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कभी-कभी ऐसा लगता है कि आज का दौर आत्महत्याओं का दौर है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार विभिन्न कालखंडों की अलग-अलग विशेशताएँ रही हैं। त्रेता, द्वापर, सतयुग....। वर्तमान कालखंड हत्या और आत्महत्या का है। सबको लगता है कि हर समय कुछ नया होने जा रहा है। सब जल्दी मे हैं। सब दौड रहे हैं। हाँफ रहे हैं। पिछले दशक में काँग्रेस पार्टी के वरिश्ठ नेता सीताराम केसरी के बारे में किसी अखबार या खबरिया चैनल ने कहा था, ’’ओल्ड मैन इन हरी।‘‘ आज हमारे समाज का ’’यंग मैन इन हरी‘‘ है। हमारे बच्चे जल्दी में हैं। नौजवान माँ-बाप जल्दी में हैं। नया बनता वैश्विक समाज जल्दी में है। किसी की गाडी आपकी गाडी से आगे कैसे निकल गयी ! बहुत बडी घटना हो गई यह और इसका फैसला जान लेकर और जान देकर ही किया जा सकता है। सलमान खान सडक पर गाडी चलाते समय भूल जाता है कि नीचे जमीन भी है। वह हरदम हवा में उडना चाहता है। हवा में आप आधार विहीन होते हैं। हवा में गति होती है-असीमित गति जो प्रकाश किरणों का मुकाबला कर सकती है। फुटपाथ पर सोते हुए लोग अगर उसकी गाडी के नीचे आकर दम तोड देते हैं तो यह किसका कसूर है? बेघर, फुटपाथी लोगों का या सलमान खान का। दरअसल सलमान खान महज एक नाम नही है। यह प्रवृत्ति है। आते हुए समय के भारी पदचापों की धमक है। यह गर्वित धमक जब नवतेज सिद्धू के हाथों में बजने लगती है तो वह राजनीति की शक्ल ले लेती है और पार्टी बन्दी हो जाती है। जब नव धनाढ्यों के नाबालिग किशोरों की बेकाबू बी.एम.डब्ल्यू० के पहियों में जोश भरी रफ्तार बन जाती है तो मृतकों पर थैलीशाह पिता नोटों की बारिश करने लगते हैं और आँसू सुख जाते हैं। आज के जैसा रंगीन कोलाज पहले संभव नहीं था। राजनीति ने १९४७ म देश का बंटवारा कराया था। अब स्वतः एक और बंटवारा हो रहा है। हमारे गाँव देहात से आया नौजवान भी पढलिख रहा है। माँ-बाप की आशाओं का केन्द्र है। वो भी सपने देख रहा है। सपने तो चारों ओर बिखरे हैं। हमारे बडे पर्दे या टी०वी० के छोटे पर्दे सभी नयी दुनियाँ सर्जित कर रहे हैं। उत्पादों के लंबे चौडे होर्डिंग। खिलखिलाते नौजवान लडके-लडकियां अपने उत्पादों के साथ लुभाते हैं, अपने पास बुलाते हैं। क्या करें वह ! उसे तो महीने में दो हजार मिलते हैं, तीन हजार मिलते ह। गाँव-देहात में चले जाइये। सबेरे से लेकर शाम तक घर की औरत काम में लगी हैं। नौजवान जगह-जगह बैठे ताश के पत्ते पीट रहे हैं। जिसके पास ट्रैक्टर-टयूब वैल है, उसकी खेती है और गाँव की चौधराहट भी है। ऐसे सम्पन्न राजनीति में हैं और संख्या में कम हैं। बाकी तो रोजगार की तलाश में हैं। या फिर आवारागर्दी और सांझ-सकारे राहजनी और चोरी-चकारी। सपने और साधन, दो विपरीत ध्रुवों के बीच खडे ये नौजवान। ये व्यर्थ हो रहे ऊर्जा बिन्दु हैं। इन्हें आप जब चाहें इस्तेमाल कर लें। ये आफ हाथों के पत्थर हैं। ये पत्थर आप धार्मिक जुलूसों में फेंक दें और नित नये दंगे तैयार करें। गुजरात की प्रयोगशालाएँ बना लें। गोरखपुर में मंदिर संस्कृति के विरोधी रहे गोरखनाथ जी के मंदिर की दीवारों में चिन कर गोरखपुर-आजमगढ से लेकर फैजाबाद तक विस्फोटों की अनवरत श्ाृंखला निर्मित कर दें। आप इन ताश पीटते, रास्ता