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Vartmaan Sahitya ::April, 2007
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पाठक-मंच
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फरवरी, २००७ का ’वर्तमान साहित्य‘ अंक ’अपनी बात‘ में नमिता जी के संपादकीय से पता चलता है कि व्यक्ति के जीवन में शिक्षा का उच्च स्थान है। ’पहला दरवाजा आरंभिक शिक्षा से खुलता है जो कदम-दर-कदम हमें उच्च शिक्षा के द्वार तक ले जाता है। आपका यह वाक्य मुझे बेहद प्रभावित कर गया। यदि आरंभिक शिक्षा में कोताही न की जाय तो वहीं से विद्यार्थी में आगे बढने की भावना जागृत होती है। संजीव ठाकुर की ’ट्राँसप्लान्टेशन‘ की कहानी में संबंधों का यथार्थ है। कहानी बयान करती है कि संबंधों में अब अपनत्व की भावना नहीं रह गई है।
सूरजपाल चौहान की ’अम्मा‘ कहानी में अज्ञानता, अशिक्षा है साथ ही साथ पता चलता है कि शिक्षा से तो ज्ञान बढता ही है लेकिन समाज में आने-जाने और चार लगों से मिलने से भी ज्ञान बढता है। इस कहानी के पात्र अपने गाँव को छोडकर कभी बाहर नहीं निकले इसीलिये वह रेल-ईंजन और पंखे को देखकर घबरा जाते हैं। व्यक्ति को पढाई के साथ-साथ यात्राएं भी करनी चाहिए जिससे पता चल सके समाज में क्या हो रहा है और कौन-कौन सी आधुनिक वस्तुएं उपलब्ध हो रही हैं। बीच-बीच में आंचलिक भाषा से कहानी और सुन्दर लगती है। कहानी में अपनत्व की पहचान मिलती है। अनामिका शिव की ’अखबार और मैं‘ अच्छी कविता है। इसमें स्त्री की लाचारी व विवशता को उकेरा गया है। छोटी सी कविता एक लंबी स्त्री-विमर्श और फिक्शन लगती है। पुस्तक समीक्षा में, डॉ. दया दीक्षित की ’चौथेपन के उत्तर संदर्भ‘ में निजी संबंध जहाँ मनुष्य को दबोच लेता है, तब उसका मन नयी राहों को खोजता है। यह अन्वेषण जीवन को नया अर्थ देता है। औपचारिक रिश्ते जहाँ बोझ बन जाते हैं, वहाँ इंसानियत से वाकिफ मनुष्य दूसरे विकल्पों को ढूँढता है। श्री निवास शर्मा की ’घटनात्मक संवेदनाओं की अभिव्यक्ति की कहानियाँ‘ में भारतीय समाज के विभिन्न पहलुओं से पाठकों को रूबरू कराया गया है। इसमें जीवन का वर्तमान है। जीवन के बनते-बिगडते विविध रूप उपस्थित ह। कुल मिलाकर वर्तमान साहित्य की पूरी सामग्री पठनीय है।
कु. जया सिंह, उन्नाव

’वर्तमान साहित्य‘ कहानी प्रतियोगिता में प्रथम स्थान पर मेरी कहानी के चुनाव के लिए मैं आप सबका हृदय से आभारी हूँ। धन्यवाद।
इस पुरस्कार को मैं पूरी विनम्रता एवं हर्ष से स्वीकार कर रहा हूँ, मेरा उत्साह बढा है।
कमल, जमशेदपुर (झारखंड)

विशेषांकों के महासमर में जूझते हुए शीघ्रातिशीघ्र शेष अंकों का निष्पादन आपकी कर्मठता और साहित्यिकता का अनुपम उदाहरण है। इसके लिए ’वर्तमान साहित्य-परिवार‘ को मेरा कोटिशः धन्यवाद। सचमुच, आफ सभी विशेषांक ’ऐतिहासिक-दस्तावेज‘ की तरह संरक्षणीय होते हैं। भविष्य में शोधार्थी इनसे अत्यधिक लाभान्वित हगे, ऐसी आशा नहीं, दृढ विश्वास है।
सितम्बर, ०६ का अंक भी लगभग हिन्दी-विशेषांक ही है। ’सम्पादकीय‘ और ’समय-संवाद‘ बहुत कुछ सोचने, समझने और कहने के लिए प्रेरित करते हैं। ’फोकस‘ के अन्तर्गत प्रकाशित वेणुगोपाल की सभी कविताएँ बिहारी लाल के दोहे को भी पीछे छोडती हुई सी प्रतीत होती हैं। अद्भुत, अनुपम, अप्रतिम अंग्रेजी कहानी ’मुक्ति‘ पढते हुए ऐसा लगा जैसे कविता पढ रहा हूँ। अति सुन्दर! लाजवाब!! औरतों की त्रासदी का नायाब हीरा, किन्तु उजला नहीं, काला। उर्दू कहानी ’इब्ने मरियम हुआ करे कोई‘ भ्रूण-हत्या के विरोध में बहुत कुछ सोचने को बाध्य करती है और उजागर करती है एक ऐसी औरत का विद्रूप चेहरा, जो अत्याधुनिकतावाद की तेज आँधी में उठती-गिरती, लस्त-पस्त भागती हुई अपनी ममता, संवेदनशीलता और औरतपन (माँ) का गला घोंट रही है। सुशान्त सुप्रिय की कहानी ’मिसफिट‘ प्रत्येक उस व्यक्ति की कहानी है जो आज के समाज में मानवीय मूल्यों की सुरक्षा का पैरोकार होकर कहीं भी ’फिट‘ नहीं बैठता है। लेकिन, यह कहानी हमें यह भी संदेश देती है कि ’मिसफिट‘ होते हुए भी व्यक्ति कहीं न कहीं ’फिट‘ होकर ’हिट‘ हो सकता है, बशर्ते वह निराशा के अंधकार में भी आशा की किरण चमकने का माद्दा रखे। शेष सुन्दर, विशेष की आशा में।
और अंत में, अपने एक शेर के साथ मैं अपनी लेखनी को विराम देना चाहूँगा-
’गम नहीं है कि अंधेरे के लोग आदी हैं,
मैं वो शमा हूँ जलता ही चला जाऊँगा।‘
राजेन्द्र राजेश

