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Vartmaan Sahitya ::May, 2007
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कुछ न कुछ छूट ही जाता है
रजनी गुप्त

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हाँ, बोलो-बोलो, अचानक बीच में रुक क्यों गए? बोलते रहो.... मैंने कंधे पर एक भरोसेमंद दोस्त की तरह हाथ रखा और उसकी उनींदी आँखों में बसी अनजानी पीडा को पढते हुए कहा- ’अरे यार। मुझसे कैसा संकोच? मैं तो तुम्हीं से डिस्कस करने आया हूँ.... हाँ तो आशीश, क्या बता रहे थे तुम उस दिन के बारे में.... मेरी उत्सुकता हद से ज्यादा बढती जा रही थी।
अचानक वह बुक्का फाडकर रोने लगा। कुछेक मिनट तक खामोशी से हम उसकी अस्थिरता, चिडचिडापन और बेचैनी को तोडते रहे। हमने उसे पर्वूवत् रोने दिया फिर हौले से उसे भरोसे में लेने के लिहाज से गहरी आत्मीयता दर्शाते हुए कहा- ’’यार ये सब तो चलता ही रहता है सबके साथ कुछ न कुछ होता है.... डॉण्ट वरी... दुनिया में कोई ऐसा शख्स होगा जो दुखी न दिखे.... हिलती डुलती देह पर टंगी पलकों को उसने मेरी तरफ उठाया तो मैंने तुरंत उसकी कांपती हथेली पर अपने हाथ का दबाव बनाते हुए नरमी से कहा.... सबसे पहले तो तुम मुझे अपना दोस्त समझो.... बाकी बातें बाद में.... ओके?
रोने के बाद उसकी धुली-उजली आँखें बेचैनी से बोझिल हो रही थी। इधर-उधर से बात का सिरा पकडने के लिए मैंने खुद पहल करते हुए पूछा.... ’जो तुम्हें अभी-अभी यहाँ छोडने आए थे... कौन हैं वो?
-’वही तो है मेरा बाप जिसने मेरी जिन्दगी तबाह करके रख दी। सारे सपने माटी में मिला दिए.. उफ ! ऐसा बाप किसी दुश्मन को भी न मिले.... अचानक उसकी आँखें दहकते अंगारों में बदल गईं.. हां, हां, हाँ इसी बुड्ढे ने खाक में मिलाई है मेरी जिन्दगी... पैसा, पैसा, पैसा सिर्फ और सिर्फ पैसों की हवस का मारा हैं। दिन रात पैसों की पोटली पर कुंडली मारकर बैठा रहेगा। डॉक्टर साब, साँप भी कभी न कभी कैचुल छोड देता है मगर इस बुढे का मोह नहीं छूटता पैसों से। मन करता है इसका सारा पैसा बर्बाद हो जाए... आग लगे इसकी धन सम्पत्ति पर, दांत पीसते हुए उसकी आवाज उत्तेजना से कांपने लगी- मैंने कसम खाली है मैं इसके पैसों को छुऊंगा भी नहीं कभी।
-’कितने भाई-बहिन हो तुम लोग?‘
-’२ बहिनें और बस मैं। छोटी वाली रिसर्च कर रही है और बडी वाली डॉक्टरी। एक मैं ही कुछ नहीं कर पाया डॉक्टर साब। एम.एस-सी. के बाद ही घर वालों ने पैसों के लालच में शादी की हथकडयाँ पहना दी। क्या करूं, विरोध के लिए जुबान नहीं खोल पाया उस वक्त। घर वालों का तर्क था... खाऊ उडाऊ पूत है बीबी के आने पर लैन पर आ जाएगा।
....बीबी अच्छी नहीं है क्या? मेरी जानलेवा उत्सुकता चरम पर आ पहुंची। पहली बार उसके उदास चेहरे पर हल्की मुस्कान की रेखाएं बनने लगीं। ’’हाँ, मैंने खुद पसंद किया था मेहा को। अच्छी भली लडकी है मगर मैं आपको क्या बताऊ? कुछ मजबूरियों में ऐसा फंसता गया कि चाहकर भी मेहा को खुश नहीं रख पाया। इस नालायक ने हमें कहीं बाहर निकलने तक नहीं दिया और तो और हनीमून पर ही नहीं जाने दिया। ऐन मौके पर अड गये थे....‘ बहुत जरूरी है क्या कहीं जाना? कौन सी इमरजैंसी आन पडी? सुनते ही मेरा उत्साह बुझ गया। हालांकि मैंने दृढता से विरोध किया मगर माताश्री भी टस से मस नहीं हुईं-’अरे, क्या करोगे वहां जाकर? नाहक पैसा बर्बाद करने की क्या जरूरत है? पास ही के मंदिर*में*घुमा लाओ। तभी सीधे मेरे मुंह पर बम पटकते हुए लताडा था बाप ने-’’पैसे की अहमियत तभी पता चलती है जब खुद चार पैसे कमाने लगोगे। फालतू में पैसा फूंकने की कोई तुक नहंी है। रईसों के चोंचले हैं ये सब, हनीमून वगैरा। वैसे भी अभी रिसेप्शन में ही हमारा इतना सारा पैसा खर्च हो गया....।
-पर मैंने तो मना किया था इसके लिए मगर आप किसी की सुनते ही कहां हैं?
