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१८५७ का सिपाही-विद्रोह महज विद्रोह भर या साधारण घटना नहीं थी, बल्कि भारतीय स्वाधीनता संग्राम की षुरुआत थी। मेरठ के बैरकपुर की छावनी में भारतीय सिपाहियों ने क्रांति का जो बिगुल बजाया, उसकी गूँज बिहार के आरा तक भी पहुँची और वहाँ के बाबू कुँवर सिंह ने भी अंग्रेजों के ख्ालाफ हथियार उठा लिये। २५ जुलाई को दानापुर में क्रांति का बिगुल बजाकर सिपाही २६ जुलाई को सोन नदी पार कर २७ जुलाई १८५७ को आरा पहुँचे। यहाँ बाबू कुँवर सिंह उनके नेता बने। कभी अंग्रेजों के साथ रहे कुँवर सिंह ने १८५७ के विद्रोही सिपाहियों के साथ मिलकर अंग्रेजों को अपने क्षेत्र से खदेडना षुरू कर दिया। अपनी वृद्धावस्था के बावजूद कुँवर सिंह अंग्रेजों के ख्ालाफ जिस तरह से लडे, उससे क्षेत्र में काफी चर्चित हो गये। यही नहीं, हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रतीक कुँवर सिंह जन-क्रांति के नेता भी बने। हिन्दी भाशी जनता ने उन्हें ’तेगवा बहादुर‘ की उपाधि से नवाजा, तो वहीं अंग्रेजों ने ’हीरो ऑफ भोजपुर‘ कहा।
बाबू कुँवर सिंह परमार वंष के क्षत्रिय थे। कुँवर सिंह के पिता साहबजादा सिंह जगदीषपुर के जमींदार थे। उनके बारे में कहा जाता है कि वे उदार और दानी व्यक्ति थे। अंग्रेजों की नजर में वे एक अच्छे जमींदार षासक थे, जो प्रजा से लगान जोर-जबरदस्ती नहीं वसूलते थे। साहबजादा सिंह को चार पुत्र हुए- कुँवर सिंह, दयाल सिंह, राजपति सिंह और अमर सिंह। कुँवर सिंह सबसे बडे थे और बचपन से ही पढने -लिखने से कतराते थे, लेकिन उनका मन खेलकूद, कुष्ती और तलवारबाजी में खूब लगता था। हाँ, वे बचपन से ही स्पश्टवादी थे। जैसे-जैसे वे बडे होते गये, बेहतर योद्धा के रूप में चर्चित होने लगे। इस बीच उनके पिता मुकदमे में फँसे और उनकी आर्थिक स्थिति जर्जर हो गयी। साहबजादा सिंह ने अपने दो पुत्रों कुँवर सिंह और दयाल सिंह का विवाह सन् १८०० में औरंगाबाद के जमींदार फतेह नारायण सिंह की पुत्रियों से कर दिया। १८०४ में बाबू साहबजादा सिंह मुकदमा जीतकर जगदीषपुर के स्वामी बने। कहा जाता है कि बाबू कुँवर सिंह चापलूसों से दूर रहते थे, इसीलिए उनकी पिता से नहीं पटती थी। उनके पिता के दरबार में कई चापलूस थे, जिन्हें हटाने के लिए कुँवर सिंह ने पिता को सलाह दी थी। जब चापलूसों को नहीं हटाया गया, तो वे अलग रहने लगे और जितौरा में अपना आवास बनाया।
एक अन्य घटना है, कुँवर सिंह ने तहसीलदार से पैसा लेकर अपने नाम की रसीद काट दी। इससे उनके पिता क्रोधित हो उठे और दंड देने चल पडे। पिता और पुत्र के सैनिकों के बीच जब युद्ध हुआ, तब कुँवर सिंह की बहादुरी को देख कर उनके पिता ने उनकी भूरि-भूरि प्रषंसा की, हालाँकि वे इस युद्ध से क्रोधित थे, लेकिन अंदर से कुँवर सिंह के प्रति लगाव था।
