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बजार का सिद्धान्त है कि वह अपने लिए नायक चुनता है लेकिन बहुत सोच-समझ कर वह इस कार्य को अंजाम देता है। वह इसमें ऐसा कोई जोखिम नहीं उठाना चाहता, जहाँ उसका पैसा डूब जाए। वह केवल फायदे का सौदा करना चाहता है और आज हर क्षेत्र का अपना एक महानायक या नायक अवश्य है।
बाजारवाद ने इस दुनिया को इतना मुतास्सिर किया है कि हर कोई आदि से अंत तक पाखंड में डूबा हुआ है। इसे आप चाहे भूमण्डलीकरण या अन्तर्राष्ट्रीयकरण कहें, लेकिन यह जनतंत्र-विरोधी एवं मानव-अधिकारों का सबसे बडा शत्रु है। भारत सरकार अमेरिकी दबाव में कुछ ऐसे कार्य कर रही है, जो जनतंत्र-विरोधी हैं। इसका ताजा उदाहरण भारत-ईरान गैस पाइप लाइन की सरकार की योजना है। अमेरिकी दबाव है कि भारत ईरान के साथ कोई समझौता न करे, इस दबाव के चलते ईरान से अब तक समझौता नहीं हो पाया। उदारीकरण की आर्थिक नीति भी पूँजीवाद प्रेरित है। चाहे कांग्रेस हो या भाजपा सभी पार्टियाँ चाहती हैं कि हमारी आय विकसित देशों की भाँति हो जाए। इसके चलते अमीरी बहुत बढ गयी, किन्तु गरीबी भी उतनी ही बढी। सरकारी सूत्रों के अनुसार, भारत की आय पिछले दशक के मुकाबले ३ गुनी बढ गयी है। लेकिन इसके साथ गरीबी की रेखा से नीचे जीने वालों की संख्या भी २० करोड हो गयी*है।
बाजार के इसी व्यापार को बढाने तथा भोली जनता को छलने के लिए बडे औद्योगिक घरानों तथा बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने फिल्म-जगत के कुछ नायकों को महानायक बनाने की कोशिश की है। दाँव तो बहुत से लोगों पर लगाया, किन्तु इस दौड*में जो सबसे अधिक प्रतिभा-सम्पन्न थे, वे आगे निकल गए।*अमिताभ बच्चन फिल्म-जगत के एक ऐसे ही नायक है, जिन्हें महानायक बनाने में बाजार पूरी तरह से सफल रहा। यह एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है, जो इलाहाबाद के एक सुशिक्षित एवं संस्कारवान परिवार से फिल्मों में आया था। इनके पिता हरिवंशराय बच्चन हिन्दी के सुप्रतिष्ठित कवि थे। उन्होंने कविता को आम जन तक पहुँचाया। वे एक अच्छे अध्यापक भी थे। उनके तथा श्रीमती तेजी बच्चन के नेहरू परिवार से काफी घनिष्ठ संबंध थे। संबंधों की घनिष्ठता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है*कि राजीव एवं सोनिया गाँधी का विवाह हरिवंशराय जी के मकान*में सम्पन्न हुआ। अमिताभ बच्चन को फिल्मों में भेजने का श्रेय भी इंदिरा गाँधी को जाता है। ख्वाजा अहमद अब्बास की फिल्म*’सात हिन्दुस्तानी‘ की भूमिका उन्होंने ही दिलवायी थी। ’सात हिन्दुस्तानी‘ बुरी तरह से पिट गयी कई और फिल्मों में भी वे जनता को आकर्षित नहीं कर सके। एक नायक के रूप में उनकी पहचान राही मासूम रजा द्वारा लिखित ’रास्ते का पत्थर‘ तथा ’आलाप‘ जैसी फिल्मों से बनी। ’जंजीर‘, ’शोले‘ एवं ’दीवार‘ की अपार सफलता के बाद अमिताभ बच्चन ने पीछे मुडकर नहीं देखा। प्रतिभाशाली संवाद-अदायगी, भाषा तथा अभिनय से वे जनता के नायक बन गये। हरिवंश राय बच्चन की कविताओं ने अमिताभ को अलग ही रूप में प्रतिष्ठित किया। वे पढे-लिखे अभिनेताओं की जमात में शुमार होने लगे। अमिताभ में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। बाजार में सबसे ऊँची कीमत प्रतिभा की ही लगती है।
