www.khabarexpress.com : The news portal of North India
www.khabarexpress.com
Download Trial of Jewellery Accounting Software
Welcome Guest Sign In  New user! Sign Up Now | My Favourites (new)
Search Photo  
RSS Feed
14 October 2008
Forum | Wallpapers | Photo Gallery | Business | Entertainment | Education | Sports | Article | City | Dhan Teras | Deepawali |
Free News on your website
  सम्पादकीय
  बांसवाडा समाचार
  बीकानेर समाचार
  डूंगरपुर समाचार
  हनुमानगढ समाचार
  अर्न्तराष्ट्रीय समाचार
  जयपुर समाचार
  जोधपुर समाचार
  मेड़ता समाचार
  मुम्बई समाचार
  राष्ट्रीय समाचार
  प्रादेशिक समाचार
  श्रीगंगानगर समाचार
  सूरतगढ समाचार
  फोटो दीर्घा
  संग्रहण

  पुस्तक समीक्षा
  वर्तमान मुद्दे
  आर्थिक
  सम्पादकीय
  शिक्षा
  परीक्षा परिणाम
  प्रदर्शनी
  खाना खजाना
  हिन्दुओ के व्रत व त्यौहार
  इतिहास
  त्चरित टिप्पणी
  प्रेरक प्रसंग
  बातचीत
  पत्रकारिता
  भाषा
  इस देश का तो भगवान ही मालिक है
  व्यक्तित्व
  दर्शन
  राजनीति
  हिन्दू देवी देवताओं की आरतीयाँ
  धार्मिक
  स्मरणांजलि
  लघु कथाऐं
  खेलकूद
  पर्यटन
  आने वाली फिल्म

  वर्तमान साहित्य

  मतदान
  कार्टून
  फोरम
  ई पत्र
  एस म एस
  वॉलपेपर
  स्क्रीनसेवर

  वर्घीकृत विज्ञापन
  Advertising With Us
  Online Advertising
  व्यापार निर्देशिका
  Rajasthan Webs
  Softwares
  Hosting Package
  Web Design
Vartmaan Sahitya :: May, 2007
Sponsered by : Decor Home, Bikaner

प्रेम का उद्भवस्थल : मथुरा
टीकेन्द्र ’शाद‘

Add comment   Mail this Story   Write to Editor
More Articles

मथुरा तीन लोक से न्यारी है यह कहावत आज भी चरितार्थ होती है। यमुना किनारे बसी इस धार्मिक नगरी की घनी आबादी में सुबह मन्दिरं के घंटों और मस्जिदों में अजान से आरम्भ होती है ...यमुना में नहाने के लिए और मंदिरों में दर्शन करने के लिए पुरुश, महिलाएँ भागते नजर आते हैं....और शाम विश्रामघाट पर यमुना मैया की भव्य आरती से....।
धार्मिक ग्रन्थों में यह नगरी मधुबन (मधुपुरी) के नाम से जानी गयी है। वैदिक युग में इसे मधुरा कहा गया है। यहाँ नन्द, मौर्य, शुंग, कुशाण वंशों का शासन रहा। वैश्णवों की उपासना स्थली रही मथुरा में बौद्ध, शैव व जैनियों ने भी यहाँ अपने पूजा स्थलों का निर्माण कराया, हजारों मूर्तियाँ लाल चित्तीदार बलुए पत्थरों में तराशी हुई एफ० एस० ग्राउस द्वारा स्थापित (१८७४) संग्रहालय में आज भी सुरक्षित हैं, जो इसका प्रमाण हैं कि यहाँ कला-संस्कृति के विकास में समन्वय व गतिशीलता नही है। प्राचीन यक्ष शैली का अन्य देवी-देवताओं में समन्वय, प्रतीकों मानवाकृतियों में कला का रूपान्तरण, नूतन कला विधाओं के विकास के साथ-साथ विदेशी तत्वों का सामंजस्य...यहाँ की कला विशशताओं में है....यही है ब्रज अर्थात् सदैव गतिशील।
