KhbarExpresswww.khabarexpress.com

Download Trial of Jewellery Accounting Software

Welcome Guest Sign In New user! Sign Up Now
Search Photo  
RSS Sunday, February 12, 2012



Vartmaan Sahitya ::May, 2007
Sponsered by : Decor Home, Bikaner

बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स की मुरली
राजेन्द्र चंद्रकांत राय

More Articles

बार्ड को राश्ट्रीय संगोश्ठियाँ करने की आदत है। उसका ऑडीटोरियम आधे साल संगोश्ठियों से भरा रहता है। पादप रोगों पर खत्म नहीं हुई कि आनुवंशिक-समस्याओं पर शुरू हो गयी। औशधीय फसलों पर प्लान की जा रही है और मुर्गी में आये बर्ड-फ्लू पर विचार चल पडा। उनके पास असंख्य विशय हैं और कारूँ का ख्ाजाना भी है। खुद का बजट तो है ही, आई सी ए आर, कृशि-मंत्रालय और अंतर्राश्ट्रीय फंडिंग-एजेन्सियों और विश्व-बैंक का प्रायोजन भी हासिल रहता है।
’किसानों का शत्रु कृन्तक-चूहा‘ पर अन्तर्राश्ट्रीय-स्तर की संगोश्ठी को विश्व-बैंक ने प्रायोजित किया था। इसमें राश्ट्रीय-अंतर्राश्ट्रीय ख्याति के वैज्ञानिक, जीवशास्त्री, अनुवांशिकी के विशेशज्ञ, किसान, सामाजिक कार्यकर्ता और गैर-सरकारी संगठनों के प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया गया था। एक सामाजिक कार्यकर्ता के नाते मुझे भी आमंत्रण मिला था। आने-जाने के लिए ए.सी. टू-टीयर का किराया उपलब्ध कराया गया था और पाँच-सितारा होटल में ठहरने की सुविधा। होटल से बांद्रा-कुर्ला कॉम्पलेक्स नामक बहु-मंजला भवन में पहुँचाने के लिए एयर-कंडीशंड बस थी। खुद संगोश्ठी-शाला इतनी उच्चकोटि की व्यवस्थाओं और भव्यता से युक्त थी कि प्रवेश करते समय मैं हीनता-बोध की ठंडी लहर से विचलित हो रहा था। अभ्यास होने के कारण मैंने जल्दी ही उस पर काबू पा लिया। बरामदे ग्रेनाइट-टाइल्स के थे और झकाझक चमक रहे थे। फिसल जाने का पूरा इंतजाम था, पर हमें अपने को सम्हालना था। महकती हुई खूबसूरत युवतियाँ सीने पर बडे-बडे बैज लगाकर स्वागतोत्सुक-मुद्रा में इस तरह मुस्कुरा रही थीं, कि वह मुस्कान असली होने का वहम पैदा करने लगे। हममें से कई लोग जवाबी मुस्कान के साथ पेश आये। एक युवती ने माथे पर तिलक लगाया, दूसरी ने शाख-युक्त गुलाब-पुश्प भेंट किया। रजिस्ट्रेशन काउंटर पर खूबसूरत पोर्टफोलियो दिये गये, और इस तरह विश्व-बैंक भारत आकर, भारतीय लिबास धारण कर, भारतीय-मुद्राओं में तिरोहित हो गया।
ग्लेज्ड-टाइल्स और ग्रेनाइट-पत्थरों के प्रयोग से उत्पन्न भव्यता के चंगुल में तो थे ही, विश्व-बैंक के चंगुल में भी हम मुस्कुराते-मुस्कुराते, बिना किसी नैतिक-बाधा के चले गये। अंदर वातानुकूलन की शीतल-सिहरन और एक खास किस्म की भीनी-भीनी सुगंध में हम सराबोर हुए। भव्यता का अचंभा वहाँ भी बाँहें पसारकर खडा मिला। कुशनदार मन-भावन आसंदी, हरे रंग का लुभावन कार्पेट, सीढीदार ऑडीटोरियम, छत से झरती-नीली-दूधिया रोशनी और ज्याति-प्रपात में नहाता हुआ विराट मंच। मंच-सज्जा को नयनाभिराम कहने के लिए जीभ व्याकुल हुई। अंग्रेजी-भाशा में संगोश्ठी के विशय का कीमती बैनर। उत्कृश्ट मेजें और कुर्सियाँ। सूट की मूल्यवत्ता में लापता-व्यक्तित्व वाले दौडते-कैमरों का वजूद, फोटोग्राफरों की धमाचौकडी। बावजूद इसके सारी हबड-दबड में भी शिश्टता-शालीनता का दबाव सब कुछ अहा-अहा लग रहा था।
