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Vartmaan Sahitya ::May, 2007
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’काल-वृक्ष की छाया में‘, वास करती जिज्ञासाएँ कवि अग्निशेखर की!!
शाकिर अली

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जिन कवियों के योगदान से हिन्दी कविता समृद्ध हुई है, उनमें कष्मीर के कवि अग्निषेखर का काव्य उनके जनपद का सच्चा प्रतिनिधित्व करता है। सही मायने में हिन्दी में ’’कष्मीर से लेकर कन्याकुमारी‘‘ वाला विस्तार कवि अग्निेषेखर की कविताओं के आने के बाद हुआ है। वे अपने साथ कष्मीरी भाशा के आधुनिक कवि ’’षायरे कष्मीर महजूर‘‘ एवं कवयित्री हब्बा खातून की कविता की परम्परा के साथ साथ और भी पीछे चले तो संस्कृत के ’राजतरंगिणी‘ वाले कल्हण की कविता की परम्परा को लेकर हिन्दी कविता में अपनी स्थानीयता के साथ उपस्थित होते हैं, एवं राश्ट्रीय मानस को न सिर्फ विस्तारित करते हैं, बल्कि उसे वैष्विक कविता से जोडते हैं। उन्होंने जाफरान की खुषबू और रंग को हिन्दी कविता में घोला है।
उनके तीसरे कविता संग्रह ’’कालवृक्ष की छाया में‘‘ की सबसे पहली लंबी कविता ’’सतीसर‘‘ चौंतीस छोटी कविताओं में फैली हुई है। ’सतीसर‘ कविता असल में कष्मीर को लेकर जनमानस में फैले मिथकों का संग्रहालय है- स्वयं कवि के षब्दों में देखें- ’’यह कष्मीर का एक प्राचीन आख्यान है, जो वहाँ के स्थानीय पुराण ’’नीलम पुराण‘‘ में वर्णित है। इसमें बताया गया है कि प्राचीन काल में कष्मीर एक विषाल सरोवर था, जो सतीसर या सतीदेष के नाम से जाना जाता था। इसके किनारों पर कष्यप की संतान नाग और दैत्य परस्पर सद्भाव से रहते थे। नागों एवं गरुडों में चूंकि वैमनस्य था, उनकी माताओं कद्रू और वनिता का सौतिया डाह प्रसिद्ध है, इसलिए पूर्वकाल में हुई संधि के तहत गरुडों को देवताओं का वरदहस्त प्राप्त था और नागों को षिव का। देव सस्कृति के लिए नाग तो असुर थे ही, षिव भी असुर थे। इसलिए वेदों में षिव का नामोल्लेख तक नहीं, वहाँ रूद्र हैं, जो षिव नहीं। बाद में देव संस्कृति के बढते वर्चस्व के कारण उनकी सर्वसमावेषी संस्कृति के चलते षिव भी रूद्र कहलाए। आर्यों की असुरोपासक षाखाएँ भी अपनी निजताएँ खोकर वर्चस्वाद का षिकर बनीं।
’’सतीसर‘‘ लंबी कविता को समझने की चाभी ऊपर स्वयं कवि के षब्दों में प्रस्तुत कर दी गई है, जो इन ३४ छोटी कविताओं में गुंथी कथा का सार भी है।
’’सतीसर‘‘ में वर्णित नाग और गरुड के संघर्श को संग्रह की भूमिका में राजेष जोषी ने जयषंकर प्रसाद के नाटक ’जनमेजय का नाग यज्ञ‘ से जोडकर देखने की कोषिष की है, जबकि जयषंकर प्रसाद के ’’कामायनी‘ महाकाव्य से इसकी तुलना ज्यादा बेहतर ढंग से की जा सकती है। अग्निषेखर की कविता ’सतीसर‘ में भी सुर-असुर के बीच जो संघर्श चित्रित किया गया है, वह उसे आज के जीवन से जोडकर विराट वैष्विक यथार्थ से हमारा परिचय करवाता है। कष्मीर में आतंकी घटनाएँ ’सतीसर‘ कविता को पढते हुए याद आ जाना स्वाभाविक ही है कि किस तरह आज कष्मीर की ष्वेत बर्फीली भूमि ’’खून और खाक से लिथडी‘‘ हुई है। कष्मीर से एक बडी आबादी का पलायन नागों के पलायन, उनकी तकलीफों के द्वारा अभिव्यक्त हुआ है कविता में मिथकीय विराट् के रूप में -
’’विश्णु हैं / छोटे-छोटे देषों के काल
रास नहीं आती उन्हें / हमारी स्वतंत्रताएँ
मारक है, उनकी मुस्कान / मेरे विरोध में
छिपा है / जीवन का स्वप्न।‘‘
