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शब्दों का इंतजार
शब्द जब मेर पास नहीं होते
मैं भी नहीं बुलाता उन्हें
दूर जाने देता हूँ
अदृश्य सीमाओं तक
उन्हें परिंदे बन कर
धीरे-धीरे
अनंत आकाश में
लुप्त होते देखता हूँ।
नहीं !
जबरन बाँध कर
नहीं रखता मैं शब्द
डोरियों से
जँजीरों में
पिंजरों में कैद करके
नहीं रखता मैं शब्द
मन को
खाली हो जाने देता हूँ।
सूने क्षितिज की भाँति
कितनी बार
अपनी ख्ाामोशी को
अपने भीतर गिर कर
टूटते हुए
देखता हूँ मैं
लेकिन इस टूटन को
अर्थ देने के लिए
शब्दों की मिन्नत नहीं करता
टूटने देता हूँ
चटखने देता हूँ
ख्ाामोशी को अपने भीतर।
मालूम होता है मुझे
कि कहीं भी चलें चाहे
अनंत सीमाओं में
अदृश्य दिशाओं में
शब्द
आख्ार लौट कर आएँगे
ये मेरे पास एक दिन
आएँगे
मेरे कवि-मन के आँगन में
मरुस्थल बनी
मेरे मन की धरा पर
बरसेंगे रिमझिम
भर देंगे
सोंधी महक से मन।
कहीं भी हों
शब्द चाहे
दूर
बहुत दूर
लेकिन फिर भी
शब्दों के इन्तजार में
भरा-भरा रहता
अंत का खाली मन।
घर का अँधेरा
मैं घर से चला
तो घर का अँधेरा
मेरे साथ-साथ
चल रहा था।
मेरी आँखों में सूरज था
उज्ज्वल भविश्य के
सपने थे
लेकिन मेरे पाँवों में
पीछे छूट चुके
घर की बेडयाँ थीं
रिश्तों की आवाजें थीं
मेरे शहर की
छूट रही सीमाएँ थीं
मेरे पूर्वजों की आत्माएँ थीं।
मैं अपने रास्तों में अटके
काले पवर्तों से जूझा
मरुस्थली पगडंडियों को फलाँग
समुद्रों को तैरा
हाथों में सूरज को पकडा
तितलियों को
सपनों में सजाया
धीरे-धीरे मैंने
अपनी इच्छा का
अपना संसार बसाया।
लेकिन अब
जब कभी भी मैं
भूले भटके
अपने शहर जाऊँ
अपने घर की
चौखट पर पैर टिकाऊँ
तो उस घर का अँधेरा
मुझ से अजब सवाल करे
जिनका जवाब देने से
मेरा मन डरे।
मैं जल्दी-जल्दी
माँ की सूख रही हथेलियों पर
चन्द सिक्के टिकाऊँ
और वापिस
अपने शहर लौट जाऊँ।
लेकिन
मेरे पीछे चल पडती
कुछ आवाजों
जिनसे बचने के लिए
मैं छटपटाऊँ
दर्द से बिलबिलाऊँ
अँधेरे के
इस जंगल से
निकलने के लिए
तिलमिलाऊँ
आँसू बहाऊँ।
मैं घर से चलता
तो घर का अँधेरा
अब भी
मेरे साथ-साथ चलता।
ऐन आधी रात
ऐन आधी रात
खुल जाती है आँख
पवन बिखेरती
अतीत की पुस्तक के पन्ने
और सामने की दीवार पर
कितना कुछ जगमगा उठता है।
दूर गाँव में
याद आता है घर एक
जहाँ शाम को इंजन की ’छुक-छुक‘
मेरे बाल मन को
करती थ बेचैन
दादा मेरे अभी भी
आँगन में स्टूल रखकर
खाना खाने के लिये हाथ धोते
और दादी मेरी, चूल्हे में
लकडयों से आँच तेज करती
उसका तांबे जैसा रंग तपता है।
अंधेरे में एक और घर दिखता है
जिसकी दीवारों से
कितने सुख-दुख साँझे
कितनी आँखें
उस घर में इन्तजार करतीं मेरा
कि कब लौटूँगा घर मैं
इस स्याह वक्त के सीने पर
जलता चिराग रख कर।
ऐन आधी रात
खुल जाती है आँख
पास आती मेरे
मेरी मोहब्बत की पहली नायिका
जिसने मेरे मासूम कदमों को
ऐसी भटकन भरी राह पर डाला
कि मेरे लिए उम्र का हर रास्ता
जंगल बनता गया।
याद आती
रिश्तों की नगरी
तो कितने ही जहर-बुझे तीर
मेरे जस्म में सरसराने लगते
कुछ रिश्ते अभी भी पास आते
और मेरा सीना इल्जाम से भरते।
आधी रात में पास आतीं मेरे
बहुत सी मटकती हुई
जामुनी नदियाँ
गुनगुनाती धूप
सुख्ार् पवन
गाती हुई ख्ाामोशी।
याद आता
उनका आना
और चले जाना
गहरी बेचैनी में
मैं करवटें बदलता
और
सो जाने की कोशिश करता
अंधेरी रात में जलता
यह
स्मृतियों का सूरज
बुझाने की कोशिश करता।
वेद प्रकाश की कविताएँ
देखना ही है तो देखो
देखना ही है तो,
देखो !
