किसी ने शराब पी नहीं कि वह मनुष्य से राक्षस हो गया।
पाँच दिसम्बर १९५५ की शाम वह थी जब वापसी का रास्ता घर न था। जाने कहाँ और किस वक्त रास्ते में ब्रेन हैम्रेज हो गया और न जाने किस भले आदमी ने उन्हें बलरामपुर अस्पताल पहुँचाया। इसे उनके अच्छे आचरण तथा आकर्षित कर देने वाले व्यक्तित्व का प्रमाण समझिये कि हमारी एक रिश्तेदार औरत जनरल वार्ड से गुजरी। उन्होंने प्यार-दुलार से पले मेरे भाई और सबके पसंदीदा शायर को देखा। पहचाना और घर ख्ाबर दी। यह ख्ाबर आग की तरह शहर में फैल गयी। प्रगतिशील लेखक संघ का वार्षिक सम्मेलन चल रहा था। इसी में भाग लेने के लिए निकले थे। सभी मित्रा और चाहने वाले वहाँ मौजूद थे। अस्पताल के दरवाजे पर केवल सगे-संबंधी ही नहीं बल्कि बडी संख्या में सिगरेट के दुकानदारों से लेकर कॉफी हाऊस के वर्कर्स तक की भीड थी। लेकिन मेरा भाई अपने आस-पास इकट्ठ चाहने वालों से बेख्ाबर था। कोमा की हालत में पहुँच गए थे। मस्तिष्क निष्क्रिय था किन्तु हृदय में स्पन्दन था। जख्मी दिल भी आखिर कब तक साथ देता। बहुत मनाने पर मेरी माँ भी अस्पताल गयी। उनको गुमान था कि उनका जग्गन एक आवाज पर जाग जाऐगा। ऐसा न होने पर मायूस हुई। पर यकीन न कर सकी कि बेटा उनकी आवाज भी न सुनेगा। आधे रास्ते से वापस लौट गयीं। उनके बेटे ने जिस तरह बिना शिकवा-शिकायत किये जंदगी गुजारी थी गयी इसी तरह ख्ाामोशी से बिना किसी सेवा-सुश्रूषा, दवा-दारू के ही जंदगी से रुख्सत हो गया। यह है कहानी मेरे भाई और आप के शायर मजाज की।
अब इसके बाद सुबह है और सुब्हे नौ मजाज
हम पर है ख्ात्म शामे गरीबानें लखनऊ।
इस सुब्हे नौ की आज कितनी जरूरत है और किस पर जम्मेदारी है यह बताने की जरूरत है।
Discuss this topic on KhabarExpress Forum
|