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05 July 2008
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यथास्थिति‘
दिनेश पालीवाल

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हम हमेशा दो दुनियाओं में जीते हैं-एक वह, जिसमें हमें रोज-बरोज जीना पडता है, हम, हमारा परिवार, हमारी नौकरी या काम की जगह हमारे आसपास के लोग, गाँव व शहर, समाज और देश-प्रदेश, दूसरी दुनिया... यानी हमारी अपनी निजी दुनिया, दिल-दिमाग, दृश्टि, सोच और संवेदनाओं की दुनिया। कहानी शायद इन दोनों दुनियाओं के बीच संबंध बनाने की कोशिश होती है।
जन्तु विज्ञान की प्रयोगशाला में स्कॉलियोडॉन (एक समुद्री मछली) की कपाल तंत्रिकाएँ विच्छेदित करके छात्र-छात्राओं को दिखा रहा था। मेज के चारो तरफ उनका झुंड विच्छेदन-ट्रे पर झुका हुआ था। एक छात्रा बिल्कुल सानिया मिर्जा की तरह अपने भीतर-बाहर ठसाठस भरी हुई किसी विदेशी परफ्यूम में गमक रही थी। अच्छा ही था। इससे फॉर्मेलीन की दुर्गंध दब-सी रही थी पर उसके जीवंत अंग जिस तरह कुहनी से रगड खा रहे थे उससे मेरी कपाल तंत्रिकाएं भी संवेदित हो रही थीं। अच्छा भी लग रहा था और कहीं यह मन भी हो रहा था कि उसकी तरफ कुछ ऐसे देख लूँ कि वह संभल जाए और अपने अंगों की रगड मेरी कुहनी से कुछ दूर हटा ले.... छात्रों के बीच छात्रा से ऐसा कुछ कहना उचित नहीं लग रहा था। आए दिन कालेजों-विश्वविद्यालयों में प्राध्यापकों पर तमाम तरह के इल्जाम लगते रहते हैं, जिनकी वजह से हमें बदनामी झेलनी पडती है।
वही, सानियानुमा छात्रा अचानक बोली, ’’सर.... लैब के दरवाजे पर कोई बूढा आपको बुला रहा है...।
विद्यार्थियों के बीच में एक फाँक बने दरवाजे की तरफ देखा.... मैला कुर्ता, ऊँची धोती, पैरों में फटे, धूल सने किरमिच के जूते। कई दिनों की दाढी के बीच थका-माँदा, झुर्रियों अंटा चेहरा, बुझी, गड्ढे में धंसी आँखें। सीढयाँ चढ कर लैब तक आने के कारण हाँफता हुआ जर्जर शरीर साधे रखने के लिए दरवाजे की चौखट बाएँ हाथ से थामे... मोटे लैंसों के चश्मे में बेडौल दीखती आँखों से वह लगातार मेरी तरफ ताके जा रहा था।
सहसा याद आया... अरे राम सनेही मास्साब ! हडबडा कर उठ खडा हुआ.... इतने अर्से बाद अचानक मास्साब यहाँ कैसे? बाईं बांह थाम उन्हें कुर्सियों तक ले कर आया, बैठा कर चपरासी से ठंडा पानी फिर चाय आदि के लिए कह, छात्रों को जल्दी से समझा उन्हें काम में लगा दिया।
’’कैसे तकलीफ की सर....?‘‘ अपनी कुर्सी उनके नजदीक खिसकाई, ’’कालेज में विभाग खोजने में कश्ट तो हुआ
होगा....।‘‘ बेवजह हंसने का प्रयास किया।
’’कालेज के गेट पर बायीं तरफ जो सरस्वती जी की तस्वीर बनी हैं, वहाँ दो वाक्य लिखे हुए हैं, हालांकि वे धुँधले पड गए हैं पर उन्हें अभी भी पढा जा सकता है-’सा विद्या या विमुक्तये‘ तथा ’तमसोमाज्योर्तिगमय.. क्या इन वाक्यों का अभी भी कोई अर्थ रह गया है...?‘‘ मेरे सवाल पर उन्होंने ध्यान नहीं दिया। वे अपने भीतर कहीं थे और वहीं से बोल रहे थे। अपनी बैडोल, बुझी आँखों से टपर-टपर मेरी तरफ ताकते हुए।