वृद्धावस्था के कारण साहबजादा सिंह की मृत्यु १८८३ में हो गयी। पिता के निधन के बाद बाबू कुँवर सिंह जगदीषपुर के स्वामी बने। बाबू कुँवर सिंह गद्दी पर बैठते ही जगदीषपुर के विकास में लग गये। उन्होंने अपने जमींदारी काल में काफी जनसेवा की। जितौरा में तालाब का निर्माण कराया, तो वहीं मुसलमानों के लिए मस्जिद और हिन्दुओं के लिए मंदिर का निर्माण एक साथ कर, कुँवर सिंह ने सर्वधर्म समभाव का बेहतर उदाहरण उस दौर में पेष किया। कुँवर सिंह हिन्दू और मुसलमान दोनों में लोकप्रिय थे। अंग्रेजों से भी अच्छी पटती थी। समय-समय पर अंग्रेज अफसरों के साथ वे जितौरा के जंगलों में षिकार को जाते थे। अंग्रेज भी उनके प्रभावषाली व्यक्तित्व और आतिथ्य की प्रषंसा करते नहीं थकते थे। कुँवर सिंह किसी के सामने झुकते या डरते नहीं थे। एक बार पटना के कमिष्नर ने बिहार के सारे जमींदारों को बुलाया। सभा में पहला स्थान एक जमींदार को दे दिया गया। इससे कुँवर सिंह नाराज हो गये और उन्होंने सभा में जोरदार षब्दों में कहा कि वंष-मर्यादा के अनुसार प्रथम स्थान महाराज डुमराव का है। उनके इस तेवर ने सभी को चौंका दिया। कुँवर सिंह ने अपने जमींदारी काल में पैतृक सम्पत्ति की भी वृद्धि की। लेकिन अधिक खर्च और कुप्रबंधन के कारण जमींदारी की स्थिति दयनीय हो गयी। उन पर ऋण-भार बढने लगा। वे अपना खर्च कम नहीं करते थे। महाजन और साहूकार उनका षोशण करने लगे। ऐसे में कुँवर सिंह पर १७ लाख ऋण हो गया। महाजनों के चंगुल से मुक्त होने के लिए, उन्होंने अंग्रेज सरकार को आवेदन दिया। इस बीच १८५७ तक ऋण बढकर २० लाख तक हो गया था। वे चाहते थे कि सरकार इसकी व्यवस्था कर दे, जिससे ऋण से मुक्ति मिले। वहीं स्थानीय महाजन नहीं चाहते थे कि कुँवर सिंह ऋण से मुक्त हों। वे उनको और फँसाना चाहते थे। कुँवर सिंह को कहीं से ऋण चुकाने के लिए कजर् नहीं मिल रहा था और अंग्रेज सरकार भी उन्हें मदद नहीं कर रही थी। २५ जून १८५७ को बाबू कुँवर सिंह ने सरकार को आवेदन देकर अपनी स्थिति स्पश्ट की। अभी मामला चल ही रहा था कि ठीक एक माह बाद, २५ जुलाई को दानापुर छावनी के सिपाहियों ने विद्रोह कर दिया और कुँवर सिंह ने भी विद्रोह में भाग लिया। हालाँकि कुछ इतिहासकारों का मानना है कि ऋण से मुक्ति दिलाने में आनाकानी कर रही सरकार के खिलाफ ही कुँवर सिंह ने विद्रोह में भाग लिया। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि इसे कुँवर सिंह का अचानक आंदोलन में कूदना‘ कहना भी ठीक नहीं है। इस आंदोलन के लिए वर्शों से हालात पैदा हो रहे थे और उनके जैसा स्वाभिमानी और संवेदनषील व्यक्ति इस भूमिका के लिए तैयारी कर रहा था। १८४५-४६ में सोनपुर मेले के दौरान् एक बैठक में क्रांतिकारियों के साथ उनकी भेंट हुई थी। कुँवर सिंह का संबंध नाना साहब के साथ था और वे कई बार उनसे मिल चुके थे। बहादुरषाह के नेतृत्व में हिन्दू-मुसलमानों द्वारा एकजुट होकर अंग्रेजों को भारत से निकालने की योजना बनी थी। इसकी चर्चा बाबू दुर्गा षंकर सिंह के ग्रंथ में मिलती है।