प्राचीन काल से आज तक यह नगरी लोगों के आकर्शण का केन्द्र अकारण ही नहीं रही। यमुना की धारा की तरह विभिन्न मत मतान्तरों में समन्वय की धारा यहाँ बहती रही है। ब्रज को ईश्वर का बास-स्थल माना गया है। पुराणों के समन्वयात्मक लोकधर्म का प्रचार सभी धर्म सभी धर्म समुदायों में बदलते समय के अनुरूप परिवर्तन होते रहने से यहाँ एक लोकधर्मीय गतिशीलता सदैव बनी रही है। मथुरा के विख्यात बौद्ध धर्माचार्य उपगुप्त ने सम्राट अशोक को धर्म प्रचार /स्तूप निर्माण आदि की प्रेरणा सम्भवतः इसी प्रभाव में दी हो, स्वयं बुद्ध यहाँ दो बार आये।(वि० स० ४९० )
ग्यारहवीं सदी में यहाँ महमूद गजनवी, फिर गुलाम, खिलजी और सैयद लोदी का यहाँ आधिपत्य रहा। सिकन्दर लोदी ने यहाँ अपार क्षति पहुँचाई, यहाँ के भव्य मंदिर केशवदेव को तोडा, जिसे जहाँगीर के शासनकाल में ओरछा के राजा द्वारा ३३ लाख रूपये में पुनर्निमित कराया गया और चहारदीवारी दाराशिकोह द्वारा बनवाई गयी। शहर के तमाम हिस्सों की नये सिरे से तामीर अब्दुल नबी (१६६१ ई०) मुसलमान सूबेदार द्वारा की गयी। यह शहर अपनी भव्यता, धार्मिक सहिश्णुता व वैभवशाली संस्कृति के कारण चर्चित रहा, यही कारण यहाँ विदेशी यात्री आकर्शित हुए। चीनी यात्री ह्वेंगसांग ने यहाँ के निवासियों की सरल और विनम्र प्रकृति की प्रशंसा की। अन्य यात्री बर्नियर, ननूची, व टैवर्नियर आये।
प्रेम सद्भाव की सांस्कृतिक परम्पराओं के इस आदि स्थल में कृश्ण भक्ति परम्परा ने भारतीय समाज को बहुत गहराई तक प्रभावित किया है। राधा और कृश्ण के प्रेम को तत्कालीन समाज में स्वीकृति मिलना भी एक अद्भुत घटना है। इसी लिए इसे प्रेम का उद्भवस्थल माना जाता है। यही कारण है कि राजस्थान से मीरा, गुजरात से शंकराचार्य, बंगाल से चैतन्य महाप्रभु, आंध्र के आचार्य वल्लभ...और पंजाब के नानक भी यहाँ आये। सूर के अलावा रसखान भी इसी परम्परा के कवि रहे जिन्होंने यहाँ यमुना (कालिन्दी) के तटों, कदम्ब के वृक्षों, करील के कुंजों, ग्वालों और गायों पर अपना सर्वस्व न्योछावर करने की रचनाएं लिख डालीं।
यमुना नदी के पश्चिमी तट पर बसे इस जनपद का भौगोलिक क्षेत्रफल ३३२९.४ वर्ग किलोमीटर है। यमुना यहाँ उत्तर से दक्षिण की ओर बहती हैं दो सहायक नदियाँ ’करवन‘ व ’पथवाहा‘ और हैं। जनपद में तीन तहसील मांट, छाता और मथुरा हैं और १० विकासखण्ड हैं। यह जनपद १८०३ में अंग्रेजों के आधिपत्य में आया और १८६२ में इसे जिला बनाया गया।
पुश्टिमार्गीय सम्प्रदाय के अश्टछाप कवियों का भी इसमें प्रमुख योगदान रहा है, जिन्होंने कृश्णभक्ति परम्परा आरम्भ कर इसे लोकजीवन से जोडते हुए सामाजिक समरसता का सन्देश दिया। इनके त्यागमय जीवन से बादशाह तक प्रभावित हुए। ये कवि थे- महाकवि सूरदास, परमानन्ददास जी, कुम्भंनदास जी, कृश्णदास जी, गोविन्ददास जी, छीत स्वामी जी, और चतुर्भुजदास जी। इनमें नन्ददास जी से गोस्वामी तुलसीदास भी मथुरा मिलने आये।
