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20 July 2008
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एक अरसे से आपको पत्र नहीं लिख पाया। ’वर्तमान साहित्य‘ को आपने नये बोध की अच्छी पत्रिका बना दिया है। उसके अंकों की सर्वत्र प्रशंसा हो रही है। प्रोडक्शन तथा सामग्री की दृश्टि से भी आपने ’वर्तमान साहित्य‘ का नया स्तर प्रस्तुत कर दिया है।
मार्कण्डेय, इलाहाबाद

’वर्तमान साहित्य‘ का मार्च अंक बहुत प्रभावी लगा। बुद्धिनाथ मिश्र की कविताएँ अच्छी लगीं।
सूरज पालीवाल, जोधपुर

मार्च, २००७ अंक ने स्त्री-विमर्श पर विशेश सामग्री प्रस्तुत कर निश्चित रूप से हिन्दी के सुधी पाठकों पर उपकार किया है। महादेवी वर्मा के जन्मशती-वर्श पर व भगतसिंह की जन्म शताब्दी पर क्रमशः महादेवी वर्मा (शिवकुमार मिश्र), ’भगत सिंह होने का अर्थ‘ (सूरज पालीवाल) तथा ’क्या हम भगत सिंह को जानते हैं?‘ (डॉ. कुँवरपाल सिंह) ऐसी सामग्री हैं, जो इन्हें फिर से पढने और जानने के लिए पाठक को विवश करती हैं।
हिन्दी-साहित्य का अध्येता होने के कारण मैंने हिन्दी साहित्य में स्त्री-विमर्श पर काफी पढा और प्रत्येक पत्रिका में स्त्री-विमर्श पर लेख आते ही रहते हैं, मगर किसी का ध्यान स्त्री-विमर्श की चिंगारी मीरा पर नहीं गया, जिसने सामन्ती व्यवस्था में समाज की कुरीतियों यथा सतीप्रथा व जौहर का विरोध कर स्त्री-विमर्श को दिशा दी। डॉ. ऋतु अग्रवाल के इस लेख ’सामन्ती संस्कृति के विरुद्ध पहला सशक्त नारी स्वर ः मीराबाई‘ ने बताया कि जहाँ २१वीं सदी की कन्याएँ भी अपने माता-पिता द्वारा चयनित वर को अस्वीकार करने का साहस नहीं रखतीं, वहीं मीरा ने १६वीं सदी में ’गिरधर गोपाल‘ को अपना वर स्वीकार कर सामाजिक बन्धनों को अस्वीकार किया। इस अंक में वशिश्ठ अनूप के गीत एवं गजलें तथा ऋतु वार्श्णेय की कविता ’स्टोर रूम‘ भी दिल को छू लेने वाली हैं। ऋतु वार्श्णेय ने ’स्टोर रूम‘ में भारतीय सामाजिक व्यवस्था व मानवीय मूल्यों का नंगा रूप प्रस्तुत किया है, तो अनूप जी ने देश की राजनीतिक, सामाजिक व आर्थिक व्यवस्था का चित्र हमारे सामने प्रस्तुत किया है। ऐसी सामग्री ’वर्तमान साहित्य‘ के माध्यम से निरन्तर मिलती रहती है, जो हमें चिंतन करने के लिए मजबूर करती है और समाज के लिए कुछ करने की ललक पैदा करती हैं।
महेश चन्द मीणा, शोध छात्र, हिन्दी विभाग
बी.एच.यू., वाराणसी

’वर्तमान साहित्य‘ का नवीनतम अंक आज ही मिला। किसी कार्य में यदि समर्पण अपने चरम पर हो, तो वह किस प्रकार अपने उत्कृश्ट स्वरूप में खिल उठता है, इसका अन्दाजा ’वर्तमान साहित्य‘ देख कर कोई भी लगा सकता है। अनेकानेक साधुवाद।
राजीव श्रीवास्तव, नई दिल्ली