१९९१-९२ में सरकार ने उदारीकरण की नीति अपनायी और बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भारत-आगमन का निमंत्रण दे दिया। इससे छोटे उद्योग धीरे-धीरे समाप्त हो गये। नयी-नयी आर्थिक नीतियों ने टी.वी. चैनलों को स्वतंत्रता प्रदान कर दी। देखते-देखते अन्तर्राष्ट्रीय कंपनियों के कई चैनल बाजार में आ गये। इससे भारतीय पूँजीपतियों एवं व्यापारियों ने भी अपने-अपने चैनल बाजार में उतारे। इसके साथ ही उन्होंने धर्म का भी व्यापारीकरण किया। ’आस्था‘, ’संस्कार‘, ’अखण्ड पाठ‘ तथा कुरान पर आधारित चैनल बन गये। इन चैनलों का उद्देश्य, जनता का कल्याण न होकर, ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाना था। जब मुनाफा ही उद्देश्य हो तो जो ज्यादा बिकेगा उसी का प्रचार भी करेंगे। अंधविश्वास से लेकर अपराध तक सभी वस्तुएँ तेजी से बिक रही है। दंगे भी बिक रहे हैं। पंजाब में सच्चा डेरा सौदा तथा अकालियों के बीच के वैचारिक संघर्ष को सभी चैनल खूब बढाकर बेच रहे हैं।
पेप्सी तथा कोक जैसे शीतल पेय जिनमें अकूत मुनाफा है; का आंरभ में तो भारतीय पेय कंपनियों ने विरोध किया किन्तु उनके विरोध की परवाह सरकार ने नहीं की। इन कंपनियों ने करोडों रुपये ख्ार्च करके फिल्म जगत के महत्त्वपूर्ण लोगों से अपने ’प्रोडक्ट‘ के लंबे-लंबे प्रचार करवाये। भारतीय जीवन पर फिल्मों का जबरदस्त प्रभाव है। जनता की भावनाओं का शोषण कर अपना व्यापार करने के लिए इन नायक-नायिकाओं ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों को पूरा सहयोग दिया। इनके विज्ञापनों से ये नायक-नायिकाएँ करोडों रुपये कमाते हैं। विज्ञापन करने में अमिताभ बच्चन सबसे आगे रहे। जब संसद में कोकाकोला में अधिक मात्रा में कीटनाशक पाये जाने पर प्रतिबंध लगाने की बात उठी, तो सामाजिक संस्थाओं ने कोकाकोला का विरोध किया। उनकी बिक्री आधी घट गयी। अमिताभ एवं उनके साथियों ने ऐसी उल्टी हवा चलायी कि कोका कोला का अमृत को दर्जा दिया। लाखों लोगों की जन्दगी बरबाद करने वाली भोपाल गैस त्रासदी के उत्पादक यूनियन कार्बाइड के उत्पाद ’एवरेडी‘ का प्रचार भी हमारे नायक-नायिका करने से नहीं चूकते।
पिछले दिनों उत्तर प्रदेश में चुनाव हुए। अमिताभ बच्चन मुलायम सरकार की प्रशस्ति गाते रहे, उत्तर प्रदेश को उत्तम प्रदेश घोषित करते रहे और यह कहते पाये गये कि वे इसी प्रदेश में पुनः जन्म लेना चाहते हैं। इस विज्ञापन पर करोडों*रुपया खर्च किया गया, और पता नहीं यह पैसा आया कहाँ से। अमर सिंह इस व्यवस्था के सबसे बडे नायक हैं। राजनीति में नैतिकता जैसी चीज नहीं होती, यह उन्होंने सिद्ध कर दिया। एक कहावत है कि तुम अपने मित्रों के बारे में मुझे बताओ, मैं तुम्हें तुम्हारे चरित्र के बारे में बता दूँगा। अमिताभ बच्चन एक बदनाम आदमी के साथ क्यूँ हैं ? इस पर सोचने की आवश्यकता है। इस सवाल का जवाब अमिताभ के करोडों फैन उनसे जरूर चाहेंगे। एक बात और, भारत में मानवीय एवं सामाजिक संबंधों को भुनाया नहीं जाता है। अभिषेक-ऐश की शादी का पूरा अधिकार एक प्राइवेट सेटेलाइट चेनल को १० करोड में बेच दिया गया। हर टी.वी. चैनल इस शादी के अधिकार लिए पागल हो गया था,*जैसे भारत की सबसे बडी समस्या यही है। बाजार का दबाव इन*चैनलों पर देखने को मिला। अमिताभ के जन्मदिवस पर पूरे दिन टी.वी. चैनल उनका गुणगान गाते रहे और जनता से भी एस.एम.एस. के जरिये करवाते रहे और कमाते रहे। जब वे बीमार होते हैं तो उनके स्वास्थ्य के लिए इसलिए प्रार्थना की जाती है कि उनका ५० करोड रुपया डूबने से बच जाए। बाजार को अपने*मुनाफे की चिंता बनी रहती है। अमिताभ से एक निवेदन और करना*था कि जिस पिता की कमाई एवं आशीर्वाद से वे इस मुकाम तक पहुँचे हैं, उनका यह शताब्दी वर्ष है। हरिवंश राय बच्चन न केवल हिन्दी के एक बडे कवि, बल्कि एक महत्त्वपूर्ण लेखक भी थे। उनकी आत्मकथा ’क्या भूल, क्या याद करूँ‘ हिन्दी में आत्मकथा लेखन का दिशा-निर्देश करती है। अमिताभ जी अपनी आमदनी का केवल एक प्रतिशत बच्चन शताब्दी के लिए दे दें तो इससे हिन्दी साहित्य का बहुत भला होगा। किन्तु शायद वे ऐसे काम भूल गए हैं। ऐसे लोग घाटे का सौदा नहीं करना चाहते हैं।