यहाँ के प्रमुख मन्दिरों के निर्माण काल को देखें तो प्रसिद्ध मन्दिर गोविन्ददेव संवत १६४७ में, केशवदेव मन्दिर १६६९।क् में, द्वारिकाधीश मन्दिर १८१५ में रंगजी मन्दिर १८४५ से १८५१ के मध्य ४५ लाख रूपये में, और शाहजी का मन्दिर १९२५ के पूर्व में निर्मित हुए हैं। अन्य मन्दिरों का निर्माणकाल भी इन्हीं के आस-पास रहा है।
यहाँ प्रतिवर्श लाखों श्रद्धालुओं का आगमन इसी कारण होता है कि कृश्णभक्तिकाल में धार्मिक संस्थाओं/ धार्मिक कृत्यों/भजनों/ आराधनाओं में लोकहित का पक्ष प्रबल रहा है जो मानव समाज की एकता का तत्व है। शास्त्रीय संगीत में भी ब्रज के लोक-तत्व प्रचुरता से मिलते हें इसीलिए ब्रज का लोक-संगीत ’रसिया‘ आज भी लोकप्रिय है। आज बदलते परिवेश में यहाँ लोकहित की संस्कृति पर व्यवसायिकता का रंग चढने लगा है जिसे बचाने का दायित्व साहित्य/कला/संस्कृति से जुडे हर नागरिक का है।
१८५७ के गदर में भी यह जिला संवेदनशील रहा और अंग्रेजों के खिलाफ संघर्श में पीछे नहीं रहा। आजादी के आन्दोलनों में भारत के राश्ट्रीय नेताओं का यहाँ निरन्तर आगमन होता रहा। १९२१ के असहयोग आन्दोलन ने यहाँ काफी जोर पकडा। ९ अगस्त १९२१ में लाला लाजपतराय और लाला गोवर्द्धनदास लाहौर वालों का मिर्जापुर वाली धर्मशाला वृन्दावन में आगमन हुआ और गाँधीपार्क मथुरा में उनका स्वदेशी पर भाशण हुआ। इसी दौरान यहाँ तमोलियों ने राश्ट्रीय रंग से ओतप्रोत ऐतिहासिक राम बरात निकाली जिससे कुपित हो जिला प्रशासन ने ४५ देशभक्तों को जेल भेजा। ७ अक्तूबर १९२१ को मौलाना आजाद, मोतीलाल नेहरू ने गाँधीपार्क में भाशण देकर लोगों को इतना आन्दोलित किया कि सभी वर्गों के लगभग १०० लोग जेल भेजे गये। साइमन कमीशन का यहाँ जोरदार विरोध हुआ, १९२९ में महात्मागाँधी खादी के प्रचार में यहाँ आये। ३२ वर्शों तक स्वतंत्रता आन्दोलन को गति देने और प्रेम का संदेश प्रसारित करने में देश-विदेश की यात्रा करने वाले मरसान स्टेट के कुँ० महेन्द्रप्रताप को कौन नहीं जानता। इनके द्वारा स्थापित प्रेम महाविद्यालय (पॉलीटेक्निक) उन दिनों क्रान्तिकारी गतिविधियों का केन्द्र रहा।
इसके अतिरिक्त स्वामीघाट स्थित जोबीबाबा की हवेली भी एक ऐतिहासिक महत्व का भवन है जहाँ स्वामी दयानन्द सरस्वती ने आश्रय पाया। वहीं स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान श्रीमती सुचेताकृपलानी तथा आचार्य कृपलानी ने महीनों अज्ञातवास किया। ज्योतिशीबाबा राधेश्याम द्विवेदी समाजवादी विचारधारा के कांग्रेसी थे। जयप्रकाश नारायण और लोहिया जी जैसे समाजवादी नेता जोशी बाबा की हवेली में स्थायी रूप से आतिथ्य ग्रहण करते थे। कालान्तर में गत सदी के छठें दशक में ज्योतिशी बाबा राधेश्याम द्विवेदी ने, जो हवेली के स्वामी भी थे, वहाँ विशाल पुस्तकालय और ’भारतीय अनुसंधान भवन‘ की स्थापना की। जोशी बाबा की हवेली लम्बे समय तक देश की राजनीतिक, सामाजिक और साहित्यिक गतिविधियों का केन्द्र रही।