ठेले वाले की बनियान पर
उगी पसीने की लकीरें
छूना है, तो,
छुओ
उसके
तडपते हाथ और
पैरों को
जो
पिछली रात
साइकिल सवार और
अंधाधुंध जा रहे ट्रक के
ऐक्सीडेन्ट का हिस्सा थे
मैं चाहता हूँ,
कीचड कहीं भी न हो
और
धरती दलदल न बन पाये
सडे हुए फलों पर
बैठी मक्खियाँ
चाहती हैं
दुनिया के सभी फल
सडे हों
सडक पर माडल बना देने से
लोग नहीं बदलते
जब लोग विज्ञापन की भाशा में
अपने को नंगा
कर रहे होते हैं,
सच कहता हूँ
लोगों को अब नंगेपन से
घृणा नहीं
आनंद आता है
ऐसे कठोर समय में
जब आँख का पानी
सूख कर
पलकों को कडा कर देता है
तब चश्मा लगाने से
कुछ नहीं होता
यह भाशण का एक नायाब
तरीका है
हमारा क्या,
हम शब्द बोते हैं
लेकिन
यहाँ ठंड में पाला
गर्मी में सूखा
यहाँ फ्रज की तकनीक
काम नहीं करती
हम,
कई टुकडों में कटकर
चौराहों पर
तडपते रहते हैं,
हमारी शिनाख्त भी
नहीं हो सकती
हाँ, यह सब
शब्दों का ही
कमाल है
देखना ही है, तो,
देखो,
शब्दों को।
छावनी बनने के बाद
सबसे पहले उन्होंने
दीवारों को
गाढा लाल और नीला किया
सडक के किनारे
अशोक लगाये
और माली को निर्देश दिया
कि इनके पत्ते टहनियों के साथ
हमेशा झुके रहने चाहिए,
पीपल अचानक
अपनी हरियाली खोने लगा
पत्तियाँ सूख कर गिरने लगीं
टहनियाँ नंगी हो गयीं
शाखों पर लटके
बया के घोंसले
अलग से दीखने लगे
कठफोडवे
गाँठ तोडने में लग गये
कठफोडवे नहीं जानते
पेड की नमी
सोखने वाले
आस-पास ही हैं,
धरती का यह कोना
बच्चों के पैर से
दबकर
घास को हरा करती था
बूढों का हृदय
यहाँ बिना किसी दबाव
के धडकता था
मोटे शरीर वाले
इतना दौडते, कि,
धरती घायल हो जाती
और कराहती भी नहीं,
अलस्सुबह आती है
बंदूक दगने की आवाज
सूरज मटमैला हो जाता है
जब बूट, धरती पर एक साथ दौडते हैं
लोग बिखरने लगते हैं
वर्दी वालों को देखकर
वातावरण सहमा-सहमा रहता है
यहाँ तक कि,
लोग खिडकियाँ खोलने से
और
परिवार को उधर देखने से
मना करने लगते हैं।
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