’वर्तमान साहित्य‘ का मार्च, २००७ अंक मेरे हाथों में है। स्त्री-विमर्श और भगत सिंह पर विशेश सामग्री से परिपूर्ण यह अंक कई दृश्टियों से काफी समृद्ध है। सम्पादकीय में सब कुछ सहती और घुट-घुटकर जीती हुई स्त्री की पारम्परिक छवि के साथ ही शिक्षित, कामकाजी और मुक्तिकामना से पंख तोलती स्त्री की आधुनिक छवि की अच्छी प्रस्तुति हुई है। महादेवी वर्मा पर डॉ. शिवकुमार मिश्र का लेख काफी ज्ञानवर्धक है। प्रफुल्ल कोलाख्यान, डॉ. ऋतु अग्रवाल, सूरज पालीवाल, अलका पाण्डेय आदि के लेख स्तरीय व विचारोत्तेजक हैं। कहानियाँ और कविताएँ भी पठनीय हैं।
इस अंक में वशिश्ठ अनूप के गीत-गजल और कविताओं को ’फोकस‘ में छापकर आपने एक महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। उनका प्रसिद्ध गीत ’इसलिए राह संघर्श की हम चुनें‘, जिसे हम भी गाते हैं, देश भर में सांस्कृतिक आन्दोलनों का मुख्य स्वर बना हुआ है। सुना है आजकल नेपाल में भी लोग इस गीत को गा रहे हैं। उनकी उन्नीस कविताएँ एक साथ उपलब्ध कराने हेतु आप मेरा धन्यवाद स्वीकार करें। आप बिना भेदभाव के श्रेश्ठ पठनीय सामग्री पाठकों को सुलभ करा रहे हैं, इसके लिए हम आफ आभारी हैं।
सुशमा तिवारी, दाउदपुर, गोरखपुर

फरवरी, २००७ का ’वर्तमान साहित्य‘ पढा। यह एक ऐसी पत्रिका है, जो हम नौजवानों के बीच खासी रुचिकर है। इन्फॉरमेशन टेक्नोलाजी के इस युग में जहाँ व्यक्ति को नित नये माध्यमों की आवश्यकता महसूस होती हो, वहाँ पढने की फर्सत किसे है? लोग मोबाइल, टी.वी. (केबल टी.वी.), इंटरनेट जैसे एकाकी कर देने वाले माध्यमों में ही इतने ’उलझे-व्यस्त‘ हैं कि दूसरी किसी चीज की जैसे आवश्यकता ही नहीं है। इस सब के बाद भी हम लोग अंक का बेसब्री से इंतजार करते हैं। सम्पादकीय में आपने नौजवानों की पीडा को समझा। इसके लिए आपका हृदय से आभार।
कृश्ण बिहारी मिश्र ने डॉ. विनीता रघुवंशी की व्याख्या को ’संघीय व्याख्या‘ बताकर अपनी संकीर्ण मानसिकता को जाहिर किया है। कोई भी व्याख्या संघीय या जनवादी नहीं हेाती। वह सिफर् व्याख्या होती है। साधुवाद एक अच्छे अंक के लिए।
डॉ. संजीत सोनी, हरदा (म.प्र.)


मार्च अंक जिसमें ’स्त्री-विमर्श‘ और ’शहीदे आजम भगत सिंह‘ पर विशेश सामग्री प्रस्तुत की गई है, लगा कि सभी लेखकों तथा कवियों ने रचनाधर्मिता का धर्म बखूबी निभाया है। यह प्रयास सार्थक तो है ही, सराहनीय भी है।
पत्रिका में आपने डॉ. वशिश्ठ अनूप के गीतों और उनकी गजलों पर ’फोकस‘ किया है। वस्तुतः, डॉ. वशिश्ठ अनूप के गीत और उनकी गजलें ’दुश्यंत‘ की परम्परा की अगली कडी*हैं।
डॉ. पी.सी. विश्वकर्मा, रीडर, विधि विभाग,
जौनपुर (उ.प्र.)

’वर्तमान साहित्य‘ का मार्च का अंक हर अंक की तरह पाठकों की जरूरत है। स्त्री-विमर्श पर विशेश यह अंक पठनीय एवं यथार्थ से लबरेज है। ’स्त्रियों के प्रश्न और मीडिया की नजर‘ लेख को प्रकाशित कर आपने एक सराहनीय कार्य किया है। मीडिया के नंगे सच को बडी निर्भीकता से हमारे समक्ष सोचने पर मजबूर होने के लिए रख छोडा है। इसके लिए आपको धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ। इसी अंक में आपने डॉ. वशिश्ठ अनूप के गीत एवं गजलें भी प्रकाशित की हैं। हिन्दी गजल आज जिस मुकाम पर है, वहाँ पहुँचाने में डॉ. वशिश्ठ जैसे कवियों की सार्थक पहल है।
मैं यह भी निवेदन करना उचित समझता हूँ कि जिन्हें मंचों पर मैंने सामाजिक बुराइयों पर प्रहार करते देखा है, उन्हें ही मंच के नीचे उन्हीं बुराइयों में लिप्त देखा है।
आर.पी. सोनकर, १३-ए, न्यू कॉलोनी,
मुरादगंज, जौनपुर

फरवरी, ०७ का अंक मिला। आभार। बहुत ही अहम सामग्री इस अंक में है। अंक की कविताएँ प्रभाव छोडती हैं।
नरेन्द्र पुण्डरीक, डी.एम.कॉलोनी, सिविल लाइन,
बाँदा-१६८५६८