स्वाधीनता सेनानियों में सर्वश्री केदारनाथ भार्गव, गोपालदास सेठ, आ० जुगलकिशोर, गोपालदास चतुर्वेदी, गौरीदत्त चतुर्वेदी, गोदावरी देवी, प्रतापसिंह पेन्टर, डॉ. दामोदर सिंह यादव, गोकुलचन्द (सौरव), दिगम्बर सिंह, डॉ. कमलेश्वर सिंह, चिन्तामणि शुक्ला, अब्दुल गनी, अब्दुल लतीफ, कृश्णचन्द्र प्रोफेसर (वृन्दावन), विजयपाल सिंह (नरी), गोवा मुक्ति संग्राम सेनानी सरदार आशा सिंह, का० ब्रजनन्दन शर्मा, दाऊदयाल चतुर्वेदी, बद्री महन्त प्रमुख हैं। यहाँ यह भी महत्वपूर्ण है कि एटा से मथुरा बसे श्री शिवचरनलाल शर्मा एकमात्र ऐसे कांग्रेसी थे जो ख्याति प्राप्त क्रान्तिकारी संस्था एच.एस. आर. ए. के सक्रिय सदस्य थे जिन्होंने काकोरी शड्यन्त्र केस में लम्बी सजा काटी। इनके पुत्र सरलकुमार शर्मा वर्तमान में जलेस के जनपदीय अध्यक्ष हैं। राजस्थान के क्रान्तिवीर विजय सिंह पथिक का परिवार भी यहाँ रह रहा है।
मथुरा में यदि वामपंथी आन्दोलन की बात करें तो यहाँ भा० क० पा० की स्थापना का० एस.एस. मजूमदार के प्रयासों से हुई जो एम.ई.एस. में कार्यरत थे। इस दौर में जनपद के झुडावई, मलिकपुर, माहई, विडावली, डहरुआ, हयातपुर, गढी गोरखपुर, ग्रामों म लाल झण्डे का व्यापक असर रहा। उस समय के प्रमुख का० सव्यसाची, सुन्दरलाल पचौरी, जगन प्रसाद, का० शंकरलाल पाठक, का० मथुरिया, डॉ. दामोदर सिंह यादव, का० कैलाशनाथ, डॉ. हरीशंकर, मा० दिलीप, शान्ति गौतम प्रमुख थे। का० दामोदर सिंह यादव १९६२ में माक्र्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी से एम० एल० ए० का चुनाव लडे और हारे लेकिन उनके द्वारा निकाला गया लाला जुलूस आज भी चर्चाओं में रहता है। जमींदार परिवार से ताल्लुक रखने वाले डॉ. हरीशंकर छात्र जीवन से ही छात्र राजनीति में सक्रिय रहे, लखनऊ/ आयरलैण्ड से डॉक्टरी की डिग्री लेकर अपने ही खर्चे पर इंग्लैण्ड, पेरिस (फ्रांस), सोवियत संघ आदि देशों की यात्रा कर लौटे और क्रांतिकारी आन्दोलन से जुड गये। असंगठित क्षेत्र के डोरी निवाड मजदूरों की डॉ. हरीशंकर और का० दिलीप के नेतृत्व में लम्बी हडताल चली, जिससे मथुरा जनपद में प्रथम बार मजदूरों को बोनस मिला। इसमें इनको ४० दिन की जेल हुई। रेलवे हडताल में यह दोनों भूमिगत रहकर कार्य करते रहे। डॉ. हरीशंकर आज भी ७५ वर्श की उम्र में पार्टी नेतृत्व सम्हाले हुए हैं। मथुरा में बिजली कर्मचारियों को संगठित कर आन्दोलित करने में का० धर्मेन्द्र का सक्रिय योगदान रहा है।ं उनकी स्मृति में बिजलीघर पर एक हॉल निर्मित किया गया है। सत्यसाची शिक्षक, मजदूर नेता थे साथ ही जनवादी लेखक के रूप में ज्यादा जाने जाते थे। ज.ले.स. के संस्थापक सदस्यों में होते हुए उन्होंने मथुरा में जनवादी लेखक संघ की स्थापना की जो आज सक्रिय रहते हुए प्रदेश का प्रान्तीय सम्मेलन आयोजित करा चुका है जिसमें प्रसिद्ध साहित्यकार असगर वजाहत, चंचल चौहान, काजी अब्दुल सत्तार, डॉ. के.० पी० सिंह, डॉ. नमिता सिंह, डॉ. प्रदीप सक्सेना, मदन दीक्षित जैसी हस्तियों ने भाग लिया।