पोर्टफोलियो को सीने से चिपकाये मैं, अपने लिए आसंदी का चुनाव करते हुए सामने से दूसरी कतार में धंसा और मक्खन जैसी धसक में धीरे-धीरे समा गया। समाया ही था कि आसंदी बहुत आदरणीय विधि से पीछे को फैल गयी और मेरी पीठ को अपने कोमल-स्पर्श से छूने लगी। पोर्टफोलियो खोला। उसमें रखी पुस्तकें, संगोश्ठी में पेश किये जाने वाले शोध-पत्रों का संक्षेपण, कार्यक्रम की रूपरेखा और मोटी नोटबुक थी। उम्दा पेन था और लिखावट रेशमी। अब मेरा ध्यान पडोसियों पर गया। उधर एक प्रौढ और इधर एक मह-मह करती महिला थीं। उधर से गरिमा बह रही थी और इधर से महंगी खुशबू। बीच में मैं था-संतुलन साधता-सा। संतुलन साधते ही असाध्य होने लगा क्योंकि जूते के ऊपर मोजों के पास कोई गुलगुली-काया अपनी बेचैनी सहित मौजूद लग रही थी। अपनी मध्यवर्गीय- हडबडाहट पर भरपूर काबू पाते हुए मैंने थोडा-सा पैर उठाया और थोडी-सी गरदन झुकाई। एक चूहा था- फुदककर कार्पेट की कुंज-गलिन में भागने की व्याकुलता में वह उन देवी जी की फाल लगी साडी की किनार को छूता हुआ दौडा। वे मुझसे ज्यादा चौंकीं। हडबडाईं। फिर मेरी तरफ मुस्कुराते हुए बोलीं- माउस।
मैंने कहा-आखिर सेमिनार का वह अहम् हिस्सा है....
वे किफायत से हँसीं। लिपिस्टिक जरा हिल-डुल कर सम हो गयी।
मैंने बात आगे बढायी-
अब आयोजकों पर यह आरोप नहीं लग सकता कि उन्होंने संगोश्ठी के सभी पक्षों को आमंत्रित नहीं किया।
इस बार वे इस तरह मुस्कुराईं कि यह आखिरी है और अब वे मुझ पर इससे ज्यादा मुस्कान नहीं लुटा सकतीं। मैंने कोई आपत्ति नहीं की।
एकाएक कैमरे चमकने लगे। वीडियो कैमरे चल पडे और बैजधारी सूट-बूट बेवजह दौडने की मुद्राएं धारण करने लगे। चेयरपर्सन पधार रही थीं। दर्शकों ने गर्दनें घुमायीं और कैमरों की आड में आती एक तनी हुई आकृति की झलक पायी। उद्घाटन-सत्र चला। उन्होंने आंग्ल-भाशा में सारगर्भित भाशण दिया और हम सबके पधारने पर स्वागत किया। फिर मुख्य कार्यक्रम की बारी आयी। मंच का सरअंजाम बदल दिया गया। वरिश्ठ विशेशगण अपनी महिमा को सम्हाले-सम्हाले, थोडा झुककर और हौले-हौले अंदाज में आये और अपनी नामावलियों के अनुसार बैठ गये। संचालनकर्ता ने उनका हम सबसे परिचय कराया। स्वागत-सत्कार हुआ। गुलदस्ते कुछ हाथों से होकर कुछ हाथों में गये और फिर मेज पर लेट गये। उदासी और मुरझावन उन पर तारी हो गयी। संचालक ने मुख्य-वक्ता के रूप में डॉ.ॅ अशोक कुमार को आमं.त्रत किया कि वे अपनी शोध-प्रस्तुति के लिए तशरीफ लाएँ। वे एलसीडी प्रोजेक्टर पर अपनी प्रस्तुति देने हेतु मंच से नीचे उतर आये। वे प्रौढतर आयु के ऐसे वैज्ञानिक थे, जिन्होंने अपना अब तक का जीवन चूहों के अनुसंधान पर खर्च किया था। वे चूहा-विशेशज्ञ की पहचान पा चुके थे।
पहली स्लाइड आयी.... धुंधलापन लिये एक अक्स उभरा। डॉ. अशोक कुमार ने फोकस ठीक किया, चित्र स्पश्ट हुआ। स्क्रीन पर एक चूहा उभरा। उसके ऊपर कलात्मक अंग्रेजी लिखावट में ’वेलकम‘ अंकित था। चूहा हमारा स्वागत कर रहा था या हम चहे का स्वागत कर रहे थे?
दूसरी स्लाइड आयी.... ’कृन्तक नियंत्रण ः प्रबंध और उपाय‘- डॉ. अशोक कुमार। उन्होंने हमें संबोधित किया - आदिमयुग से आज तक मनुश्य की प्राथमिक आवश्यकता भोजन रही है और भविश्य में भी वह बनी रहेगी। जन संख्या वृद्धि के कारण खाद्यान्न-उत्पादन बढाने के लिए अनुसंधान लगातार चल रहे हैं। कृशि वैज्ञानिकों ने इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ भी हासिल की हैं। हमारी ये उपलब्धियाँ ’हरित-क्रान्ति‘ के नाम से दुनिया भर में पहचानी जाती हैं।
