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सन् १८५७ के प्रथम स्वतंत्रता-संग्राम में समूचे उत्तर भारत के ब्रिटिश आधिपत्य वाले क्षेत्रों में जनता अंग्रेजों को खदेडने के लिए उठ खडी हुई थी। मध्यप्रदेश में शामिल रियासती क्षेत्रों में भी भीशण संघर्श जारी था। बुन्देलखण्ड क्षेत्र की रियासतों की रानियाँ, राजा और महाराजा अंग्रेजों के चरणदास बने हुए थे। इसीलिए, दोहरी गुलामी के विरुद्ध बुन्देलखण्ड की रियासती जनता का संघर्श अधिक कठिन था, लेकिन देशपत बुन्देला, फरजन्द अली, लोकपाल सिंह, बखतसिंह आदि के नेतृत्व में क्रांति की ज्वालाएँ बुन्देलखण्ड में धधक उठीं। नौगाँव छावनी स्थित ब्रिटिश सेना के भारतीय सैनिक भी विद्रोह की राह पर चल पडे।
दिल्ली-मेरठ में उठे बवंडर और आठ जून १८५७ को झाँसी की घटनाओं के समाचारों ने नौगाँव की ब्रिटिश फौजी छावनी में उत्तेजना फैला दी। नौ जून को नौगाँव में क्रांति शुरु हो गयी। वास्तव में, इसके बहुत पहले से ही यहाँ के सैनिक अन्य केन्द्रों से सूचनाएँ मिलने पर क्रांति की तैयारी में जुटे थे, किन्तु भारतीय सेना के तीन अंग्रेज-परस्त सैनिकों ने इस तैयारी की सूचना अंग्रेज अधिकारियों को दे दी। इससे थोडे समय के लिए बाधा जरूर उत्पन्न हुई, किन्तु क्रांति की भावना तिरोहित नहीं हुई।
नौगाँव स्थित १२वीं बंगाली भारतीय सेना ने रात में ही विद्रोह कर दिया। इस सेना और घुडसवार सेना से अधिकारियों ने पहले पूछा था कि क्या वे अंग्रेज सरकार के प्रति वफादार बने रहेंगे? सूबेदार बैजनाथ ने तत्काल अपनी निश्ठा व्यक्त कर दी थी। दूसरे सैनिकों ने भी हामी भर दी थी, परन्तु सेना के विद्रोह ने स्पश्ट कर दिया कि यह केवल दिखावा था। नौगाँव के सेकंड स्टेशन आफीसर कैप्टन स्कॉट ने नौवें तोपखाने के कमान्डिंग आफीसर सी.एस. रीड को भेजे पत्र में विद्रोह का आँखों-देखा हाल लिखा है। वह लिखता है, ’’जिस समय विद्रोह की शुरूआत हुई, उस समय संपूर्ण बैटरी १२वीं देशी पैदल सेना परेड पर थी.... जब २०वीं देशी पैदल टुकडी या रक्षक दल कूच कर रहे थे, तभी सिखों ने आगे बढकर सामने हमला कर दिया। उनके पास तीस या चालीस बन्दूकें थीं। इसके बाद, इन्होंने हवलदार मेजर किर्के को मार डाला और तोपों की और लफ। सार्जेंट रेट ने अपनी तलवार खींच ली, किन्तु उस पर गोली चला दी गयी। क्षण भर में उन्होंने परेड में लगे तंबुओं पर गोली चलाना शुरू कर दिया।‘‘
सीताराम और सरदार ख्ाान को उनकी कंपनी के सैनिकों ने पकड लिया, लेकिन सूबेदार बैजनाथ बच निकला। बाद में, सीताराम भी जान बचाकर भाग गया। क्रांतिकारियों ने सरदार ख्ाान को उसकी अंग्रेज-परस्ती के लिए मौत की सजा दी। यूरोपियन अधिकारी टाउनसेन्ड, रेट और रोडरिक; तीन भारतीय अधिकारी और ८० सिपाही भागने में सफल हुए। यह भगोडा दल महोबा होते हुए छतरपुर पहुँचा, जहाँ छतरपरु की रीजेन्ट रानी ने उन्हें किले में शरण दी। फिर यह, दल इलाहाबाद जाते हुए महोबा पहुँचा। जब वे लोग १७ जून, १८५७ को महोबा से कालिंजर की ओर जा रहे थे, विद्रोही सैनिकों ने उन्हें घेर लिया और टाउनसेन्ड की हत्या कर दी। अन्त में, इस भगोडे दल को चरखारी के राजा ने शरण दी। क्रांतिकारियों ने चरखारी के राजा से उन्हें लौटाने के लिए कहा, किन्तु उसने १७ दिन तक प्रतिरोध किया और अंत में उसे समझौता करना पडा।
