KhbarExpresswww.khabarexpress.com

Download Trial of Jewellery Accounting Software

Welcome Guest Sign In New user! Sign Up Now
Search Photo  
RSS Wednesday, February 15, 2012



Vartmaan Sahitya ::May, 2007
Sponsered by : Decor Home, Bikaner

स्वतंत्रता-सेनानी तिलका माँझी
संजय कुमार

More Articles

राजमहल की पहाडयों में आज भी एक गीत गूँजता है-
बाबा तिलका माँझी
खाम खुंटी काना हो
गाँधी बाबाय मुतुल
खाम खुंटी काना....
अंग्रेजों के ख्ालाफ लडने वाले जुझारू आदिवासी सेनानी तिलका माँझी ने जिस कदर अंग्रेजों को तबाह किया, वह आज भी लोकगीतों के स्वरों में फूटता दीखता है। पर, अंग्रेजों के ख्ालाफ स्वाधीनता की लडाई लडते वक्त अंग्रेज कलेक्टर को अपने तीर का निषाना बनाने वाले तिलका माँझी उन षहीदों में षुमार हैं, जिन्हें इतिहास के पन्नों में वह स्थान नहीं मिल पाया, जो मिलना चाहिए था। यही नहीं तिलका माँझी खुद अपने क्षेत्र में प्रषासन की अनदेखी के षिकार हैं। उनकी याद में बना षहीद-स्थल उपेक्षित है। केवल भागलपुर षहर के तिलका माँझी मुहल्ले में उनकी प्रतिमा उस दौर की याद को ताजा कर जाती है, जब तिलका माँझी ने अपने तीर से अंग्रेजों को खदेडा था। सन् १७७१ से १७८४ तक तिलका माँझी अंग्रेजी षासन के विरुद्ध भागलपुर और राजमहल में जन-आंदोलन का नेतृत्व अत्यंत साहसपूर्वक करते रहे। अंग्रेजी हुकूमत किसी भी कीमत पर राजमहल की पहाडयों पर कब्जा करना चाहती थी। अंग्रेजों की बढती ताकत और गुलामी के भय से संथालों ने विद्रोह कर दिया। लेकिन, अंग्रेजों ने आंदोलन को बर्बरता से दबाने का अपना प्रयास जारी रखा। इसी बीच तिलका माँझी नामक आदिवासी युवक ने संथालों के विद्रोह का नेतृत्व अपने हाथ में लिया और छापामार युद्ध द्वारा अंग्रेजों को भागलपुर और राजमहल की पहाडयों से खदेड दिया।
भारत के प्रथम स्वतंत्रता-सेनानी के रूप में इस क्षेत्र में चर्चित तिलका माँझी का जन्म एक संथाल परिवार में ११ फरवरी, १७५० ई० को तिलकपुर गाँव के सुल्तानगंज में हुआ था। उस समय मुर्षिदाबाद और आसपास के थोडे से इलाकों में अली वर्दी खान का षासन था। मराठों ने सन् १७४२ में राजमहल को अपने कब्जे में ले लिया था, जो मारगो दर्रे से बंगाल की समतल भूमि से जुडा हुआ है। सन् १७५७ में सिराजुद्दौला को मीर दाउद ने पकडा और उसे मुर्षिदाबाद लाकर मार डाला। अंग्रेजों ने सन् १७५८ में मीर जाफर को मुर्षिदाबाद का नवाब बनाया। इस तरह, मुर्षिदाबाद की असली मालिक ईस्ट इंडिया कंपनी बनी। राजमहल में मुस्लिम षासन ढीला पडने लगा और माल पहाडया लोगों ने मौके का फायदा उठाकर विद्रोह कर दिया। पहाडया लोगों के बारे में कहा जाता है कि वे गंगा नदी और ब्राही नदी के बीच लूटपाट मचाया करते थे और पहाडों में छिप जाते थे। सन् १७७० में जब भीशण अकाल पडा, तो पहाडी लोगों ने मैदानी इलाकों में आतंक पैदा कर दिया। वे सरकारी खजाने तक को लूट लेते थे। सन् १७७२ में वॉरेन हेस्टिंग्स ने जनरल ब्रूक को आठ सौ सैनिकों की सेना के साथ इस जंगली तराई का सैनिक गर्वनर बनाया। सन् १७७३ में जनरल ब्रूक ने टिउर का किला जीत लिया, जो माल पहाडया