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जनजातीय संस्कृति से संवाद की मुखर अभिव्यक्ति
शेफाली सक्सेना

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संस्मरणात्मक षैली में लिखी गयी ’पूरब का स्वीट्जरलैंड नागालैंड,‘ लेखक-पत्रकार और आकाषवाणी पटना के सहायक समाचार-संपादक संजय कुमार की तीसरी पुस्तक है। विषाल पब्लिकेषन द्वारा प्रकाषित इस पुस्तक में लेखक ने नागालैंड का चित्रण काफी बारीकी से किया है। वहाँ के नकारात्मक पहलुओं को समेटते हुए, अनछुए पहलुओं को भी बेहतर ढंग से समेटा गया है। समीक्षित पुस्तक में नागालैंड की संस्कृति, भाशा, वहाँ की सामाजिक परिस्थितियों, उग्रवादी संगठनों की गतिविधियों के बीच झुलसती वहाँ की जन्दगी और राजनीतिक हालातों को समेटते हुए संजय कुमार ने अपने पत्रकारिता के अनुभवों को षब्दों में पिरोया है।
पुस्तक में लेखक के नागालैंड प्रवास का न सिफर् यात्रा-वृत्तान्त भर है, बल्कि यह रिपोर्ताज का भी आनन्द देता है। पाठकों को ऐसा एहसास हो सकता है, मानो वहाँ रहकर नागालैंड के बारे में जान रहे हों। नागालैंड को लेकर लिखी यह पुस्तक सूचनापरक भी है, जो वहाँ के प्राकृतिक स्थलों, आतंकवाद के इतिहास, संस्कृति आदि की भी जानकारी देती है। यही नहीं, पुस्तक नागा समाज की जिस उदात्त और विषिश्ट जीवन षैली से परिचित कराती है, वह अनूठा अनुभव है। अमूमन, नागालैंड की बिल्कुल अलग ही छवि है, जो बहुत सकारात्मक नहीं है। देष के अन्य भागों में नागालैंड को पूरब के अभिषाप के रूप में देखा जाता है। लेखक ने तमाम उग्रवादी गतिविधियों एवं विशम सामाजिक परिस्थितियों के बावजूद वहाँ की जन्दगी में गतिषीलता, लोक-संस्कृति के मोहक रंगों और समाज की खनक को जिस रूप में रखा है, वह काबिले तारीफ है।
पुस्तक के प्रथम अध्याय में नागा समाज की सहजता और वहाँ की प्राकृतिक सुशमा का रोचक वर्णन किया गया है। लेखक के अनुसार उन्हें करीब तीन साल तक नागालैंड की राजधानी कोहिमा में रहकर पूर्वोत्तर राज्यों में काफी संवेदनषील तथा लम्बे समय से हिंसा से जूझ रहे अषांत और कठिन राज्य नागालैंड को करीब से महसूस करने और समझने-बूझने तथा वहाँ के राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक पहलुओं से रू-ब-रू होने का अवसर मिला।
षेश भारत के नागरिकों के मन में सुरम्य प्रदेष नागालैंड की दहषतजदा छवि वहाँ की उग्रवादी हिंसक गतिविधियों के कारण ही बनती हैं। लेखक ने अलगाववाद के कारण वहाँ की ठहरी ठिठकी हुई जन्दगी को समझने की कोषिष की है। लेखक ने वहाँ के भूमिगत उग्रवादी संगठनों द्वारा चलाई जा रही समानान्तर सत्ता की सामाजिक-आर्थिक पडताल करते हुए उसके अतीत को भी देखने की कोषिष की है, जिससे पता चलता है कि नागा समाज को उसकी समग्रता में देखने की रचनात्मक दृश्टि लेखक के पास है। इसी कारण, वे पाठकों में उस प्रदेष के प्रति एक नया विष्वास पैदा करना चाहते हैं। एक दिसम्बर १९६३ ई० को राज्य के रूप में स्वायत्तता मिल जाने के बाद भी, जब उसके हितों की अनदेखी होती रही, तो अलगाववादी आन्दोलन की हिंसक कडयाँ षुरू हो गईं; जिसकी ऐतिहासिक गाथा को दूसरे अध्याय में रोचक अंदाज में दर्ज किया गया है। अलगाववादी गतिविधियाँ अब काफी कम होती जा रही हैं। गृह मंत्रालय, भारत सरकार की वार्शिक रपट २००४-०५ के हवाले से लेखक ने निश्कर्श रूप में लिखा है-’’मणिपुर को छोडकर सारे पूर्वोत्तर में हिंसा के रुझान में गिरावट आई है, जिसमें नागालैंड भी षामिल है।‘‘