इसके बाद दल तितर-बितर हो गया और कई समूहों में बँट गया। एक दल कैप्टन स्कॉट के नेतृत्व में रीवा पहुँचा, जबकि सार्जेंंट रेट सहित कुछ अधिकारी नागौद की ओर गये। १२वीं पैदल सेना के तीन भारतीय अधिकारियों और ३५ सिपाहियों का एक दल बाँदा और फतेहपुर की ओर गया, जो चार जुलाई को इलाहाबाद पहुँचा। वहाँ कर्नल नील ने उन्हें अपनी सेवा में ले लिया।
देशपत बुन्देला का पराक्रम
देशपत बुन्देला रियासती बुन्देलखण्ड क्षेत्र के संभवतः सर्वाधिक सशक्त, शूरवीर, कद्दावर और दूरदर्शी क्रांतिकारी सेनानायक थे। वे सन् सत्तावन की महान क्रांति में अंग्रेजों से लगातार संघर्श करते रहे। अंग्रेज उन्हें पाँच वर्श की लम्बी अवधि तक बन्दी नहीं बना सके। वास्तव में, देशपत ने १८५१ से ही अंग्रेजों के विरुद्ध खुलेआम विद्रोह कर दिया था। आख्ार वे वीर बुन्देले महाराज छत्रसाल के वंशज थे और छतरपुर की रानी के भाई के पुत्र। नौगाँव छावनी से मात्र १८ कि.मी. दूर झिंझनी या झीझन नामक गाँव पर उनका आधिपत्य था। नौगाँव में सैनिकों को क्रांति के लिए तैयार करने का कार्य देशपत ने ही किया था।
जैतपुर के राजा परीक्षत की रानी की जब्त रियासत को वापस पाने के लिए किये गये विद्रोह में देशपत बुन्देला की बेझिझक सहायता उल्लेखनीय है। उन्हें अन्य जागीरदारों की सहायता भी मिल रही थी। उन्होंने जैतपुर की रानी की खोई हुई रियासत को पुनः प्राप्त करने का बीडा उठाया और युद्ध में अकेले पड जाने के बावजूद, वे अंत तक संघर्श करते रहे। वस्तुतः, मई १८५७ से मई १८५८ तक देशपत ब्रिटिश इलाकों पर और अंग्रेजों का साथ देने वाली रियासतों पर लगातार हमला कर लूटपाट करते रहे।
देशपत की क्रांतिकारी गतिविधियाँ अंग्रेजों की आँख की किरकिरी बनी हुई थीं। जनरल विटलॉक सागर-दमोह होता हुआ छतरपुर में घुसा। उसे पॉलिटिकल एजेण्ट ने सूचित किया कि देशपत झीझन गाँव में दो हजार विद्रोहियों के साथ पडाव डाले हुए है। विटलॉक ने बडी सेना के साथ झीझन गाँव पर आक्रमण किया। घमासान युद्ध में क्रांतिकारी सेना के ९७ सैनिक मारे गये और ३९ बंदी बना लिये गये। विटलॉक ने पूरे झीझन गाँव को और गढी को तहस-नहस कर दिया।
तात्या टोपे ने जनवरी, १८५८ में चरखारी पर हमला किया। वहाँ का राजा रतनसिंह भी पूरी तरह अंग्रेजों का मददगार था। ११ दिनों के संघर्श के बाद तात्या ने नगर पर कब्जा कर लिया, २४ तोपों पर अधिकार कर लिया और राजा से तीन लाख रुपये प्राप्त किये। फिर रानी लक्ष्मीबाई की सहायता के लिए झाँसी के ओर कूच कर गये। चरखारी के युद्ध में देशपत ने सेना के साथ तात्या टोपे की सहायता की। केवल चरखारी ही नहीं, ओरछा की लडई रानी; दतिया की रानी; छतरपुर की रानी; पन्ना, बिजावर, अजयगढ और बुन्देलखण्ड की अन्य रियासतों के शासक भी अंग्रेजों के ही साथ थे।