यहाँ तानाषाही एवं सामंतषाही तथा उसके विरुद्ध पूँजीवादी जनतंत्र के बीच अंतर्विरोध को मुक्तिबोध ने देखा था, लेकिन अग्निेषेखर ने ’’सतीसर‘‘ में जनवाद की अपनी पक्षधरता रखी है, इसलिए सहज एवं सरलतापूर्वक स्थितियाँ व्यंजित हुई हैं। मिथक को जनसंघर्श से जोडने की दृश्टि मुक्तिबोध के पास थी, तो अग्निेषेखर के कवि ने सतीसर के कथा मिथक को स्वयं ही जन-भावनाओं एवं जनसंघर्श से जोड दिया है।
धुल चुकी हैं, दुर्भावनाएँ
कविताएँ खेलती साथ बच्चों के
कामायनी के समान ही अग्निेषेखर के यहाँ भी मनु के जलप्रलय के समान जलप्रलय हैः
पर्वत षिखरों के ऊपर/छलकता
दौडता है समुद्र/ऊँची नीची पानी की
पगडंडियों पर/खा रही हिचकोले
नील की नौका
कवि अग्निेषेखर की जनपक्षधतरता पहली कविता ’’चीन की दीवार‘‘ में इस तरह प्रकट होती है ः
’’यहाँ पर तुम्हारी दीवार में
यह कैसी दरार है सम्राट/दबी हुई प्रजा की अवज्ञा है
या अपने सैनिक पति को खोजती
चियांग लू के आंसू की धार है‘‘
कवि का जनतांत्रिक आषावाद प्रकट होता है ः
’’जाल फेंकना सीखा मछेरे ने
मछली ने सीख लिया उछलना
कहावत यह भी/मछली की खुषफहमी देखो
तराजू में भी/भूली नहीं उछलना‘‘
अग्निषेखर का कवि, दोस्त-स्मृतियों से पाता है ताकत!
मैं भूल नहीं पाता तुम्हारा गरमकोट
देखना, मैं तुम्हारी यादों के लिए
सिलवाऊंगा/कफन में भी जेबें....
कवि अग्निषेखर के यहाँ धर्मनिरपेक्षता अपने वैज्ञानिक सोच के साथ उपस्थित है। एक षरणार्थी की तरह तकलीफ झेलते हुए, वे संकीर्ण सोच के बदले असली कारकों की पहचान करते हैं ः
’’उस आदमी ने/प्रार्थना में उठाये हाथ
और उसके हाथों में
आकाष से गिरा/एक मंत्र
उसे यकीन हुआ
वह इस सदी का कोई पैगंबर है
वह बदल गया समूह में
और समूह ने / उसे बदल डाला
एक मुहावरे में !
फिर वहाँ/हर बस्ती में जली आग
जिसमें रात के समय
जुटाया धर्म ने ईंधन
....
ब्रह्मांड में यह पृथ्वी/बदल रही है
उन्माद के बीजाक्षरों में‘‘
अग्निषेखर विकराल स्थितियों के ’’राजनीतिक इस्तेमाल‘‘ पर व्यंग्य करते हैं ः
’’दधिचि हो तुम।
कहा उन्होंने हमारे पास आकर
दरअसल उन्हें अपने भय से
पाना था पार
उन्होंने सहलायी हमारी हड्डियाँ
बना लिये उनसे हथियार‘‘
’’षरणार्थी षिविर‘‘ षीर्शक लम्बी कविता में निर्वासित जीवन की त्रासदी को जिस तरह से दर्षाया गया है, वह उस सत्ता विमर्ष को भी दर्षाते हैं, जिसके एजेंडे से आम जनता के सुख-दुख, चिकित्सा, षिक्षा, किसानों के खेत-खलिहान, उनकी बीज की रक्षा, सभी बाहर हो गये हैं, सत्ता आज केवल मल्टी नेषनल्स के हितों की रक्षा का काम करती है, सर्वसमावेषी मल्टीनेषनल्स ने सभी सरकारों को गोद ले लिया है, मानो !
’’हाँ, कवियों के मन में सबसे पहले
छपती है कविताएँ हवा के पन्नों पर
फिर चलती है साथ हमारे
आवेष और संघर्शों के तमाम ख्ातरों तक
चमक उठी श्रमजीवियों के पसीनों में
और कुछ रह जाती जीवन भर अलिखित ही
देखती हमें आकाष से हर क्षण
जैसे कोई हुतात्मा की आँख हो
यही है कवि की तीसरी आँख
रौषन रखती गहनतम अंधेरों को।
अग्निषेखर के कविताओं में वृहद् मानवीय मूल्यों को प्रतिश्ठित किया गया है और मानवीय सरोकारों को वाणी दी गई है, जो भारतीय संस्कृति के अनवरत प्रवाह से कष्मीर की भूमि को जोडती है। अग्निषेखर ने अपनी कविताओं में कष्मीर की सूफी परंपरा को पुनआर्विश्कृत कर समासिक संस्कृति को पुनरुज्जीवित किया है।



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