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युवा कवि आशीश त्रिपाठी बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में हिन्दी के अध्यापक हैं। कविता के संस्कार और उसका सहज मुहावरा उनके पास है। उन्हें अनुभव को काव्य-विशय बनाने की कला आती है। यही कारण है कि वे छोटी-छोटी कविताओं में बात कह देने में सफल हो जाते हैं। शब्दों और बिंबों के संस्कारित एवं सटीक प्रयोग तथा उनकी मितव्ययिता इस दौर की कविता में उनकी अलग पहचान बनाती है। आशीश त्रिपाठी की कविताओं में आधुनिक भाव-बोध है और साथ ही परंपरा और मिथक के चित्र भी हैं। प्रकृति के चित्र वाह्य आलंबन निर्मित करते हैं और साथ ही उनकी अंतस्चेतना का हिस्सा भी बनते हैं। उनकी नजर हाशिये पर टंगे समूहों की ओर भी जाती है। वे उनकी संवेदना का हिस्सा बनते हैं। उनकी कविताओं के दृश्य बंध अपनी पूरी चित्रात्मकता के साथ पाठकों के सम्मुख उपस्थित होते हैं। आशीश त्रिपाठी एक सशक्त हस्ताक्षर के रूप में आजकी कविता में अपनी पहचान बना रहे हैं। -संपादक)
मैं आता हूँ
मैं आता हूँ
टूटा, बिखरा
गर्द की तरह उडता
मेरे पैरों में पहाडों की बेडयाँ हैं
हाथों में रेत का ज्वार
मेरे सीने में महाभँवर
मेरी साँस में झलकता है खण्डहर
मेरी आवाज में टूटने-गिरने-बिखरने का नाद
उत्सवों पर पतझड की छाया
मैं हँसता हूँ,
रोती है नदी एक
मेरा रंग रात का रंग
कैसे मिलूँगा रोशनी से
कैसे बढाऊँगा उसकी ओर अपना हाथ
क्या वह टाँक लेगी मुझे अपने माथे पर एक किनारे
बरसों जले दिये को जला लेगी अपने आँगन में
मेरा रंग स्याह, क्या लिखेगी मुझसे अपने दुख
मेरा रंग धुएँ का
क्या वह आसमान की तरह हो जायेगी
मैं जैसे महावर भरा एक पाँव
कीचड में धँसा
सदियों से मेरे इंतजार में
द्वार पर खडी वह स्त्री
क्या पहचान लेगी मुझे
अनगिनत प्रश्नों से हारता
मैं आता हूँ
टूटा, बिखरा
गर्द की तरह उडता
आवाज ः दादी
अमावट की अधसूखी रात पर
अमरस की एक और परत
जनमता सीझता एक स्वाद आवाज का
भिनसारे
फूल के कटोरे में रखे दूध में
धीरे-धीरे घुलती गुड की डरिया-सा सूरज
चकिया चलाती एक स्त्री
राम और सीता के गीतों में जोडती है एक नयी कडी
उसके गीतों में
जनमते हर बच्चे के साथ जन्म राम का
उस आवाज में
पोथियों के बाहर रहकर भी
जन्दा रहने की शक्ति
एक आवाज
जिससे पैदा होता है आवाजों का शऊर
बात
हर बार
यहीं से मुडती है बात
यहीं से
शुरू होता है
अंधा मोड
यहीं से
बातें बजती हैं सारंगी-सी
हर बार
यहीं पर खत्म होती है बात
कि फिर बात करने के लिए
नहीं रह जाती
हमारे पास
कोई बात
सभव नहीं
एक रंग के साथ
वह बार-बार गुजरती है पास से
आँखों के अनगिन जोडों से
वह देखती है मुझे
पर नहीं दिखायी देती कभी
आदमकद
वह जब आती थी
मिट जाती थी सुबह और शाम की दूरी
ख्ात्म हो जाता था दिन और रात का फकर्
वह, जिसके बोल
हवा में बहते हुए आ जाते थे