उन वाक्यों का क्या, अब तो किन्हीं आप्त वाक्यों का कोई अर्थ नहीं रह गया। बरसों पहले जब मैं नौकरी शुरू करने के पहले दिन इस कालेज में घुसा था तो मेरा ध्यान भी सरस्वती की तस्वीर और आप्त वाक्यों पर गया था। इन चमकीले वाक्यों ने मेरे भीतर एक नया जोश, एक नया उन्मेश भर दिया था.... चाल में एक ठसक आ गई थी और लगा था कि मैं इस महाविद्यालय में विद्या के जरिए विद्यार्थियों को तमाम दुर्गुणों से मुक्ति दिलाऊँगा... हिंसा, अराजकता, कक्षाओं में न आना, पाठ्य पुस्तकों के प्रति अरुचि, सरल अध्ययनों से परीक्षा देना, फिर परीक्षा के बाद सूटकेस ले कर विश्वविद्यालय के भ्रश्टतंत्र की खोज में निकलना और नंबर बढवा कर प्रथम श्रेणी हथियाने का प्रयत्न करना। पांच-दस हजार में पी-एच०डी० की गाइड द्वारा लिखी-लिखाई थीसिस हथियाना। उसके सहारे किसी कालेज या विश्वविद्यालय के विभाग में घुस जाना... ज्ञान-विज्ञान और सही शोध से दूर-दूर तक केाई नाता न होना... कालेज में हर वक्त सुंदर लडकियों के चक्कर में रहना, उनके लिए लडाई-झगडे... न कहीं कोई सिद्धांत, न सोच, न दृश्टि, न नैतिक मूल्य... अंधेरे में भटक रही इस पीढी को उजाले की जैसे जरूरत ही नहीं है। मैं जरूर कुछ ऐसा करूंगा या कर सकूंगा जिससे यह नई पीढी इन सब अवगुणों से बच कर सद्गुणों की तरफ उन्मुख हो.... पर क्या ऐसा हुआ? कर सका ऐसा?
राम सनेही मास्साब का नाम अब दलित विमर्श के अनुसार सनेही राम होना चाहिए। सहसा प्राइमरी स्कूल में इनके द्वारा की जाती अपनी पिटाई मुझे स्मरण हो आई। कक्षा में हम पाँच ब्राह्मण लडके थे और राम सनेही मास्साब आते ही हमसे गणित के ऐसे कठिन सवाल पूंछते जो हमें किसी तरह न आते और उन्हें नीम की ताजा टूटी लगुदिया से सूने का बहाना मिल जाता। क्रूरता से इनका श्यामल चेहरा किसी यमदूत या जल्लाद की तरह ऐंठ जाता और ये हमारे चीखने-चिल्लाने से बेफिक्र लगातार सूडते रहते। महीनों चली अपनी पिटाई से आंतकित एक दिन जब अपने पिता से इनकी शिकायत की, ’’एक हरिजन मास्साब हैं स्कूल में... श्री राम सनेही जी, हम ब्राह्मण लडकों से हर दिन ऐसे सवाल पूछते हैं जो हमें नहीं आते और फिर हमें पीटने लगते हैं...।‘‘ पिता ने ताड से गाल पर चांटा जड दिया था, ’’खबरदार जो आज के बाद अपने अध्यापक की हमसे शिकायत की। तुम लोगों को सवाल आते न होंगे। कोई अध्यापक बेवजह क्यों मारेगा?‘‘ पिता ने यह भी जोडा था कि अध्यापक की न कोई जाति होती है, न धर्म... वह कक्षा में खडा ज्ञान का अजस्र स्रोत होता है।
कुलबुलाता और कसमसाता रह गया था.... मुझे लग रहा था, अध्यापक की जाति भी होती है और धर्म भी। मुंशी इनायत खाँ स्कूल में सिर्फ मुसलमान लडकों को तरजीह देते हैं और राम सनेही मास्साब हरिजन छात्रों को कभी नहीं पीटते। पर ब्राह्मण लडकों को कभी नहीं बख्शते। जाति और धर्म के नजरिए से मुझे तभी से नफरत हो गई थी। हालांकि पिता गांधी से बहुत प्रभावित थे। उन दिनों हमारे घर में ’रघुपति राघव राजाराम‘ वाली प्रार्थना रोज शाम को होती थी। रामायण पाठ के बाद गांधी जी के प्रवचनों की किताब पिता जरूर बांचते थे। ’’चांद‘‘ के अलावा गांधी जी का ’हरिजन सेवक‘ हमारे घर निरंतर आता था। पिता गांव और कस्बों में हरिजनों के लिए छोटे-मोटे संघर्श करते रहते थे। जमींदार जमुनाप्रसाद पिता की इस हरकत से बहुत चिढते थे और पंचायतों से लेकर जाति-बिरादरी के आयोजनों में उन्हें अक्सर जलील किया करते थे पर पिता को जैसे किसी की परवाह नहीं थी।
