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उन्हें देखा गया खिलते कमल तक,
कोई झाँका नहीं झीलों के तल तक।
तो परसों, फिर न उसकी राह तकना
जो भूला आज का, लौटा न कल तक।
न जाने, कब समन्दर आ गये हैं,
हमारी अश्रु-धाराओं के जल तक।
सियासत में उन्हीं की पूछ है अब,
नहीं सीमित रहे जो एक ’दल‘ तक।
यही तो टीस है मन में लता के,
हुई पुश्पित मगर पहुँची न फल तक।
हजारों कलयुगी शंकर हैं ऐसे ,
पचाना जानते हैं जो गरल तक।
जो बारम्बार विश्लेशण करेगा ,
पहुँच ही जायेगा वो ठोस हल तक।
(२)
दबंगों की अनैतिकता अलग है,
उन्हें अन्याय की सुविधा अलग है।
डराते ही नहीं, अपराध उनको,
महल का गुप्त दरवाजा अलग है।
जिसे तुम व्यक्त कर पाये न अब तक,
वो दोनों ओर की दुविधा अलग है।
पतंगें कब लगीं आजाद पंछी,
पतंगों की तरह उडना अलग है।
जिसे महसूस करता हूँ मैं अक्सर,
तुम्हारी देह की दुनिया अलग है।
है स्वाभाविक किसी दुश्मन की चिंता,
निजी परछाईं से डरना अलग है।
वो चाहे छन्द हो , या छन्दहीना,
हमारे दौर की कविता अलग है।
(३)
आँखों की कोर का बडा हिस्सा तरल मिला,
रोने के बाद भी मेरी आँखों में जल मिला।
उपयोग के लिए उन्ह झुग्गी भी चाहिए,
झुग्गी के आसपास ही उनका महल मिला।
आश्वस्त हो गये थे वो सपने को देखकर,
सपने से ठीक उल्टा, मगर स्वप्न-फल*मिला।
इक्कीसवीं सदी में ये लगता नहीं अजीब,
नायक की भूमिका में लगातार खत मिला।
पूछा गया था प्रश्न पहेली की शक्ल में,
लेकिन कठिन सवाल का उत्तर सरल मिला।
उसको भी कैद कर न सकी कैमरे की आँख,
जीवन में चैन का जो हमें एक पल मिला।
ऐसे भी दृश्य देखने पडते हैं आजकल,
कीचड की कालिमा में नहाता कमल मिला।
(४)
सपने अनेक थे तो मिले स्वप्न-फल अनेक,
राजा अनेक वैसे ही उसके महल अनेक।
यूँ तो समय-समुद्र में पल यानी एक बूँद,
दिन, माह, साल, रचते रहे मिलके पल अनेक।
जो लोग थे जटिल, वो गये हैं जटिल के*पास,
मिल ही गये सरल को हमेशा सरल अनेक।
झगडे हैं नायिका को रिझाने की होड के,
नायक के आस पास ही रहते हैं खल अनेक।
बिखरे तो मिल न जायेगी सत्ता की सुन्दरी,
संयुक्त रहके करते रहे राज ’’दल‘‘ अनेक।
लाखों में कोई एक ही चमका है सूर्य -सा,
कहने को कहने वाले मिलेंगे गजल अनेक।
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