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सज्जाद जहीर ः नाम का अर्थ तो जाहिर है वही होगा जो ’सज्जाद‘ और ’जहीर‘ नामक शब्दों के अर्थ शब्दकोश में होंगे। मगर किसी भी ’नाम‘ का अर्थ सिफर् वही नहीं होता जो शब्दकोश में लिखा होता है। ’नाम‘ का अर्थ तो उसके कारनामों से तय होता है, वरना यह मुहावरा क्यों बनता कि ’आँख का अंधा नाम नैनसुख?‘ तो फिर सज्जाद जहीर का कोई एक अर्थ तो हो नहीं सकता। इस नाम के अनेक अर्थ हैं, जैसे-सज्जाद जहीर का एक अर्थ है ः वह शख्स जिसने सन् १९३५ में मुल्कराज आनंद, डॉ. ज्योति घोष, डॉ. के.एस. भट्ट, डॉ. एस. सिन्हा और डॉ. मोहम्मद दीन तासीर के साथ मिलकर लंदन में भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ की नींव डाली। भारत में प्रगतिशील आंदोलन की वह ऐतिहासिक शुरूआत है, जिसकी भूमिका सन् १९३३ में प्रकाशित ’अंगारे‘ नामक कहानी-संग्रह से बन चुकी थी। इस संग्रह में सर्वाधिक कहानियां सज्जाद जहीर की हैं। वे कहानियाँ हैं- ’नंींद नहीं आती‘, ’जन्नत की बशारत‘, ’गर्मियों की एक रात‘, ’दुलारी और फिर से हंगामा‘। उर्दू-जगत में इन कहानियों ने वही किया जो उस जमाने में प्रेमचंद और निराला की रचनाएँ कर रही थीं।
सज्जाद जहीर का एक अर्थ है ः उर्दू-हिन्दी के महान कथाशिल्पी प्रेमचंद से उनकी वैचारिक घनिष्ठता, जिसका प्रमाण है, उनके नाम लिखा गया प्रेमचंद का यह पत्रा ः
मैंने यहाँ एक ब्रांच कायम करने की कोशिश की है। तुम इसके मुताल्लिक जितना लिटरेचर हो, भेज दो तो मैं यहाँ के लेखकों को एक दिन जमा करके बातचीत करूँ। बनारस कदामत-परस्ती का अड्डा है और हमें शदीद मुख्ाालफत का भी सामना करना पडेगा। लेकिन दो-चार भले आदमी तो मिल ही जाएँगे जो हमारे साथ इश्तिराक कर सकें....।
और दो-चार नहीं, बल्कि कितने ही भले आदमी उस प्रगतिशील आंदोलन से जुडे जिनकी ’रुशिनाई‘ सज्जाद जहीर ने की थी। रुशिनाई वास्तव में प्रगतिशील आंदोलन की रुशिनाई है। अतः सज्जाद जहीर की इस किताब का सम्यक मूल्यांकन जरूरी है। और यह दायित्व केवल उर्दू वालों का नहीं है। हिन्दी वालों पर भी यह फर्ज आमद होता है क्योंकि बन्ने भाई ही वह शख्सयत हैं जिन्होंने हिन्दोस्तान में उर्दू-हिन्दी के अदीबों की एक मुशतरका अंजुमन को अंजाम दिया था, जिसका नाम भले ही अंग्रेजी में रहा हो -यानी प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन, मगर थी वह साँझी। अफसोस, कि जैसे ही उसका नाम ’देसी‘ हुआ, हिन्दोस्तान-पाकिस्तान की तरह वह भी विभाजित हो गयी। एक रहा ’प्रगतिशील लेखक संघ‘ यानी हिन्दी के लेखकों का संगठन तो दूसरा हो गया ’अंजुमने-तरक्कीपसंद मुसन्नेफीन‘ यानी उर्दू के अदीबों की अंजुमन। यह विभाजन हुआ प्रगतिशील लेखक संघ की लखनऊ में आयोजित पचासवीं सालगिरह के अवसर पर यानी सन् १९८६ में।
तो क्या सज्जाद जहीर का यह अर्थ भी हो सकता है? जहाँ तक इस नाचीज का ख्ायाल है, ’नहीं‘। अगर किसी शब्दकोश में यह अर्थ लिखा हो, तो उसे निकाल देना चाहिए।
