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क्यों हंगामा बरपा है

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इन दिनों नन्दीग्राम प्रकरण चर्चा का विशय बना हुआ है। टी०वी० चैनल इसमें बढ-चढकर हिस्सा ले रहे हैं। बिना वास्तविकता जाने आरोपों की झडी लगा दी गयी है। ममता बनर्जी इन ख्ाबरों की मुख्य प्रवक्ता बन गयीं हैं। प्रेस की स्वतंत्रता के नाम पर ख्ाबरों को बढा-चढाकर पेष करने से प्रेस न केवल जनता के बीच अपनी साख खो देता है, बल्कि अप्रत्यक्ष रूप से अंधी राजनीति में षामिल हो जाता है और एकपक्षीय निर्णय देने लगता है। थोडा सा विष्लेशण करने की जरूरत है कि यह क्यों हुआ और इसके पीछे क्या सच्चाई है। इसके लिए कुछ बातों को समझने की आवष्यकता है।
पूरे देष में, पिछले कुछ समय से कृशि उद्योग में बदल रही है। यदि इसे समझना है तो नोयडा, गुडगाँव और फरीदाबाद तथा दिल्ली के आस-पास की छोटी-छोटी जगहों को देखना होगा, जहाँ हरियाणा तथा पष्चिमी उत्तर प्रदेष के किसानों की हजारों एकड जमीन थी, जिसे इन राज्यों की सरकारों ने बहुत ही सस्ते दाम में ले लिया। फिर भी किसानों को मुआवजा मिला और साथ ही उद्योगों में नौकरी मिल गई। गरीब किसानों की दषा में सुधार भी दिखाई देने लगा। अब वे किसान मध्यवर्ग की श्रेणी में आ रहे हैं तथा अपने उद्योगों में निरन्तर सफलता भी प्राप्त कर रहे हैं। यह आवष्यक है कि किसानों को उनका उचित एवं सही मुआवजा मिले। उत्तर प्रदेष के किसान दादरी में रिलायन्स द्वारा लगाये जा रहे बिजलीघर का इसलिए विरोध कर रहे हैं कि उन्हें उसका उचित मुआवजा नहीं मिल रहा है। वे सरकार को भूमि देन से इनकार नहीं कर रहे। उत्तर प्रदेष की सरकार किसान और उनके प्रतिनिधियों से सीधे बात न करके पुलिस तथा प्रषासन के बल पर उनकी जमीन हथियाना चाहती है। समस्या यहीं से उत्पन्न होती है।
बंगाल में औद्योगीकरण १९वीं षताब्दी में षुरू हो गया था। कलकत्ता आजादी से पूर्व देष के मजदूरों के लिए सबसे ज्यादा आकर्शण का केन्द्र था। पूर्वी उत्तर प्रदेष तथा बिहार के लाखों लोगों को उसने अपने औद्योगिक विकास के कारण अपनी ओर खींचा तथा नौकरियाँ भी दीं और लगभग आधा करोड जनता वहीं की होकर रह गयी। इस स्थिति पर ब्रज तथा भोजपुरी में अनेक लोकगीत प्रचलित हैं। राही मासूम रजा ने अपने कालजयी उपन्यास ’आधा गाँव‘ का आरम्भ-’लागा झुलनियाँ का धक्का, बलम कलकत्ता चले गये‘- से किया है। एक अन्य प्रचलित लोकगीत है, ’’पैसा दे दा, चल कलकत्ता‘‘ इन लोकगीतों में उस समय के जनसमुदाय के बीच कलकत्ता का आकर्शण देखा जा सकता है। उस समय कलकत्ता के सारे उद्योग-धन्धे मारवाडयों के हाथ में थे। अस्सी के दषक तक आते-आते हरियाणा, राजस्थान तथा दिल्ली के आसपास उद्योग फैलने लगे। बंगाल में बहुत से कारख्ााने इस बीच बंद हो गये और इससे लाखों मजदूर बेरोजगार हो गये। इस स्थिति से माक्र्सवादी सरकार के सामने बहुत बडा संकट उत्पन्न हो गया कि उद्योगों को लगवाया जाए कि नहीं। क्योंकि पूँजीपतियों की षर्तों को भी मानना था और मजदूरों के हितों का ध्यान भी रखना था। वामपंथी सरकार ने उनके बीच तालमेल बिठा लिया। लेकिन, पार्टी और उसके संगठन का एक छोटा वर्ग हमेषा इसका विरोध करता