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Vartmaan Sahitya :: May, 2007 Sponsered by : Decor Home, Bikaner |
प्रो. ए. अरविन्दाक्षन को जस्टिस शारदा चरण मित्रा स्मृति भाषा सेतु सम्मान अश्विनी ढा
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कोलकाता की प्रतिश्ठित संस्था ’अपनी भाशा‘ का वर्श २००७ का जस्टिस षारदा चरण मित्र स्मृति भाशा सेतु सम्मान, हिन्दी-मलयालम के बीच सेतु निर्मित करने वाले रचनाकार प्रो. ए०अरविन्दाक्षन को प्रदान किया गया। ’अपनी भाशा‘ संस्था की ओर से इस सम्मान को पाने वाले श्री अरविन्दाक्षन सातवें लेखक हैं।
समारोह में प्रख्यात ललित निबंधकार डॉ. कृश्ण बिहारी मिश्र, कलकत्ता विष्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष प्रो. जगदीष्वर चतुर्वेदी, ’छपते-छपते‘ दैनिक समाचार पत्र के प्रधान संपादक विष्वंभर नेवर, कथाकार सिद्धेष आदि उपस्थित थे।
उक्त अवसर पर ’हिन्दी-मलयालम संबंध, ऐतिहासिक संदर्भ और समकालीन परिप्रेक्ष्य‘ विशय पर अपना वक्तव्य रखते हुए प्रो. ए. अरविन्दाक्षन ने कहा- ’’हिन्दी-मलयालम का संबंध सैकडों वर्श से भी ज्यादा पुराना है। अनुवाद प्रक्रिया के जरिए दोनों भाशाएं काफी नजदीक आयी हैं। संस्कृत के महत्त्व को स्वीकार करते हुए उन्होंने कहा कि संस्कृत काफी समृद्ध भाशा है। मलयालम में अस्सी प्रतिषत षब्द संस्कृत के हैं। ऐतिहासिक पृश्ठभूमि पर चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि लगभग दो सौ वर्श पूर्व केरल के महाराजा त्रिनाडपाणी ने हिन्दी के प्रति यह लगाव स्वतंत्रता संग्राम के दरम्यिान महात्मा गांधी के खादी, हिन्दी व स्वराज के नारे से और मजबूत हुआ। केरल में हिन्दी के प्रति श्रद्धा का भाव है। उन्होंने सुझाव दिया कि अहिंदी भाशी लेखक जो हिन्दी में मौलिक रचना करते हैं उनकी रचना का मूल्यंाकन हिन्दी की मुख्य धारा में रखकर किया जाना चाहिए।
कार्यक्रम के दूसरे सत्र में ’विज्ञापन की भाशा‘ विशय पर एक संगोश्ठी का आयोजन किया गया जिसमें डॉ. कृश्ण बिहारी मिश्र, प्रो. जगदीष्वर चतुर्वेदी और श्री विष्वंभर नेवर ने अपने विचार व्यक्त किए। इन वक्ताओं ने विज्ञापन की भाशा की विषेशता, आज के दौर में उसकी उपयोगिता, संकट और कलात्मक मौलिक रूपों आदि की विस्तृत चर्चा की।
कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. कृश्ण बिहारी मिश्र ने, संचालन दुर्गा व्यास ने और धन्यवाद ज्ञापन ’अपनी भाशा‘ संस्था के उपाध्यक्ष पारस बोथरा ने किया। संस्था के महासचिव डॉ. अमरनाथ ने स्वागत वक्तव्य दिया।
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