(११ जनवरी, २००७ को अपनी आयु के बावन साल पूरे करने पर)
तेरी चाहत के दरिया में बहते-बहते
देख तो बावन साल गुजारे हमने कैसे
हमने क्या खोया, क्या पाया हम क्या जानें
निकला है ये कौन बही-खातों को ले के
जेह्न में तेरे भारीपन का तोड नहीं है
आज भी हलके लगते हैं चाँदी के सिक्के
हमको बडा भरोसा है अगली पीढी पर
दुनिया भर में छा जाएँगे अपने बच्चे
बस कर्मों का लेखा-जोखा रह जाएगा
मिट्टी में मिल जाएँगे सब झूठे-सच्चे
इसीलिए तो सोने की कोशिश करते हैं
रात को शायद सपने आयें अच्छे-अच्छे
हो सकता है तुझको कुछ राहत मिल जाये
अब के अपने किसी दोस्त को देख बदल के
अपने कामों को निबटाओ जल्दी-जल्दी
वक्त की आँधी से टकराओ धीरे-धीरे
सुनने में तो ये बातें अच्छी लगती हैं
मगर नहीं पडता है कुछ भी अपने पल्ले।
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