डॉ. अशोक कुमार पल भर के लिए रुके फिर रहस्य पर से पर्दा उठाने के अंदाज में बोले-लेकिन हमारी उपलब्धियों को हमारा जानी-दुश्मन कुतर डालता है और उसका नाम है-चूहा। जी, हाँ.... हम इसके निशाने पर सदियों से हैं। हमारी प्रगति, आत्मनिर्भरता और जीवन का शत्रु यही है। पहचान लीजिए इसका असली रूप। आइये, इससे निपटने के उपाय करें। जड से ही साफ कर दें अपने दुश्मन को। न रहे चूहा और चरे हमारी हरित-क्रान्ति।
तालियाँ।
कुछ पल डॉ. अशोक कुमार खामोश रहे और गर्व को अपनी गर्दन पर चढने का अवकाश देते रहे। फिर दूने जोश में बोले-हमारे देश में इस वक्त चूहों की आबादी दस अरब है-यानी मनुश्यों की तुलना में आठ-नौ गुना अधिक। मतलब एक आदमी पर आठ-नौ चूहे। आठ-नौ चूहे और बेचारा एक आदमी....अभिमन्यु की तरह प्रत्येक आदमी को घेरकर ये चूहे उसे मिटा डालने पर आमादा हैं।
विराम।
सन्नाटा।
वे अगला प्रहार करने के अंदाज में बोले-एक चूहा २४ घंटे में २१ ग्राम अनाज खा डालता है, यानी एक दिन में हमारा इक्कीस हजार टन अनाज वे भकोस लेते हैं....अर्थात् मित्रो यह जरा-सा चूहा अपनी आबादी के जरिये एक साल में हमारा...जी हाँ, इतनी मेहनत मशक्कत से उगाया गया ७६ लाख टन से भी ज्यादा अनाज खा जाता है...इतना ही नहीं दोस्तो, इसका दस गुना वे बरबाद भी कर डालते हैं।
विराम।
डॉ. अशोक कुमार ने हमें हैरत के सुरसा-मुख में पडे रहने दिया और हमारी दशा निहारते रहे। ऑडीटोरियम भय के सागर में डुब्ब-डुब्ब कर रहा था और वे मानो बम ब्लास्ट कर देने के बाद उसका असर देख रहे थे।
फिर वे पीछे पल्टे...नैक्स्ट....
अगली स्लाइड स्क्रीन पर आ गयी।
चूहों का जीवनकाल ः कुछ तथ्य
आयः २ से ३ वर्श
प्रजनन परिपक्वताः ३ माह
गर्भ कालः २१ दिन
प्रजनन क्षमताः ५-१० शिशु (कभी-कभी २१)
वार्शिक प्रजनन आवृत्ति ः ४-६ बार
डॉ. अशोक कुमार एक नये बम के साथ फिर मुखातिब हुए- एक चूहे की उम्र दो-तीन वर्श होती है। मादा-चूहा मात्र तीन माह की उम्र में प्रजनन-योग्यता हासिल कर लेती है। इसका गर्भ-काल सिर्फ इक्कीस दिन का ही होता है और एक बार में एक मादा-चूहा ५ से १० चूहों को जन्म देती है ....दोस्तो यह संख्या कभी-कभी २१ भी हो जाती है। एक मादा, एक साल में चार से छह बार तक बच्चे देती है, इस तरह वह अपने जीवन-काल में १२ से १८ बार प्रजनन करती है और चूहों की आबादी भीशण रूप में बढ जाती है।
विराम।
डॉ. अशोक कुमार एक कदम आगे आये और सरगोशी करने वाले अदाज में बोले- जानते हैं....चूहों का एक जोडा पैंतीस करोड चूहों के जन्म का कारण बनता है ..पैंतीस करोड....।
ऑडीटोरियम हलचल से भर गया।
पहलू बदले जाने लगे।
खुसर-फुसर होने लगी।
उधर माइक्रो फोन पर आवाज गूँजी- जी हाँ...पैंतीस करोड चूहे पैदा होते हैं एक जोडा चूहों से।
वे अशोक थे और शोक-सर्जक बने हुए थे।
वे मुस्कुराये-भरोसा नहीं हो रहा है न...नहीं होगा....मुझे भी नहीं हुआ था, मगर जब आप केलकुलेटर लेकर गणना करने बैठेंगे और तीन-तीन माह में उनका गुणन-बहुगुणन निकालेंगे तो सत्य को पा लेंगे। प्यारे मित्रो ! सत्य फिसलन-भरा होता है- हाथ से फिसल जाता है। उसे सम्हालना, पाने से ज्यादा मुश्किल है। मैंने ...आफ इस डॉ. अशोक कुमार ने अपना पूरा यौवनकाल चूहों पर होम कर दिया....तब, तब कहीं सत्य का कुछ भाग हाथ में आया है ....
वे हँसे-घर जाकर केलकुलेट कीजियेगा, यहाँ आगे बढते हैं....ओ. के. ....नेक्स्ट....
अगली स्लाइड स्क्रीन पर आयी।