राम सनेही मास्साब को पढने का शौक है, यह हमें पता चल गया था। वे गांव की एकमात्र किताबों और किराने के सामान की दुकान पर जा कर शाम को अखबार जरूर पढते थे और उनकी दुकान में किराए पर पढने के लिए दिए जाने वाले जासूसी और रोमांटिक उपन्यास अध्यापक होने के नाते मुफ्त में लाते और दूसरे-तीसरे दिन पढ कर वापस लौटा देते।
अखबार, ’’चांद‘‘ और ’’हरिजन सेवक‘‘ पिता के पढने के बाद मैं बस्ते में रेाज लाकर मास्साब को देने लगा। साथ ही एक अलमारी में रखे उपन्यास... चंद्रकांता संतति, सफेद शैतान, भूतनाथ वगैरह एक-एक कर उन्हें पढने को देने लगा तो तकरीब काम आई। मेरी मारपीट बंद हो गई। कठिन सवाल पूछे जाने बंद हो गए।
स्कूल में खेल-कूद का आयोजन हुआ था। कुश्ती के दौरान एक हरिजन दबंग छात्र से ब्राह्मण छात्र की कुश्ती करवाई। गोल बना कर खडे अधिकांश छात्रों में दीगर जातियों के छात्रों की संख्या बहुत थी। वे उस ब्राह्मण लडके का कस कर उत्साहवर्धन करने लगे और हरिजन छात्र को ’पटक कर मारो‘ जैसे नारे लगाने लगे तो राम सनेही मास्साब का चेहरा तोप की तरह तन गया। वे भकुरते रहे पर छात्रों पर उनके कोप का कोई असर नहीं पडा। ब्राह्मण लडके ने आखिर उस हरिजन को दांव दे कर पटक ही दिया। इस पर राम सनेही मास्साब ने नीचे दबे हरिजन छात्र को हुलकारा, उत्साहित किया। जब उसका वश नहीं चला तो गुस्से में आ कर उसने ब्राह्मण लडक के मुंह पर थूक दिया। वह थूक पोंछने के लिए एकदम उसे छोड उठ खडा हुआ। मौका पा हरिजन छात्र ने उसे दबोच कर पटखनी दे दी। इस कांड पर वहां जम कर मारपीट हुई। बात पूरे गाँव में फैल गई और राम सनेही मास्साब को उत्तेजित गाँव ने घेर लिया। हाथों में लाठियाँ, बल्लम-कांते.... पिता और गाँव के मुखिया दौड कर स्कूल पहुँचे और किसी तरह हाथ-पाँव जोड कर लोगों को शांत किया। राम सनेही मास्साब कुछ दिन की छुट्टी लेकर अपनी किसी रिश्तेदारी में चले गए।
प्रयोगशाला में जब उन्होंने कहा- क्या इन वाक्यों का अभी भी कोई अर्थ रह गया है? तो मेरा मन हुआ, कहूं, इन या ऐसे वाक्यों का क्या कभी कोई अर्थ रहा है? पहले भी ये वाक्य अर्थहीन थे, आज भी है और शायद आगे भी रहें. जब जिसका दांव लग जाता है, वह दूसरे का दमन और दलन करने से नहीं चूकता। पर इस समय राम सनेही मास्साब मेरे पास आए थे। मैं उनका प्रारंभ का पुराना छात्र... चुप ही रहा। चाय-नाश्ते के बाद पूछा, ’’अब बताएं, क्या सेवा करूं आपकी?‘‘
’’हजारी महादेव मंदिर के बाबा भोलेनाथ ने आफ पास भेजा है। हालांकि स्कूल की पुरानी बातों मुझे अब तक याद हैं, इसलिए हिम्मत नहीं पड रही थी। पर उन्होंने कहा, आप ऐसे व्यक्ति नहीं हैं कि पुरानी बातों को गांठ बांध कर रखें।‘‘
