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Vartmaan Sahitya ::May, 2007
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श्रीप्रकाश शुक्ल की कविताएँ
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एक सुबह की उदासी
यह एक अजीब बात थी कि एक दिन बिलकुल सुबह
जब चाय बनाने को चला
तो चाय की पत्ती नदारद थी

यह एक सूखे की शाम थी
और बाजार में बडी गहरी उमस थी

चाय की पत्ती कहाँ से आये
यह सवाल मेरे सामने एक कठिन सवाल था
और यह जानते हुए भी कि अपनी मकान मालकिन
किरन जी से चाय
माँगी जा सकती है।

मैं माँग नहीं सकता

मैं सोच ही रहा था कि इस मुश्किल समस्या का
उत्तर क्या है
पत्नी से कहा था कि चाय की पत्ती ख्ातम है
सोच रहा हूँ नीचे से माँग लूँ
यदि उनके यहाँ भी नहीं हो
तो पडोस के कैलाश जी से माँग लूँ

यह सुनते ही वह बिफर पडी

तुम कैसे मर्द हो जी
जब देखो जहाँ कुछ माँगते रहते हो
पिछले मकान में थे तो यही काम सुधा जी से करते थे
कभी-कभार पाण्डेय जी, सिंह साहब, यादव जी से भी
माँग लेते थे

तुम्हारी अक्ल कभी ठिकाने ही नहीं रहती
दिन भर तुम लफंगों के यहाँ घूमते रहते हो
उम्र का ख्याल भी नहीं करते
बूढों के यहाँ आया जाया करते हो

यह ख्याल भी नहीं करते कि भोजन का क्या वक्त है
बच्चे कितना इंतजार करते हैं
तुम्हारी अनुपस्थिति में दिन भर कितना डर लगता है
घर के प्रति तुम इतने लापरवाह हो
यदि यह जानती, तो शादी ही नहीं करती
और यदि तनिक भी पता होता कि तुम कुछ
लिखते पढते भी हो
तब तो कदापि ही नहीं।

मैंने,

मैंने बहुत मनाने की कोशिश की
कि चाय, चीनी और हल्दी सदियों से गायब होती रही हैं
पुर्तगाली, डच और अंग्रेज इसी चाय की तलाश में भारत आये थे
इसी तरह अचानक

चाहो तो अपने पिताजी से पूछ लो
नहीं कहो तो अपने ही पिताजी से बात करा दूँ
यह कहकर मैंने जैसे ही पिताजी को फोन लगाया
वे बिफर पडे
कैसे शहर में रहते हो जी
पडोसी से चाय भी नहीं माँग सकते

मुझसे कहो तो मैं अपने यहाँ से अपने पडोसी को भेज दूँ
यहाँ तो रोज ब रोज कुछ न कुछ घटता ही रहता है
और जो घटता है पडोसी के यहाँ मिल ही जाता है।

माँगना यूँ भी विश्वास को जमाये रखना है।

मैं पिताजी को अपनी समस्या बता ही रहा था
यह कहने की कोशिश कर ही रहा था
कि यहाँ किसी के यहाँ अब कुछ भी नहीं मिलता
सब कुछ सब जगह से गायब हो चुका है
कुछ भी माँगना उचक्कों की जमात में शामिल होना है।

कि तभी बिजली गुल थी
और यह देखकर प्रसन्न था
कि भगोने का पानी जल चुका था।
भुतहिया टाँड
पहली बार जब मैंने इस शहर में प्रवेश किया था
तब इसी भुतहिया टाँड ने
मेरा स्वागत किया था।

बस थी कि तेजी से भाग रही थी
मैं परिचित शहर से लगातार एक अपरिचित शहर की ओर भाग रहा था
और कुछ-कुछ अपरिचय की बेचैनी से परेशान
हर चेहरे को निहार रहा था
कि अचानक बस रुकी
और पता चला कि यह भुतहिया टाँड है
गाजीपुर का प्रवेश द्वार।

इस दो घंटे की यात्रा में मुझे पहली बार मिला इतना परिचित*शब्द
कुछ-कुछ डोहरी के मोड जैसा
जहाँ से अक्सर ही गुजरना होता था।

यह अपने गाँव बरवाँ का अनिवार्य प्रवेश द्वार था
जहाँ गोधूलि के साथ ही छा जाता था सन्नाटा
और सरसराती नीम की पत्तियों के बीच
अक्सर ही किसी के उछलने-कूदने की आवाज आती थी।

यह उन दिनों की बात है जब भूत किस्सों में नहीं
जीवन में भी दिखते थे
कोई नदी किनारे
तो कोई आम के घने बगीचों के बीच

कभी-कभी वह उछल कर सडक के बीचों-बीच आ जाता
कभी वह चुपचाप बैठ जाता साइकिल के पीछे
कभी-कभी यह भी होता कि वह एक लावारिस बच्चे की पुकार बन कर चीखता

हमें घर से अक्सर ही हिदायत दी जाती
कि दिन ढलने के पहले ही गुजरना होगा मोड से
और यदि खुदा न ख्वास्ता कभी देर हो ही गयी
यात्रा में हनुमान चालीसा का पाठ न भूलना।