रहा। वे कहते रहे कि इस कार्य से पूँजीवादी व्यवस्था को मजबूती मिलती है जबकि वामपंथी पूँजीवाद के सबसे बडे दुष्मन होते हैं। यह अन्तर्द्वन्द्व सिद्धान्त और व्यवहार के बीच था। सिद्धान्त में यह बात ठीक थी, किन्तु व्यवहार में फट नहीं बैठती थी। हमारे संविधान का पूरा ढाँचा ही पूँजीवाद समर्थक है तथा आर्थिक व्यवस्था भी पूँजी एवं मुनाफे पर आधारित है। पूरे देष में यही व्यवस्था है। बंगाल की सरकार इससे थोडी भिन्न है। वहाँ के किसी भी मंत्री पर ३० साल में भ्रश्टाचार के आरोप नहीं लगे। उनके किसी एम०पी० ने पैसे लेकर सवाल नहीं पूछे। उनके यहाँ दल-बदल की भी परंपरा नहीं है। जो योजनाएँ बनती हैं, वे लागू भी हो जाती हैं। अन्य राज्यों में, योजनाएँ कागज पर ही सिमट कर रह जाती हैं। इसी कारण, बंगाल में वामपंथी सरकार पूँजीपतियों पर दबाब देकर अपनी नीतियों को मनवा लेती हैं। साथ ही, पार्टी वैष्वीकरण की नीतियों का विरोध भी करती है। उसे षोशण का नया हथियार मानती हैं।
२१वीं षताब्दी के आते-आते नयी चुनौतियाँ सामने आई हैं। जनता को रोजगार देना सबसे बडी चुनौती है। यह रोजगार नये उद्योग-धन्धों से ही संभव है। छोटी पूँजी, बडी पूँजी के सामने बाजार में नहीं टिक पा रही है। बडी पूँजी आये कहाँ से, यह एक ज्वलंत प्रष्न है। अमरीका और उसके सहयोगी मित्रों की षर्तों को मानने से जनसमुदाय के हित बाधित होते हैं। उनकी नीतियाँ आम जन के हित में नहीं होती। उसका विकल्प यह सोचा गया कि तीसरी दुनिया के देषों से बात की जाए। दक्षिण पूर्व एषिया के देष इसके लिए तैयार हो गये हैं और यह तय हुआ है कि मजदूरों का दमन नहीं होगा तथा उन्हें उचित मुआवजा दिया जायेगा एवं भारतीय कानून का पूरा सम्मान किया जायेगा। इसी बीच, टाटा ने छोटी कार बनाने वाले बडे उद्योग को लगाने का आग्रह किया और बंगाल सरकार की तमाम षर्तें मान लीं। मोटर उद्योग में लिप्त अन्य बडे उद्योगपतियों के राजनैतिक सहकर्मी, जिनमें तृणमूल कांग्रेस तथा अन्य दल भी षामिल हैं; किसानों के पक्ष में झण्डा बुलन्द करने और वहाँ की जनता की भावनाओं को भडकाने में लगे हैं। मोटर-उद्योग में लगे बडे देषी-विदेषी पूँजीपतियों की इस लडाई को ये पार्टियाँ उनकी ही ओर से लडने लगी हैं। ’सिंगूर‘ में आन्दोलन भी किया गया, किन्तु वह आन्दोलन असफल रहा। इस बार नन्दीग्राम के लोगों को ये पार्टियाँ भडकाने में सफल रहीं। वहाँ ११ किसानों ने अपनी जान गवाँ दी। यह बहुत ही षर्मनाक और भयानक घटना है। इस पर किसी भी सभ्य समाज को दुख होगा, लेकिन बंगाल पुलिस कुछ अलग होगी, यह भ्रम, इस निंदनीय घटना के बाद समाप्त हो गया। वहाँ की पुलिस भी पंजाब, उत्तर प्रदेष एवं बिहार आदि राज्यों की पुलिस की ही भाँति है। जब साधारणजन उनका मुकाबला करते हैं, वे अपना विवेक खो देते हैं और उन पर हर तरह के अत्याचार करना अपना कर्तव्य समझते हैं। बंगाल में भी षायद यही हुआ है। यहाँ प्रष्न उठता है कि क्या नन्दीग्राम के किसानों को सरकार ने विष्वास में लिया था? यदि नहीं लिया तो क्यों नहीं लिया? किसान सभा तथा उससे जुडे अन्य संगठन क्या कर रहे थे? ये संगठन इतने निश्क्रिय क्यों रहे? केवल ममता बनर्जी की आलोचना करने से इस समस्या का हल नहीं होगा।