’’आप अपनी बात बेहिचक कहें।‘‘ मैंने मुस्कुराकर कहा, हालांकि मन हो रहा था, कह, बचपन की गांठें आसानी से खुलती नहीं है मास्साब!‘‘ मुझसे जो हो सकेगा, जरूर करूंगा।
’’एक तो यह कि बाबा भोलेनाथ ने आपको गांव में याद किया है। बीमार रहते हैं। तुमसे मिलने की बहुत इच्छा है उन्हें.... घुटनों के जोडों में बहुत दर्द है। चल-फिर नहीं पाते। वरना कभी खुद ही मिलने आते। अगर हो सके तो गांव चलें। दूसरे यहां किसी नेता से कह कर पुलिस अधीक्षक से गांव के थाने म दरोगा को फोन करवा दें कि वह मुझे हैरान न करे.... महादेव मंदिर के पास आप तो जानते ही हैं, प्रसिद्ध बडा तालाब है... तमाम देशी-विदेशी पक्षी आते हैं वहां जाडा व्यतीत करने। नहर से वह तालाब हमेशा भरा जाता रहा है। इसलिए आसपास के खेतों की सिंचाई के काम भी खूब आता है। पंचायत के फैसले के अनुसार उसका मछली पालन के लिए ठेका मुझे मिल गया था। करीब अस्सी हजार की मछलियाँ निकलेंगी.... यहाँ विद्यार्थी जैसी मछलियों की चीर-फाड कर रहे हैं, वे वैसी नहीं हैं।‘‘
’’इस मामले में मैं क्या कर सकता हूँ....?‘‘ मैंने अपने आप को बचाना चाहा, कौन बेकार के झंझटों में पडे? नेताओं और पुलिस अफसरों से मेरा अर्से से कोई वास्ता नहीं रहा, बाद में जब आपातकाल की घोशणा हो गई तो शांत बैठ गया। सिवा बहुत सोच-समझ कर अच्छी कहानियां लिखने के, उन दिनों कुछ नहीं किया। सारिका, कहानी, धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, कादंबिनी आदि में उन दिनों ढेरों चीजें लिखीं.. हाथ-पांव बचा कर लिखने का हुनर उन्हीं दिनों आया।
’’बाबा भोलेनाथ का कहना है कि शहर में आप ही हैं जो इस वक्त हमारी मदद कर सकते हैं। तीन साल हमने तालाब में मछलियां पाली हैं। अब जब उन्हें जाल डाल कर पैसा बनाने का वक्त आया तो गाँव के बामन-बनिया-ठाकुर सब एक हो गए। कह रहे हैं, तालाब मन्दिर का है। वहां जीव हत्या नहीं होने दी जायेगी। एक भी मछली मारी तो खून की नदियां बह जाएंगी। यह गांव की धर्मभीरू लोगों की आस्था का सवाल है....।‘‘ मास्साब बोले, ’’आप इस एस०पी० से कह दें तो थाने को फोन हो जायेगा। पुलिस हमारे पक्ष में खडी हो जायेगी तो किसी की हिम्मत नहीं पडेगी, हमें रोकने की, वरना हमारी तीन साल की मेहनत पर पानी फिर जायेगा। बाबा बता रहे थे, आप ने जे०पी० के आन्दोलन के वक्त और आपातकाल के समय बाबा भोलेनाथ की भूमिगत गतिविधियों में बहुत साथ दिया था। उस वक्त आपने साथ न दिया होता तो पुलिस के हत्थे चढ गए होते और जिस तरह छोटा नागपुर के आन्दोलन के दौरान उनका पता-ठिकाना पूछने के लिए उनकी मेडीकल कालेज में पढ रही बहन को पुलिस ने पकड लिया था, फिर उसके गले में दुपट्टा बांध कर मौत के घाट उतार दिया था फिर भी उससे बाबा भोलेनाथ का पता पुलिस नहीं उगलवा पाई थी... वही बाबा आपातकाल में महीनों आफ घर में छिपे रहे थे... बहुत मानते हैं आप को। हमारे साथ चलना पडेगा आप को और यहाँ से किसी नेता को पकड कर एस०एस०पी० से फोन भी कराना पडेगा... कम से कम पुराने विद्यार्थी होने के नाते मेरी इतनी मदद जरूर करोगे, यह आशा ले कर आया हूँ इस वक्त तुम्हारे पास....।‘‘
