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Vartmaan Sahitya ::May, 2007
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बांग्ला बुद्धिजीवियों की दृष्टि में १८५७ की जनक्रांति
सोमा बंदोपाध्याय

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यह वर्श सन् १८५७ के राश्ट्रीय जागरण की उत्तर सदी स्वर्ण-जयंती का है। ’सिपाही विद्रोह‘ के नाम से परिचित १८५७-५९ की यह क्रांति वस्तुतः जनक्रांति ही थी। इस क्रांति के साथ ही षताब्दी से पदानत, षोशित, वंचित भारतवासियों का क्षोभ कई प्रकार के आन्दोलनों और संघर्शों के माध्यम से एकसाथ व्यक्त हुआ था- यही कारण भी था कि इसे प्रथम महाविद्रोह या राश्ट्रीय जागरण कहा गया। विषिश्ट इतिहासकार डॉ. विकास गुप्त की यह उक्ति यहाँ उल्लेखनीय है ः
’लाखों की संख्या में भारतवासियों ने इस क्रांति में भाग लिया। युद्ध के मैदानों में हजारों की तादाद में इन्होंने अपने प्राणों की बलि दी। सरकारी फौज ने षताधिक गाँवों को फूँक डाला। करीब एक लाख भारतवासी भारत छोड मॉरीषस में षरण लेने को बाध्य हुए। करीब दो लाख भारतवासी अपंग हो गए। भारत की जनसंख्या उस समय पंद्रह करोड थी।‘१
बंगाल में वर्श १८५७, सिपाहियों के षस्त्र उठा लेने के साथ-साथ कई और महत्त्वपूर्ण घटनाओं का साक्षी रहा है, जैसे कोलकाता, मुम्बई व चेन्नई विष्वविद्यालयों की स्थापना, मध्यवर्गीय बंगाली की चेतना में अंग्रेज प्रभुओं के प्रति आक्रोष और घृणा के काले बादलों का छा जाना आदि। वैसे जागरण का यह वातावरण काफी समय से बन रहा था, भारतीय नवजागरण के अग्रदूत माने जाने वाले राजा राममोहन राय ने बंगाल की जनता में षिक्षा, इतिहास एवं वैज्ञानिक चेतना के जरिए राश्ट्रीय जागरण का भाव भरा था। समस्त भारतीय जनमानस को नवजागरण का संदेष देने के उद्देष्य से उन्होंने साप्ताहिक ’बंगदूत‘ नामक पत्र अंग्रेजी, बंाग्ला, फारसी तथा हिन्दी में निकाला। जनता में राश्ट्रीय भावना के प्रसार करने में पत्र-पत्रिकाओं का बडा भारी योगदान रहा है। विषेशकर बंगाल से प्रकाषित पत्र-पत्रिकाएँ। उन दिनों यह कहावत प्रसिद्ध थी कि बंगाल जो आज सोचता है, षेश भारत कल सोचेगा। सन् १८८४ में ष्यामसुन्दर सेन ने प्रथम दैनिक पत्र ’समाचार- सुधावर्शण‘ कलकत्ते से प्रकाषित किया। यह पत्र न केवल बांग्ला में, बल्कि हिन्दी में भी प्रकाषित होता था। इस प्रकार सन् १८५७ की जनक्रांति के पष्चात् पूरे भारतवर्श की दृश्टि बंगाल पर केन्दि्रत थी। आज भी, उस महाविद्रोह के १५० वर्श के उपरांत हम जहाँ खडे हैं, बांग्ला बुद्धिजीवियों के चिंतन के आईने में तटस्थ होकर इस कालावधि का मूल्यांकन करना अत्यंत मौजू होगा।
