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Vartmaan Sahitya ::April, 2007 Sponsered by : Decor Home, Bikaner अपनी बात
बहुत साल पहले आर्थर मिलर का नाटक ’’डेथ ऑफ अ सेल्समैन‘‘ पढा था। उस समय इसकी चर्चा करते हुए अमरीका जैसे पूंजीवादी देशों की बाजार व्यवस्था पर बात होती थी जहाँ सारी जिन्दगी काम करने के बाद अशक्त हुए आदमी को कोई पूछने वाला नहीं होता था। बाजारव्यवस्था आधारित समाज में वृद्धों के लिये कोई स्थान नहीं। जब तक आप कमाऊ हो, बाजार में खरीद फरोख्त कर सकते हो तब तक आप जन्दा हो। जब इस लायक नहीं रहे तो तब इस व्यवस्था को आपकी कोई जरूरत नहीं। जैसे चाहो जिओ। न चाहो तो...।
सेवा निवृत्त नौकरीपेशा जिन्हें पेंशन या प्रॉविडेन्ट फंड जैसा कुछ आगे जीने के लिये सहारा मिला करता था, अब हर सरकार की आँखों में खटकने लगा है। पिछली सरकार के जमाने में टी.वी. पर कुछ बुड्ढे रोते हुए दिखाई दिये थे जिनका पैसा यू.टी.आई. घोटाले में डूब गया था।
शहरों में रहने वाले मध्यवर्गीय समाज के सेवानिवृत्त वृद्धों के लिये संपन्न सन्तानों के आगे हाथ फैलाना उनकी आत्मा को कुचलने जैसा होता है। अपने स्वाभिमान की हत्या करने का साहस वे नहीं जुटा पाते। हमारे अनेक रचनाकार निरंतर गहराती वृद्धजनों की बहुआयामी त्राासदी को अपना विषय भी बना रहे हैं। चित्राा मुद्गल का गिलिगडु इस रूप में उल्लेखनीय उपन्यास है।
उदारवादी अर्थव्यवस्था आज जीवन जीने के नये मानक तैयार कर रही है। जीवेम् शरदः शतम् जैसी अवधारणा को तो अब प्राचीन भारतीय संस्कृति के संवाहक राजनीतिक दल भी नहीं मानते। इसीलिये ’’नवल वृन्द औ‘ नवल छन्द नव‘‘ जैसी पंक्तियों के रचयिता महाकवि निराला की तजर् पर पिछले दस सालों से नयी नीति, नया समाज और नयी जीवन पद्धति को रूप देने का प्रयास हमारी अलग-अलग सरकारें कॉमन मिनिमम प्रोग्राम के अंतर्गत कर रही हैं। अब उसके नतीजे आने शुरू हो गये हैं। बानगी के रूप में हमारे कुछ सजग टी.वी. चैनल ऐसी कहानियाँ लोगों के सामने ला रहे हैं। मसलन विधवा मांयें जो बुढया हो रही हैं। उन्हें उनके बेटा-बहू कभी तो मकान के पिछवाडे गैलरी में थोडी जगह घेर टिन शेड डाल कर रहने की व्यवस्था कर देते हैं। आश्चर्य होता है कि शानदार मुहल्ले के शानदार बडे मकान में उस नन्हीं जान के लिये जगह नहीं होती। वहाँ पडी एक चारपाई, एक गिलास, पानी की एक बोतल और एक प्लेट गवाही देते हैं कि उन्हें दिन में एक बार, दो बार खाना जरूर डाल दिया जाता होगा। कभी ऐसी विधवा बुढया के लिये पिछवाडे के बडे से आंगन के एक कोने में पाँच-छह फुट लंबा, चौडा और ऊँचाई वाला लोहे का पिंजडा बना कर रख दिया गया है। चिडयाघर का बन्दर भी उसे देख ले तो शरमा जाय और अपनी किस्मत पर गर्व करे। उसका अपना पिंजडा तो आकार में कई गुना बडा होता है। कभी विधुर