देहली से मथुरा राश्ट्रीय राजमार्ग से जब पहले बाईपास मार्ग से आगे बढते हैं तो इस शहर का मिजाज समझ में आता है। दूर से कृश्णजन्मभूमि के मन्दिर की ऊँची पताका और यहाँ के ईदगाह मस्जिद के विशाल गोल गुम्बद बिल्कुल पास-पास नजर आते हैं। भले ही यह हिन्दुत्ववादियों के एजेन्डे में विवादग्रस्त जगह हो, लेकिन जब आप देखेंगे तो पायेंगे कि दो संस्कृतियाँ सदियों से साथ-साथ खडी हैं। शहर के अन्दर पुराने बस स्टेशन से आते समय मुख्य गेट (चौराहा भी) पडता है जिसे होली गेट (तिलक द्वार) कहते हैं। १८७५ में नगरपालिका ने भरतपुर के राजा के प्रस्ताव पर इस नक्काशीदार गेट को बनवाया था। नुक्कड मीटिंग हो या पुतला दहन यह चौराहा यहाँ की राजनैतिक सामाजिक गतिविधियों का केन्द्र बिन्दु है। होलीगेट के भीतर से चौक बाजार तक का क्षेत्र इस शहर की जान है, इसी मध्य यमुना किनारे विश्वप्रसिद्ध द्वारिकाधीश मन्दिर है जो इस शहर की धडकन है। इस पूरे बाजार में सुबह देशी घी की कचौडी, जलेबियों के नाश्ते के लिए हर दुकान पर उमडती भीड देखी जा सकती है। प्रसिद्ध साहित्यकार कमलेश्वर जब भी मथुरा आये यहाँ की कचौडयाँ खाये बिना नहीं गये। चौक बाजार में भी एक शाही मस्जिद है और उसी के इर्द-गिर्द सर्राफा बाजार है, जो बम्बई के बाद द्वितीय नम्बर का माना जाता है। यहाँ यमुना के किनारे घाटों को अब अतिक्रमण मुक्त कर आकर्शक बनाया जा रहा है। प्रमुख घाट हैं, स्वामी घाट, असकुण्डा घाट, सन्तघाट, विश्रामघाट (जहाँ कंस को मारकर कृश्ण जी ने विश्राम किया) प्रयाग घाट, श्यामघाट, रामघाट, बंगालीघाट, और ध्रुव घाट जहाँ अन्तिम यात्रा का पडाव होता है।
मथुरा से १० किलोमीटर दूरी पर वृन्दावन है जहाँ घर-घर मन्दिर हैं। यहाँ रामानुज के अनुयायियों का बडा और भव्य रंगजी का मन्दिर है जिसे चन्दन की लकडी पर सोना चढाकर खडा किया हुआ है। यह मन्दिर लगभग १८५० में बना। वृन्दावन का विश्व प्रसिद्ध बिहारी का मन्दिर सर्वाधिक आस्था का केन्द्र है। यहाँ लाल पत्थरों का ऐतिहासिक गोविन्द देव जी का मन्दिर भी है जिसकी अनेकों मंजलें मुगल काल में क्षतिग्रस्त कर उतरवा दी गयी थी। अंग्रेजों के मन्दिर के रूप में इस्कान संस्था का आधुनिक भव्य मन्दिर भी देखने लायक है। वृन्दावन यमुना किनारे लगभग २२ घाट हैं जो अतिक्रमित हो विलुप्तप्राय हैं। एक घाट बचा है केसी घाट जिसे भरतपुर की रानी ने १८वीं शताब्दी में बनवाया था। हम तमाम विकास और उन्नति के बाद भी बंगाली विधवाओं (बाल विधवा भी ) के इस विश्वास को नहीं तोड पाये कि यहाँ मरने पर मोक्ष मिलता है यहाँ हर उम्र की विधवाएँ मिलेंगी जो आर्थिक तंगी का शिकार भी हैं और भजनाश्रयों में कीर्तन करती हैं। इनके आर्थिक, दैहिक शोशण की खबरें भी छपती रहती हैं।