सज्जाद जहीर का एक अर्थ है ः बकौल अली बाकर-सज्जाद जहीर लखनऊ में अपने ख्ाानदान के ऐशो-इशरत पर कदरे शर्मिन्द हैं, उस दौर के इन्कलाबी रहनुमाओं से मुतास्सिर हैं, अपने हमउम्रों की बेअमली से झुँझलाएँ हुए हैं, हर ईसार और कुर्बानी देने के लिए कमरबस्ता है, हिन्दोस्तान लौटकर वो एक गुलाम की तरह जन्दा रहना जुर्म समझते हैं, गमे-जमाना और गमे-रोजगार से टूटे हुए हैं, मगर बगावत के जजबात से इन्कार नहीं है।
अली बाकर का उपर्युक्त कथन उनके एकमात्रा उपन्यास ’लन्दन की एक रात‘ के संदर्भ में है, जिससे गुजरे बगैर प्रगतिशील आंदोलन के प्रति सज्जाद जहीर की ललक को समझना मुश्किल है। इस उपन्यास के बारे में किसी ने कहा है-’’अगर लेखक ने इस उपन्यास के अलावा और कुछ नहीं लिखा होता, तो भी उर्दू इतिहास में उसका अपना एक स्थान होता।‘‘ मगर सवाल उठता है, क्यों? क्या उर्दू-साहित्य के इतिहास में उपन्यास का अकाल पडा था? नहीं, बात अकाल की नहीं, विषयवस्तु की है। अगर उस कालावधि में लिखे गए उर्दू उपन्यासों की विषयवस्तु पर ध्यान दें तो पता चलता है कि उन रचनाकारों की दृष्टि उस समय की मुख्य समस्या-यानी ’स्वाधीनता-प्राप्ति‘ की ओर लगभग न के बराबर थी। उपन्यासों में मुसलमानों के प्राचीन जीवन का चित्राण है। जैसे-उस जमाने के आसपास एक प्रसिद्ध उपन्यासकार हुए हैं मो. अब्दुल हलीम ’शरर‘ जिनके उपन्यासों में मुसलमानों के प्राचीन जीवन का चित्राण है। उनकी वीरता, उदारता, धार्मिक दृढता आदि के अंकन तक वे उपन्यास सीमित हैं।
मिर्जा हादी रुसवा एक कुशल उपन्यासकार थे, मगर उन्होंने भी ’उमरावजान अदा‘ नाम से जो एक महत्त्वपूर्ण उपन्यास लिखा, वह एक वेश्या के जीवन पर आधारित था। जैसा कि प्रेमचंद का बाजारे-हुस्न, अर्थात् सेवासदन।
राशिदुल ख्ौरी अपने उपन्यासों में मुस्लिम मध्यवर्ग के दुखान्त का, विशेषकर नारी-जीवन का चित्राण कर रहे थे। इनके अतिरिक्त शाद अजीमाबादी, ज्वाला प्रसाद बर्क, अब्बास हुसैन ’होश‘ आदि सभी कथाकार इसी प्रकार के विषयों पर रचना कर रहे थे।
सज्जाद जहीर उस जमाने के ऐसे अकले उर्दू-कथाकार हैं, जिन्होंने स्वाधीनता प्राप्ति के लिए चल रहे आंदोलन को अपनी रचना का आधार बनाया। उनके एकमात्रा उपन्यास ’लंदन की एक रात‘ की कोई ख्ाास कहानी नहीं है, मगर उसमें व्यक्त विचार बहुत ख्ाास हैं। वे विचार ही हैं, जो हमें विवश करते हैं बन्ने भाई के बारे में सोचने के लिए जैसे-’लंदन की एक रात‘ का एक पात्रा ’राव‘ कहता है ः ’’ख्ायाल तो करो, ३५ करोड इन्सान और एक लाख से भी कम अंग्रेज इन पर मजे से हुकूमत करते हैं।‘‘
एक जगह हिन्दोस्तानियों की भीड का चित्राण करते हुए लिखते हैंः ’’हवा बंद। आख्ार हम आगे क्यों नहीं बढते?‘‘ ’आगे बढो, आगे बढो‘ की आवाज यकबारगी उसके (यानी राव के) कानों में आई और उसके सारे जिस्म में खुशी की एक लहर दौड गयी।‘‘
