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तुम्हारा व्यवहार अब क्रोधित नहीं करता
बल्कि आहत करता है,
दिला जाता है एहसास/एक बेचारगी का
रह जाती है षेश एक टीस
गहरे कहीं ठगे जाने की।
ओ इन्सानी गिरगिट/तेरे इस बहुरंगेपन ने
ख्ात्म कर दी तेरे अपने
असली व्यक्तित्व की पहचान-
कभी उन षब्दों को टटोल
जो खो चुके हैं अपनी अर्थवत्ता
तेरी इस दोगली जुबान से निकलकर
स्वार्थ के रथ पर हो आसीन
कितने निर्दोशों को दोशी ठहराकर,
अकर्मण्यों को कर्मठ सिद्धकर
झूठ को सच कर दिखलाकर
इठलाता अपने बुद्धि-विवेक पर।
कभी इस मायाजाल से परे-
होकर गम्भीर
अपनी आत्मा की गहराई में उतर
और पहचान अपने सत्य स्वरूप को।
एक दिन ऐसा आएगा कि-
तेरा थोथा अहंकार,/सुखी जीवन की अवधारणाएँ
निश्क्रिय थोथे सिद्धान्त
सत्ता का उफनता उन्माद
सब कुछ ढह जाएगा, बिखर जाएगा,
तब तू चाहेगा व्यथा कहना किसी से अपनी
पर किसी को अवकाष न होगा,
और तू थामकर हृदय को अपने कहेगा,
ओ भगवान ! अब नहीं उठता,
तेरी इन वेदनाओं का गुरुभार।
(२)
ओ गृह स्वामी पुरुश,
तुम इतने कमजोर,
कब से हो गये कि-
अपने आँगन का हरसिंगार भी
नजर आता है तुम्हें,
पत्थर फेंकता।
क्या तुम नहीं जानते
तुम्हारे कितने दुख
बाँटे हैं इसने
कितने फूल खिले हैं
इस पर तुम्हारी कामनाओं के !
और तुम इतने कृतघ्न हो गए -
कि जब बच्चे उस पर
ढेले फेंकते हैं तब तुम
हँसते हो, सुखी होते हो !
(३)
अनगिनत प्रष्न और
षंकाओं के हाहाकार
उत्तर और समाधान
कुछ नहीं पाते हम-
चलता रहता है सिलसिला
चक्रवात, निरन्तर/जीवन के संघर्श का
अँधेरों से लडने,
पत्थरों से टकराने,
काँटों में राह बनाने के
प्रयास, युक्ति, पुरुशार्थ
होते चले जाते हैं निश्फल,
सब कुछ बिछलता चला जाता है
हाथों से बहते नीर सा
और हम रह जाते हैं खाली हाथ।
तभी प्रकृति
दिखाती है राह
सुझाती है समाधान
जीवन के तूफानी प्रवाह भी
दिषा दे जाते हैं अकस्मात्
दिखा जाते हैं राह किनारों की
अनजाने, अनचीन्हे रूप में,
हम देखते रह जाते हैं बस
चकित, विस्मित और मुदित।
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