हनुमान चालीसा उन दिनों हर आदमी की जुबान पर होता*था।

आज जब वर्शों बाद इस भुतहिया टाँड से मिलना हुआ
तो लगा कि कुछ भी अपरिचित नहीं है
बरवाँ व गाजीपुर के बीच
हर शहर के पहले होते हैं कुछ टाँड
जिन्हें समझना वहाँ से परिचित होना है।

इस समझ में पहला व्यक्ति जो मिला
वह बुजुर्ग था जिसके कई बच्चे हैजे का शिकार हो गये थे
उसने बताया कि यहाँ आम के घने बगीचे थे
इतने घने कि मियाँ गाजी को भी उनके पार जाने की हिम्मत नहीं हुई
और वह यहीं से चुपचाप लौट गया था।

उसने यह भी बताया कि एक-एक कर कटते गये सभी पेड
और भूतों ने अपनी जगह बदलनी शुरु कर दी।

उसने इशारे से दिखाया एक घर
और कहा कि वह जो खिडकी पर लगा है दरवाजा
उसकी चौखट में अब बसते हैं भूत।

साथ ही उसने यह भी बताया कि जनाब आप भी
जब कभी बसेंगे किसी शहर में
तो अपने साथ रखेंगे इसी तरह के चौखट व दरवाजे
और खुदा न ख्वास्ता बस ही गये इस शहर में
तो लिखेंगे एक कविता
भुतहिया टाँड पर।

उसने अन्तिम रूप से यह अनुरोध भी किया
यूँ तो सियासत में इसे कहने लगे हैं ’प्रकाश नगर‘
लेकिन आप कभी मत कहिएगा ऐसा
यह इस शहर की आख्ारी निशानी है
जिसे मैं आपको सौंप रहा हूँ।

वह इस शहर का अन्तिम भूत था
जो नितप्रति घनी होती जा रही इन बस्तियों में
चीखता-चिल्लाता रहता है।

अक्कड बक्कड
मैं प्रायः ऊबता हूँ और जब ऊबता हूँ
तब बच्चे के साथ खेलता हूँ यही खेल

यह वह खेल है
जिसे मेरी माँ ने मुझसे खेला था
और उसकी माँ ने उससे

किसी ने कभी नहीं जानना चाहा इसका अर्थ
यद्यपि, यह सभी जानते हैं कि यह एक अर्थहीन संज्ञा है
जिसमें जीवन की अर्थपूर्ण क्रियाएँ हैं

खुद मैं कभी नहीं जाना इसका अर्थ
अर्थ समस्या यूँ भी नहीं रहा
जबकि, एक सवाल तो उठना ही चाहिए था
कि कैसे अस्सी, नब्बे मिलकर पूरे सौ हो जाते हैं
बात जो भी हो
पर एक दिन मेरे बच्चे ने ठान ही लिया
जद ही कर डाली जानने को इसका अर्थ
जो मेरे लिए आज भी था उतना ही व्यर्थ

मैंने कई बार फुसलाने की कोशिश की
अक्कड बक्कड से अतिया पतिया तक लगाता रहा छलाँग
’तिलकाटे तिरकुल काटे‘ की लगाता रहा गुहार
लेकिन सब की सब
व्यर्थ रही मनुहार

अब अपने बच्चे को कैसे बतलाते
कि उसके जन्म के बहुत पहले
कुछ पुराने बरतनों के बदलने की प्रक्रिया में
बाजार में चला गया था यह
जहाँ से उसकी माँ ने बहुत चुफ से
अपनी माँ की तरह बचा कर रख लिया था

हो सके तो बचा लो इसे
जिसे आज मैं तुम्हें सौंपता हूँ
इसलिए नहीं कि तुम इसे आगे ले जाओगे
बल्कि, इसलिए कि तुम इसमें अपना पिछला जीवन देख सकोगे।

पाण्डुलिपियाँ
रँभाती गायों के ताप से पिघल कर
भीड में छूट गये बछडे के
कंकाल शिल्प की तरह
होती हैं ये पाण्डुलिपियाँ

इनके होने में होती है किसी शब्द की हुडक
किसी वाक्य की हुमक
और इन दोनों के बीच पडी ध्वनि की हुलस भी

घनी तपती दुपहरी में
बालू के बीच की ठंडक होती हैं ये
छाया रहित ताड के पेड से निकलती
भरी दोपहरी में ताडी की ठंडक होती हैं ये

इन्हें सहेज कर रखने की जरूरत है
ईंटा, गारा, मिट्टी सभी कुछ होती हैं ये

किसी भी किताब को पढते समय
कभी ठीक से सोचें इन पाण्डुलिपियों के बारे में

ये ही बतायेंगी कि कितने पहाडों से कितनी बार
कूदा होगा हमने
कितने सन्नाटे हमने बुने होंगे अपने आस-पास
कितनी रातों में कितनी बार खोदा होगा चाँद को
और तो और, ये हमें बताती हैं कितने नंगे होते हैं हम
सुन्दरता के साँचे में ढाले जाने से पहले।



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