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Vartmaan Sahitya ::May, 2007
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प्रथम भारतीय स्वतंत्रता-संग्राम : माक्र्स की अवधारणाएँ
महेन्द्र फुसकेले

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भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम‘, यह नाम सर्वप्रथम इतिहासकारों में से जिस प्रसिद्ध इतिहासकार ने देकर स्वयं विष्व इतिहास में अपना इतिहास स्वर्ण अक्षरों में अंकित कर लिया है, वह इतिहासवेत्ता हैं कार्ल माक्र्स। बिल्कुल ठीक-ठीक कहा जाय तो कार्ल माक्र्स पहले गैर भारतीय इतिहासकार हैं जिन्होंने भारत में सन् १८५७ के जंगे आजादी को उसका सही नाम देने साहसपूर्ण जोखम उठाया था। साम्राज्यवाद से प्रभावित भारतीय इतिहासकारों का समूह और अंग्रेज एवं अन्य विदेषी इतिहासकारों का समूह विषाल इतिहास के पृश्ठों को ’’सिपाही विद्रोह‘‘ तथा ’’गदर‘‘ नाम से घृणापूर्वक अंकित करता था। इन इतिहासविदों का पूरा प्रयत्न भारत के इतिहास के स्वर्णिम पृश्ठों का महत्व विष्व समुदाय के समक्ष भारत के स्त्री-पुरुशों के सम्मान और उनकी भागीदारी को गिराना है। भारत की स्वतंत्रता के पष्चात् अब तक छात्र-छात्राओं को यही इतिहास पढाने का उपक्रम पाठ्यपुस्तकों द्वारा जारी है। कार्ल माक्र्स ने अपने एक अभिन्न साथी फ्रेडरिक एंगेल्स के साथ मिलकर भारत के इतिहास के इन महान वर्शों पर अपनी कलम चलाकर अमर कर दिया था। पुस्तक का नाम है- ’’भारत का प्रथम स्वातंत्र्य संग्राम १८५७-५९‘‘ पुस्तक के लेखक हैं कार्ल माक्र्स तथा फ्रेडरिक एंगेल्स। इतिहास की यह ऐतिहासिक पुस्तक कुल २५६ पृश्ठों की है।
भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में बुन्देलखण्ड की गौरवषाली भागीदारी रही थी, यह तथ्य सर्वमान्य है। माक्र्स ने बुन्देलखण्ड में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में क्रांति की मषाल को जलते देखा था-सात समुन्दर दूर लंदन षहर से। कार्ल माक्र्स ने तथा फ्रेडरिक एंगेल्स ने बुन्देलखण्ड के जिन नगरों, कस्बों तथा गांवों का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के सिलसिले में उल्लेख किया है, उनमें प्रमुख हैं- झांसी, ग्वालियर, सागर, बांदा, नागौद, जबलपुर, मिर्जापुर, काल्पी, बिठूर, मर्दानपुर, कुंच (कोंच), राहतगढ, गढाकोटा, धौलपुर, भरतपुर, कानपुर, फैजाबाद, लखनऊ, रीवा, आजमगढ, गाजीपुर, बरेली तथा आगरा जैसे बुन्देलखण्ड लगे हुये जो नगर हैं, उनका उल्लेख भी माक्र्स ने विस्तार से किया है। बुन्देलखण्ड के योगदान को समझने के लिये इसे ध्यान में रखे जाने की आवष्यकता है। माक्र्स ने बुन्देलखण्ड के प्रथम स्वतंत्रता सेनानियों-क्रांतिकारियों- रणवांकुरों-षहीदों का जिन षब्दों में सम्मान के साथ उल्लेख किया है वह आज भी महत्व रखता है। प्रमुख महानायक है-लक्ष्मीबाई-झाँसी राज्य की रानी। राश्ट्रीय वीरांगना। सन् १८५७-५९ के भारतीय राश्ट्रीय मुक्तिविद्रोह की एक नैत्री। विद्रोही दस्तों का उन्होंने स्वयं नेतृत्व किया था। लडाई में मारी गई थी।
नाना साहब-भारतीय सामन्त। अंतिम पेषवा। बाजीराव द्वितीय का गोद लिया पुत्र। सन् १८५७-५९ के भारत के राश्ट्रीय मुक्ति विद्रोह का एक नेता।
तांत्या टोपे-प्रतिभाषाली मराठा जनरल। भारत के सन् १८५७-५९ के राश्ट्रीय मुक्ति विद्रोह का एक नेता। कानपुर-काल्पी और ग्वालियर के इलाकों में विद्रोही दस्तों का नेतृत्व किया। सन् १८५९ में धोखे से गिरफ्तार हुआ और फांसी चढा दिया गया।