-ऐ लो सुन लो इसकी बेअक्ली की बातें। हमारा एक ही लडका है फिर भी हम रिसेप्शन न दें तो चार लोग क्या कहेंगे? आखिर इस समाज में हमारी भी तो कोई इज्जत है कि नहीं? फिर कल के दिन लडकियों के भी तो सबंध करने हैं हमें।
....मगर मेहा के घर से इतना सारा सामान और ४-५ लाख नगदी भी तो आई है...
....ये तो भई बहुत बढ-चढकर जुबान चलाने लगा है ....हां है हमारे पास पैसा, मगर बर्बाद करने के लिए नहीं। सुन ले कान खोलकर, पसीने का पैसा उडाने के लिए नहीं होता।
जब खुद कमाने लगना, तब दिखाना इतनी गर्मी... समझे? वे पूरी ताकत से दहाड उठे। फिर किसी से कुछ कहने-सुनने की इच्छा नहीं हुई। कंट्रोलिंग हैड बाप था सो खून का घूंट पीकर रहना पडा। अब मेहा के सामने क्या मुँह लेकर जाऊँ? कितने उत्साह और कितने चाव से हमने साथ-साथ घूमने के सपने देखे थे। फलाँ जगह यूं तस्वीरें, ऐसे पोज में खिचवायेंगे। घंटों-तारीखों से बेखबर कमरे में ही दिन रात सोते-जागते, जागते-सोते, खाते-पीते बेसुध पडे रहेंगे मगर.... बोलते-बोलते उसकी जुबान लडखडाने लगी। रुँधे कंठ से भावनाएँ बहने लगीं फिर आँसू पोंछते हुए बोला-’’जानना चाहेंगे मेरे बाप की माली हालत? बहिन की पढाई के लिए यूँ चुटकियों म ३ लाख का ड्राफ्ट बनवाकर दिया था। अभी हफ्ते भर पहले ६ लाख की नई दुकान खरीदी है और हमें मात्र दो हजार देने के लिए इतनी दलीलें....। ओफ ! रह-रहकर बाप की कटूक्तियाँ काट खाने दौडती। जितना सोचता हूँ कनपटी में उतना ज्यादा दर्द बढता चला जाता है।
....’’रिलक्स आशीश, रिलैक्स, माना कि वो इतने कंजूस हैं मगर तुम्हारी माँ क्यों उनकी हाँ में हाँ मिलाती रहती? वो तो मेहा को चाहती होंगी-
-घनघोर अंधविश्वासी और कर्मकाण्डी औरत है वो। पता नहीं किस पंडित ने उनके कान में एक मंत्र फूक दिया कि उन्होंने हमारा जीना दुश्वार कर दिया। किसी न किसी तरीके से वे बंदिशों की बाड में हमें कैद करने के रास्ते ढूँढती रहती। वे किसी न किसी ज्योतिशी, पंडित या तांत्रिक के घनचक्कर में पडी रहती। गाहे ब गाहे यही सुनाया करती काशी का नामी पंडित कै रिया था-जैसे ही इसके हाथ में पैसा आएगा, उसे ये बीबी के साथ उडाएगा और उसी टैम*से इसकी बर्बादी का दौर शुरू हो जाएगा। शनि बडा भारी है*कुल घातक योग बन रहा है और राहू नीच का है सो कभी भी*कोई भी दुर्घटना के प्रबल योग है तो संभलकर चलो बेटा..., फिर वे इन ग्रहों से बचाव के तमाम तरीके हमारे ऊपर इस्तेमाल करती रहती-मसलन २-४ तरह की अगूँठियाँ बनवाकर पहनाना.... वगैरा। एक और बात उनके भीतर गहरे धंसी थी कि मेहा बडे पैसों वालों की लडकी है सो शुरू से ही इसे दाबकर रखना पडेगा वरना कहीं ये हमारे लडके को लेकर रफूचक्कर ही न हो जाए अपने घर की तरफ। येन-केन प्रकारेण उन्होंने हमें अपने सुरक्षात्मक कवच में खींचना शुरू कर दिया था।