पत्रिाका ’वर्तमान साहित्य‘, अगस्त-२००६ नजर से गुजरा। इस अंक का सभी विषय अपने आपमें श्रेष्ठ है। इसमें ’लछमन की जमीन‘ कहानी ’इतरेलहू‘, समय संवाद ’अमेरिका आतंकवाद और मुसलमान‘ तथा ’बाजार और मीडिया‘ अधिक पसन्द आया। हकीकत की बू टपकती है, जो बढती हुई बुराइयों को रोकने में मददगार होगी। महेन्द्र नारायण पंकज की कहानी ’लछमन की जमीन‘ पढने से ऐसा लगा कि प्रेमचंद की कहानी पढ रहा हूँ, जिसमें नसीहत आमेज सच्ची दास्तां है। समय संवाद ’अमेरिका, आतंकवाद और मुसलमान‘ हकीकत से लबरेज है, जिसमें अमेरिका द्वारा मानव अधिकारों का सब से अधिक उल्लंघन कर आतंक मचाने की बात उजागर की गई है। ’बाजार और मीडिया‘ में मीडिया द्वारा समाज में गंदगी फैलाने की हकीकी आवाज उठायी गयी है।
खैर इस पत्रिाका के सभी विषय अपने आप में अनूठा हैं।
हकीकत है, यह पत्रिाका दिलों में बलवला लाता,
इसी से हम बदलते, हालते दुनिया बदलती है।
जलालुद्दीन सैयद अहमद, हरावत राज.उ.वि. लालपुर, सरोपट्टी, मधेपुरा (बिहार)

’वर्तमान साहित्य‘ का जनवरी, ०७ अंक मिला। यह पत्रिाका साहित्यिक होने के साथ-साथ एक वैचारिक जागृति के अभियान को भी साथ लेकर चल रही है। यही इसकी विशिष्टता भी है। अंक में दलित साहित्य की पडताल करता शरणकुमार लिम्बाले का आलेख विमर्श के व्यापक आयाम खोलता है। जहीर कुरैशी साहब की गजलें हिन्दी गजल के क्षेत्रा में एक मिसाल हैं-कई बार पढा पर मन नहीं भरा। जीवनसिंह ने अपने आलेख में ’आधा गाँव‘ और ’राग-दरबारी‘ को आमने-सामने रखकर विशद् विवेचना की है। सभी कहानियाँ स्तरीय हैं। ’आज के सवाल‘ में इलेक्ट्रानिक दुनिया में पुस्तकों की नियति को लेकर एकांगी विवेचन किया गया है। कल कहीं ये न हो कि हम ’पुस्तकें हमारी सच्ची मित्रा हैं‘ कहने के बजाए ’कम्प्यूटर हमारा सच्चा मित्रा है‘- कहने लग जाएँ। बहुत से अर्थों में यह हानिकारक भी होगा।
अंशु बाजपेयी, मेवाती नगर, अलवर

’वर्तमान साहित्य‘ जनवरी, ०७ में प्रो. अरविन्दाक्षन की कविताएँ पढीं। ये जीवन की विविधता को पूरी गंभीरता से उठाती हैं। ’भद्र पुरुष‘ बेहद गंभीर मार्मिक और संप्रेषित होने वाली कविता है। दूसरी कविता ’डूबते जहाज को हम बचा सकते हैं‘ हैं जो कि हिन्दी की वर्तमान स्थिति ही नहीं संपूर्ण भारत को भी दर्शाती है।
’मामूली भारतीय‘ वाली कविता भी अच्छा व्यंग्य है। आपकी रचनात्मकता ने प्रभावित किया।
रवीन्द्र स्वपनिल प्रजापति, विदिशा (म.प्र.)