सन् १८५७ के महा-अभ्युत्थान के विशय में जन-पत्र था जो क्रांति चेतना का समर्थक था। इस पत्र के सम्पादक हरिष्चन्द्र मुखोपाध्याय सन् सत्तावन के जनक्रांति के अनेक रक्त-रंजित वृत्तांत अपने पत्र में छाप रहे थे। इन्होंने अपने सम्पादकीय वक्तव्य में इस विद्रोह के मूल कारणों का विष्लेशण भी किया था। उनके विष्लेशण और परवर्ती इतिहासकारों की व्याख्या में पर्याप्त साम्य है। इन्हीं दिनों जनता के प्रबल पक्षधर के रूप में एक और पत्र ’सोमप्रकाष‘ (१८५८) भी प्रकाषित होता था। इसके सम्पादक पंडित ईष्वरचन्द विद्यासागर थे। इन दोनों पत्रों में प्रकाषित खबरें यह सिद्ध करती थीं कि क्रांति की भावना केवल सिपाहियों में सीमित नहीं थी, वरन् जनता के एक विराट् हिस्से में यह फैल गयी थी। ईष्वर गुप्त (ईष्वर गुप्त और भारतेन्दु हरिष्चन्द्र प्रायः समसामयिक थे। इन दोनों के विचार एक-दूसरे से काफी मिलते जुलते थे।) का ’संवाद प्रभाकर‘ इससे थोडा हटकर था। इसमें क्रांतिकारियों के क्रियाकलापों का जहाँ विरोध किया जा रहा था, वहीं क्रांति को बुरी तरह से दबाने के लिए अंग्रेजों की वैशम्यमूलक नीतियों की कटु आलोचना भी की जा सकती थी। ’अमृत बाजार पत्रिका‘ जिसके सम्पादक षिषिर घोश थे, में भी कुछ ऐसी खबरें और टिप्पणियां प्रकाषित होती, जिन्हें पढकर जनगण अंग्रेजों की दासता से मुक्ति पाने के लिए प्रयत्नषील हो सके। इस प्रसंग में एक बात यहाँ उल्लेखयोग्य है। वह यह कि इन्हीं षिषिर घोश को बाल गंगाधर तिलक अपना गुरु मानते थे। ’केसरी‘ के प्रकाषन षुरू करने से पहले ’अमृत बाजार पत्रिका‘ और उसके सम्पादक ही उनके सामने आदर्ष के रूप में मौजूद थे। यद्यपि उस समय क्रांति के पक्ष में किसी भी प्रकार का वक्तव्य रखना अत्यंत कठिन था क्योंकि ’५७ का संग्राम छिडने पर अंग्रेज सत्ता ने पत्र-पत्रिकाओं पर कठोर ’सेंसरषिप‘ लागू कर दी थी, परन्तु यह स्वातंत्र्य-संग्राम और अंग्रेजी राज की दमन-नीति राश्ट्रीय चेतना को क्षिप्रतर करने वाला प्रसंग था, अतः अंग्रेजों की ’सेंसरषिप‘ की उपेक्षा करते हुए विद्रोह की आग पत्र-पत्रिकाओं के माध्मय में तेजी से फैलने लगी। इन पत्र-पत्रिकाओं ने क्रांति के सकारात्मक पक्षों को कई प्रकार से उद्घाटित किया और इस प्रकार देषवासियों में राश्ट्र की स्वाधीन चेतना को जगाने में अहम् भूमिका निभाई।
पत्र-पत्रिकाओं के अतिरिक्त, कथा-साहित्य में भी विदेषी दासता से मुक्ति हेतु इस महाक्रांति का प्रसंग आया। इस महाविद्रोह के थोडे समय के अंतराल पर कृश्णकमल भट्टाचार्य ने ’विचित्रवीर्य‘ (१८८२) नामक उपन्यास लिखा। इसमें वर्णित लगभग सारे चरित्र राश्ट्र को परतंत्रता की बेडयों से मुक्त करने की कोषिष में जुटे दिखाए गये हैं। कह सकते हैं कि यह पहला उपन्यास था जिसमें सन् सत्तावन के बंगाली बुद्धिजीवियों की भूमिका को लेकर पर्याप्त बहस हुई