’वर्तमान साहित्य‘ का जनवरी, ०७ का अंक। धन्यवाद। पत्रिका में आपका परिश्रम स्पश्ट दिखायी दे रहा है। पत्रिका के अंक आगे भी इसी प्रकार प्रकाशित होते रहे यही कामना है।
डॉ. धर्मेन्द गुप्त, दिल्ली-११००३४

’वर्तमान साहित्य‘ के मार्च, ०७ के अंक में प्रकाशित अनंत कुमार सिंह की कहानी ’मुआर नहीं‘ पढी। कहानी में जगदंबी चाचा के बहू-बेटे का जो प्रसंग चित्रित किया है, उसका कहानी से (कथ्य) कोई संबंध नजर नहीं आ रहा है। कहानी अन्त में आशावाद को जगाती है, लेकिन वास्तविकता से दूर है। भूमंडलीकरण और बाजारवाद के इस भयावह युग में किसानों पर जो भयानक अत्याचार हो रहे हैं, ये आपने सिंगूर और नंदीग्राम में देखे होंगे।
सुप्रसिद्ध लेखिका महाश्वेता देवी जी ने नंदीग्राम में हुए नरसंहार की तुलना जलियाँवाला बाग हत्याकांड से की है। कोई भी बुद्धिजीवी इन अत्याचारों को देखकर अपने आपको स्वस्थ महसूस नहीं करेगा।
संपादक द्वय कुँवरपाल सिंह जी और नमिता जी क्या इस पर कुछ अपनी बात कहेंगे?
शान्ताराम मंजुरे, मबई

(ऐसे मुद्दों पर भावना के आधार पर नहीं, लेकिन तथ्यों को सत्यापित करने के बाद ही किसी निश्कर्श पर पहुँचा जा सकता है और इसमें समय लगता है। आप हमारे सुधी पाठक हैं। इस अंक का ’समय संवाद‘ देखेंगे-संपादक)

’वर्तमान साहित्य‘ का मैं नियमित पाठक हूँ। जनवरी, ०७ अंक में ’फोकस‘ स्तंभ के अंतर्गत हिन्दी के एक सफल आलोचक की पंद्रह कविताएँ पढने का अवसर मिला। ’वर्तमान साहित्य‘ से ही पता चला कि प्रो. अरविंदाक्षन के चार कविता-संकलन प्रकाशित हो चुके हैं। ऐसी खोजी दृश्टि के लिए आपको साधुवाद।
प्रत्येक कवि की कुछ निजी विशेशताएँ होती हैं, उसकी अपनी भाशा होती है और उसका अपना शिल्प होता है। इस दृश्टि से प्रो. अरविंदाक्षन की कविताएँ पाठकों से संवाद स्थापित करने में सार्थक हैं। भूमंडलीकरण के दौर में पहली दुनिया के साथ तीसरी दुनिया के संबंध अथवा उसकी संबंधहीनता को कवि ने बखूबी रेखांकित किया है। उज्जीवित करने का प्रयास भी है।
पन्द्रह कविताओं के पठन के बाद यह पता चला कि कविता का सार्थक आलोचक सबसे पहले एक सफल कवि होता है।
’भूल-गलती ः पुनर्पाठ‘ पठनीय है। कहानियाँ स्तरीय हैं। पंजाबी कहानी उत्कृश्ट है। गरीबी, सांप्रदायिकता, पिछडी जातियों की दुरवस्था, अशिक्षा आदि विशयों पर नमिता जी का संपादकीय किसी भी पाठक को सहज आकृश्ट करता है।
अरुण होता, पश्चिमी बंगाल