हजरत महल-अवध की बेगम। भारत के सन् १८५७-५९ के राश्ट्रीय मुक्ति विद्रोह के समय अवध के विद्रोहियों की नेत्री।
बहादुर षाह जफर-अंतिम मुगल सम्राट। अंग्रेजों ने १८५७-५९ में उन्हें हटा दिया था। परन्तु भारत के राश्ट्रीय मुक्ति संग्राम के समय विप्लवकारियों ने उन्हें फिर सम्राट बना दिया था। सितम्बर सन् १८५७ में दिल्ली की फतह के बाद अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और देष निकाला देकर वर्मा भेज दिया था।
कुँअर सिह, अमर सिंह (कुँअर सिंह का भाई) फिरोज षाह, मामू खाँ, मौलवी अहमदषाह को भी ’’राश्ट्रीय मुक्ति संग्राम के विप्लवकारी‘‘ सम्मानजनक षब्दों से उल्लेख किया गयाय है। मगर साथ ही कुछ का जिक्र घृणा के साथ किया है। इनमें प्रमुख है-
सिन्धिया-आलीषाह जयाजी बागीरतराव। ग्वालियर राज का मराठा राजकुमार। सन् १८५७-५९ के भारतीय राश्ट्रीय मुक्ति विद्रोह के समय उसने अंग्रेजों का साथ दिया था।
होल्कर, तुकोजी-इंदौर राज्य का मराठा सरदार (ड्यूक) भारत के सन् १८५७-५९ के राश्ट्रीय मुक्ति विद्रोह के समय उसने अंग्रेजों का साथ दिया था।
मानसिंह (राजा) और रणवीर सिंह (राजा) भी राश्ट्रीय मुक्ति संग्राम के गद्दार हैं। इन्होंने अंग्रेजों का साथ दिया था।
बुन्देलखण्ड का उल्लेख इसी नाम से माक्र्स ने आठ भिन्न-भिन्न पृश्ठों पर विभिन्न जगहों पर संदर्भ पर किया है। कालमाक्र्स ने अपनी एक अन्य महत्वपूर्ण पुस्तक ’’भारतीय इतिहास पर टिप्पणियाँ‘‘ में भारत के लगभग हजार वर्शों के इतिहास पर छठी षताब्दी मध्य से लेकर उन्नीसवीं षताब्दी के मध्य तक की ऐतिहासिक घटनाओं पर क्रमबद्ध टिप्पणियां हैं। अपने जीवन के अंतिम वर्शों में माक्र्स ने इस पुस्तक की पांडुलिपि तैयार की थी। इस पुस्तक में भारत में होने वाले प्रथम विदेषी आक्रमण से लगाकर ईस्ट इंडिया कम्पनी की स्थापना और सन् १८५७ के विद्रोह के पष्चात भारत पर अंग्रेजों के पूर्ण अधिकार तक का काल इसमें आ जाता है। इस ऐतिहासिक पुस्तक में भी कार्ल माक्र्स ने काफी विस्तारपूर्वक बुन्देलखण्ड में भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सन् १८५७-५९ की विद्रोही लडाइयों का उल्लेख किया है। समाजवाद की विचारधारा से बैरभाव रखने वाले पूँजीवाद के पक्षधर और आज के दौर के हिन्दुत्व वाले फासीवादी बुद्धिजीवी एवं नेता अक्सर यह कहते-लिखते-थकते नहीं हैं कि कार्ल माक्र्स को भारत के विशय में तनिक भी ज्ञान नहीं था। समाजवाद का पौधा भारत की मिट्टी में इसीलिये पनपेगा नहीं-रुपेगा नहीं। इन अज्ञानी बुद्धिजीवियों इतिहासकारों तथा नेताओं को कार्ल माक्र्स तथा फ्रेडरिक एंगेल्स की लिखी कम से कम उपरोक्त दोनों पुस्तकों को स्वयं पढने का कश्ट अवष्य कर लेना चाहिये। दोनों पुस्तकें अंग्रेजी तथा हिन्दी भाशा में भारत में उपलब्ध हैं।
अंग्रेज षासक एवं साम्राज्यवादी अंग्रेज और भारतीय इतिहासकार यह फैलाने का प्रयत्न करते रहे कि सन् १८५७-५९ कुछ सषस्त्र सिपाहियों की महज एक बगावत थी। इस तथ्य को उन्होंने छिपाने की कोषिष की थी कि इस विप्लव में भारतीय जनसमुदाय के व्यापक अंग षामिल थे। माक्र्स और एंगेल्स ने ब्रिटिष षासकों के इस झूठ का खंडन किया था। इस षस्त्र संघर्श को आरम्भ से ही एक राश्ट्रीय विद्रोह के रूप में ब्रिटिष षासन के विरुद्ध भारतीय जनता की एक क्रांति के रूप में उन्होंने चित्रित किया था।