जिसके जाने में भी, आ जाने की महक थी
जिसकी चिट्ठियाँ आसमान की तरह छा जाती थीं
जिसकी दूरी की कोशिश
और नजदीकी की अकुलाहट
किसी दुख भरे गीत-सी बजती थी कानों में
जो नहीं थी
पर समायी थी हर जगह
जो हर वीराने में बसी थी
हर खाली जगह पर जो रहती थी मेरे संग
आवाजों के कभी अंतरालों में
गूँजती थी जिसकी शाइस्ता आवाज
है इसी धरती पर
पर जिससे मिलना अब
संभव नहीं
संभव नहीं आवाज सुनना तक
ठंड की एक शाम
जैसे बरसता है पानी
शाम बरसती थी ठंड
सूरज पीले छाते-सा
एक ओर झुका
रोक रहा था
तुम पर आती बौछारें
पीले कनेर-सी हुई जा रही थीं तुम
या ढाल रहा था वह एक सुनार
तुम्हें सोने की मूरत में
मैं एक किसान, तुम सामने थीं
खेत में पक रहे धान-सी
बालियों में पक रहा था रक्त-रस
धीरे-धीरे, कुछ और झुका सूरज
बदल गया
आँच की पलाशी टोकरी में
झरती आँच
बढायी मैंने अपनी अँजुरी
मैंने देखा
तुम सिंदूर भर रही थीं
बस कुछ पल
अब वहाँ न छाता था न टोकरी
आँचल में सूरज ने
आख्ार छुपा लिया अपना चेहरा
शायद देखा था जनाब ने
मुझे एक छाते में बदलते।
एक पाँव पर
वह लँगडी खेलना चाहती थी
वह जब भी चली
किसी न किसी ने रोका उसे
कभी पिता ने कहा-जाओ किताबों में
कभी माँ ने इशारा किया-रसोई की ओर
कभी भाई आ गया सामने
वह घूमती रही जीवन पर
आदेशों के पीछे-पीछे
एक पाँव पर
पर लंगडी नहीं खेल पायी वह
उसे तो अब याद भी नहीं होगा
वह लँगडी खेलना चाहती थी।
माँ का जन्मदिन
कोई नहीं डालता
माँ के लिए क्वॉडर
गाते हुए जन्म के गीत,
लगाकर टीका
बैठ कर चौक पर
कोई नहीं बरसाता सर से गुलगुले
नहीं काटा जाता केक भी
मुझे नहीं मालूम
अपनी माँ का जन्मदिन
पता नहीं कितनों के जन्मदिन
जानता हूँ
त्योहार-सा मना आता हूँ
घर के बाहर
पढता हूँ पाठ्यक्रम में
कितनों ही के जन्मदिन
जिनके काफी बाद पैदा हुई है माँ
मुझे नहीं मालूम
अपनी माँ का जन्मदिन
जैसे
धरती-माँ का
बस पाँच रुपये
पाँच रुपयों में नहीं आता एक किलो गेहूँ
नहीं आती आधा किलो शक्कर
तीसरी कक्षा की हिन्दी की किताब
सौ ग्राम बहुराश्ट्रीय चिप्स
सौ ग्राम सेंवई विदेशी भी नहीं आती
नहीं आता एक किलो अन्तर्राश्ट्रीय नमक
बस पाँच रुपये मिलते हैं उसे
नये विश्व-ग्राम के सदियों पुराने गाँव में
चोरी-छिपे
एक बोतल शराब बेचने के
छीजती जाती है सोलह की उमर की उठान
बीतते जाते हैं खेल
सपन-सुहाने, हेल मेल
करोडों के खेल से बाहर
ठेकेदार और पुलिस के भाईचारे के बीच
रामलीला के भोले भरत के हाथों में
बस पाँच रुपये
जैसे कीडा गुबरैल
जीवन भर का भइपा
सैकडों-सालों की पट्टेदारी
गाँव की मरजाद
वंचना में पले किसान पिता का मौन
आशंकाओं के बादल
सबके सामने-बस पाँच रुपये
बस इन्हीं पाँच रुपयों के विश्लेशण से
शुरू होता है अपराध का समाजशास्त्र
इन्हीं में ’लोक‘ की पराजय
और ’तंत्र‘ की मौत।
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