इस बीच सेन्ट्रल इण्डिया के कमान अधिकारी को गवर्नर जनरल लार्ड केनिंग और प्रमुख सेनापति का झाँसी में आदेश मिला कि चरखारी की सहायता करो। २०,००० सैनिकों और ३० तोपों के साथ तात्या झाँसी की रानी की सहायता के लिए आगे बढे, परन्तु ह्यू रोज से पराजित होने के कारण उन्हें लौटना पडा। देशपत का तात्या टोपे से परस्पर सहयोग के लिए पत्र-व्यवहार जारी था। उन्होंने अक्टूबर, १८५८ तक क्रांतिकारियों की एक बडी सेना तैयार कर ली थी। उनके पास करीब ५,००० पैदल सैनिक, ३,००० गोंड आदिवासियों की सेना और घुडसवार थे। क्रांतिकाारियों की इतनी विशाल संख्या से अंग्रेज भयभीत थे।
बुन्देलखण्ड के पॉलिटिकल एजेण्ट ने सेन्ट्रल इण्डिया के गवर्नर जनरल के एजेण्ट को लिखा था कि ’’देशपत ही सारे लडाई-झगडे की जड है और वह क्रांतिकारी गतिविधि में इतना दक्ष और स्वभाव से इतना क्रूर और निर्भीक है कि उसे गतिविधियों की जानकारी आसानी से मिल जाती है।‘‘ देशपत की तूफानी गतिविधियों के बारे में ३० दिसंबर, १८५८ के हिन्दू पेट्रियट (कलकत्ता) ने लिखा था, ’’बुन्देलखण्ड में क्रांति की भावना स्थानीय बागियों द्वारा समय-समय पर किये जाने वाले विद्रोह से प्रकट होती है। देशमुख नामक एक प्रमुख सरदार का जैतपुर नामक इलाके पर आधिपत्य है। इस व्यक्ति को संपूर्ण माफी के संदेश भेजे गये थे, किन्तु संदेश लेकर जाने वाले सात लोगों में से छह लोगों की हत्या की जा चुकी है। उत्तर-पश्चिम प्रांतीय (पश्चिमी उत्तरप्रदेश) सरकार ने उसके सिर पर १०,००० रुपये के पुरस्कार की घोशणा की थी। जब भी, अंग्रेजों को सफलता नहीं मिली।‘‘
हीरापुर के किलेदार ने सूचित किया था कि देशपत के साथ १० से ११ हजार सैनिक चार डिवीजनों में पन्ना के आसपास की पहाडयों में फैले हुए हैं। पन्ना, चरखारी, छतरपुर की सेनाओं से निकाले हुए सैनिक भी देशपत के साथ हो गये थे। १८५९ के अंत तक, अंग्रेजों के लिए देशपत तब तक आतंक का पर्याय बना रहा जब तक कि छतरपुर राज्य को उसकी गतिविधियों के लिए जम्मेदार नहीं ठहरा दिया। यह आम अफवाह थी कि देशपत को छतरपुर की रानी की गुप्त रूप से सहायता प्राप्त थी। अंग्रेजों ने रीजेन्ट रानी पर देशपत की गिरफ्तारी के लिए जोर डाला।
इस बीच, छतरपुर के नाबालिग राजा जगतराज और रीजेण्ट रानी के मध्य मतभेद बढ गये। अंग्रेजों को अपने पक्ष में करने के लिए वह अंग्रेजों की सहायता में जुट गया। देशपत का पता-ठिकाना ज्ञात करने के लिए उसने बडी राशि खर्च की। तीन दिसंबर, १८६२ को सूचना मिली कि देशपत अपने गाँव के निकट पहुँचने वाला है। अंग्रेज दल जगत राज के साथ छतरपुर से कोई २४ किलोमीटर दूर दोनी ग्राम की ओर बढे, लेकिन इनके पहुँचने के पहले मुखबिर ही देशपत पर टूट पडे और धोखे से उस रणबाँकुरे की हत्या कर दी, लेकिन विद्रोह की आग भीतर ही भीतर धधकती रही। अक्टूबर, १८६७ में देशपत के एक भतीजे रघुनाथ सिंह ने विद्रोह कर दिया और वह छतरपुर रियासत पर हमले करने लगा। एक साल बाद, अक्टूबर १८६८ म उसे गिरफ्तार कर कालेपानी भेज दिया गया। उसके परिवार को लाहौर भेज दिया गया और वहाँ उन्हें निगरानी में रखा गया।
