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Vartmaan Sahitya ::May, 2007 Sponsered by : Decor Home, Bikaner जनवादी लेखक संघ लखनऊ की रचना संगोष्ठी डॉ. गिरीशचन्द्र श्रीवास्तव
जनवादी लेखक संघ (लखनऊ इकाई) के तत्त्वाधान में रचना संगोश्ठी आयोजित हुई जिसकी अध्यक्षता चर्चित लेखक गिरीष पाण्डे ने की। इस संगोश्ठी में मुख्य अतिथि थे प्रसिद्ध उपन्यासकार-कथाकार षिवमूर्ति तथा संगोश्ठी का संचालन किया वरिश्ठ कथाकार-आलोचक गिरीषचन्द्र श्रीवास्तव ने।
संगोश्ठी में चर्चा हेतु युवा कहानीकार एम० इलियास अन्सारी ने अपनी लम्बी कहानी ’सरिता‘ का पाठ किया जिस पर उपस्थित साहित्यकारों के बीच एक विचारोत्तेजक बहस हुई। श्री षिवमूर्ति ने कहा कि एक अच्छी कहानी के लिए यह देखना आवष्यक है कि उसे कहाँ से उठायें और कहां उसे समाप्त करें। ’सरिता‘ कहानी का नरेषन बहुत अच्छा है, इसके बावजूद कहानी आगे बढती हुई नहीं दिखती। वरिश्ठ कवि भगवानस्वरूप कटियार ने कहा कि कहानी का कथ्य हमें आकर्शित करता है। भावनात्मक द्वन्द्व की सषक्त अभिव्यक्ति भी हुई है किन्तु इसके विस्तार की आवष्यकता है। कथाकार भानुप्रकाष श्रीवास्तव ने कहानी पर सविस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि कहानी में अनवरी बेगम और सरिता के मध्य वार्तालापों द्वारा धर्मनिरपेक्षता को बहुत सषक्त ढंग से उभारा गया है। वरिश्ठ लेखक राजेन्द्र वर्मा ने कहा कि कहानी सषक्त है लेकिन कहानी से किसी लक्ष्य की स्थापना नहीं होती और तार्किक अन्तर्द्वन्द्व की कमी है। चर्चित युवा कवि-कहानीकार वीरेन्द्र सारंग न कहा कि कहानी का षिल्प नया और सषक्त है। भाशा भी सहज और पात्रों के अनुकूल है। परन्तु कहानी में अनिर्णय की कई स्थितियाँ हैं। गिरीषचन्द्र श्रीवास्तव ने कहा कि कहानी का सर्वाधिक उज्ज्वल पक्ष है इसकी अन्तरवस्तु जो बहुत ही महत्त्वपूर्ण और प्रसंगिक है। कहानी में सामाजिक रूढयों और अंधविष्वासों को बेनकाब किया गया है। चर्चित वरिश्ठ कवि सुरेष उजाला ने रेखांकित किया कि कहानी में समय का दर्द झलकता है। युवा कथाकार अखिलेष श्रीवास्तव ’चमन‘ ने कहानी को सषक्त बताया परन्तु यह भी कहा कि कहानी में कहीं-कहीं वर्णन पक्ष अधिक है। वरिश्ठ लेखक ब्रह्मानन्द गौड ने कहा कि कहानी का षिल्प सषक्त है लेकिन कहानी से लेखक की पक्षधरता स्पश्ट नहीं होती। युवा लेखक लक्ष्मीकान्त ने कहा कि कहानी में संवेदित करती है तथा कहानी में लेखक का ’विजन‘ झलकता है।
अध्यक्ष पद से बोलते हुए गिरीष पाण्डे ने रेखांकित किया कि कहानी में कौमी एकता का स्वर उभारा गया है। उन्होंने यह भी कहा कि कहानी में अंधविष्वास के विरुद्ध स्वर को और षिद्दत से उभारने की जरूरत है। संगोश्ठी में राजेन्द्र प्रसाद और सुश्री सुषीला पुरी व प्रज्ञा पाण्डे ने भी सक्रिय भाग लिया।
संगोष्ठी के अंत में उपस्थित साहित्यकारों ने दो मिनट का मौन रख कर कमलेश्वर और कुमुद नागर के निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया।
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