है। सन् १९५७ में अर्थात् इस क्रांति के सौ वर्श की पूर्ति के उपलक्ष्य में इस प्रसंग पर काफी कुछ लिखा गया था। इन रचनाओं के विष्लेशण के पष्चात् सन् १८५७ को जन-विद्रोह के प्रति बंाग्ला बुद्धिजीवियों की सोच में तीन प्रकार के विचार मिलते हैं। पहला विचार यह है कि षिक्षित बंगालियों ने इस विद्रोह का समर्थन नहीं किया, क्योंकि उनकी राय में यह विद्रोह कुसंस्कारों से जन्म देने वाला विद्रोह था।२ इस विचार के समर्थक मानते थे कि आर्थिक और राजनैतिक स्वातंत्र्य की आवष्यकता का अनुभव हमें अंग्रेजों से ही प्राप्त हुआ है। दूसरा विचार उन बांग्ला बुद्धिजीवियों का था जिन्होंने इस क्रांति का समर्थन किया था।३ तीसरा मत था कि क्रांति का प्रत्यक्ष रूप से समर्थन न करते हुए भी षिक्षित बंगालियों का एक वर्ग क्रांतिकारियों के प्रति सहानुभूति का भाव रखता था।४
तत्कालीन पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाषित रिपोर्ट, टिप्पणियों, काव्य-साहित्य, कथा-साहित्य, इतिहास आदि के माध्यम से महाविद्रोह की गाथा का पुनर्निर्माण हो रहा था। क्रांति के इतिहास के रूप में यह निर्माण उतना महत्त्वपूर्ण हो न हो पर उससे भी महत्त्वपूर्ण यह है कि क्रांति को विशय बनाकर इन आलोचकों तथा साहित्यकारों ने कई तरह के वक्तव्यों के माध्यम से उपनिवेषवाद के अनुभवों को किस रूप में आत्मस्थ किया या खारिज किया।
उस युग के षिक्षित बंगालियों का एक वर्ग ब्रिटिष षासन को वरदान स्वरूप मानता था। उनका कहना था कि षिक्षा, रेल, तार, डाक की व्यवस्था करना, भारतीय सामाजिक रीतियों का सम्मान करना तथा आम भारतीय की जिन्दगी में दखल न देना ब्रिटिष राज की विषेशता थी। अतः ऐसे पढे-लिखे बंगाली अंग्रेज प्रभुओं के अनुगत रहने में ही अपनी भलाई समझते थे। ऐसे लोगों पर १८५७ की जनक्रांति का तात्कालिक प्रभाव पडा था कि इसने उनके मन में एक तरह का भय और अपराधबोध की भावना को तीव्र कर दिया था। इस क्रांति के बाद अंग्रेजों के मन में उठने वाले सवालों से उन्हें डर लगने लगा था। किन्तु यह तो केवल एक वर्ग का मनोभाव था। बंगाल के जागरुक साहित्यकारों ने पत्रकारिता को अपनाया। ’समाचार सुधावर्शण‘ जैसे समाचार पत्र लगातार विद्रोह के समर्थन में खबरें छाप रहे थे। साथ ही अंग्रेजों के विरुद्ध हिंसामूलक विचारों का समर्थन और प्रोत्साहन भी दे रहे थे। इसका परिणाम यह हुआ कि इस द्विभाशी पत्रिका के सम्पादक ष्यामसुन्दर सेन को अंग्रेजों के रोश का सामना करना पडा। ’हिन्दू पेट्रियट‘ ने भी ऐसा ही एक और जनक्रांति का जीवंत दस्तावेज पेष किया। कृश्णकमल भट्टाचार्य के अतिरिक्त उस युग में और भी कई ऐसे उपन्यासकार हुए जिन्होंने अपने उपन्यास में इस ’महाविद्रोह‘ को विशय बनाया। गोविन्द चन्द्र घोश द्वारा