आपका भेजा ’वर्तमान साहित्य‘ का जनवरी, ०७ का अंक प्राप्त हुआ। धन्यवाद। पत्रिाका में आपका परिश्रम स्पष्ट दिखाई दे रहा है। पत्रिाका के अंक आगे भी इसी प्रकार प्रकाशित होते रहें यही कामना है।
धर्मेन्द्र गुप्त, दिल्ली-३४

भाई माताप्रसाद की दुकान पर, अनायास ही-’वर्तमान साहित्य‘ का प्रथम दर्शन हुआ। (जनवरी, ०७) और दृष्टि-पथ पर ’मेघदूत‘ की भाँति छा गया।
’उत्तिष्ठत् जाग्रत के मंत्रादाता‘-आचार्य श्री कन्हैयालाल मिश्र ’प्रभाकर‘ के व्यक्तित्व एवम् कतित्व पर, श्री विश्वनाथ मिश्र का अंतरंग आलेख, मन को गहरे तक छू गया। यहाँ यह बताने में, मैं अत्यन्त गौरव तथा हर्ष अनुभव कर रहा हूँ कि आचार्य श्री के अपार स्नेह का पात्रा होने का परम सौभाग्य, मुझे भी प्राप्त हुआ।
प्रो. ए.अरविन्दाक्षन की पन्द्रह कविताओं में-’वह दिन‘, ’बोधिवृक्ष‘, ’इतिहास का इतिहास‘ और ’आतंक‘-अधिक रुचीं, उन्हें बधाई। चालीसा पार पर ’आधा गाँव‘ और ’राग दरबारी‘-श्री जीवनसिंह की समीक्षात्मक प्रस्तुति वजनदार हैं।
बहन श्रीमती नमिता जी का संपादकीय विचारोत्तेजक एवं संपूर्ण गरिमा से परिपूर्ण है।
’वर्तमान साहित्य‘ की असामान्यता के लिए, संपादक द्वारा श्री कुँवरपाल सिंह और श्रीमती नमिता सिंह को आत्मीय साधुवाद।
शैवाल सत्यार्थ, ग्वालियर

’वर्तमान साहित्य‘ का फरवरी माह का अंक पढने का सुअवसर प्राप्त हुआ। सम्पादकीय में राजनीतिक षडयंत्रा, शिक्षा की भूमिका व सामाजिक सहभागिता इन तीन बिन्दुओं पर प्रकाश डाला गया था। अर्थात् साम्प्रदायिकता रूपी नासूर को समवेत प्रयत्न से ही नष्ट किया जा सकता है। वस्तुतः शिक्षित वर्ग निष्क्रिय और हिप्पोक्रेट है। वे समाज के लिए कुछ करना ही नहीं चाहते। अन्यथा नौकरशाह और राजनीतिज्ञों की जुगलबन्दी इतनी प्रभावी न होती, इस अंक में प्रकाशित सभी कहानियाँ अद्यतन व्यवस्था के त्राुटि-छिद्रों को प्रभावी शिल्प में ढालकर लिखी गई हैं। परमिंदरजीत की कविताओं का संवेद्य-विषष व्यापक है। ’गीत‘ कविता में ’पंछी‘ सादृश्यमूलक है। बिम्ब, प्रतीक एवं अलंकारों का सुन्दर प्रयोग किया गया है। इसी प्रकार अरुण काले की कविताओं का रूपान्तरण विविध भाव-भंगिमाओं से भरा पडा है। बेटे और बुद्ध के काल-व्यापी अन्तर व सांस्कृतिक-क्षरण का विहंगम चित्रा खींचा गया है। शहरयार की गजलों में प्रेम का एकाकी संवाद ’निष्ठा‘ बन गया है। इसी क्रम में सुरेन्द्र काले की संक्षिप्त कविताएँ विविध अर्थ-छवियाँ बनाती हैं। अनामिका शिव की कविताओं में ऐन्दि्रयक वितृष्णा, स्व-संघर्ष, अनास्तिक और दृष्टांतबद्धता है। समग्रतः कविताएँ सम-सामयिक हैं। इसी प्रकार समय संवाद में कुँवरपाल सिंह ने सत्ता और जातिवाद के अन्तर्संबंधों पर बेबाक टिप्पणी की है। अंक संग्रहणीय है।
डॉ. बलदेव सिंह, संजोली (हि.प्र.)

१८५७ पर बेहतरीन, जरूरी और मौजूँ सामग्री से युक्त संग्रहणीय अंक जो आपने छापा है, उसकी एक अहमियत यह है कि पहली दफा ’साहित्य‘ की जमीन से जो विमर्श सामने आया उसने ’इतिहासकारों‘ को अपनी धारणाओं पर पुनर्विचार करने को विवश और बेचैन किया है। इतिहास की पुनर्व्याख्या अब एक नई अन्तर्दृष्टि की मांग करती है। नामवर जी को भी स्वीकार करना पडा है कि हमें पश्चिमपरस्त धारणाओं पर पुनर्विचार करके अपने पूर्वाग्रहों को छोडने की जरूरत पड रही है। तो, १८५७ के संदर्भ में जो काम आपने आगे बढाया है मेरी समझ में उसे और आगे के समयों तक फैलना चाहिए।



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