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Vartmaan Sahitya :: April, 2007
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छः गजलें
राम मेश्राम

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(१)
नई  हर  शै  पे  ऐसे  आशना  है
नई  औरत  पे  जैसे  दिल फदा  है

वो  इक अल्सेशियन है  बॉस का  जो
रकीबों  को  लपक  कर  काटता  है

कयामत  है कि बारिश है,  हमें  क्या
कि किस बस्ती का क्या-क्या बह गया*है

मियाँ  हम  ही  तो  हैं  वो  सर्वहारा
जिन्हें  हमदर्द  लीडर  ने  ठगा  है

खदेडा था जिसे जन्नत से इक दिन
वही दिल आज सम्मानित हुआ है

वो  इन्टरनेट,  ये  टी.वी.  के  चैनल
जवाँ  मन  ईडियट  सा  देखता  है

वो  साधू  है  तो  क्यूँ  गाहे-बगाहे
तराने  औरतों   के   छेडता   है?

ये  अय्याशी,  ये  दारू  और  रिश्वत
यही  तो  जीनियस  का  रास्ता  है!

लिए  तलवार  टूटी  हाथ  में,  दिल
समूचे  आस्माँ  से  लड  रहा  है

(२)
इतना  क्यूँ   तू   मिमियाता   है?
तू  तो  आदम   का   बच्चा   है

भाग्य-लक्ष्मी     दासी     जिसकी
तू  भी  तो  उसका  चमचा  है

मेरा    बातूनी    मन    मुझसे
हर-हर   लम्हा   बतियाता   है

दिल  का  कुआँ  सदा  देते  ही
जीवन-सरगम      घुन्नाता     है

राजनीति   का   डॉन   हमेशा
लोकतंत्रा   को   गरियाता   है

आला   अफसर   रोज   धडाधड
कविता  पर  कविता  लिखता  है

राजनीति  का  भूत,  न  पूछो
मार-मार   कर   सहलाता   है

तेरे-मेरे     सबके     भीतर
एक  नदी  है,  वह  कविता  है

गाता  जा  रे,  मत  घबरा  रे
भीड  बहुत  है,  तू  तनहा  है

(३)
तर्कों की बौछार में हँसता घाघ शिकारीपन का सच
बूढा हंस कहे सुन प्यारी, तेरा-मेरा-उसका सच

वह खलनायक जिसे नायिका खुद अपने को पेश*करे
साफ हकीकत भी है गोया फल्मी कस्सों जैसा सच

मुफलिस मौत मरे भुवनेश्वर, शहर-बदर हो जाए शरद
जिसे उछाले ख्ोमा अपना वही असल रचना का सच

दारूबाजी, औरतबाजी, शोहरतबाजी से होकर
खिलता महाजीनियस तेरी प्रगतिशील कविता का सच

दिखलाती है रोज वकालत पेशेवर सच्चाई को
करती है इन्साफ अदालत, आता हाथ अधूरा सच

एक तरफ है सारी दुनिया, एक तरफ है मेरा मैं
ठोस अना में तना हुआ है सबका अपना-अपना सच
कौन नहीं है वाकिफ मन के काले-उजले चेहरे से
किसकी हिम्मत है सुनने की अपने मुँह पर कडवा*सच

नंगी आँखों से जो दिखता होता वह भी सत्य कहाँ
अख्ाबारों के अपने चेहरे, दीवारों का अपना सच

काँधे अरथी और जुबाँ पर नारा सत्यमेव जयते
आज सत्य की मय्यत में भी जीत रहा है झूठा सच

(४)
तारीक  बेबसी  से  गुजरना  पडेगा  यार
बिल्कुल नहीं के पार उतरना पडेगा यार

अम्बेडकर  की  जदगी  जीने  की  शर्त  है
तुमको  हजार  हादसे  मरना  पडेगा  यार

कोरे  दलित-विमर्श  के  फैशन  में  झूमती
शोहरत की ख्वाहिशों से मुकरना पडेगा यार

अम्बेडकर के बुत की इबादत को छोडकर
बन्दानवाजयों  से  उबरना  पडेगा  यार

सत्ता का सुख निहारती नेतागिरी को भूल
ख्ाालिस  लहूलुहान  निखरना  पडेगा  यार

जल्दी  अमीर  होने  की  अंधी  उडान  का
बेताब  पर  हमें  ही  कतरना  पडेगा  यार

दलितों में हम दलित हैं, कुलीनों में हम कुलीन
हमको समाज-सच पे ठहरना पडेगा यार

आएँगे  रोज-रोज  कहाँ  ज्योतिबा  फुले
हमने किया, हमीं को सुधरना पडेगा यार

हिर्सो-हवस में सड रहे हिंसक समाज की
मिट्टी में बीज बन के बिखरना पडेगा यार

(५)
सच है कि फरिश्तों में तो गिनती नहीं होती
मैं वो हूँ कि जिससे कभी गलती नहीं होती

हँस-हँस के फरिश्तों के गुनाहों को बताना
दिलचस्प,  मगर  ये हँसी सस्ती नहीं होती

कुदरत की तराजू में बराबर हैं सभी लोग
मख्ासूस अलग से कोई हस्ती नहीं होती
विरसे से या तकदीर से मिल जाती है सत्ता
भारत में कहीं कुनबापरस्ती नहीं होती

हँसने को तो हँसता है हँसी खूब जमाना
क्या बात, हँसी में कोई मस्ती नहीं होती

दर्दी है यहाँ कौन किसी और के गम का
लोगों की बसाहट से ही बस्ती नहीं होती

कानून की बैसाखियाँ सेठों को मुबारक
दौलत के हों अपराध तो सख्ती नहीं होती

कुछ सीख सबक नामवरों से भी कबीरा
हर घर में तेरे नाम की तख्ती नहीं होती

(६)
यारो किसी गिरगिट का करदार जिया करना
दुनिया में अगर खुद को खुद्दार कहा करना

हर  रोज गढा करना फैशन के नए  फत्ने
हर  बार  तनाजों  का  संसार  रचा  करना

चुन-चुन के दफा करना सच बोलने वालों को
चमचों के कसीदों का दरबार सजा रखना

इन्सान की फतरत में जीने से तो बेहतर है
इस दौर में दिल्ली का बाजार हुआ करना

हम आलिमो-दानिश की औकात है बस इतनी
दौलत के इशारों पर सौ बार बिका करना

पैसों के लिए पागल होती हुई दुनिया में
मत बोलिए, ईमाँ का मेयार बचा रखना

दौलत से, सियासत से जारी है लडाई तो
हर वक्त शहादत को तैयार रहा करना

आँसू से, पसीने से, कुछ खून की बूँदों से
सूखी हुई कविता का संसार हरा रखना



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