जिले के एक सरकारी दल के पाएदार नेता के पास पहुँचा। राम सनेही मास्साब की समस्या संक्षेप में बता अपने आने का मकसद बताया तो वे लापरवाही से बोले, ’’कहां आप जैसे पढे-लिखे लोग इस चूतियाचक्कर में पड रहे हैं मास्साब!‘‘ प्राइमरी का हो या कालेज-विश्वविद्यालय का, हर अध्यापक इन नेताओं के लिए एक अदद अदना मास्टर ही है। हालांकि वह नेता मेरा पुराना छात्र रह चुका था फिर भी वह अपने सोफे से उठा तक नहीं था। हम लोगों से उसने बैठने तक को नहीं कहा था। कोफ्त हो रही थी, क्यों आया इनके पास? अपने काम के लिए आजतक किसी के पास नहीं गया पर यह मेरे गुरु जी का काम था और बाबा भोलेनाथ का आदेश.... इसलिए यह अपमान सहना पडा। मुँह से देर तक केाई वाक्य न फूटा तो उन्होंने अपना मोबाइल उठाया और कोई नंबर मिला बाहर बरामदे में हंसते हुए बतियाने लगे।
बैठक में आ नेता जी बोले, ’’कह दिया है मास्साब। तुरंत चले जाएं तो मुलाकात हो जाएगी, वरना जिलाधिकारी के साथ वे अपने इस क्षेत्र के कुख्यात डाकू और उसकी रखैल का समर्पण कराने निकल जाऐंगे।
याद आया, अखबारों में कुछ दिनों से चर्चा चल रही थी इस आत्मसमर्पण की। उससे समझौता हुआ है, उसे दल का टिकट दिया जाएगा और वह आगामी चुनाव लड कर विधान-सभा में पहुंचेगा। रखैल भी कहीं से कोई चुनाव लडेगी। हालांकि उसे गांव के दबंगों ने अपहृत किया था और चार-पाँच दिन तक उसके साथ बलात्कार करते रहे थे फिर पुलिस से बचने के लिए थानेदार को भी उसका स्वाद चखाया था। थानेदार स्वयं उस औरतों के शौकीन डाकू को उस लडकी को सौंप आया था, एक लाख में ! अब दोनों चुनाव लड कर नेता बन जायेंगे।
एस०एस०पी० साहब पुलिस अधिकारियों और जवानों से भरी अन्य जीपों और एक ट्रक के साथ काफिले में निकलने वाले थे। पहले जिलाधिकारी के बंगले पर जाना था फिर समर्पण-स्थल पर। कोई राजनीतिक दल का नेता वहाँ उपस्थित नहीं रहेगा, अखबार टेलीविजन चैनल बात का बतंगड बना देते हैं। सिर्फ अधिकारियों द्वारा सारी कार्यवाही की जाएगी।
जीप में बैठते हुए एस०एस०पी० साहब एक क्षण को रुके, ’’नेता जी का फोन आया था। गांव के दरोगा को कह दिया है। अगर कायदे-कानून का काम होगा तो मदद हो जाएगी... जाइए।‘‘
बंगले से बाहर निकले तो राम सनेही मास्साब बोले, ’’आप साथ चलिए। बाबा भोलेनाथ से भी मिलना हो जाएगा आपका और हमारा काम भी....।‘‘
बहुत टालना चाहा पर वे टले नहीं। साथ जाना पडा। नहर के पुल से बस द्वारा उतर कर गांव तक जाने के लिए करीब तीन किलोमीटर का नहर किनारे का पक्का रास्ता था, पर उससे जाना मुझे उचित नहीं लगा। तमाम ट्रेक्टर, मारूतियां, स्कार्पियो, बोलेरो और सेंट्रो उस रास्ते आ-जा रही थीं। पहचान में आना मेरे लिए ठीक न होगा। गाँव का मामला। अधिकांश पुरानी पीढी मुझसे परिचित है। इंटर तक गांव में रह कर कस्बे के कालेज में पढने साईकिल से आता-जाता रहा था।