आदिवासी सरदारों का सैन्य गढ था। ब्रूक बडे ही नम्र स्वभाव का था, जिसने पहाडया सैनिक कैदियों का दिल जीत लिया। सन् १७७४ से कैप्टन जेम्स ब्राउन १७७८ तक जंगल तराई का सैनिक गर्वनर रहा, उसने लक्ष्मीपुर के जगन्नाथ देव के नेतृत्व में हुए भुईयाँ विद्रोह को दबाया। अम्बर और सुल्तानाबाद की पहाडयों में हमेषा लडाई होती रही। उसने तब पहाडया लोगों पर भविश्य में षासन करने की एक योजना बनाई, जिसे क्लीवलैंड ने पूरा किया, जो १७७६ में राजमहल के उपसमाहर्ता अगस्टम कूलीवलैंड, भागलपुर के समाहर्ता बन कर आये। वह उस समय २१ वर्श के खूबसूरत और सूझ- बूझ वाले अंग्रेज नौजवान था। उसने माल पहाडया लोगों के साथ संधि की और उनकी षासन-व्यवस्था को मान्यता दी। हर परगने या टप्पे को सरदार के अंदर रखा। साथ ही परगने या टप्पे के हरेक गाँव को एक माँझी के तहत रखा और सरकार की मदद के लिए नायक रखा। उन्होंने हर सरदार को १०, हर नायक को ५ और हर माँझी को २ रुपये मासिक वेतन देना षुरू किया। ४७ पहाडया सरदार एवं ४०० माँझी थे और प्रत्येक माँझी को एक सिपाही भेजना पडता था, हर ५० सिपाहियों के पीछे एक सरदार रहता था। सन् १७८१ में १३०० सैनिक सेनापति सर आयरकूट के नेतृत्व में बहाल किये गये, जिनका सेनापति जाउराह के रान के एक पहाडया को बनाया गया जो एक खूंखार पहाडया डाकू के नाम से पूरे इलाके में जाना जाता था। यह उस इलाके की मुगलकालीन मुस्लिम जमींदारी को दबाने का अच्छा तरीका था और मुस्लिम जमींदारों में षुरू से ही दुष्मनी थी। जहाँ एक ओर माल पहाडया और संथालों के बीच खूब लडाई होती थी, वहीं दूसरी ओर, जंगली इलाकों में मुस्लिम, हिन्दू और संथाल तिलका माँझी के नेतृत्व में संगठित होने लगे। तिलका माँझी हर जाति और धर्म के लोगों के बीच श्रद्धा और विष्वास के पात्र थे। कहा जाता है कि वे भागलपुर में अपनी जन-सभाएँ किया करते थे। वे मारगो दर्रों और कहलगाँव में अंग्रेजी खजाने को लूट कर गरीबों में बाँट दिया करते थे। इससे प्रभावित होकर गरीब तबके के लोग तिलका माँझी के नेतृत्व में गोलबंद होने लगे और अंग्रेजी सत्ता तथा सामंतवादी प्रथा के ख्ालाफ लडाई को तेज कर दिया। मुंगेर, भागलपुर और संथाल परगना के पहाडी इलाकों में खूब लडाई लडी गई। जहाँ एक तरफ, अगस्टस क्लीवलैंड और अंग्रेजी सेनापति सर आयरकूट, पहाडी सेनापति तथा खूंखार डकैत जाउराह थे, वहीं दूसरी तरफ, इन सबसे मोर्चा लेने वाले तिलका माँझी और उनके लोग थे। हर जगह तिलका माँझी की जीत होती गई। सन् १९८४ में तिलका माँझी ने भागलपुर पर हमला बोल दिया। १३ जनवरी, १७८४ को तिलका माँझी ने एक ताड के पेड पर चढकर घोडे पर सवार कलक्टर अगस्टस क्लीवलैंड को तीर से मार गिराया।
अंग्रेज कलेक्टर के मारे जाने से अंग्रेजी फौज में आतंक का माहौल व्याप्त हो गया। विजय की खुषी में जब तिलका माँझी और उनके लोग जष्न मना रहे थे, तब रात के अंधेरे में, पहाडया सेनापति जाउराह और अंग्रेज सेनापति आयरकूट ने हमला बोल दिया, जिसमें बहुत सारे लोग मारे गये। किसी तरह तिलका माँझी ने बच-बचाकर सुल्तानगंज के पहाडों में षरण ली और वहीं से अंग्रेजों के ख्ालाफ छापामारी युद्ध को कायम रखा। अंग्रेजों ने सारे पहाड को घेरना षुरू कर दिया और तिलका माँझी तक पहुँचने वाली तमाम सहायताओं को रोक दिया गया। ऐसे में अन्न और जल के अभाव में तिलका माँझी को पहाडों से निकलकर लडाई लडनी पडी और एक दिन वे पकडे गये। तिलका माँझी को चार घोडों से बाँधकर भागलपुर तक घसीटकर लाया गया और बडी बेरहमी से वर्तमान तिलका माँझी चौक में एक बरगद के पेड की डाल से बाँधकर फाँसी दे दी गई।