रिटायर्ड बुड्ढा अकेला पडा पार्कों में रोता है या सोता है या पडोस के बच्चे से लेकर हर किसी से जो पल्ले पड जाय बतियाता है और चाय की तलब लिये बैठा रहता है। अपने घर में बार-बार चाय के लिये कहने की हिम्मत नहीं होती। पेंशन या प्रॉविडेंट फंड से मिलने वाले ब्याज के रुपयों का अगर उसने इन्तजाम कर रखा है तो भूखों मरने की तो नौबत नहीं आयेगी। लेकिन अगर परिवार का दबाब न झेल पाने की स्थिति में पहले ही प्रॉविडेंट फंड का बंटवारा कर देना पडा हो तो फिर भगवान ही मालिक है।
इन सारी स्थितियों को देखते हुए मुझे लगता है कि शासन को लोगों के मरने की उम्र निर्धारित कर देनी चाहिये और इस संबंध में कुछ नये कानून बनाने चाहिये। मसलन, शारदा एक्ट को धता बता कर छोटी उम्र में शादी का प्रावधान कर देना चाहिये। इससे हमारे शंकराचार्य और विश्व हिन्दू परिषद के नेता भी खुश होंगे। जब बच्चे बडे हो जांय और नौकरी-पेशे वाले हो जांय तो घर के मुखिया को जीवन का मोह तोड देना चाहिये। अगर ऐसा नहीं तो रिटायरमेंट के बाद अवश्य वानप्रस्थ ग्रहण करके जंगल में चला जाय। लेकिन वनगमन कैसे हो! वन तो अब रहे नहीं। ऐसे में इस लोक से स्वयम् अपनी इच्छा से प्रस्थान कर परलोक गमन तो कर ही सकता है। इससे दो फायदे होंगे। एक तो जनसंख्या पर नियन्त्राण रहेगा। दूसरे, उसके सर्विस में होते हुए अगर उसका पुत्रा कोई रोजगार नहीं पा सका तो उसके शीघ्र परलोक गमन से पुत्रा को सर्विस मिल जायेगी। फिर उसके पुत्रा या परिवार वालों को उसे ऊपर भेजने की मशक्कत नहीं करनी पडेगी और वे कानूनी झंझटों से बचेंगे। सरकार को सुविधा रहेगी कि उसे वी.आर.एस. थोपना नहीं पडेगा और वह विपक्ष की आलोचना से बचेगी। उसे बेरोजगारी का ग्राफ घटाने में भी मदद मिलेगी। एक आदमी को ऊपर भेजने से इतने सारे फायदे।
अब बची पत्नी तो वह क्या करे? बच्चे बडे हो गये हैं। पैरों पर खडे कर दिये गये हैं। घर में बहू का आ गयी है तो अब अंगने में उस बुढया का क्या काम? इसके कारण बच्चों को तरह-तरह की व्यवस्थाएं करनी पडती हैं। कैलेंडर में देख कर बारी-बारी से अपने यहाँ रखना पडता है। घर की रुटीन तो बिगडता ही है। या तो अपनी बारी निभाओ या मोटर में बिठा कर ले जाओ और उस गरीब को दूर कहीं अनजान जगह पर छोड आओ। जैसे अगर किसी के घर में देसी कुतिया ने पिल्ले दिये तो लोग थैले में बन्द कर पिल्लों को दूर किसी अनजान जगह पर छोड आते हैं। नये जमाने में नयी-नयी हाइटेज चीजें आ रही हैं। नये फैशन के नये-नये लोग दिखाई दे रहे हैं। ये पुराना कबाड कोई कब तक ढोयेगा। हमारी भारतीय संस्कृति में कितना अच्छा होता था कि बुढया या विधवा माँ, बहू, बेटी को उठाकर पवित्रा नदियों के किनारे डाल आते थे। अब बुढया अथवा विधवा को सडकों पर डाल देते हैं कि जाओ, कमाओ-खाओ.... वर्ना....। पति अगर नहीं रहा त पत्नी को जिन्दा रहने का हक है? आखिर सती प्रथा हमारी संस्कृति का गौरवमय इतिहास है। इस गौरव की पुनर्स्थापना होनी चाहिये और औरतों को पति के साथ ही परलोक गमन करना चाहिये। हमारी मृदुला सिन्हा बहन के लिये वह दिन स्वर्णाक्षरों में लिखा जाने वाला होगा जब औरतें फिर से सती होने लगेंगी। सरकार भी वरिष्ठ नागरिकों वाले झमेले से छुटकारा पा लेगी।