देशपत ने स्वतंत्रता की बलिवेदी पर अपने प्राण न्योछावर कर दिये। वे अंग्रेजों के लिए इतने महत्त्वपूर्ण थे कि बुन्देलखण्ड के पॉलिटिकल एजेण्ट ने सेन्ट्रल इण्डिया के गर्वनर जनरल के एजेण्ट को लिखे पत्र में माना कि देशपत की गिरफ्तारी दिवंगत तात्या टोपे के बाद सरकार की दूसरी महत्त्वपूर्ण उपलब्धि होगी। देशपत की शहादत के बाद स्वयं गवर्नर जनरल को २० दिसंबर, १८६२ के पत्र में स्वीकार करने को बाध्य होना पडा कि ’देशपत का अंत निर्विवाद रूप से एक महत्त्वपूर्ण घटना है।‘
फरजंद अली
बुन्देलखण्ड की अजयगढ रियासत में विद्रोह का झण्डा उठाया रियासत के वकील फरजंद अली ने। अजयगढ में गद्दी के उत्तराधिकार के लिए लोकपाल सिंह और रणजोर सिंह में विवाद हो गया और पन्ना, बिजावर, छतरपुर के राजघराने रणजोर सिंह के पक्ष में थे, जबकि फरजंद अली ने लोकपाल सिंह का पक्ष लिया। अंग्रेजों ने, क्योंकि, रणजोर सिंह को स्वीकृति दी, अतः फरजंद अली-लोकपाल सिंह के संघर्श ने ब्रिटिश विरोधी अभियान का रूप अख्तयार कर लिया। फरजंद अली को अजयगढ रियासत से निकाल दिया गया।
फरजंद अली और लोकपाल सिंह ने मिलकर एक क्रांतिकारी सेना गठित कर ली और सुरक्षा की दृश्टि से पहाडी क्षेत्रों और जंगलों में अपनी गतिविधियों को केन्दि्रत कर लिया। फरजंद अली एक योग्य संगठनकर्त्ता था। उसने शीघ्र ही बाँदा के नवाब, बघेलखण्ड के क्रांतिकारी नेता रणमत सिंह, कर्वी के विद्रोही नेता राधा गोविन्द आदि अनेक विद्रोही प्रमुखों से संफ साध लिया। भिलसाँय के मैदान में अजयगढ की सेना और विद्रोहियों के बीच युद्ध हुआ। युद्ध की कमान रणमतसिंह के हाथ में थी, लेकिन उसमें बुन्देलखण्ड के अनेक रणवीर शामिल थे। फरजंद अली भी उनमें से एक था। क्रांतिकारियों के पास तोपें नहीं थी और मात्र एक हजार सैनिक थे। अजयगढ की तोपों से वे हार गये।
फरजंद अली ने रणमत सिंह के साथ मिलकर भीशण संघर्श जारी रखा। २० दिसंबर, १८५८ को भरत शाह और जवाहर खाँ का साथ मिल गया। बाद में वे हरदी से सिद्धपुर पहुँच गये। अंग्रेजों ने उन्हें घेरने की कोशिश की, तो वे इटवा चले गये। वहाँ अंग्रेजों ने विद्रोहियों को चारों ओर से घेर लिया, लेकिन पन्ना राज्य के अधिकारियों के कहने पर इटवा में युद्ध नहीं हुआ और विद्रोही वहाँ से रवाना हो गये।
बाद में नागौद से कर्नल व्हिसलर, बघौरा मार्ग से लेफ्टिनेंट लुइस की कमान में ब्रिटिश सेना आगे बढी। व्हिसलर फरजंद अली की गिरफ्तारी के लिए अभियान छेडे हुए था। पन्ना का राजा भी मदद कर रहा था और अजयगढ का रणजोर सिंह तो पहले से ही अंग्रेजों के साथ था। १६ अक्टूबर, १८५९ को फरजंद अली को कल्दा नामक गाँव में पकडने के लिए व्हिसलर को आदेश मिला। वह नागौद से आगे बढा। उसकी पुरजोर कोशिश के बाद भी फरजंद अली व्हिसलर की गिरफ्त में नहीं आ सका। इसलिए, ब्रिटिश सरकार ने गिरफ्तारी के लिए पन्ना दरबार पर दबाव डाला।
अंत में, फरवरी १८६० में फरजंद अली और लोकपाल सिंह ने अंग्रेजों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। अंग्रेज सरकार ने उनके साथ क्या सुलूक किया, इसकी जानकारी फलहाल उपलब्ध नहीं है।
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