तिलका माँझी का स्थान भगवान बिरसा मुंडा से कम नहीं है, जिन्होंने सामंती व्यवस्था, साम्राज्यवाद, पूँजीवादी- व्यवस्था और राजतंत्र के ख्ालाफ लडाई लडी। तिलका माँझी जिस जमीन की लडाई लडते हुए षहीद हुए, आज उसी जमीन पर अपने ही लोगों द्वारा भुलाये जा रहे हैं। अतीत के पन्नों में कैद तिलका माँझी को याद करने का सिलसिला भी भुला दिया गया है। १५ अगस्त, २६ जनवरी, ३० जनवरी और तिलका माँझी की पुण्यतिथि के अवसर पर संथाल लोग अपने प्रिय नेता की समाधि पर फूल चढाने जाते हैं और यहाँ सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किये जाते हैं। लेकिन, अब इसमें एक ठहराव आ गया है। चंद लोग ही उनके षहीद स्थल पर जमा हो पाते हैं। इस बार ११ फरवरी, २००७ को एक आयोजन कर षहीद को याद किया गया। तिलका माँझी की षहादत जितनी बडी है, उसके एवज भागलपुर विष्वविद्यालय का नाम तिलका माँझी विष्वविद्यालय किये जाने पर ही षहीद को सच्ची श्रद्धांजलि नहीं होगी, बल्कि इतिहास के पन्नों में उचित स्थान देकर ही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि दी जा सकती है।



Discuss this topic on KhabarExpress Forum 

Post Your Comments to this Article Posting Rules
Name*:
Comment*:
 


October, 2006 <br> Sponsered by : Decor Home, BikanerOctober, 2006
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 
January, 2007 <br>Sponsered by : Decor Home, BikanerJanuary, 2007
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 
February, 2007 <br>Sponsered by : Decor Home, BikanerFebruary, 2007
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 
March, 2007 <br>Sponsered by : Decor Home, BikanerMarch, 2007
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 
April, 2007 <br>Sponsered by : Decor Home, BikanerApril, 2007
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 
May, 2007 <br>Sponsered by : Decor Home, BikanerMay, 2007
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 
June, 2007 <br>Sponsered by : Decor Home, BikanerJune, 2007
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 

All right reserved by Khabarexpress.com
Contact Us | Archives | Sitemap | Can't see Hindi ? | News Ticker
Special Edition: Lakshchandi Mahayagya, Camel Festival 2007, Vartmaan Sahitya, Nagar Ek - Nazaare Anek, Bikaner Udyog Craft Mela
Our Network rajb2b.com | khabarexpress.com | uniqueidea.net | PelagianDictionary.com | hindinotes.com
Developed & Designed by Pelagian Softwares