दानापुर के सैनिकों ने जब नये कारतूसों का प्रयोग करने से इनकार कर दिया था, तब कमिष्नर ने कुँवर सिंह और डुमराव के जमींदार को समझाने के लिए बुलाया। कुँवर सिंह ने स्पश्ट कहा था कि षाहाबाद के लोग मेरी बात मान सकते हैं, लेकिन दूसरी जगह के सिपाही मेरी बात नहीं मानेंगे। इससे कमिष्नर ख्ाफा हो गया। कुँवर सिंह देष और बिहार की परिस्थितियों से अवगत थे। पीर अली की फाँसी ने उन्हें बैचेन कर दिया था। इधर दिल्ली और मेरठ की घटना से बिहार के अंग्रेज अधिकारी चिंतित थे। दिल्ली पर विद्रोही सिपाहियों का अधिकार हो चुका था। सिपाहियों ने दिल्ली पर कब्जा कर जो बिगुल बजाया, उसकी आवाज बिहार में भी स्पश्ट सुनायी पडी। अंग्रेज कुँवर सिंह को गिरफ्तार करने की फराक में लग गये। वहीं, कुछ अंग्रेज अधिकारी इसके बाद के परिणामों से सषंकित थे कि कहीं इसका उलटा असर न हो। कमिष्नर टेलर पर गया के मजिस्ट्रेट की चेतावनी का कोई असर नहीं हुआ। उसने २ जुलाई १८५७ को कुँवर सिंह के मित्र और रईस डिप्टी कलेक्टर मौलवी सय्यद अजीमुद्दीन को बाबू साहब को पटना लाने के लिए भेजा। उस समय कुँवर सिंह जगदीषपुर में थे। कुँवर सिंह ने स्थिति को भाँपते हुए अपनी अस्वस्थता जाहिर की और पटना नहीं गये। इसके पूर्व, पटना में मौलवियों की फाँसी और टेलर के आतंकी कार्य को वे सुन चुके थे। इससे उनके मन में अंग्रेजों के प्रति घृणा हो गयी और उन्होंने अपने आपको विद्रोह के लिए तैयार किया। दानापुर के सिपाहियों के विद्रोह को लेकर उन्होंने अपने भाई अमर सिंह और कई ख्यातिप्राप्त लोगों के साथ विचार-विमर्ष कर हालात को जानने का प्रयास किया। सभी दानापुर के सिपाहियों का साथ देने के लिए तैयार थे और अधिकतर लोग कुँवर सिंह को सिपाहियों का नेता बनाना चाहते थे। २९ मार्च १८५७ को ३४वीं पलटन के विद्रोह की जो आवाज मंगल पाण्डे की षहादत से उठी, उसका विद्रोही स्वर मेरठ और दिल्ली में सुनायी दिया। इसका प्रभाव दानापुर की छावनी पर भी पडा। देषी सैनिकों में कई बिहार के उच्च जाति के ब्राह्मण और राजपूत थे। क्रांतिकारियों की योजना २५ जुलाई १८५७ को दानापुर में विद्रोह करने की थी। इस बीच, दिल्ली से ख्ाबर आयी कि सिपाहियों ने वहाँ कब्जा जमा लिया है और बहादुरषाह जफर को हिन्दुस्तान का षासक बना दिया गया है। चारों ओर संघर्श का षंखनाद हो गया था। उधर टेलर पटना में लोगों को फाँसी देकर आतंक मचा रहा था। कमिष्नर ने हालात देखते हुए सेना को पटना आने को कहा। इस बीच २४ जुलाई को ३७ नम्बर की यूरोपियन फौज दानापुर पहुँची। अगले दिन देषी फौज अंग्रेज अफसर और सैनिकों से भिड गयी और मेजर जेम्स होम की हत्या कर दी। देषी सिपाही वर्दी उतार हथियार लेकर आगे बढे। सिपाही सोन नदी पार करना चाहते थे। वहीं सिपाहियों का पीछा करने के लिए अंग्रेजी सेना आ गयी। हालाँकि, २६ जुलाई को देषी सैनिक सोन