इसी बीच नौकरषाही पर अत्यधिक भरोसा करने की एक प्रवृत्ति पनपी है। उनके माध्यम से परिवर्तन की बात सोचना भ्रामक है। जनता के प्रति नौकरषाहों की न तो प्रतिबद्धता है और न ही उनकी चेतना का सही ढंग से विकास होता है। इसलिए, नौकरषाही से वही कार्य करवाने चाहिए, जिनके लिए उन्हें नियुक्त किया गया है।
इस संबंध में मत मेरा है कि पुराने सोषलिस्ट मुल्कों के अनुभवों से आज हमें सीखने की आवष्यकता है। मुझे सोवियत यूनियन के टूटने के बाद पूर्वी यूरोप के पुराने समाजवादी देषों की यात्रा करने तथा वहाँ के लोगों से मिलने का अवसर मिला। हंगरी में किसानों के यहाँ जाकर उनसे बात भी की। उन्होंने बताया कि धीरे-धीरे पार्टी के अधिकारों को नौकरषाही ने किस प्रकार अपने हाथ में ले लिया। नौकरषाही अपनी असफलता छिपाने के लिए गलत रिपोर्टें भी प्रस्तुत करती थी। औद्योगिक एवं कृशि-उत्पादन कागज पर ही बढता था। पार्टी में निहितस्वार्थी वर्ग तथा नौकरषाहों ने मिलकर समाजवाद के नाम पर जो रास्ता अपनाया, उसका दुश्प्रभाव पार्टी पर भी पडा। इन आन्दोलनों में किसान एवं मजदूर कहीं नहीं थे। एक पुराने कम्युनिस्ट, जो द्वितीय विष्वयुद्ध में हिटलर के ख्ालाफ लडे थे; आज भी कम्युनिस्ट पार्टी से जुडे होने में गर्व का अनुभव करते थे। इनका नाम इवान था और उनके पैर में गोली लगी थी। वे लंगडाते थे। उन्होंने एक कहानी सुनाई कि एक व्यक्ति एक क्षेत्र में पार्टी का सचिव था। वह अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए पार्टी में आया था। अपनी चतुराई एवं सक्रियता के कारण वह जल्दी ही पार्टी का सेक्रेटरी बन गया, जबकि पुराने लोग पीछे रह गये। कुछ पुराने कम्युनिस्टों ने इसकी षिकायत पार्टी के महासचिव से की। महासचिव एक ईमानदार आदमी थे। वह पन्द्रह वर्श से पार्टी में सर्वोच्च पद पर थे, लेकिन भले आदमी तत्कालीन हंगरी की वास्तविकता से अनभिज्ञ थे। उस षातिर आदमी ने ऐसा जाल बुना कि उसमें ये महासचिव फँस गये। उसने ऐलान किया था कि हंगरी में वो संतरे पैदा करेगा, क्योंकि बाहर से मँगाने में हंगरी को अपनी बहुमूल्य मुद्रा व्यय करनी पडती थी। महासचिव आये थे षिकायत सुनने, किन्तु उसने रातों-रात संतरे के पेड गाड दिये और नीबू को छोटे संतरे बताकर कॉमरेड को भ्रमित कर दिया और कहा कि देखिए कम्युनिस्ट हर चीज पैदा कर सकता है, वह हार नहीं मानता है। उन्होंने उसकी पीठ थपथपाई और उसे षाबाषी दी। थोडे दिनों के बाद उसी व्यक्ति ने समाजवाद के ख्ालाफ सबसे पहले आवाज उठायीं।
जहाँ तक भारत की बात है, इस देष के मध्यवर्ग की विचित्र मानसिकता है। वे कम्युनिस्टों से द्वेश भी रखते हैं और बहुत अधिक अपेक्षा भी रखते हैं। वे चाहते हैं कि कम्युनिस्ट अपने सिद्धान्तों पर डटे रहें, चाहे उन्हें कोई भी मूल्य चुकाना पडे, किन्तु खुद कुछ भी नहीं करेंगे। वे हर हालत में बडे उद्योगों की स्थापना को पूँजीवाद समझते हैं भले ही यह आवष्यक हो। उनके इस चिंतन में भावुकता अधिक, यथार्थ कम है। दरअसल समस्याओं के मूल्यांकन के लिए सही तथ्यों की जानकारी तथा तर्क एवं विष्लेशण की आवष्यकता होती है, तो उत्तेजनापूर्ण ख्ाबरों की प्रस्तुति के जोष में आज नदारद है।



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