’’ढाक के जंगल में महादेव मंदिर का छोटा रास्ता था, क्यों न सीधे उसी रास्ते से चल कर पहले बाबा भोलेनाथ से मिलें...?‘‘ मैंने अपने बचाव और आत्मरक्षा का बहाना बनाया।
’’अब कहां रहा साब ढाक का जंगल.... उस पर गांव के बडे और दबंग लोगों ने कब्जा कर लिया। इस सडक से सीधे मंदिर तक एक कच्चा रास्ता निकाल दिया। बीचों बीच, शहरों में बन रहे मॉल बाजारों की तरह यहाँ के गांवों-कस्बों के लिए ’’चौपाल भवन‘‘ बना है। देख कर अचरज में पड जायेंगे आप... सब कुछ भवन में मिल रहा है... मोटर साईकिल से लेकर कारों तक। टी०वी०, फ्रिज, कूलर, देशी-विदेशी ब्रांडेड सिले-सिलाए कपडे। साडयां। सलवार-कुर्ते। खाद, बीज, चाट-पकौडे यहां तक कि कोल्ड स्टोर तक उसमें हैं।
शहरों को ही नहीं गांवों-कस्बों को भी उपभोक्ता सामग्री द्वारा देशी-विदेशी व्यापारियों ने ठगना शुरू कर दिया। एक तरफ आदमी अपनी पाली हुई मछलियों को ले कर परेशान है, उसकी तीन बरसों की मेहनत बेकार जा रही है। दूसरी तरफ क्रीम-पाउडर से लेकर ट्रैक्टर-कारें, डीजल-पेट्रोल, ब्रांडेड वस्त्र, रोजमर्रा की चीजें, किसान-उपयोगी खाद, बीज, कीटनाशक आदि सब एक ही छत के नीचे।
उम्मीद से कहीं विशाल बनाया गया था चौपाल-भवन और वहां की भीड देख कर चकित रह गया था। जाने क्यों रह-रह कर इकबाल की कविता याद आती रही.... वतन की फिक्र कर नादां/ मुसीबत आने वाली है / मेरी बरबादियों के मशवरे हैं आसमानों में/ न समझोगे तो मिट जाओगे ऐ हिन्दोस्तां वालो / तुम्हारी दास्ता तक न मिलेगी दास्तानों में!
’’बाबा भोलेनाथ वहीं मंदिर पर मिलेंगे ...?‘‘ सवाल पूछा तो राम सनेही मास्साब मुस्कुरा दिये, ’’बाबा ने एक जमीन हडप ली है और एक जवान औरत भी.. धोबी की लडकी रमिया.... आप न जानते होंगे, तब वह पैदा न हुई होगी। बहुत सुंदर है। बाबा जब मंदिर में आ कर रहे, उस तालाब में एक धोबी परिवार आ कर गांव के कपडे धोता था। जाने कैसे बाबा जैसे खडूस ढलती उमर के आदमी ने रमिया जैसी हूर की परी पटा ली। फिर उससे शादी भी कर ली। गांव में बबाल मचा। बाबा भोलेनाथ ब्राह्मण आदमी.... मंदिर में भजन-पूजा करते, कथा-भागवत बांचते। तुलसी की रामायण लोगों को सुनाते.... बुढापा कट जाता। प्रसाद और चढावे से काम चलता रहता पर उनके दिमाग में न जाने माक्र्सवाद का कीडा कहां से घुस गया.... मंदिर पर रहना छोड दिया। धोबी की मौत हुई तो मरने से पहले उसने अपनी जमीन बाबा भोलेनाथ के नाम न करके अपनी लडकी रमिया के नाम कर दी। उसी जमीन पर कुटिया बना कर रहते हैं बाबा.... रमिया उनकी सेवा-टहल करती है। पढने-लिखने का शौक अभी भी है। अखबार और पत्रिकाएं अभी भी आती हैं। ढेरों किताबें हैं उन पर, पर गांव वाले अच्छी नजरों नहीं देखते। कहते हैं, ब्राह्मण हो कर कुल डुबो दिया। धोबिन बैठा ली घर में।‘‘
समझ नहीं पाया, गांव वालों की राय प्रकट कर रहे हैं या अपनी। जब बाकायदा बाप की रजामंदी से शादी कर ली तो किसी को क्यों ऐतराज हो? बाबा भोलेनाथ उन लोगों से तो ठीक ही है, जो औरत को इस्तेमाल भी करते हैं और कोई हक भी नहीं देते, न उसे, न उसकी संतानों को। संतानें, अवैध होने का दंश जीवन भर झेलती है। औरत की बदनामी होती है वह अलग। गांव के कई किस्से अखबार में छपे हैं। पर शायद उनकी किसी को परवाह नहीं है।