अब सोचने की बात है कि ’आगे बढो, आगे बढो‘ का विचार आया कहाँ से? जाहिर है कि रूसी क्रांति से, और उस जमाने में ऐेसे तमाम लोगों को रूस-समर्थक माना जाता था। इसीलिए, जब इस उपन्यास का एक पात्रा एहसान कहता है ः ’’तुम सबके सब रईस, बनिये, महाजन, बैरिस्टर, वकील, डॉक्टर, प्रोफेसर, इंजीनियर, सरकारी नौकर जोंक की तरह हो और हिन्दुस्तान के मजदूरों और किसानों का खून पीकर जन्दा रहते हो।‘‘ तो दूसरा पात्रा ख्ाान बोलता है ः ’’ये बोलशेविक यहाँ कहाँ शे आ गया?‘‘
ध्यान रहे कि ’बॉलशेविक‘ शब्द उस जमाने में अपशब्द की तरह इस्तेमाल होता था। मगर प्रतिबद्ध रचनाकारों के लिए यह शब्द कोई साधारण शब्द नहीं, बल्कि नयी चेतना का प्रतीक था। अपने उपन्यास ’कर्मभूमि‘ में प्रेमचंद ने भी रूस के बॉलशेविकों का जक्र किया है। दरअसल रूसी भाषा में ’बॉलशोई‘ शब्द का अर्थ है-बडा या महान। सन् १९१७ की क्रांति को यहाँ ’बॉलशोई‘ विशेषण के साथ अभिव्यक्त किया गया। लेनिन के नेतृत्व में जो क्रांतिकारी पार्टी बनी उसका विशेषण भी यही था। इसलिए यह शब्द इतना प्रचलित हुआ-और लोकप्रिय भी-कि विरोधी विचारधारा रखने वाले लोगों के लिए लगभग अपशब्द-सा हो गया। मगर हिन्दी-उर्दू के प्रगतिशील आंदोलन को कोई भी अपशब्द धीमा नहीं कर सका, क्योंकि उसके मूल में ’सच‘ को सच मानने की ताकत थी। इसी उपन्यास में सज्जाद जहीर एक बहुत बडा सच बोलते हैं। लिखते हैंः ’’यहाँ के हिन्दुस्तानी तालिबे-इल्म, हिन्दुस्तान के अमीर तबके के नौजवानों के नुमाइन्दे हैं।.... और अब उसमें कोई भलाई बाकी नहीं रही।.... सिर्फ एक काम जो उनको खूब आता है, मुल्क फरोशी है।‘‘ और उभरते हुए हिन्दोस्तानी मध्यवर्ग का हाल यह था कि-गवर्नमेंट का डर, राजाओं-महाराजाओं का डर, मजहब का डर, मुल्ला का डर, बरहमन का डर।
जबकि आर्थिक धरातल पर समाज का यथार्थ यह था ः ’’मजदूर की समझ में तो ये बात आसानी से आ जाती है कि उसकी मेहनत का फल उसको मिलना चाहिए, मगर अमीर आदमी की समझ में इस बात का आना मुश्किल है। इस वजह से नहीं कि इसमें कोई पेचीदा बात है, बल्कि इस वजह से कि इसमें उसका नुकसान है।‘‘ बन्ने भाई इससे आगे बढकर एक सच और बोलते हैं कि ’’हिन्दोस्तान में कैद होने के लिए मुजरिम होना जरूरी नहीं। आजादी की ख्वाहिश इसके लिए काफी है।‘‘
’लंदन की एक रात‘ उनके इन विचारों के लिए एक अमर रचना है, न कि उसके शिल्प के लिए, जैसाकि तमाम विचारकों का मत है। हालाँकि वे मत भी गलत नही हैं, क्योंकि ’लंदन की एक रात‘ उपन्यास में बन्ने भाई ने जिस कथा-शिल्प को अपनाया है, वह उस युग का वह यूरोपियन कथा-शिल्प है, जिससे भारतीय कथाकार उस समय तक शायद पूर्णतया परिचित नहीं थे।
और अन्त में-’’सज्जाद जहीर का अर्थ है ः ’लंदन की एक रात‘ उपन्यास का एक वाक्य ः ’’दुनिया में और भी बहुत सी चीजें हैं, अलावा इश्क के।‘‘ यह कोई साधारण पंक्ति नहीं है। इस पंक्ति में एक संदेश है। अगर हमें प्रगति करनी है तो रूमानी दुनिया से बाहर निकलना होगा। ध्यान से देखें तो प्रगतिशील आंदोलन के सारे सरोकार इस वाक्य में समाए हुए हैं।