कार्ल माक्र्स ने इस बात पर गंभीर विचार किया कि वे कौन से बडे कारक हैं जिनके कारण भारत अपनी राश्ट्रीय स्वतंत्रता अंग्रेज साम्राज्यवादियों के हाथों गवाँ बैठा है। यह कैसे हुआ कि भारत के ऊपर अंग्रेजों का आधिपत्य कायम हो गया? महान मुगल की सर्वोच्च सत्ता को मुगल सूबेदारों ने तोड दिया था। सूबेदारों की षक्ति को मराठों ने नश्ट कर दिया था। मराठों की ताकत को अफगानों ने खत्म किया, और जब सब एक दूसरे से लडने में लगे हुए थे, तब अंग्रेज घुस आये और उन सबको कुचल कर खुद स्वामी बन बैठे। एक देष जो न सिर्फ मुसलमानों और हिन्दुओं में, बल्कि कबीले-कबीले और वर्ण-वर्ण में भी बंटा हुआ हो। एक समाज जिसका ढांचा उसके तमाम सदस्यों के पारम्परिक विरोधों तथा वैधानिक अलगावों के ऊपर आधारित हो ऐसा देष और ऐसा समाज क्या दूसरों द्वारा फतह किये जाने के लिये ही नहीं बनाया गया था? भारत के पिछले इतिहास के बारे में यदि हमें जरा भी जानकारी न हो, तब भी क्या इस जबर्दस्त और निर्विवाद तथ्य से हम इन्कार कर सकेंगे कि इस क्षण भी भारत को, भारत के ही खर्च पर पलने वाली एक भारतीय फौज अंग्रेजों का गुलाम बनाये हुए हैं? अतः भारत दूसरों द्वारा जीते जाने के दुर्भाग्य से बच नहीं सकता और उसका संपूर्ण पिछला इतिहास अगर कुछ भी है, तो वह उन लगातार जीतों का इतिहास है जिनका षिकार उसे बनना पडा है। भारतीय समाज का कोई इतिहास नहीं है, कम से कम ज्ञात इतिहास तो बिल्कुल ही नहीं है। जिसे हम उसका इतिहास कहते हैं, वह वास्तव में उन आक्रमणकारियों का इतिहास है जिन्होंने आकर उसके उस समाज के निश्क्रिय आधार पर अपने साम्राज्य कायम किये थे, जो न विरोध करता था, न कभी बदलता था‘‘ माक्र्स का यह गहन-ंचंतन एवं वैज्ञानिक विष्लेशण अपने आप में पूर्ण ऐतिहासिक सबक देने वाला है। जड-स्थिर-गैर प्रतिरोधी समाज व्यवस्था इक्कीसवीं सदी के स्वतंत्र भारत के लिये नुकसान पहुंचा सकती है। माक्र्स और एंगेल्स ने इस बात पर खास तौर से जोर दिया था कि इस विद्रोह ने न केवल भिन्न-भिन्न धर्मों-हिन्दुओं और मुसलमानों तथा जातियों के लोगों-ब्राह्मणों, राजपूतों और कहीं-कहीं सिक्खों को, बल्कि भिन्न-भिन्न सामाजिक स्तर के लोगों को भी साथ में ला खडा किया था। माक्र्स ने लिखा-’’यह पहली बार है कि सिपाहियों के रेजीमेंटों ने अपने यूरोपीय अफसरों की हत्या कर दी है, जबकि अपने आपसी विद्वेशों को भूलकर मुसलमान और हिन्दू अपने सामान्य स्वामियों के विरुद्ध एक हो गये हैं, जबकि हिन्दुओं द्वारा आरम्भ की गई उथल-पुथल ने दिल्ली के राज्य सिंहासन पर वास्तव में एक मुसलमान सम्राट को बैठा दिया है जबकि बगावत केवल कुछ थोडे से स्थानों तक ही सीमित नहीं रही है।‘‘
माक्र्स और एंगेल्स की कृति-’’भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम १८५७-५९‘‘ वास्तव में कार्ल माक्र्स तथा फ्रेडरिक एंगेल्स द्वारा अमरीकी दैनिक समाचार-पत्र ’’न्यूयार्क डेली ट्रिब्यून‘‘ में प्रकाषित लेखों का संग्रह है।
भारतीय जनता के मुक्ति संघर्श से माक्र्स तथा एंगेल्स की हर प्रकार से सहानुभूति थी। वे आषा करते थे कि विद्रोह विजयी होगा। फिर भी वे जानते थे कि उसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि भारतीय जनता के तमाम अंग खासतौर से दक्षिण और मध्य भारत में, हर प्रकार से उसका समर्थन करते हैं या नहीं किन्तु ऐसी व्यापक कार्रवाई न हो सकी।
मगर अंत में माक्र्स की भविश्यवाणी सच हुई। भारत पन्द्रह अगस्त उन्नीस सौ सैंतालीस को अंग्रेजो की दासता से मुक्त होकर स्वतंत्र देष बन गया।



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