तलाशते नौजवानों के हाथों में बंदूक, तमंचा देकर चुनाव के दौरान बूथ लुटवा दें, सिर फुटौव्वल करा दें। ऐसे मौके ही तो कमाई के होते हैं। वेश बदल जाते हैं। माथे पर बँधी पट्टियों के रंग बदल जाते हैं। नहीं बदलती तो पेट की भूख ! हाथों की बेकारी और दिलो-दिमाग की लाचारी ! जो आँख देख रही हैं वह बेहद चमकदार है और लुभावना है। वहां जिस्म है। बिपाशा बसु है। लाल गाडी में हवा से बाते करता फिल्मी हीरो है। उसकी गाडी और खूबसूरती और अंडरबियर और बनियान पर फिदा होती, ललचाती मल्लिका शेरावत जैसी नायिकाएँ है। लेकिर हाथ-पैर तो बेकार हैं। लुंज-पुंज। शरीर के अंगों में कोई ताल मेल नहीं। भीशण विरोधाभास। निरन्तर चलता अंतर्द्वन्द ! फिर क्या नतीजा? या तो मारो या खुद मरो ! खरबूजा छुरी पर गिरे या छुरी खरबूजे पर। कटना तो उसी को है। मध्यवर्ग की विडम्बना भी इससे भिन्न नहीं है। यहाँ भी सब कुछ ऐसा ही हो रहा है लेकिन शालीनता और खामोशी के साथ। हमारे एक मित्र के अठारह साल के बेटे ने आत्महत्या कर ली। माँ-बाप की इच्छानुसार मेडिकल में नहीं*आ पाया था। अपने माँ-बाप के लिये एक पत्र छोड गया जिसमें*उसने लिखा था ः मैं जा रहा हूँ। वर्ना आप को जाना पडता....। कुछ महीने पहिले एक और हृदय विदारक घटना सुनी थी। कोलकाता के एक अत्यंत महत्त्वाकांक्षी पिता अपने बेटे को ऐसा टेनिस खिलाडी बनाना चाहते थे जिसका नाम दुनियां में जगमग हो। उसका हरपल पिता की निगरानी में होता और टेनिस के लिये होता। उसने भी जान देकर मुक्ति प्राप्त की। एक और मौत जिसने बहुत दिनों तक बैचेन किया एक बारह वर्शीय किशोर की थी। नये जमाने का विश्वास है कि सम्पन्नता और प्रतिश्ठा नामी-गिरामी अंग्रेजी स्कूलों के रास्ते आती है। अंग्रेजी स्कूलों के हॉस्टल की डॉरमेट्री के रास्ते आती है। लेकिन बच्चा वहां खुश नहीं था। उसे माँ-बाप का प्यार चाहिये था। घर की सुरक्षा की उसे जरूरत थी। वह छुट्टियों में घर आया। वह जिद करता रहा कि हॉस्टल नहीं जायेगा। माँ-बाप की जद। कोई रास्ता न देख एक दिन पहले उसने भी जान दे दी। हमारे साथ के*एक शिक्षक दंपत्ति का अटूट विश्वास था कि उनकी बेटी जिस कक्षा में पढती है उसमें उसके अलावा कोई प्रथम स्थान ला ही नहीं सकता। सातवीं कक्षा तक तो ऐसा ही हुआ। फिर आठवीं कक्षा में कोई दूसरा दौड में आगे निकल गया। नतीजा उसे घर छोडकर जाना पडा। शुक्र है वह मर नहीं पायी थी, सो ढूँढ ली गयी। ये मध्यवर्गीय समाज के सपने हैं। यहाँ हर परिवार का सपना आई.आई.एम. अहमदाबाद में पलता है। यहाँ का बाइस चौबीस वर्शीय नौजवान पचास, साठ, अस्सी लाख वार्शिक पैकेज का आमंत्रण पाता है। वह लाखों रुपये सालाना की नौकरी भी ठुकराने की सामर्थ्य रखता है क्योंकि उसे एक करोड तक देने की पेशकश कोई विदेशी कंपनी कर सकती है। यह सपना आज के शिक्षित मध्यवर्गीय समाज का है जो अपने बच्चों को गुलेल में बाँधकर भरपूर ताकत से खींचते हुए आसमान में टंगे एक करोड के पैकेज पर निशाना लगाता हैं। जाहिर है, ज्यादातर निशाने किसी भी ऊँचाई तक नहीं पहुँच पाते और बच्चे नीचे गिरकर दफन हो जाते हैं। ऐसे में अचानक भगत सिंह याद आने लगते हैं। स्वाधीनता संघर्श का इतिहास याद आने लगता है। याद आती तेईस साल*के भगतसिंह और उनके नौजवान साथियों की शहादत। भगतसिंह*ने कहा था, कि