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दिनेश कुशवाह की कविताएँ

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स्त्री के लिए शोकगीत

तडपता रहता है मेरा मन
एक स्त्री को देखने के लिए
जबकि मेरे भीतर बसी हैं असंख्य स्त्रियाँ।

जब मैंने आँखें खोल दुनिया देखनी शुरू की
और प्रेम के बिना
यह जीवन निस्सार लगने लगा
यह स्त्री उसी समय
मेरे मन में समा गई थी
जैसे मीरा की आँखों में नन्दलाल।

पर गृहस्थ, संयासी, परमहंस
मद्यप-चोर-लुटेरे
राजा की सवारी
ब्रह्मा-विश्णु-मुरारी !!!
सारे के सारे इस स्त्री के पीछे पडे थे।

यह स्त्री कभी उन्हें देखती थी लुभाकर
और अपने पर गर्व करती थी।
कभी बेबाकी से हँसती
और कभी क्रोध से नथुने फुलाती
कभी भागती थी डरकर और कभी
भय से छिप जाती थी।

वह कहीं मनचाहे आकार में
काटी-छाँटी जा रही थी
तो कहीं रँगी जा रही थी
कहीं ढकी जा रही थी
तो कहीं उसकी दुकानें सज गई थीं
जहाँ उसकी सजावटी पैकिंग की जाती थी।

इस बार उसे हर माल अपनी देह के बल पर
बेचने के लिए लगाया गया था
पहले से ही जाल में फँसी चिडया की
यह नयी घेराबंदी थी।
मंत्री-हाकिम-वैद्य-शिक्षक-साधु
यहाँ तक कि उसके दलाल भी
उसे उपदेश देते थे
उसके दिल पर हाथ रखना चाहते थे
सबके पास उसके इलाज का दावा था।

स्त्री भी कम उलझन में नहीं थी
वह कहीं भाई पाना चाहती थी, कहीं पिता
कहीं उसे सिफर् दोस्त चाहिए था
तो कभी वह किसी लल्लू के साथ
इतना खुश दिखती थी
कि मुझे उस पर दया आती थी।

यह स्त्री बेहद सुडौल थी
पर उतनी ही बेतुकी
एक आदमी, जिसे वह पति कहती थी
उसे त्रस्त किये रहती थी
नहीं तो उससे त्रस्त रहती थी
वह उसे देखना भी नहीं चाहती थी
और उसके बिना उससे रहा भी नहीं जाता था।

विपत्ति की सबसे बडी रातें
उसने देखी थीं
पर सुख के सपने उसके जीवन में
हवा के झोकों की तरह आये
ऐसे मौकों पर उसे घर-परिवार
कुछ भी नहीं सँभालना पडा उतना
जितना कि अपना आँचल
यह विश्वास वह कभी नहीं जी पायी कि
अगर उसका दूध न होता तो
धरती पर कभी नहीं आते भगीरथ
कि पतित-पावनी गंगा से कमतर नहीं है वह।

दूध जैसी सफेदी के सारे विज्ञापन
इस स्त्री से अटे पडे थे
पर दाग से सबसे अधिक
वही डरती थी।
समाज में बहुत कम लोग थे
जो स्त्री से प्रेम करते थे
उन्हें बस एक स्त्री चाहिए थी
ऐसी स्त्रियाँ भी थीं जिन्हें
प्रेम से कुछ लेना-देना नहीं था
वे प्रेम को मूर्खों का कोरस कहती थीं
उन्हें जो मिल गया था वो बहुत था
या बहुत कुछ पाने के लिए
वे कुछ भी कर सकती थीं।

पर अमूमन यह स्त्री जब प्रेम की तलाश में होती
तो सारे मर्द उसे एक जैसे लगते
पर उनमें कुछ इतने प्यारे थे कि उसे
उन्हें अपनी कोख में रख लेने का मन करता।

इस स्त्री के पास अपनी कमाई नहीं थी
और थी तो भरोसे के आदमी नहीं थे
जिनसे वह अपना घट-अघट सब कुछ
दिल खोलकर कह सके।

इसलिए अगर कोई एक पल के लिए भी
उसका मन छू लेता तो
उसका तन-मन महावर की तरह
लाल हो जाता था।

उसे बचपन से ही एक पैर पर
खडे होना सिखाया गया था
उसे जीवन भर एक स्थान पर
इस प्रकार ठहरना पडा था कि
वह बुढौती में भी
एक बार भागकर देखना चाहती थी
बाल-बच्चों को छोडे बिना।

परन्तु कई बार यह स्त्री उन्हें
एकदम समझना नहीं चाहती थी
जो उसे समझना चाहते थे
वह या तो किसी को बना रही थी
या किसी के द्वारा बनायी जा रही थी।

स्त्री ने अपना घर बनाया
फिर पुरुश को मालिक बना लिया
पुरुश ने स्त्री को घरेलू बनाकर
उसे वनवास दे दिया।

स्त्री के पास ऊब थी, आदतें थीं
अजूबे थे,
मोहिनी थी, मर्म था, गृहस्थी थी,
गरीबी थी, कठिन संघर्श थे,
गीत थे, गाने की इच्छा थी
कहीं अमीरी और ऐश भी थे
पर....,
आँसू सब जगह थे।

लडकी और सपने

दुनिया में सिफर् लडकी की आँख होती है
जहाँ चूजों की तरह जनमते हैं सपने
पलते हैं राजकुमार की तरह
और मुर्गे की तरह हलाल होते हैं।

लडकी सपने नहीं दुनिया पालती है-
हरी-गुलाबी-लाल-बैंगनी
लडकी दर्पण नहीं सपना देखती है
अपने आँचल में छिपे दूध जैसा उजला सपना
सपने में भी शीशा टूटने और दूध फटने को
असगुन मानती है लडकी
और चटखती रहती है काँच की तरह।

सपने में देहधारी भूत-पिशाच
उसका सबसे अधिक पीछा करते हैं
फिर भी लडकी
नहीं पढती हनुमान-चालीसा
देवी गीत गाती है और चुडैलों से डरती है।

राजकुमार ही नहीं
जोगी के सपने भी देखती है लडकी
जोगी की सारंगी, वैरागी की बाँसुरी पर
बावली होती सोचती है
’अगर माँ को दुख न हो‘
तो राजपाट छोडकर निकल जाती है लडकी

सपने भी इतने जालिम हो सकते हैं,
तब पता चलता है
जब भयानक सूनी आँखों ताकती है लडकी
सपने में कभी नहीं ओढती नकाब
एक नन्हीं सी जान चिडया की तरह
उडने के सपने देखती है लडकी।



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