चूहों की प्रमुख जातियाँ

 १. घरेलू चूहा (रेटस रेटस) ः रंग काला-भूरा, कान बडे, शरीर के अनुपात में पूँछ बडी, बिल की मिट्टी भुरभुरी-दानेदार, बिल का मुँह खुला रहता है।
 २. छोटी घूस (बेंडीकोटा बेंगालेसिस) रंग भूरा, रोम छोटे और कडे, पूँछ शरीर से छोटी या बराबर, देखने में खूँख्वार, बिल की मिट्टी चिकनी-भुरभुरी, बिल का मुँह मिट्टी से ढंका रहता है।
 ३. घरेलू चुहिया (मस मसकुलस) ः घरेलू चूहे की तुलना में छोटी, शरीर की तुलना में पूँछ लम्बी, काला-भूरा रंग, रोम मुलायम, घरों के अनाज-गोदामं पायी जाती है।
 ४. मुलायम बालों वाला चूहा ः घरेलू चूहे से छोटा, पेट का रंग श्वेत, पूँछ शरीर के बराबर (मिलारडिया मेलटाडा) या कभी-कभी छोटी, बिल साधारण, सिंचाई वाले खतों में पाया जाता है।
 ५. खेत की चुहिया (मस बुडुगवा) ः आकार छोटा, बाल चिकने, बिल छोटा।
 ६. भारतीय जर्बिल (टटेरा इंडिका) रंग काला-भूरा, पूँछ के छोर पर बालों का गुच्छा, पहाडी स्थानों पर निवास।
 ७. जंगली चुहिया (मस सेक्सीकोला) आकार खेत की चुहिया जैसा, जंगलों में निवास।
डॉ. अशोक कुमार ने इस स्लाइड पर इतना ही कहा- अपने शत्रु को खूब अच्छी तरह पहचान लीजिए। फिर बताया कि चूहे फसलों की बुवाई के समय से नुकसान पहुँचाने लगते हैं। ज्यों-ज्यों फसल बढती है, चूहों का भी प्रकोप बढता जाता है। चूहे अपने बिलों में अनाज संग्रहीत करते जाते हैं। वे बोले-अब आते हैं असली बात पर कि नियंत्रण कैसे किया जाये?
उन्होंने पीछे मुडकर कहा-नेक्स्ट।
स्क्रीन पर रंगीन ताजगी वाली उगली स्लाइड आ गयी।

