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Vartmaan Sahitya :: May, 2007 Sponsered by : Decor Home, Bikaner |
आशुतोश हीरालाल मिश्र
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बमबारी जारी थी......। भारतीय जहाज समुद्र की लहरों के बीच भारत के नागरिकों को लेने की प्रतीक्षा कर रहा था। मेरिन की इमरजेंसी टुकडी का एक जाँबाज जवान आग के गोलों के बीच बचता, अनेक भारतीयों को बचाता, जहाज पर पहुँच चुका था।
जहाज तक पहुँचने के रास्ते को हमीदा संभल कर तय करती जा रही थी। पीछे मुडकर अपने बडे बेटे और पति पर नजर रखती, धीरे-धीरे कदम बढाती, वह भारतीय जहाज की ओर अग्रसर हो रही थी। अचानक याद आया.... मम्मी तो आग के गोलों के बीच ही रह गई हैं। कुछ देर के लिए हमीदा अपनी प्रसव-वेदना को भूल गई।
’’मम्मी.... मम्मी..... मम्मी छूट गई हैं। मेरी मम्मी को ले आइए प्लीज....।‘‘
’’ आप जहाज की ओर आगे बढें, मैं उन्हें ले आता हूँ।‘‘
शोलों के मध्य से गुजरता हमीदा की मम्मी का हाथ पकड, भारतीय मिलिट्री का बहादुर जवान उन्हें जहाज की ओर ले गया। माँ-बेटी एक दूसरे से लिपट कर खूब रोईं।
’’अभी रोने का वक्त नहीं है......। जहाज इंतजार कर रहा है‘‘.....। जवान ने कहा।
भारतीय जहाज पर पहुँचकर हमीदा दर्द से कराह उठी। ’मम्मी, मम्मी‘ के दर्दनाक स्वर ने जहाज का भी दिल दहला दिया। अपनी मम्मी के कंधों पर पूरा भार देकर, वह फफक-फफक कर रोने लगी।
’’एक बहन को प्रसव-वेदना है। आप सभी एक ओर चले आयें‘‘-जवान ने कहा।
कपडा घेरकर स्थान बना दिया गया। वह फिर भारतीयों को जहाज तक पहुँचाने की ड्यूटी में लग गया। अचानक बम के छोटे-छोटे टुकडों ने उसे गंभीर रूप से घायल कर दिया। वह गिर पडा। दौडती, चीख मारती हमीदा की मम्मी ने उसे बाँहों में थामकर पूछा- ’’बेटा तुम्हारा नाम क्या है?‘‘
’’आशुतोश‘‘... आशुतोश सत्पथी....।‘‘
हमीदा के नवजात शिशु के रोने की आवाज आयी- ’’बेटा तुम्हारे नाम पर इस बच्चे का नाम होगा। आशुतोश.... हाँ, हाँ, आशुतोश.....‘‘ -हमीदा की मम्मी ने कहा।
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