नदी पार कर आरा की ओर चल पडे। अंग्रेजों ने उन्हें रोकने का काफी प्रयास किया। इधर हरेकृश्ण सिंह और रणदलन सिंह दानापुर जाकर, सिपाहियों से बात कर, उनको आरा में प्रवेष कराने के लिए तैयार कर रहे थे। उन्होंने सिपाहियों को बताया कि कुँवर सिंह नेतृत्व करेंगे। हरेकृश्ण सिंह के नेतृत्व में २७ जुलाई को वे सुबह आरा पहुँचे। कहा जाता है कि सिपाहियों को नदी पार करने के लिए कुँवर सिंह ने ही नाव का प्रबंध किया था। उसी दिन बाबू कुँवर सिंह भी आरा आये। आरा स्थित बाबू बाजार के मकान पर सिपाही एकत्र हुए। बिहार की धरती पर कुँवर सिंह ने दानापुर के विद्रोही सैनिकों का साथ देकर क्रांति की धारा को तेज कर दिया था। बंगाल गजट के हवाले से माक्र्स ने लिखा है कि दानापुर के बागियों ने सोन पार कर आरा पर धावा बोल दिया। वहीं बंगाल सरकार के सेक्रेटरी के समक्ष पटना के कमिष्नर टेलर ने भी उत्तेजना की चर्चा करते हुए लिखा है कि सिपाही हथियार और लूट के साथ चक्कर काटते रहे और आरा के पास किसी गाँव में डेरा डाले हुए थे और अंग्रेजी फौज उन्हें गिरफ्तार करने में असमर्थ थी।
आरा पर कब्जे के बाद बाबू कुँवर सिंह राश्ट्रीय स्वतंत्रता-संग्राम के करीब पाँच हजार क्रांतिकारी सिपाहियों के षौर्यमान नेता और भोजपुरी-भाशी जनता के चहेते बन गये। जनता ने उन्हें ’तेगवां बहादुर‘ कहकर बुलाना षुरू कर दिया। कुँवर सिंह का प्रभाव इतना बढ गया कि खेत-खलिहानों में कुँवर सिंह पर गाने गाये जाने लगे। बिहार में जो विद्रोह हुआ, उसका व्यापक प्रभाव पडा इसमें जनता ने खुलकर भाग लिया। पूरे षाहाबाद में विद्रोह का क्रांतिकारी तेवर अपना रूप ले चुका था। छोटे-मोटे जमींदार और सभी राजपूत कुँवर सिंह के विद्रोह के साथ थे। आरा कब्जे के दौरान् जेल को तोडकर, करीब ४०० कैदियों को छुडा दिया गया था। बाद में, सरकारी ख्ाजाने से सत्तर हजार रुपये भी लूट लिये गये। इस लूट में अंग्रेजों के नजीर पहरेदारों ने भी साथ दिया। विद्रोह के समय सैनिक बिना पोषाक के लडे थे। आरा के अंग्रेजों की रक्षा के लिए ५५ सिक्खों को नियुक्त किया गया था।
देषी सैनिक और स्थानीय जनता ने अंग्रेजों के विरुद्ध भाग लिया। सोन पार पर कुँवर सिंह से मिलने तक बागियों की संख्या दस हजार तक पहुँच चुकी थी, जो षाहाबाद के लिए अनोखी बात थी। कुँवर सिंह ने ग्रैंड ट्रंक रोड पर कब्जा जमा लिया।
बिहार में १८५७ के संग्राम में हिन्दू-मुस्लिमों ने कंधे से कंधा मिलाकर लडाई लडी। कहा जाता है कि कुँवर सिंह हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रतीक के रूप में थे। आरा की ब्यायल कोठी को आरा-हाउस का संघर्श कहा जाता है। अंग्रेजों के पास जहाँ आधुनिक हथियार थे, वहीं कुँवर सिंह और उनके आदमियों के पास साधारण। ब्यायल कोठी की लडाई करीब एक सप्ताह तक चली थी। कहा जाता है कि पानी की कमी होने पर कोठी में तैनात सिख सिपाहियों ने अठारह फीट जमीन खोदकर