नागालैंड की अनूठी सांस्कृतिक विरासत की विस्तृत चर्चा तीसरे अध्याय में की गई है। वहाँ की अलग-अलग जन-जातियों में अलग-अलग प्रकार के मोहक लोक-उत्सव धूमधाम से मनाये जाते हैं। यहाँ पर, मुख्यतः १६ जनजातियाँ और अनेक उप-जनजातियाँ हैं, जिनकी वेषभूशा, रहन-सहन, उत्सव-त्योहार और संस्कृतियाँ भी अलग-अलग हैं। इन जनजातियों के त्योहारों और उनके सूक्ष्म विभेदों को विस्तार से समझाते हुए, उन सबके मूल में स्थित आमोद और मस्ती के भावों को उद्घाटित किया गया है। किसी भी समाज को प्रामाणिक रूप से समझने के लिए उसके पर्व-त्योहारों की बारीकियों को समझना आवष्यक है। इस दृश्टि से देखा जाए, तो नागा समाज के सारे पर्व-त्योहार उनके सामान्य जीवन के आंतरिक एवं बाह्य जीवन-सौन्दर्य को ही उद्घाटित करते हैं।
नागालैंड के निवासियों का पहनावा, रंगबिरंगी वेषभूशा, अलस्सुबह षुरू होती रोजमर्रा की जन्दगी, सुबह खुलते बाजार और काम पर निकलते आधुनिक दिखते युवक-युवतियाँ, औरत-मर्द अर्थात् उस प्रदेष के जन-जीवन की समग्र झाँकी, इन सब की पडताल पुस्तक के चौथे अध्याय में की गयी है। वहाँ की अलग-अलग जनजातियों की पहचान वेषभूशा की बारीक बनावाटों से ही किस प्रकार हो जाती है, इसकी रोचक जानकारी लेखक ने दी है। बकौल लेखक, नागा समाज परिश्रमी है। मांस उनका प्रिय आहार है, किसी भी पषु-पक्षी का मांस खाने से उन्हें परहेज नहीं है और वहाँ सिफर् दुकानों में ही नहीं, आम जीवन में भी ज्यादातर महिलाएँ कामकाजी नजर आती हैं।
पर्यटन स्थलों, धार्मिक मान्यताओं, षिक्षा, भाशा आदि का अवलोकन पुस्तक के पाँचवे अर्थात् अंतिम अध्याय में किया गया है। ’कठिन और अषांत क्षेत्र‘ घोशित होने के बावजूद नागालैंड के क्रोड में ऐसा बहुत कुछ है, जिससे वे देष के षेश भाग में रहने वालों को अकर्शित-प्रभावित करता है। तीन वर्शों में, किसी प्रदेष की आंतरिक स्थितियों और बाह्य सौन्दर्य को कोई खोजी*मन जितना समझ-परख सकता है, उसे लेखक ने पुस्तक में सहेजने की कोषिष की है। ’अपनी बात‘ में लेखक ने ठीक ही लिखा है कि ’’नागालैंड के ऐतिहासिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र सहित कई ऐसे पहलू हैं, जिनके बारे में देष के अन्य भाग के लोगों को जानकारी नहीं है। बस यहाँ के अलगाववाद के बारे में ही वे जानते हैं, जबकि संस्कृति के मामले में यह राज्य काफी धनी है। नागालैंड को जानने के लिए वहाँ जाना और रहते हुए अध्ययन करना होगा। नागाओं ने जो प्रेम भाव मुझे दिया उसे भूल नहीं सकता। साथ ही, उनसे एक बात जरूर सीखी, वह यह कि संकट को भी हँसते-हँसते गले लगाना।
कठिन संघर्श के बीच भी जीवन की मुस्कान में खिलने की कला नागा समाज की सबसे बडी विषेशता है, जिसे इस*पुस्तक के केन्द्र में रखकर नागालैंड को देखने-समझने का प्रयास किया गया है। संघर्श से प्रतिभा के मेल की भाशा का जो खास स्वाद होता है, वह पूरी पुस्तक में मौजूद है। इसे पढकर पाठक के*मन में नागालैंड को वहाँ रहकर देखने-समझने की ललक पैदा होगी।
पूर्वोत्तर भारत के अनेक क्षेत्र, विषेशकर नागालैंड, न केवल अपनी अनूठी प्राकृतिक सुशमा, अपितु संस्कृति, परम्परा और सादगी के कारण षेश भारतीय नागरिकों के मन को मोहते रहे हैं। खूबसूरत वादियों से महमह करते इस पर्वतीय क्षेत्र को यों ही पूरब का स्वीट्जरलैंड नहीं कहा गया। इस देष की सात बहनों अर्थात् सात पूर्वोत्तर प्रान्तों में से एक नागालैंड के क्रोड में जाने कितने ही विराट सौन्दर्य और ऐतिहासिक धरोहर के रत्न बिखरे पडे हैं। नागालैंड प्रकृति प्रदत्त अक्षय सौन्दर्य से चतुर्दिक रचा-बसा प्रदेष है, जिसे समग्रता में देखने-परखने की कोषिष इस पुस्तक में झलकती है।



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