बोलते-बोलते उसकी निगाहें खिडकी से दिखते इक्के-दुक्के पेडों की तरफ उठ गई। उस शांत माहौल में बस २-४ लोग ही जाते दिख जाते थे। बंगले के आगे वाले बरामदे से जुडे दो बडे कमरों को ही क्लिनिक का रूप दिया गया था जहाँ करीने से सजाए गमलों को सीढयों का शेप देकर सजाया गया था। उतरती हुई उस शाम में बारिश की हल्की बूँदें अपनी गुपचुप उपस्थिति जमा देती थीं। इतना उडेलने के बाद उसके चेहरे पर थोडे से सुकून की छाँव दिखी गोया बादल के उस टुकडे के बरस जाने के बाद आकाश का तो कोना खाली हो गया हो।
तभी डॉक्टर प्रभात उसे केबिन के अंदर हडबडाते हुए घुसे... हाँ तो मिस्टर आशीश, अब कैसा महसूस कर रहे हो? कल रात ठीक से नींद आई? दवाइयाँ नियम से ले रहे हो न? गर्दन उठाकर उसने डॉक्टर की आँखों में मूक सहमति देनी चाही फिर धीमीं आवाज में बोला-’ डॉक्टर साब, बेचैनी नहीं जाती। इस हाथ को देखते ही कडुवाहट और प्रतिहिंसा जगने लगती। एक अजीब तरह की हताशा, डर और फिर घबडाहट होने लगती। रह रहकर वही निरर्थक ’सोच‘ दिमाग पर हावी हो जाती। -’कौन है मेरा इस दुनिया में? किसके लिए जिऊँ? मैं कितना अकेला और बेबस हूँ डॉक्टर साब। अब तो मेरे पास मेरी बीवी भी नहीं आना चाहेगी और फिर ऐसी हालत में किसी से भी दया की भीख कतई नहीं चाहिए मुझे। डॉक्टर साहब....कोई मुझे प्यार नहीं करता, सबके सब मतलबी हैं और-और-आई एम रियली हेल्पलेस.... फिर वह रुक-रुककर बोलने लगा- घर में घुसते ही पहला विचार यही आता है.... कौन सा घर? किसका घर? इतना अपमान तो कोई गैरों का भी न करे। डॉक्टर साब, एक मौत जीते जी होती है और जो जीते जी मरता है वह असल मौत से कई गुना ज्यादा बुरी होती है।....मगर आशीश.... इन सबमें तुम्हारी बीवी का क्या कुसूर जिसे तुम इतनी बडी सजा दे रहे थे.... वो तो तुम्हें कितना चाहती है....‘ बीवी के प्रति अपनी जानलेवा उत्सुकता को मैं कैसे भी दाब ही नहीं पा रहा था।
-’हूँ.... मेहा....आँखें भींचे वह खामोश बैठा रहा थोडी देर, फिर निरपेक्षता दर्शाती टोन में बोला....डॉक्टर साहब उसकी एक अलग दुनिया है....आधा टैम तो उसका कुत्तों के लिए रिजर्व रहना और आधा दोस्तों में, फिर बचा-खुचा वक्त मेरे लिए। शादी के बाद उस दिन उसका पहला जन्मदिन था जिसे हम अपने तरीके से मनाना चाहते थे मगर उस साले बुढऊ ने मेरी सारी इज्जत धूल में मिटा दी जबकि मैं मेहा को सरप्राइज देना चाहता था।
-’क्या करते हैं तुम्हारे वो बुढऊ बाप?‘