पानी की व्यवस्था की थी। दोनों तरफ से गोलाबारी जारी थी। दानापुर से सेना भेजना आसान नहीं था। २७ जुलाई को ३७ नम्बर की गोरी सेना भेजने का प्रयास किया गया। लेकिन नदी में पानी कम होने से जहाज रुक गया। बाबू कुँवर सिंह की सेना द्वारा आरा की घेराबंदी और कोठी में घिरे अंग्रेजों की रक्षा का प्रष्न सरकार को परेषान कर रहा था। हालाँकि उनकी रक्षा के लिए ५०० यूरोपियन सैनिकों की एक टुकडी भेजी गयी, जिसका नेतृत्व कैप्टन डनवर ने किया। बाबू कुँवर सिंह के सैनिकों से डनवर की फौज का मुकाबला आरा से तीन मील दूर पर हुआ। रात का फायदा उठाकर काली पोषाक में कुँवर सिंह की सेना ने सफेद पोषाक पहने अंग्रेजों को चांदनी रात में पहचान कर हमला किया। सैनिकों को मरते देख अंग्रेजों में हडकंप मच गया। कई अंग्रेज सिपाही लापता हो गये। इस युद्ध में डनवर मारा गया। जो बच गये थे, किसी तरह जान बचाकर भागे। यह कुँवर सिंह और देषी सैनिकों की अपूर्व विजय थी। दानापुर से सैनिक भेजे नहीं जा सकते थे, क्योंकि कुँवर सिंह के समर्थक सैनिकों की संख्या दस हजार तक हो गयी थी। आरा पर कुँवर सिंह का पूर्ण अधिकार हो गया था। इस विजय के बाद कुँवर सिंह को लोगों ने ’तेगवां बहादुर‘ की उपाधि से नवाजा। बाबू कुँवर सिंह ने अपना राज्य हरेकृश्ण के सहयोग से स्थापित किया। कुँवर सिंह ने बेहतर षासन के लिए कई व्यवस्थाएँ की।
डनवर की पराजय और आरा में कुँवर सिंह के कार्यों से अंग्रेजों में डर पैदा हो गया था। इस बीच मेजर आयर ने आरा की ओर कूच किया। दो अगस्त को कुँवर सिंह के सैनिकों के साथ उसका मुकाबला हुआ। अंग्रेजों के पास तोपें थीं। कुँवर सिंह के सैनिक पीछे हटे। आयर आगे बढा, लेकिन कुछ ही दूर जाने पर बीबीगंज के पास एक नदी मिली, जहाँ भीशण संग्राम हुआ। कुँवर सिंह ने पूरी ताकत के साथ अंग्रेजों पर आक्रमण किया। इस हमले से आयर घबरा गया। घंटों भयंकर संघर्श जारी रहा। ३ अगस्त १८५७ को आयर आरा पहुँचा। इससे गोरों को राहत मिली। आयर ने आरा पहुँच कर दो दिन के भीतर सभी के हथियार जमा करा लिये और कोर्ट मार्षल कराकर संदिग्ध लोगों को फाँसी पर लटका दिया। कुँवर सिंह के लोगों ने सहर्श फाँसी का आलिंगन किया। जहाँ अंग्रेजों ने कत्लेआम किया, वहीं कुँवर सिंह ने आरा पर कब्जा करने के बाद, किसी भी अंग्रेज का बेवजह खून नहीं बहाया, बल्कि यूरोपियन परिवारों की रक्षा की। इधर कुँवर सिंह ने अपने समर्थकों के साथ जगदीषपुर में मोर्चाबंदी की, उधर आयर ने आरा में रुक कर युद्ध की तैयारी की। जगदीषपुर के निकट दुलौर में आयर और कुँवर सिंह के बीच मुकाबला हुआ। इस युद्ध में कुँवर सिंह के भाई अमर सिंह भी सहायता के लिए आ गये। इस युद्ध में डुमराव के महेष्वर सिंह अंग्रेजों के साथ थे। १२ अगस्त को जगदीषपुर आकर आयर ने गढ में आग लगा दी। लोगों के मकान ध्वस्त कर दिये और कत्लेआम किया। बाबू कुँवर सिंह और उनके लोगों ने जगदीषपुर छोड