भारत में क्रिकेट कभी भी राष्ट्रीय खेल का दर्जा नहीं पा सका। हाकी-फुटबाल बरसों से राष्ट्रीय खेल थे लेकिन बाजार जब कला और संस्कृति पर हावी हुआ, उसने खेल को भी अपने प्रभाव में ले लिया। खेल में उन्होंने क्रिकेट को अपने व्यापार का केन्द्र बनाया और मीडिया को पूरी तरह इस काम के लिए इस्तेमाल किया। देखते-देखते क्रिकेट हिन्दुस्तान के गाँव-गाँव में पहुँच गया और हाकी-फुटबाल जैसे अपेक्षाकृत सस्ते खेल हाशिए पर आ गये। सारा ध्यान क्रिकेट और इससे होने वाली कमाई पर केन्दि्रत हो गया। कई साल तक बाजार ने सुनील गावस्कर को नायक बनाया, फिर कपिल देव आये। फिर उसके बाद सचिन तेंदुलकर को तो बाजार ने नायक ही नहीं बल्कि महानायक बना दिया। यह जानकर आश्चर्य होता है कि एक आदमी क्रिकेट से ५०० करोड रुपया कमा सकता है। खेल और कला के दो अरबपति हैं-सचिन और अमिताभ। जहाँ मुनाफा होगा, वहाँ बँटवारे को लेकर झगडा होगा। क्रिकेट का व्यक्तिवादी पक्ष यह है कि इसमें एक व्यक्ति का महत्त्व ज्यादा होता है टीम का कम। यह अकेला खेल है, जिसमें खिलाडयों के बीच में पैसे का भेदभाव है। जब क्रिकेट बोर्ड पर दबाब पडा तो बोर्ड राजी हुआ कि सभी खिलाडयों को बराबर राशि दी जाए। पर कुछ खिलाडयों ने बोर्ड की नहीं चलने दी। यह संविधान के इस कानून का उल्लंघन है, जिसमें यह कहा गया है कि एक जैसा काम हो तो एक वैसा वेतन भी मिलेगा।
आखिर क्या कारण है कि सचिन २ वर्षों से असफल रहने के बाद भी अब तक मीडिया की आँख के तारे बने हुए हैं। वस्तुतः, बाजार को अभी अपने पसंद का नायक नहीं मिला है, जैसे ही उसे अपने पसंद का नायक मिला, वह सचिन को छोड देगा।
बाजार हमारे समाज का नियंत्रक क्यों है ? आखिर क्या कारण है कि १२ करोड लोग केवल उपभोक्ता बने हुए हैं। एक हिस्से की आमदनी बहुत बडी है। इस उपभोक्तावादी समाज के सामने कोई नैतिक और मानवीय मूल्य नहीं है। यह एक अंधी दौड है। इस दौड में व्यापारी, राजनेता, सरकारी कर्मचारी, मध्यवर्गीय लोग सभी शामिल हैं, जिनके पास न कोई सोच है और न ही कोई सामाजिक उद्देश्य है। इस उपभोक्तावादी व्यवस्था में विचारहीन, चेतनाहीन तथा संवेदनहीन समाज दुनिया के व्यापारियों के लिए चारागाह है। बस, अच्छे प्रचार-साधन एवं चमक-दमक की जरूरत होती है।
प्रेमचंद ने १९३६ में ’महाजनी सभ्यता‘ के बारे में जो परिकल्पना की थी, वह आज पूरी तरह चरितार्थ हो रही है। प्रेमचंद ने कहा था कि महाजनी सभ्यता का केवल एक उद्देश्य है, मुनाफा एवं केवल मुनाफा और कुछ भी नहीं। इस समस्या पर आज गंभीरता से सोचने की आवश्यकता है कि यह उपभोक्तावाद हमें कहाँ ले जाएगा।
पुनश्चः इस वर्ष जून में कबीर की ६१०वीं जयन्ती (जन्म १३९८) है। कबीर आज भी हमारे लिए प्रासंगिक है, क्योंकि अंधविश्वास एवं पाखंड हमारे समाज में आज मध्यकाल से भी अधिक हैं। इसलिए, आज कबीर से हमारी निकटता बढती जा रही है। कबीर ने जो बात अपने समय में कही थी, आज उसकी और भी आवश्यकता है-
’’कबिरा खडा बाजार में, लिए लुकाठी हाथ।
जो घर जारै आपण, चले हमारे साथ।‘‘
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