वरिष्ठ नागरिकों के साथ चूहा बिल्ली का खेल सरकारें हमेशा से खेलती रही हैं। नौकरीपेशा आदमी ही नियमित टैक्स देता है। उसका टैक्स काटना मालिक की जिम्मेदारी होती है। सेवा निवृत्ति के बाद मिलने वाले प्रॉविडेन्ट फंड पर न जाने कितनों की नजर लग जाती है। दो जून सम्मान की रोटी पाने के लिये फंड को बैंक में जमा किया गया तो सरकार ने ब्याज घटाते घटाते छह और सात के बीच ला पटका।
बैंक और डाकघर के बीच रस्साकशी हुई तो डाकखाने ने वरिष्ठ नागरिक बचत योजना निकाल कर नौ प्रतिशत बचत की बात कही और मूलधन की सीमा रखी पाँच लाख। यानि हर महीने लगभग चार हजार की ब्याज। बेचारे बुड्ढे भेडों की तरह खुद ही हंक गये और बैंक से निकल कर डाकखाने पहुंच गये। ऊपर कुर्सी में टंगी आंखों ने देखा कि भीड अब डाकखाने के दरवाजे पर है तो समझ गयीं कि गुड यहाँ बिखरा हुआ है। तुरन्त पहले तो ब्याज दर घटाने का ऐलान किया और फिर स्रोत पर टैक्स लगा दिया। यानि पहले पांच साल जिस पांच लाख पर ब्याज खाया अब अगले पाँच सालों में बचत खाते में सिर्फ चार लाख रह गये और उसी वजह से ब्याज भी घट गयी। सरकार जानती है कि उम्र बढने के साथ-साथ भूख कम होनी चाहिये। जरूरतें कम होनी चाहिये। अगर आप नहीं जानते हो व्यवस्था आपको सिखा देगी।
बडे उद्योगपतियों से जिनका वार्षिक मुनाफा अरबों खरबों में होता है उनसे आज तक कोई शासन व्यवस्था टैक्स और कजर् की अदायगी नहीं करा पाई है। हर रोज शासक वर्ग में नेताओं और अफसरों के घोटालों की खबरें आती रहती हैं। जनता की गाढी कमाई इन करोडों-करोडों के घोटालों में कुछ लोगों की जेब में चली जाती है और वे साफ बच निकलते हैं। सरकारें इनकी ओर से आंख मूंद लेती है लेकिन सीनियर सिटीजन को मिलने वाली ब्याज पर आंख लगा लेती है। गिरती अर्थव्यवस्था के छेद अगर बुड्ढों की रोटी से ढके जा सकते हैं तो वे खुशी-खुशी फाकाकशी कर लगे लेकिन शासक दल के नेता और अफसर शाह जो इन नीतियों के निर्माता और नियंत्राक हैं उनकी आने वाली पीढयां भी अपने ऐशो आराम की बुकिंग इस नश्वर संसार में करा चुकी हैं। ऐसी स्थिति में वरिष्ठ नागरिकों को रोटी न मिलने पर केक खाने की सलाह तो वे दे सकते हैं। वे यह भी कह सकते हैं कि अरे, बुड्ढो, तुम्हें क्या मालूम नहीं, मर जाने की उम्र क्या होती है। रिटायर हो जाने के बाद किसने कहा था कि जिन्दा रहो....।
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