बाबा भोलेनाथ छोटा नागपुर क्षेत्र में भी नक्सलपंथी आन्दोलन में थे। कांग्रेस और सी०पी०एम० की नीतियों के घोर विरोधी। भूमिगत जीवन था उनका।
आपातकाल के दौरान कानुपर के एक प्रसिद्ध कामरेड का पत्र लेकर रात के अंधेरे में मेरे पास आए थे बाबा भोलेनाथ। साधु वेश में। पूर्ण आश्वस्ति के बाद अपना परिचय दिया था.... ’’कामरेड भोलेनाथ। कमलसिंह आप से परिचित हैं और कानपुर के ये कामरेड भी....‘‘ पत्र थमा दिया। पढ कर मुस्कुरा दिया, ’’तो आपको हमें छिपाना पडेगा....?‘‘
’’हाँ ! जब तक मैं और कोई सुरक्षित ठिकाना नहीं खेाज लेता....।‘‘ बाबा ने कहा था, ’’आफ गांव के एक मुनीर खाँ है.... पिता रुई धुनने का काम करते हैं गांव में। कानपुर आते-जाते हैं। हम दोनों से मुलाकात है उनकी। पक्के कामरेड हैं। कह रहे थे गांव में एक प्रसिद्ध मंदिर है शंकर जी का। विशाल तालाब उसके पास है। नहर भी दूर नहीं है। कुआँ-बावडी सब हैं वहाँ। आराम से एक कोठरी में रहना हो जायेगा। मंदिर का चढावा, प्रसाद, पूर्णमासी और अमावस को आसपास से तमाम आटा-अनाज दालें आती रहती हैं। मजे से रहिए और भगवान भजन के लिए बाबा का आपका वेश है ही! जब स्थितियां ठीक हो जाएं, चले जाइएगा।‘‘
लगभग तीन महीने रहे बाबा भोलेनाथ हमारे घर के एक कमरे में। अचानक कालेज में एक दिन लाल पगडी वाला चपरासी आया, जिलाधिकारी का अर्दली था, ’’साहब ने आपको अभी बुलाया है।‘‘ कालेज के प्राध्यापकों के कान खडे हो गए। प्राचार्य जी ने बुला भेजा-क्या बात हो सकती है? मैंने अनभिज्ञता जाहिर की-क्या पता? हिन्दी के एक साथी न कहा- इधर जो कहानियां सारिका वगैरह में लिखी हैं उनका कोई लफडा तो नहीं....? आपातकाल है बरखुदार... जरा ठंडे दिमाग से जवाब देना.... मीसा लगा कर अधिकारी बिना बात भी बंद कर रहे हैं आजकल।
धडकते दिल से पहुंचा था जिलाधिकारी बट्ट साहब के बंगले पर। सनाका खा गया जब सारिका का वह अंक मेज पर पडा देखा जिसमें उन दिनों एक चर्चित कहानी कांग्रेस की कारगुजारियों के खिलाफ छपी थी। काटो तो खून नहीं। हलक सूख गया। जिलाधिकारी महोदय आए। कहीं जाने को तैयार हो गये थे, ’’हमें आफ बारे में सब पता है। आपकी लिखी चीजें पढी भी हैं। अच्छा रहेगा, यह सब बकवास लिखना बंद कर दें आप, वरना हमें मजबूरन आप जैसे पढे-लिखे आदमी के खिलाफ कदम उठाना पडेगा... आप अभी तक मेरी श्रीमती जी के कारण बचे हुए हैं। वह आपकी कहानियाँ की फैन हैं, आज आपको उसी ने बुलाया है। आ रही हैं, उनसे बात करिए आप। और हाँ.... ’’एकाएक कहते हुए रुक गये। तीखी नजरें मेरे चेहरे पर जमाए रहे कुछ देर, ’’उस हरामी को घर से अभी भगा दीजिए जिसे आपने तीन महीने से छिपा रखा है। आपको तो माफ भी कर सकते हैं पर नक्सली आंतकवादियों को तो हम कतई बर्दाश्त नहीं करेंगे....। कल अगर वह आफ यहाँ छिपा रहा तो मजबूरन हमें आप दोनों को उठा लेना पडेगा। आप क्या समझते ह