हमारे बलिदान से देश की स्वाधीनता का मार्ग*प्रशस्त होगा। अनगिनत, अनाम नौजवान क्राँतिकारी राश्ट्रीय झंडे की शान के लिये ही शहीद हो गये। कैसे थे ये नौजवान ! कैसे*थे इनके माता पिता जो अपने इन बच्चों पर गर्व करते थे। कैसा*था वह समाज जो इन नौजवान सपूतों और उनके भाग्यशाली*माता-पिता के सामने सिर नवाता था। एक आदर्श, एक संकल्प, एक बडा उद्देश्य! इन नौजवानों के सामाजिक सरोकार इतने बडे थे कि जिन्दगी का वह छोटा सा सफर आसमान की ऊँचाई छू लेने की सामर्थ्य रखता था। आदमी को महान न उसकी उम्र की लंबाई बनाती है और न ईंट पत्थर जैसी जमा उसकी दौलत। विज्ञान का एक नियम है। कोई भी वस्तु या माध्यम जब मात्रा में अथाह हो जाता है तो गणना में उसका मूल्य शून्य हो जाता*है। आत्मकेन्दि्रत हो रहे समाज का नौजवान एक करोड की वार्शिक आय से अपनी, जिन्दगी की शुरूआत करता है। अथाह से शुरू हुए आरंभिक कदम। विचार शून्यता और शून्य सामाजिकता से होने वाली शुरूआत। एक ओर सात आसमान की ऊँचाइयाँ और दूसरी ओर पाताल गुफा के अंधेरे। इसी शून्यता का अहसास अभी हाल में क्रिकेट के विश्व कप से शर्मसार होकर लौटी भारतीय टीम को हुआ कि नहीं, कहा नहीं जा सकता। नये अंकुरित हो रहे सामर्थ्यवान खिलाडी भी तुरन्त करोडों में गोते लगाने लगे हैं। किसी भी क्षेत्र में सर्वोच्च ऊँचाई तक पहुंचना लंबी साधना का परिणाम होता है। वही एक दिल है, वही एक दिमाग है। चाहे अपनी कला को अभ्यास के रास्ते पुख्ता कर लेने में केन्दि्रत करो या उसे उत्पादों की चकाचौंध करती विज्ञापन की दुनिया में खपा लो या रैंप पर सुन्दरियों से घिर कर मटक-झटक में व्यतीत कर दो। महेन्द्र सिंह धोनी जब एक समुद्र (या नदी या तालाब, जो भी हो) के किनारे बैठा जलपरी सुंदरियों के साथ विज्ञापन कर रहा होता है तभी उसके खेल के जज्बे और समर्पण और साधना पर प्रश्न चिह्न लगता दिखाई देता है। यहाँ तो खिलाडयों में होड है कि कौन प्रति वर्श कितने करोड कमा सकता है। देशभक्ति और राश्ट्रीयता टी शर्ट पर तिरंगी पट्टियां लगाने या किसी प्रार्थना सभा या संघ सभा में शामिल होने का नाम नहीं है। कितने माँ-बाप अपने बच्चों को सामाजिक सवालों से जोडने की बात करते हैं। खुद उनके सामने मानवीय रिश्ते, परस्पर सौहार्द, समर्पण, राश्ट्रीय सम्मान जैसे सवाल कितने अहम् हैं? भगतसिंह सिर्फ एक बलिदान नहीं हैं। आज के युवा मानस के सामने एक आदर्श भी हैं। एक जलती मशाल भी हैं। नौजवानों के अनेक सवालों के जवाब, सामाजिक उलझनों और टकराव भरे अन्तर्द्वन्द शायद इस रोशनी में हल हो सकें। स वर्तमान साहित्य का नवंबर-दिसंबर २००६ अंक ’’१८५७-जन प्रतिरोध‘ पर केंदि्रत था। जनक्रांति से संबंधित कुछ और सामग्री पाठकों को अच्छी लगेगी। स ’वर्तमान साहित्य‘-कमलेश्वर कहानी प्रतियोगिता में दो कहानियां पुरस्कार के लिये चयनित हुई हैं। श्री कमल की ’’प्रोजेक्ट ऑक्सीजन‘‘ और श्रीमती सुशमा मुनीन्द्र की ’’शो फ्लॉप‘‘। इसके अलावा दस अन्य कहानियों का उल्लेख भी निर्णायक मंडल ने किया। सभी बारह कहानियाँ हम वर्तमान साहित्य में छापेंगे। पुरस्कृत दो कहानियों के अतिरिक्त दो अन्य कहानियां अप्रैल २००७ के अंक में छपीं। चार अन्य कहानियां इस अंक में दे रहे*हैं।



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