दिया। आयर ने यहाँ षिव मंदिर भी तबाह कर दिया था जिसकी वजह से अंग्रेज सरकार ने आयर की खिंचाई की। जगदीषपुर में आतंक पैदा कर गोरे सिपाही दानापुर पहुँचे और वहाँ उन्होंने करीब एक सौ देषी सिपाहियों को गोलियों से उडा दिया। जगदीषपुर पराजय के बाद बाबू कुँवर सिंह अपने समर्थकों और सिपाहियों के साथ सासाराम की ओर बढे और अंग्रेजों के खिलाफ अपनी लडाई जारी रखी। १७ मार्च १८५८ को वे अतरौलिया पहुँचे। इसकी सूचना अंग्रेजों को मिल चुकी थी। २१ मार्च १८५८ को कुँवर सिंह के दल पर कर्नल मिलमैन ने हमला बोल दिया। अचानक हुए हमले से कुँवर सिंह के आदमी हतप्रभ रह गये। ऐसे में उन्होंने पीछे हटना ही उचित समझा। २२ मार्च को पुनः देषी सेनाओं के साथ मिलमैन का मुकाबला हुआ। कुँवर सिंह लगातार पीछे हटते गये। अंग्रेजों ने समझा कि वे हार गये हैं। ख्ाुषी में वे जष्न मनाने लगे। इसका फायदा उठाकर अचानक कुँवर सिंह ने पीछे से अंग्रेजी सेना पर हमला बोल दिया। इस हमले में बहुत से अंग्रेज सैनिक मारे गये और उनकी कई तोपें कुँवर सिंह के हाथ लग गईं। मिलमैन किसी तरह आजमगढ की ओर भागा। कुँवर सिंह ने उसका पीछा किया। आजमगढ के क्षेत्र में कुँवर सिंह को अपार जन-समर्थन मिला। २६ मार्च १८५८ तक बाबू कुँवर सिंह आजमगढ के क्षेत्र के षक्तिषाली व्यक्ति बन गये। इधर मिलमैन ने अपनी सहायता के लिए लखनऊ, इलाहाबाद और सासाराम को पत्र लिखा। कर्नल डेम्स गाजीपुर से २०० सैनिकों के साथ कुँवर सिंह से मुकाबला करने चला और आजमगढ से कुछ ही दूरी पर कुँवर सिंह की सेना से यह मुकाबला हुआ। इसमें डेम्स की बुरी तरह पराजय हुई और उसके कई सैनिक मारे गये। कुँवर सिंह ने अपनी तोपें और कई सैनिकों को अतरौलिया गाँव भेज दिया और खुद आजमगढ चले गये।
इस बीच बाबू कुँवर सिंह अपने लोगों के साथ षाहाबाद लौटना चाहते थे। इस ख्ाबर से उत्तर प्रदेष सहित बिहार के अंग्रेज अफसर चिंतित हो गये। ख्ाबर फैली कि कुँवर सिंह दोआबा पार कर बलिया के निकटवर्ती क्षेत्र से गंगा पार करते हुए षाहाबाद में प्रवेष करेंगे। गोरखपुर के मजिस्ट्रेट ने चम्पारण के मजिस्ट्रेट को लिखा कि वे चौकन्ने रहें और गंडक नदी पर पहरा बैठा दें। कुँवर सिंह के आने का भय पटना के कमिष्नर को भी सता रहा था। इधर बाबू कुँवर सिंह जगदीषपुर से सौ मील आगे निकल आये थे। उनके साथ लखनऊ और अवध के क्रांतिकारी सिपाही थे। अंग्रेजों को लगा कि वे बनारस पर हमला कर देंगे। ऐसे में लार्ड कैनिंन ने मार्केकर को बनारस और इलाहाबाद की सेना को कुँवर सिंह को रोकने के लिए भेजा। ६ अप्रैल १८५८ को मार्केकर ने आक्रमण की योजना बनाई और कुँवर सिंह पर हमला कर दिया। दोनों ओर से गोलियाँ चलीं। कुँवर सिंह के लिए यह युद्ध अपूर्व संग्राम था। वृद्ध कुँवर सिंह ने जमकर लडाई लडी। अंग्रेजी तोपें आग उगल रही थीं। इसी समय देषी सिपाहियों ने तोपों का मुँह उलट दिया। मार्केकर को भागना पडा। इस युद्ध में अंग्रेजों