-’फोटोग्राफी की दुकान है। मेरा एकदम मन नहीं करता कि मैं वहाँ बैठूं और जब कभी जाता भी तो वो मुझे चोरों की तरह घूरता कहता- ’पढने-लिखने में मन नहीं लगता क्या? या यूं ही सैरसपाटे के लिए चले आते हो। हुंह... देखो आशीश यदि वाकई पढने में दिलचस्पी नहीं रही तो यहीं मेरे साथ इस बिजनेस में ही हाथ बटाओ। खामखाँ यूं इधर-उधर घूमकर टैम बर्बाद करने से क्या फायदा?‘‘
-हुंह! ये भी कोई बिजनेस है? फोटोग्राफी के इस ओल्ड फैशन्ड बिजनेस में मेरी कतई कोई दिलचस्पी नहीं है। आजकल तो वैसे भी सबके पास अपने-अपने कैमरे होते हैं। तो तस्वीरें खिचाने कौन आता होगा? मैं अपनी टैलेंट को यहाँ नहीं खपा सकता। आखिर मेरी जिन्दगी का सवाल है ये....‘
’ऐ आशीश इसे हिकारत की नजरों से मत देख। तुझे जो दिखाए सो कर।‘ अचानक वे दुकान छोडकर तेज कदमों से कहीं और चले गए। उन्हें जाते देख अगले ही पल एक आइडिया कौंधा....’क्यों न इस पुराने पडे कैमरे को बेचकर कुछ पैसों का इंतजाम किया जाए और उसी से मेहा को कोई खूबसूरत गिफ्ट दिया जाए। यूं भी बरसों से बेकार पडी-पडी सड रही है ये पुरानी मशीनरी और में झटपट गिफ्ट पैक करवाकर घर लौट आया फिर मेहा को स्कूटर के पीछे बैठाकर मैं फर्राटेदार हवाओं के साथ उडाने भरने लगा। वह मुझे कसकर पकडे हुए थी और मैं घोडे की तरह कुलांचें भरता हुआ आसमान को नाप रहा था।
साइक्रेटिक के सामने एकालाप करते करते अचानक वह चुप हो गया। बाहर की रिमझिम से बेखबर वह अन्दरूनी गाँठों को खोलने में इस कदर डूबा हुआ था कि बोलते-बोलते उसकी आँखें अपने आप मुँदती चली गई।
-’फिर.... फिर क्या हुआ?‘
-फिर तो विस्फोट ही हो गया था। उस दिन जैसे नहाए धोए व्यक्ति के ऊपर किसी ने जानबूझकर मैला फैंक दिया हो। वो कमीना बुड्ढा जोर-जोर से चीखने लगा... ’’किससे पूछकर बेचा तूने कैमरा? तुम्हारी इतनी हिम्मत कि बिना मुझसे पूछे अपनी ही दुकान पर सेंध लगाई तूने? वाह बेटा! वाह .... खूब नाक ऊँची कर रहे हो बाप की, खाऊ उडाऊ औलादें पैदा की हैं हमने, निकम्मा कहीं का। दाँत पीसते बाप की जुबान से लगातार नुकीले बोल फिकते जा रहे थे जैसे कोई धारदार छुरी को बेरहमी से मेरे पेट में घुसेडता जा रहा हो।
अवाक ! भौंचक्का ! हतप्रभ खडा रहा ठूंठ की तरह। उस वक्त तो दिलोदिमाग जैसे लॉक हो गया था। पल भर के लिए तनमन मुर्दा बन गया था, कुछ भी बोलते नहीं बना। अपमान से जलता तनमन लिए खडा रहा। फिर थोडी देर बाद गले से गों-गों करती आवाज निकली...‘‘ तो आज आखिर मेरी हैसियत का आईना दिखा दिया आपने। यानी मेरा उस दुकान पर कोई हक नहीं तो फिर मैं हूँ क्या? कौन हूँ आपका? कोई मामूली सा नौकर या वो भी नहीं; तो आखिर क्यों पडा रहूँ यहाँ और किसके लिए? ’’क्रोध और अपमान से सर्वांङग कांप रहा था।