वृन्दावन संगीत के जनक स्वामी हरिदास की आराधना स्थली भी है। हर वर्श बडे स्तर पर उनकी स्मृति में शास्त्रीय संगीत और नृत्य कार्यक्रम आयोजित हो ता है किन्तु आश्चर्य है कि संगीत का कोई प्रांन्तीयस्तर का भी विद्यालय जनपद में नहीं है। रासलीला, रामलीला पार्टियों की संख्या १००-२०० होगी जिसमें बाल कलाकार भी होते हैं। ये कलाकार पूरे भारत में रामलीला-रासलीला (कृश्ण्लीला) हेतु जाते हैं लेकिन अपने पारम्परिक ढंग से की गयी लीलाओं को बदलते परिवेश में नया रूप देने को तत्पर कोई नाट्य संस्था यहाँ नहीं है जिससे इससे जुडे कलाकार भविश्य में जीविका हेतु टी०वी० या फिल्म आदि में भी जगह पा सकें। हलो-हाय के युग में वृन्दावन में राधे-राधे ही बोला जाता है। रिक्शा हो या ताँगा, आगे बढने के लिए राधे-राधे ही प्रयोग होता है। यहाँ की प्रमुख हस्तियाँ जो यहाँ की सांस्कृतिक/साहित्यिक/ सामाजिक पहचान बनाये रखने में अपना योगदान दे रही हैं उनमें प्रमुख हैं श्री गोविन्द शर्मा, ब्रजभूशण चतुर्वेदी, डॉ. साधना कुलश्रेश्ठ, सपना शर्मा, जो कबीर शब्दकोश पर शोधरत हैं और वर्तमान में बेल्जियम में हैं, डॉ. सुखमणि सैनी जो लोक कथाओं की विशेशज्ञ हैं, डॉ. सबीला उस्मानी जो संस्कृत साहित्य के साथ-साथ कवित्री भी हैं गौरी अग्रवाल प्रतिभावान कवियत्री हैं। दोनों जलेस की सक्रिय पदाधिकारी हैं। यहाँ श्रृंगार सामगी्र, जरदोजी (मुकुट श्रृंगार पर कढाई) कार्य में हिन्दू-मुस्लिम समान रूप से सहभागी हैं।
मथुरा से हरियाणा राजस्थान बार्डर की ओर लगभग १५ किलोमीटर दूर गोवर्धन है जहाँ पर्वत के रूप में गोवर्धन महाराज को पूजा जाता है। प्राकृतिक रूप में पर्वत की पूजा स्वयं कृश्ण के द्वारा की गयी थी उसी विश्वास से यहाँ सर्वाधिक पर्यटक परिक्रमा देने आते हैं। यहाँ से २ किलोमीटर दूर पारासौली है जो सूरदास, कुम्भनदास आदि अश्टछाप कवियों की भजन स्थली मानी जाी है। ३ किलोमीटर दूर राधाकुंड है जिसका निर्माण भरतपुर के जाट राजाओं ने कराया। गोवर्धन से २० किलोमीटर नन्दगाँव कृश्ण की लीलास्थली मानी जाती है। निकट ही राधाजी का गाँव बरसाना है। यहाँ की लठामार होली प्रसिद्ध है। यहाँ सुन्दर कलात्मक पत्थरों से निर्मित लाडली जी (राधाजी) वृशभान जी और अश्टसखी का मन्दिर है। बरसाना क्षेत्र में मेवों की भी अच्छी खासी आबादी है। यहाँ सुप्रसिद्ध शायर मीर तकी मीर भी कुछ समय रहे थे।
मथुरा से यमुना पार करके १० किलोमीटर की दूरी पर गोकुल (महावन) है जहाँ कृश्ण का बाल्यकाल बीता था। यहाँ का मन्दिर व घाट दर्शनीय हैं। यहाँ महाकवि रसखान की समाधि भी है। अंग्रेजों के खिलाफ बगावत करने पर यहाँ के गोकुला जाट का सिर काटकर आगरा कोतवाली (तत्कालीन) पर लटकाया गया था। यहाँ से आगे १० किलोमीटर दूरी पर बल्देव (दाऊजी) का विशाल मन्दिर है। यह कृश्ण के बडे भाई बलदाऊजी का स्थान माना जाता हैं। इसकी देख-रेख अहिवासी ब्राह्मणों (पांडे) के हाथ में है जिनके पूर्वजों का नमक के व्यापार पर एकाधिकार हुआ करता था।