आमतौर पर किसी भी विचार का प्रभाव तत्काल नहीं पडता। मगर सज्जाद जहीर के इस विचार का प्रभाव पडा। उर्दू के मशहूर शायर फैज अहमद फैज‘ ने कहा ः
’’मुझसे पहली सी मुहब्बत मिरे महबूब न माँग
और भी दुख हैं जमाने में मुहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
हालांकि जनाब अली बाकर साहब का कहना है कि ’’मैं न कभी सज्जाद जहीर साहब से पूछ सका और न उनके जेल के साथी और यारे-वफादार फैज से कि वह नज्म ’मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरे महबूब न माँग‘, जिसको नूरजहाँ ने गाया भी है, ’लंदन की एक रात‘ छपने से पहले की है या बाद की।‘‘
जाहिर है कि अगर यह नज्म पहले की है, तो फैज का असर सज्जाद जहीर पर है और अगर बाद की है, तो सज्जाद जहीर का असर फैज पर है। मगर इस खोजबीन की कोई ख्ाास अहमियत नहीं है। अहमियत तो है उस ’दुख‘ की, जो ’गम‘ की जगह आराम से बैठा हुआ है और उसे उर्दू का कोई नक्काद यानी आलोचक भगा नहीं रहा है। वरना फैज को इस्लाह दी जा सकती थी कि कहिए ः
और भी गम हैं जमाने में मुहब्बत के सिवा।
दुख क्यों?
मगर उस जमाने में दुख और गम का बँटवारा करने का मतलब था हिन्दी-उर्दू का बँटवारा, जोकि तकरीबन हो ही चुका था। लेखकों का प्रगतिशील आंदोलन उस बँटवारे को अस्वीकार करते हुए अपनी साँझी सामाजिक-सांस्कृतिक परंपरा को सिर्फ कायम रखना चाहता था, बल्कि उसके व्यापक विकास के लिए प्रयासरत भी था। बन्ने भाई उस प्रयास के अग्रदूत थे।
सज्जाद जहीर का एक अर्थ और है। वे नजूमी थे।
प्रगतिशीलों और कम्युनिस्टों का वैसे तो नजूम यानी ज्योतिष पर कोई विश्वास होता नहीं, मगर जब उनके विचार सच होने लगते हैं, तो लगता है कि उन्होंने शायद भविष्यवाणी ही की थी। जैसे प्रेमचंद की एक कहानी ’आहुति‘ का एक पात्रा सोचता है कि कहीं स्वाधीनता का यह अर्थ तो नहीं कि ’जॉन‘ की जगह ’गोविन्द‘ बैठ जाय। तो क्या यह प्रेमचंद की भविष्यवाणी नहीं थी? और आजादी मिलने के बाद फैज ने कहा-
ये दाग-दाग उजाला ये शबगुजीदा सहर
वो इंतिजार था जिसका ये वो सहर तो नहीं
बन्ने भाई को भी शायद इसका आभास पहले से ही हो गया था। अपने उपन्यास ’लंदन की एक रात‘ का अन्त उन्होंने इस वाक्य के साथ किया है ः ’’सुबह की फीकी रौशनी चोर की तरह खिडकी के रास्ते, दबे कदम अन्दर आने लगी।‘‘ अब अगर ’सुबह‘ आजादी है तो उसकी रौशनी फीकी है। यही नहीं, वह चोर की तरह आती है। जाहिर है कि जो चोर है, वह दूसरे चोरों को भी प्रोत्साहित करेगा। इस तरह वे सभी चोर दबे पाँव अन्दर आ जाएँगे और ऐसे-ऐसे गुल खिलाएँगे, जिनकी हम कल्पना नहीं कर सकते।
बन्ने भाई ने यह कल्पना की-और बडी शिद्दत से की। यही उनका अर्थ है और यही उनका महत्त्व, संदर्भ चाहे साहित्य का हो, चाहे प्रगतिशील आन्दोलन का।
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