-’जन्मदिन मनाने के लिए चोरी की तुमने, क्यों आशीश, खूब लिखा-पढाकर चंट बना दिया है इस चुडैल ने तुझे, तभी बाप से जुबान लडाना सीख लिया यानी चोरी और सीना जोरी। गलती तो तुम्हारी है ही बेटा और वो भी इसकी वजह से....‘ सयानी माता श्री ने तरेरती आँखों से मेहा को घूरा और ताना सुनाते हुए बडबडाने लगीं.... ’’आजकल की लडकियों को होटलबाजी, हनीमून जैसे पता नहीं कौन-कौन से नए-नए शौक चर्राने लगे हैं। जन्मदिन मनाना ही था तो हमसे कहते, हम मंदिर में जाकर प्रसाद चढा आते। वे लगातार भुनभुनाती जा रही थीं।
मेहा के सामने अपनी इस दुर्गति और अपमान को झेलना पड रहा था। काश ! कि यह धरती फट जाती तो इसी वक्त इसमें समा जाता....‘ यही सब सोच-सोच कर गर्दन नवाए शर्मसार होता रहा। हताशा और बेबसी की पराकाश्ठा में हलाहल से मुंह भर जाता.... लगता है सब कुछ पलट जाएगा मगर अफसोस कि कुछ भी नहीं पलटता सो मजबूरन जहर को गुटकना पडता है। आश्चर्य ! कि फिर भी मैं जिंदा कैसे हूँ। डाक्टर साहब, मेरे लिए तनाव जैसे मामूली शब्द अपनी अहमियत खो चुके हैं। यूं तो कोई भी चलते-फिरते कह देता है-बहुत टेंशन है मगर कोई मुझसे पूछे, हकीकत में तनाव के माने क्या होता है। जैसे महीनों समुंदर में सिर घुसेडकर भी यदि मैं साबुत बचा हूँ तो वाकई मेरे अंदर जहर भरा होगा न डाक्टर साब? हर सुबह मेरे लिए एक नया सूरज उगता है मगर अफसोस ! कि उसकी रोशनी मेरे भीतर के अंधेरों को रोशन नहीं कर पाती। मैं घंटों अकेले बैठा-बैठा सिर्फ सोचता रहता हूँ फिर नींद उड जाती है, उसके बाद अकेले में रोते देखकर ही घर वालों ने मुझे यहां जबरन भेजा जबकि मैं यहाँ आने को तैयार नहीं था।
मैं उसके निस्तेज चेहरे को गौर से देखने लगा-मुरझाई आंखों में हताशा का गहरा काजल लगा हुआ था। आवाज में जैसे जीवन का कोई चिह्न नजर नहीं आ रहा था। क्लिनिक के उस केबिन में हमारी आवाजें सिर्फ हमीं सुन पा रहे थे। खिडकी से आती ठंडी हवा के साथ-साथ अनायास कोई मीठी धुन सुनाई पडी-कोई माउथ आर्गन बजा रहा है; वह धीमे से बुदबुदाया।
धीरे-धीरे शाम का धुंधलका उसकी आँखों में उतरने लगा। पुराने जमाने के ऊँचे बंगले की पीली दीवारों के बीचोंबीच टंगी पेंटिंग को ध्यान से देखता वह जमुहाई लेने लगा। दरवाजे पर हिलते-डुलते परदों में से बरामदे में पंक्तिबद्ध रखे गमले दिख जाते थे जहाँ ४-६ आराम कुर्सियों पर कुछ और लोग अपना गमगीन चेहरा लटकाये अपनी-अपनी बारी आने का खामोशी से इंतजार कर रहे थे। डाक्टर सा

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