अन्य छोटे-छोटे महत्व के स्थल जैसे मधुबन (महौली गाँव) कुमुदवन (ऊँचागाँव), सतोहा, बाटी (बहुलावन), वच्छवन, कोकिला वन, लोहवन। ऐसी मान्यता है कि चातुर्यमास में पृथ्वी के सभी तीर्थ ब्रज क्षेत्र में वास करते हैं इसलिये चातुर्यमास में ब्रज की परिक्रमा लाखों श्रद्धालुओं द्वारा लगाई जाती है जिसमें सभी उक्त धार्मिक स्थल आते हैं। परिक्रमा ८४ कोस (२५२ किलोमीटर) की है जो भवचक्र का प्रतीक है अर्थात् गौडीय चौरासी लाख योनियों के आवागमन का प्रतीक परिक्रमा में बल्लभ कुल, निम्बार्क व सम्प्रदाय के अनुयायी ज्यादा हते हैं।
साहित्य,लोक संस्कृति, और रंगकर्म की समृद्ध विरासत से ही यह जनपद यहाँ समन्वयवादी संस्कृति बनाये रखने में सफल रहा है। विभाजन से पूर्व यहाँ मोहर्रम पर अन्य ताजियों के साथ सेठ लक्ष्मीदास का ताजिया निकाला जाता था। यह क्रम उनके पुत्रों द्वारा भी जारी रखा गया। इसी अवसर पर हिन्दुओं द्वारा ब्रज भाशा में मर्सिये, नौहा, सोज आदि पढे जाते रहे हैं।
यहाँ के जानकार बताते हैं कि ढोला की उत्पत्ति लोहवन ग्राम के मदारी बाबा द्वारा की गई। उनके शिश्यों की ९वीं पीढी के ढोला गायक पं० हरफूल शर्मा भी दिवंगत हो चुके हैं। स्वांग परम्परा के गायक भगवती प्रसाद वर्मा भी लोकप्रिय रहे हैं जिनका लिखा ’नजर खान का भात‘ (स्वांग) बहुत चर्चित है। एटा से आकर यहाँ बसे जनाब नाजिर अली (९० वर्श) बुन्देलखण्ड शैली में आल्हा गायकी के उस्ताद माने जाते हैं। पुराने कवि ग्वाल, उरदाम कवि, लोहवन के लोक गायक रामदयाल, ’ध्याल‘ और आयुर्वेदाचार्य प्यारेलाल गुप्ता ’वैद्य‘ के नाम लोग अभी भूले नहीं हैं।
जनपद में शायरों, कवियों की भी एक लम्बी फेहरिस्त है। शायरी में चौधरी शाहमीर मलीह, डॉ. शहाबुद्दीन साकब, मौ० शिफा कमर मथुरावी, महेन्द्र ’हुमा‘, मुश्ताक अंजुम, सईद अहमद सईद, और बज्मे-शैदाए-अदब संस्था के संस्थापक जनाब सईद आजमी प्रमुख हैं जो हर माह के अन्तिम शनिवार को मुशायरे का आयेाजन विगत एक दशक से करते आ रहे हैं। कवियों में डॉ. सुरेश पाण्डे, राम रतन एडवोकेट, फूल सिंह बेताब, डॉ. कन्हैयालाल पाण्डे, डॉ. सरोज अग्रवाल, अशोक ’अज्ञ‘ डॉ. अनिल गहलौत, डॉ. अशोक बंसल, डॉ. धर्मराज, निशेश जार, प्रमुख हैं।
प्रान्तीय , राश्ट्रीय सतर पर कुछ जाने पहचाने चेहरे भी मथुरा के हैं। व्यंगकार डॉ. बरसानेलाल चतुर्वेदी, साहित्यकार सुधीश पचौरी, जगदीश्वर चतुर्वेदी, व्यंगकार अशोक चक्रधर, फिल्मों से जुडी डॉ. अचला नागर, वीरेन्द्र सक्सैना, नाट्य मर्मज्ञ डॉ. ब्रजवल्लभ मिश्रा, पद्मश्री श्रीकन्हाई (चित्रकार), शिक्षा में राश्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त डॉ. नुजहत आरा जुबैरी, और विशेश टिकट संग्राहक आर. सी० भाटिया तथा फिल्म निर्माता अनिल शर्मा प्रमुख हैं।