वर्तमान साहित्य के १८५७ अंक को आपने ’जन-प्रतिरोध‘ अंक का नाम ठीक दिया है। वीर सावरकर ने इसे ’स्वतंत्रता का प्रथम महासमर‘ कहा था। अंग्रेज इतिहासकार जॉन के ने भी अपनी पुस्तक ’इंडियन मुटिनी में मानो आपकी बात को प्रमाणित करते हुए लिखा है-’’गंगापार के इलाके में ही नहीं, दोआब के जिलों में भी ग्रामीण जनता उठ खडी हुई थी और शीघ्र ही ऐसा कोई ग्राम, नगर व मनुश्य न बचा, जो अंग्रेजों के विरुद्ध खडा न हो गया हो।‘‘ (इंडियन मुटिनी भाग-२, पृ० १९५)
स्वयं अवध का निवासी होने के कारण श्री वीरेन्द्र मोहन के लेख ’बैसवाडा ः १८५७ का संग्राम‘ पर मेरी दृश्टि कुछ विशेश केंदि्रत हुई। बैसवाडा के विद्रोही राजाओं का उल्लेख करते हुये राना बेनी ’माधव‘ सिंह का उल्लेख भी एक ही पंक्ति में कर दिया गया है। उनके महत्त्व पर विशेश प्रकाश नहीं डाला गया। रायबरेली के शंकर गढ के राना बेनीमाधव अवध विद्रोह के एक महत्त्वपूर्ण व्यक्ति थे। वे बेगम हजरत महल के प्रमुख सेनापतियों में थे। उनके नाम पर वहाँ अब भी अनेक लोकगीत प्रचलित हैं-’’अवध का राना है मर्दाना। लिख लिख पतियाँ लाट ने भेजीं आन मिलो राना भाई रे....‘‘ आदि। ’शंकरगढ की लडाई में पराजित होने के बाद भी राना न तो पकडे जा सके और न उनका शव ही मिला था। राना के वंशजों को अंग्रेजों ने बन्दी बनाकर राना का पता बताने के लिए अनेक यातनाएँ दी थीं। परन्तु बाद को उन्हें सीतापुर, बहराइच के बीच स्थित एक बडी रियासत चहलारी के इलाके में तालुके देकर संतुश्ट कर दिया गया था। परन्तु उन वंशजों को सन् १९४७ के पहले उनके रायबरेली जिले में जाने की इजाजत नहीं थी। विद्रोह सीतापुर, हरदोई, लखीमपुर, बारांबकी आदि जिलों में भी हुआ था, जिसका जक्र वीर सावरकर ने अपनी पुस्तक में किया है। सन् ५७ के विद्रोह पर इंग्लैण्ड के लन्दन म्यूजयम में रह कर बडे परिश्रम से लिखी गई वह सबसे प्रामाणिक पुस्तक है। सीतापुर, बहराइच आदि जिलों में फैला इलाका चहलारी कहलाता था। वहाँ के आह्वान पर सबसे पहले अंग्रेजों से युद्ध किया था। वे इस युद्ध में मारे गये थे। उस समय उनकी आयु केवल सोलह-सत्रह वर्श की थी, और उसी वर्श उनका विवाह हुआ था। सीतापुर छावनी के सैनिकों ने विद्रोह कर दिया था। बैसवाडे के विशय में मुझे ये सूचनाएँ उनके वंशज स्वराना सूर्य विक्रम सिंह से मिली थीं, जो सीतापुर में थान गाँव रियासत के तालुकेदार थे। मेरे पिता उस रियासत में मैनेजर थे। राना बेनीमाधव सिंह के विशय में डॉ. लक्ष्मी सागर वार्श्णय ने ’आधुनिक हिन्दी साहित्य‘ शीर्शक अपने शोध-प्रबन्ध में उन पर लिखे गये लोकगीतों का उल्लेख किया है। दो दशक पहले डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल ने उनके जीवन पर ’पुरुशोत्तम‘ नामक एक उपन्यास भी लिखा था।
अंक में तत्कालीन साहित्य से दी गई सामग्री का चयन भी सराहनीय है। फरवरी २००७ के ’वर्तमान साहित्य‘ में पाठक मंच में छपा श्री मलखान सिंह सिसौदिया का पत्र भी पठनीय है। उसमें जहाँ आफ द्वारा सन् ५७ के विद्रोह पर निकाले गये अंक की प्रासंगिकता को स्पश्ट किया गया है, वहीं, साथ ही साथ, भ्रान्त इतिहासकारों के विद्रोह के संबंध में गलत निश्कर्शों का खण्डन भी सशक्त रूप में हुआ है।
कृश्ण बिहारी मिश्र

’वर्तमान साहित्य‘ का मार्च २००७ अंक युगीन परिदृश्य सम्पादकीय दर्पण में निहित है। महादेवी वर्मा की जन्मशती वर्श में शिवकुमार मिश्र का स्मरण अंश सराहनीय है। भविश्य में ’महादेवी वर्मा‘ विशेशांक निकाला जाये तो श्रेयश्कर होगा। कविताओं में बुद्धिनाथ मिश्र की ’सीमा मासी‘ में माँ की पुत्र के प्रति वात्सल्य भावना तथा नरेन्द्र तिवारी की ’आते हैं ऋतुराज‘ कविता में चित्रात्मकता, डॉ. उत्तिमा केशरी की ’बंदरू कुम्हार‘ में आर्थिक विपन्नता, कर्म के प्रति समर्पण भावना निहित है। अमर शहीद भगतसिंह पर ’सूरज पालीवाल‘ का लेख, देश के प्रति कर्तव्यबोध जाग्रत करता है। चुनाव परिप्रेक्ष्य में भगतसिंह की धम को राजनीति से अलग रखने की बात ’समय संवाद में विचारणीय है। हमारे नेता धर्मविहीन राजनीति करे तो साम्प्रदायिकता की आग में विलुप्त होती मानवता को बचाया जा सकता है। कुल मिलाकर पत्रिका गागर में सागर समेटे है।



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