रचित ’चित्त विनोदिनी‘ (१८७५), उपेन्द्रचन्द्र मित्र का ’नाना साहेब‘ (१८७९), कालीप्रसन्न दत्त का ’विजय‘ (१८८८), गिरीषचंद्र घोश का ’चंदा‘ (१८८४), चंडीचरण सेन का ’झाँसीर रानी‘ (१८८८), षारदा प्रसाद मुखोपाध्याय कृत ’षंकर‘ (१८८८), नगेन्द्रनाथ गुप्त का ’अमर सिंह‘ (१८८९), प्रसन्नमयी देवी कृत ’अषोका‘ (१८९०), वरदाकांत सेनगुप्त द्वारा लिखित ’हेमप्रभा‘ (१८९०) आदि ऐसे ही कुछ महत्त्वपूर्ण उपन्यास हैं। इन उपन्यासों में क्रांति के समय क्रांति के समर्थकों में स्वाधीनता की चेतना जागृत होते हुए दिखाया गया है। क्रांतिकारियों में उनके नेताओं को आदर्ष चरित्र के रूप में चिन्हि्त किया गया है। ’चित्त विनोदिनी‘ में तो राजभक्ति भी देषभक्ति में बदल जाती है। स्वातंत्र्य यहाँ एक स्वप्नमय चेतना के रूप में उपस्थित है। तत्कालीन इतिहास में यह चेतना भले ही उतना स्पश्ट रूप से उभर नहीं पाई हो, पर परवर्ती काल के इतिहास में यह संभवतः सर्वाधिक विमर्ष का विशय रहा है।
स्वातंत्र्योत्तर काल में भी १८५७ की जनक्रांति को लेकर कई उपन्यास रचे गये। सर्वप्रथम महाष्वेता देवी ने इस विशय पर सन् १९५६ में ’झांसी की रानी‘ (झांसीर रानी) लिखा। यह उपन्यास से बढकर एक षोधपरक ऐतिहासिक ग्रंथ था। उसके उपरांत उनके दो अन्य उपन्यास ’अमृत संचय‘, और ’नटी‘ भी प्रकाषित हुए। बंगाल के एक और ख्यातिलब्ध उपन्यासकार प्रमथनाथ बिषी का ’लालकेल्ला‘ उपन्यास भी इसी क्रांति पर लिखा गया है। अकादमी द्वारा पुरस्कृत विख्यात उपन्यास ’पांचजन्य‘ के लेखक गजेन्द्र कुमार मित्र का ’वन्हिबन्या‘ भी क्रांति विशयक एक महत्त्वपूर्ण रचना है। महाष्वेता देवी ने अपने उपन्यासों में सन् १८५७ की क्रांति को आजादी की लडाई के रूप में रेखांकित किया है। प्रमथनाथ बिषी एवं गजेन्द्र कुमार मिश्र ने भी अपनी रचनाओं में क्रांति का कारण, उसका स्वरूप और उसके प्रभाव को लेकर विस्तृत वर्णन किया है। इन दोनों उपन्यासकारों ने यद्यपि ’सिपाही विद्रोह‘ को राश्ट्रीय संग्राम की संज्ञा नहीं प्रदान की, पर क्रांन्ति के सकारात्मक पहलुओं को उद्घाटित किया।
उपन्यासों के अतिरिक्त असंख्य कहानियाँ, नाटक एवं निबन्धों की रचना की गई। बिपिन बिहारी गुप्त द्वारा रचित ’पुरातन प्रसंग‘ (१८८६) से यह ज्ञात होता है कि ’नाना साहब‘ को प्रेरणा मानकर कई कविताएँ भी रची गई थीं। वास्तव में इस क्रांतिकारी आन्दोलन के साथ बांग्ला कविता का गहरा और आत्मीय संबंध बल्कि कहना चाहिए एक रागात्मक संबंध बहुत पहले ही स्थापित हो चुका था।