नाट्य क्षेत्र में ’स्वास्तिक‘ संस्था यहाँ लम्बे समय से सक्रिय है। इसे पूर्व में डॉ. अचला नागर , मोहन स्वरूप भाटिया का वरदहस्त प्राप्त था। वर्तमान में डॉ. नागर के पुत्र संन्दीपन नागर इसके निदेशक हैं जो प्रान्तीय/राश्ट्रीय स्तर पर सक्रिय रंगकर्मी हैं। दर्जनों नाटक इनके द्वारा मंचित हुए हैं प्रमुख हैं। ’इप्टा‘ नाट्य संस्था भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराये हुए है जिसके निदेशक देवेन्द्र पाल हैं। संकेत संस्था संकेत रंग टोली विगत वर्शों से इस क्षेत्र में तेजी से सक्रिय हुई है जिन्होंने कफन, दस दिन का अनशन, मोक्ष आदि नाटक मंचित किये हैं। इनके निदेशक एम. गनी व इनके दो भाई हैं, लेकिन जनपद को इनसे एक यादगार प्रस्तुति का इंतजार है।
पत्र-पत्रिकाओं में का० सव्यसायी द्वारा सम्पादित उत्तरार्द्ध पत्रिका श्रीमती विजय लक्ष्मी निकाल रही हैं, लेकिन इस पत्रिका की वो पहचान नहीं रही जिसके लिए ये जानी जाती थी। ’सम्यक‘ पत्रिका मदन मोहन उपेन्द्र तथा दिनेश पाठक शशि द्वारा सफलता पूर्वक निकाली जा रही है। ’अखण्ड ज्योति‘ पत्रिका (धार्मिक) युग निर्माण योजना, मथुरा से हजारों की संख्या में छापी जा रही है। पुस्तकों में भारत-पाक दोस्ती को समर्पित ’मैं भी सोचूँ तू भी सोच‘ डॉ. सईद अहमद सईद की, ’स्वर्ग से जम्बूदीप तक‘, डॉ. वेद वर्मा की और ’मृत्युदण्ड‘ पर बहस को केन्दि्रत करती मधुवन दत्त चतुर्वेदी की ’आमि निर्दोश‘ काफी चर्चित रही हैं।
शहर में साहित्य/राजनीति पर ताजा तरीन विमर्श, माक्र्सवादी चिन्तन एवं विमर्श का एक केन्द्र बंगाली घाट स्थित ’यमुना होटल‘ भी रहा है। यहाँ ट्रेड यूनियन नेता का० हरीश तिवारी, का० चतुरानन मिश्र, का० भीखालाल, सरजू पाण्डे जैसे नेता मीटिंग कर गये हैं। यह स्थान शिवदत्त चतुर्वेदी का है। यहाँ आज भी हर दिन ८-१० बुद्धिजीवियों की शाम को बैठकें होती हैं। आज भी चाय और भांग इच्छानुसार और फिर विमर्श। आजकल शिवदत्त जी अखिल भारतीय साम्प्रदायिकता विरोधी समिति, अखिल भारतीय रचनात्मक समाज जैसे संगठनों के जरिए गाँधीवादी नजरिये से समाज सेवा कर रहे हैं।
मथुरा का जिक्र हो और चतुर्वेदियों का जिक्र न हो तो सब कुछ अधूरा रह जायेगा। घाटों, धर्मशालाओं, गलियों के चबूतरों पर शतरंज के फड लगाकर बैठे, खैनी रगडते, लंगोट-अंगोछा बाँधे १०-१५ के समूह नजर आयेंगे। उधर ही सिल पर भांग, ठंडाई पीसते हुए क्षेत्रीय, राश्ट्रीय राजनीति पर ठेठ ब्रजभाशा में चर्चा व विश्लेशण वैसा ही होता है जैसे ’देख तमाशा लकडी का‘ में कभी काशीनाथ सिंह ने बनारस के बारे में लिखा था। भांग छानने के बाद नित्यकर्म से फारिग हो लंगोट बाँधते ही आँखों में गुलाबी नशा तैरता है, चेहरे पर हल्की मुसकराहट और चाल में मस्ती....ऐसे में नमस्ते करने वाला जब उन्हें गुरू से सम्बोधित करता है तो नमस्ते गर्दन की हल्की जुम्बिश से ली जाती है। ये अंदाज यहाँ का पेटेन्ट है। नशे में जब गला चटकता है, तो बाजार से ताजा मिठाई लेते, गलियों में लटके बिजली के तारों से बचते-झूमते घरवारी के हाथ सौ रात की बयारू (भोजन)....है कोई भो....का इतना भाग्यशाली? सभी त्यौहारों के अलावा क&