चूहा नियंत्रण की विभिन्न विधियाँ
 १. कृशिगत ः अधिक से अधिक रकबे में एक साथ बोनी करें। खेत साफ और सँकरे हों।
 २. भौतिक ः चूहों के बिलों में पानी भरें। भागने पर चूहों को लाठियों से मार डालें।
 ३. यांत्रिक ः चूहेदानियों का प्रयोग करें। (जैसे तार वाली चूहेदानी, चटकनीदार ट्रेप, सरमन ट्रेप आदि)।
 ४. जैविक ः नेवला, बिल्ली, साँप, उल्लू पालें।
 ५. रासायनिक जहरीली दवाओं का प्रयोग करें (जैसे जिंक फास्फाइड, ब्रोमोडियोलान-०.००५, एल्यूमीनियम फास्फाइड (सल्फास) आदि।
नोट ः जहरीली दवाओं का प्रयोग सावधानी से करें।
डॉ. अशोक कुमार ने प्रत्येक पद्धति को विस्तार से समझाया, क्योंकि संगोश्ठी का मुख्य उद्देश्य यही था। फिर कहा-
नेक्स्ट।
तब एक और नयी स्लाइड पर्दे पर आयी।

चूहा ः कुछ रोचक तथ्य
  संसार में चूहों की ५०० प्रजातियाँ पायी जाती हैं।
  चूहों के दाँत हर माह एक सेंटीमीटर बढते हैं।
  चूहे बिना भोजन के सात दिन और बिना पानी के २ दिन तक जीवित रह सकते हैं।
  चूहे तैर कर एक किलोमीटर तक जा सकते हैं।
  चूहे अपने बिलों में आठ किलोग्राम तक अनाज संग्रहित कर सकते हैं।
  एक चूहा अपने जीवनकाल में मल की दस हजार गोलियाँ, चार लीटर मूत्र और पाँच लाख बालों से अनाज को दूशित कर देता है।
इसके पश्चात् एक और स्लाइड आयी जिसमें बडे-बडे अक्षरों में ’थैंक्यू‘ लिखा हुआ था। डॉ. अशोक कुमार दो कदम आगे आये-दोस्तो, चूहे से बडा कोई और दुश्मन मानवता का नहीं हो सकता। कोई आतंकवाद भी शायद इतना खतरनाक नहीं हो सकता, जितना यह चूहा होता है। वे तो हमें मारने के लिए बम और ए के ४७ बगैरह लेकर आते हैं और यह वैपन्स के बिना ही हमें खत्म कर देने की गुपचुप चाल चल रहा है। आप सबसे अनुरोध है कि आज से ही इसे मिटा डालने का संकल्प ले लें। यदि हमें अपनी अरब की संख्या को पार कर गयी भारी जनसंख्या को खाद्यान्न उपलब्ध कराना है तो चूहे से निजात पानी ही होगी, अन्यथा हमारे किसानों, कृशि-वैज्ञानिकों और सरकार की अथक मेहनत से उगाया गया अन्न इस दुश्मन के पेट में जाता रहेगा। धन्यवाद।
ऑडीटोरियम ने उतनी ही जोर से तालियाँ बजायीं, जितना कि वह अपने इस मासूम दुश्मन से डर गया था। डॉ. अशोक कुमार ने सवाल पूछने के लिए कहा किंतु हाथ नही

Discuss this topic on KhabarExpress Forum 


Post Your Comments to this Article Posting Rules
Name*:
Comment*:
 


October, 2006 <br> Sponsered by : Decor Home, BikanerOctober, 2006
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 
January, 2007 <br>Sponsered by : Decor Home, BikanerJanuary, 2007
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 
February, 2007 <br>Sponsered by : Decor Home, BikanerFebruary, 2007
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 
March, 2007 <br>Sponsered by : Decor Home, BikanerMarch, 2007
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 
April, 2007 <br>Sponsered by : Decor Home, BikanerApril, 2007
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 
May, 2007 <br>Sponsered by : Decor Home, BikanerMay, 2007
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 
June, 2007 <br>Sponsered by : Decor Home, BikanerJune, 2007
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 

All right reserved by Khabarexpress.com
Contact Us | Archives | Sitemap | Can't see Hindi ? | News Ticker
Special Edition: Lakshchandi Mahayagya, Camel Festival 2007, Vartmaan Sahitya, Nagar Ek - Nazaare Anek, Bikaner Udyog Craft Mela
Our Network rajb2b.com | khabarexpress.com | uniqueidea.net | PelagianDictionary.com | hindinotes.com
Developed & Designed by Pelagian Softwares