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समकालीन व्यवस्था की विद्रूपताओं को व्यक्त करनेवाली कहानियाँ आशिक बालौत
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बादषाह हुसैन रिजवी हिन्दी के उन कथाकारों में से एक हैं जिन्होंने हिन्दी कहानी विधा का विस्तार किया है। उन्होंने अपनी कहानियों में समकालीन व्यवस्था में व्याप्त अराजकता का विरोध करने के साथ-साथ मानवीय संवेदना को विषेश महत्त्व दिया है। वे कहानी की संरचना, कथ्य और दृश्टि या विचारधारा के सामंजस्य को बनाये रखते हैं। उनकी कहानियों में व्याप्त विचारधारा आरोपित नहीं लगती। यही कारण है कि उनकी कहानियों में अभिव्यक्त विचार जीवन के व्यापक अनुभवों को पेष करने में एक दूसरे के पूरक बन जाते हैं।
इस संग्रह की कहानियों में वर्तमान ज्वलंत प्रष्नों और आसपास घटित हो रही घटनाओं के संदर्भों को आत्मसात् करके उन्हें रचना का रूप प्रदान किया गया है। ये कहानियाँ आम आदमी के दुख-दर्द, पीडा, यातना और संघर्श को पूरी संवेदना से देखने की गवाही देती हैं।
’जमीन का कीडा‘, ’षफीक की जबान बंद थी‘ आदि कहानियों में जहाँ लेखक ने गाँव के जीवन में आई गिरावट और लम्पटता को केन्द्र में रखा है वहीं आर्थिक संदर्भों और बुनियादी समस्याओं को रेखांकित किया है। सामंती मूल्यों और संगठित भ्रश्टाचार से घिरे ग्रामीण समुदाय की स्थितियों के संजटिल यथार्थ को ये कहानियाँ प्रभावषाली ढंग से सामने रखती हैं- ’’कागजात की जाँच के बाद पता चला कि विगत पाँच वर्शों से ताल की नीलामी से प्राप्त धन का कहीं लेखा-जोखा नहीं था। ब्लाक से गाँव की सडकों और गलियों में खडन्जा बिछाने, पक्की नालियाँ बनवाने के लिये मिली धनराषि को पंचायत सेक्रेटरी, ग्राम विकास अधिकारी और प्रधान ने आपस में बांटकर उल्टा-सीधा इन्द्राज करके कागजात का पेट भर दिया था।‘‘ पृश्ठ-२५
’पनाह‘ और ’बँटवारे‘ कहानियों में कहानीकार ने भारतीय समाज में व्याप्त सांप्रदायिक उन्माद और सांप्रदायिकता के चरित्र के वास्तविक यथार्थ को चित्रित किया है। बादषाह हुसैन रिजवी जागरुक लेखक हैं इसीलिए उन्होंने सांप्रदायिकता की राजनीति का विष्लेशण और आकलन करते हुए राजनीतिक स्वार्थों और अपनी महत्वकांक्षाओं को पूरा करने वाले राजनीतिक नेताओं, धर्म और संप्रदाय के ठेकेदारों के चेहरे से आवरण हटा दिया है। ये कहानियाँ जहाँ सांप्रदायिकता का चित्रांकन करती हैं; वही सांप्रदायिक सौहार्द्र और मानवीयता को भी स्वर प्रदान करती हैं। इन कहानियों से गुजरते हुए हम महसूस करते हैं कि बादषाह हुसैन रिजवी सांप्रदायिकता और व्यवस्था के नंगेपन के बीच से मानवीय रिष्तों को सामने लाकर समाज में साम्प्रदायिक सद्भाव बनाने के लिए जमीन तैयार करते हैं। इस प्रकार वे हमें भीश्म साहनी की परंपरा के कहानीकार दिखाई देते हैं,
’अपने जब्बार भाई‘ कहानी गरीबी की रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले उन मुसलमानों के जीवन की त्रासद स्थितियों को सामने रखती है जिनका ख्वाब अरब जाना है, ताकि उनकी आर्थिक स्थिति में कुछ सुधार आ सके और जीवन की बुनियादी जरूरतों को पूरा कर सकें। लेकिन यह बडी ही विडम्बना की बात है कि वे अपने थोडे-बहुत आर्थिक संसाधनों, जमीन, जेवर को बेच-बाचकर जब्बार भाई जैसे लोगों के हाथ ठगे जाते हैं। गरीब और असहाय लोगों के दुखों पर महल खडा करके जब्बार जैसे लोग न केवल खुषी में मग्न हैं बल्कि अपने संप्रदाय में उनको एक विषिश्ट स्थान भी प्राप्त है। बादषाह हुसैन रिजवी जब्बार भाई जैसे लोगों के वास्तविक चरित्र को उजागर करके हमें समाज के सफेद पोष लोगों के चरित्र के विशय में सोचने को बाध्य करते हैं। यही इस कहानी की सम्प्रेशणीयता और ताकत है।
उनकी ये कहानियाँ जिन्दगी का अर्थ और उसके मायने खोलती हैं। ये कहानियाँ धर्म निरपेक्षता की पेरोकार भी हैं और वर्तमाान समाज के अंतर्विरोधों का दस्तावेज भी हैं।
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