उन्नीसवीं सदी में प्रकाषित नाटकों में अतुलकृश्ण मित्र द्वारा लिखित ’निर्वासित दीप‘ क्रांति विशयक पहला नाटक था। कहानियों में नगेन्द्रनाथ गुप्त की ’भैरवी‘ (१८९४) कहानी उस समय की बहुचर्चित कहानियों में से थी। स्वातंत्र्योत्तर काल में प्रमथनाथ बिषी का ’चापाटी ओ पद्म‘ नामक कहानी संग्रह एक ऐसा संग्रह था जिसमें ऐसी कहानियां संकलित की गई थीं जो इस ’महाक्रांति‘ को केन्द्र में रखकर लिखी गई थीं। गजेन्द्रनाथ मित्र ने भी ऐसी कई ऐतिहासिक कहानियाँ लिखी थीं, जिनका मुख्य विशय था ’महाक्रांति‘ के समय घटनेवाली मार्मिक घटनाएँ। बांग्लादेष के विख्यात कथाकार सत्येन सेन ने महाविद्रोह के इतिहास से संबंधित कुछ लघु कथाएँ लिखी थीं। उनकी कहानियों में यह क्रांति स्वतंत्रता की पहली लडाई के रूप में चित्रित की गई है।
सन् १८५७ की इस क्रांति ने बांग्ला इतिहासकारों को एक नया इतिहास लिखने के लिए प्रेरित किया। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में रजनीकांत गुप्त का पांच खण्डों में विभाजित वृहद् इतिहास-ग्रंथ ’सिपाही युद्दे इतिहास‘ एक महत्त्वपूर्ण अभिलेख है। अंग्रेज इतिहासकार सर जॉन. के. की रचना ’हिस्ट्री ऑफ द सिपाय वार ऑफ इण्डिया (१८६४-१८८०) से प्रभावित होने के बावजूद गुप्तजी ने राश्ट्रीय संग्राम की सही व्याख्या की। बीसवी सदी के आंरभ में पंचकडी दे और भुवनचंद्र मुखोपाध्याय ने मिलकर १८५७ की जनक्रांति पर इतिहास लिखा। ये पुस्तकें तथ्यपरक भी हैं। प्रसिद्ध इतिहास प्रणेता रमेषचंद्र मजूमदार एवं सुरेन्द्रनाथ सेन की पुस्तक ’द सिपाय म्युटिनी एंड रिवोल्ट ऑफ १८५७‘ (१९६३) इस क्रम में एक महत्त्वपूर्ण पुस्तक है। इनके मतानुसार इस ’विद्रोह‘ के बिना साधारण जनता का जागरण संभव नहीं होता। डॉ. षषिभूशण चौधरी की पुस्तक ’सिविल रिबेलियन इन इण्डियन म्युटिनी‘ (१७६५-१८५९) एवं ’थियोरीज ऑफ म्युटिनी‘ (१९७४) दोनों ही १८५७ की जनक्रांति के ऐतिहासिक महत्त्व के प्रामाणिक दस्तावेज हैं। सन् १९५७ में इस ’महा-विद्रोह‘ के षतवार्शिकी के उपलक्ष्य में बंगाल के जाने-माने इतिहासकारों ने कई संगोश्ठियों एवं कार्यक्रमों का आयोजन किया। उसी समय डॉ. पी०सी० रायचौधरी ने विषेशरूप से बिहार के अंचलों में इस क्रांति के उन्मेश और प्रभाव को लेकर कई षोधपरक काम किया। अंचलों पर क्रांति के प्रभाव को लेकर किए गए षोधपरक कार्य पर आधारित पुस्तकों में रुद्रांषु मुखोपाध्याय का ’अवध एंड द रिवोल्ट‘ (१९६३) और ताप्ती राय का ’द पॉलिटिक्स आफ पप्युलर अपराइजिंग‘ (१९७०) पुस्तकों का उल्लेख करना आवष्यक हो जाता है। डॉ. राय का यह षोध-ग्रंथ बुंदेलखंड के विद्रोह की गतिविधियों पर आधारित है। बुंदेलखंड उन दिनों राजनीतिक जागरूकता और स्वातंत्र्य आंदोलन का केन्द्र रहा है। इसी क्रम में एक और पुस्तक स्निग्धा सेन की ’द हिस्टॉरियोग्राफी आफ द रिवोल्ट आफ १८५७‘ (१९७६) बहुत महत्त्वपूर्ण है। डॉ. रजतकांत राय द्वारा रचित ’द में

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