की षर्मनाक पराजय हुई। आजमगढ पहुँचकर एडवर्ड लुगार्ड ने ब्रिगेडियर डगलस को कुँवर सिंह से लडने भेजा और कुँवर सिंह की गिरफ्तारी पर पच्चीस हजार रुपये का इनाम घोशित कर दिया। २१ अप्रैल को सहतबार में कुँवर सिंह की सेना रात में एकत्रित हुई। वहीं डगलस की एक सैन्य टुकडी गायघाट के पास पडाव डाले हुए थी। इसी बीच, षिवपुर निवासी सेनानी सिद्धा सिंह ने अपने लोगों के साथ अंग्रेजों पर हमला कर उन्हें मार डाला और लाषों को नाले में बहा दिया। आज भी नाले को मुडकटवा नाला कहा जाता है। इधर अफवाह फैला दी गई कि कुँवर सिंह गंगा पार करेंगे। अंग्रेजी सेना वहाँ पहुँची। तब तक कुँवर सिंह व उनके सैनिक षिव घाट पहुँच गये थे। ख्ाबर पाकर डगलस भी पीछे से आया। गंगा पार करने के लिए अंग्रेजों ने नाव डुबो दी थी, लेकिन स्थानीय लोगों ने डूबी नावों का पता बताकर देषी सिपाहियों का सहयोग किया। बाबू कुँवर सिंह की सेना रात में गंगा पार कर रही थी, तब तक डगलस षिवपुर घाट पहुँच गया। अंतिम नाव में कुँवर सिंह थे। २२ अप्रैल १८५८ को कुँवर सिंह के पीछे रणदलन सिंह थे। एक छत्रधारी नौकर उनके पीछे राजछत्र पकडे था। अंग्रेजों ने उन्हें ही कुँवर सिंह जान कर गोला दाग दिया। गोले से रणदलन सिंह और नौकर मारे गये। वहीं कुँवर सिंह की भुजा के उपरी भाग का मांस गोले के साथ उड गया और वे बेहोष होकर गिर गये। फीलवान षीघ्र ही हाथी को भगाकर ले गया और उन्हें होष में लाने की कोषिष करने लगा। होष में आने के बाद भी उनकी विरक्त चेतना कम न हुई थी। उन्होंने नौकर से दाहिनी भुजा काटकर गंगा में फेंकने को कहा, लेकिन इसके लिए कोई तैयार नहीं हुआ। अंत में, उन्होंने खुद ही अपनी भुजा काट गंगा को भेंट कर दी। इसके बावजूद, अंग्रेजों के ख्ालाफ अपनी लडाई जारी रखी। अपूर्व रणकौषल का प्रदर्षन कर आठ माह पष्चात् बाबू कुँवर सिंह जगदीषपुर पहुँचे। जगदीषपुर खंडहर बन चुका था। केवल आगे का बरामदा बचा हुआ था। यहीं पर उन्हें लिटाया गया। वृद्ध और घायल बाबू कुँवर सिंह २३ अप्रैल को लीग्रैंड की सेना के साथ जगदीषपुर के समीप लडे। आधुनिक अंग्रेज सेना भी कुँवर सिंह के आगे टिक नहीं पायी। खुद लीग्रैंड मारा गया। युद्ध के तीन दिन बाद २५ अप्रैल १८५८ को १८५७ के संग्राम के वृद्ध योद्धा बाबू कुँवर सिंह का निधन हो गया।
१८५७ के युद्ध में कुँवर सिंह ने जो परचम लहराया वह आज भी इतिहास के पन्नों में स्वर्णाक्षरों म दर्ज है। कहा जाता है कि कुँवर सिंह ने स्वाधीनता का ध्वज अपने महल पर फहराया था। वे अपने षासनकाल में पूर्ण स्वाधीन थे। हरा झंडा उनकी राजधानी पर लहरा रहा था। कुँवर सिंह के नाम ने ही प्रजा को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त करा दिया था। १८५७ के स्वतंत्रता-संग्राम के प्रमुख सेनानी के रूप में ठाकुर कुँवर सिंह को हमेषा याद किया जाता रहेगा !
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