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Vartmaan Sahitya ::June, 2007
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१८५७ से ही हमें स्वतंत्रता प्राप्ति का मूलमंत्र मिला
जाहिद खान

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हिन्दुस्तानी तवारीख में १८५७ वह साल है जब मुल्क की दोनों बडी कौमें हिन्दू और मुसलमान अपने सारे मतभेद भुलाकर अंग्रेजो हुकूमत के खिलाफ मैदान में उतर आईं, यह एक जनक्रांति की शुरूआत थी।‘‘ यह उद्गार थे विचारक शायर वकार सिद्दीकी के।
म.प्र. प्रगतिशील लेखक संघ की वैचारिक गोष्ठी १८५७ एक जनक्रांति विषय पर आगे बोलते हुए श्री सिद्दीकी ने क्रांति की नाकामयाबी की वजह का विश्लेषण करते हुए कहा, ’’दरअसल हमारे पास उस समय जो नेतृत्व था उसके पास अवाम के लिए कोई नीति नहीं थी। उसके पास मुस्तकबिल का कोई खाका नहीं था। इसलिए यह क्रांति असफल हुई बावजूद इसके हम उस दौर के क्रांतिकारियों के कारनामों को भुला नहीं सकते।‘‘ १८५७ क्रांति की महान घटना को मौजूदा वक्त से जोडकर जनवादी विचारक श्री सिद्दीकी ने आगे कहा ’’१८५७ क्रांति की हिन्दू-मुस्लिम एकता से सबक लेकर हमें साम्राज्यवादी, साम्प्रदायिक शक्तियों के खिलाफ एकजुट हो उठ खडा होना चाहिए। जनवादी, प्रगतिवादी लोगों की क्रांति का ख्वाब तभी पूरा होगा जब अवाम तक हमारा प्रोग्राम पहुंचेगा और जनता ऐसे अनुष्ठानों में दिल से जुडेगी।
विचार गोष्ठी के सूत्रधार प्रो. पुनीत कुमार ने प्लासी युद्ध के बाद अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोहों का जिक्र करते हुए कहा, ’’अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह का जो सिलसिला शुरू हुआ उसका क्लाइमेक्स १८५७ था। जिसमें अनगिनत लोगों ने अपना बलिदान दिया। मजनू शाह, तीतू मियां, सिद्धू-कान्हू, बिरसा मुण्डा आदि ऐसे कई नाम हैं जिनके अवदान को हमने सही तरह से रेखांकित नहीं किया। गोष्ठी के अगले वक्ता जनाव डॉ. यूसुफ कुरेशी ने पूर्व वक्ता प्रो. पुनीत कुमार की बात का प्रतिवाद करते हुए कहा ’’अंग्रेजों के खिलाफ हिन्दुस्तानी अवाम की बगावत की शुरूआत १७३१ से मानी जानी चाहिए। जब शाह वलीउल्लाह ने गोरों के बरखिलाफ अपनी आवाज बुलंद की।‘‘
कहानीकार प्रमोद भार्गव ने अपने एक लेख का वाचन किया। जिसमें उन्होंने १८५७ के एक नायक तात्या टोपे के बस्ते से मिले ढाई सौ पत्रों के हवाले से जो उन्ह रानी लक्ष्मीबाई, राजा बख्तबली, रानी लडीदुलैया, राजा मर्दनसिंह और स्थानीय निवासियों ने लिखे थे, श्री भार्गव ने कहा ’’इन पत्रों के पढने से यह साबित होता है कि १८५७ की क्रांति एक जनक्रांति थी जिसमें आम जनता भी हृदय से जुडी हुई थी।‘‘
आर.के. श्रीवास्तव ने १८५७ क्रांति के तथ्यों के जरिए उस दौर में अंग्रेजों के खिलाफ भारतीय जन के व्यापक असंतोष का जिक्र किया जिसके कारण यह क्रांति हुई। भारत के संदर्भ में बैन्जाइम डिजराईली एवं एड्म स्मिथ के कथनों का उन्होंने खास तौर पर उद्धरण दिया। डॉ. संध्या भार्गव ने विचार गोष्ठी को एक नया आयाम देते हुए कहा, ’’क्रांति का अर्थ है आमूलचूल परिवर्तन लेकिन हमारे यहां जो क्रांति हुई उसमें यह परिवर्तन कहीं नहीं था। लिहाजा १८५७ की क्रांति जनक्रांति नहीं बल्कि एक विद्रोह था।
गुना से आये लेखक, आंदोलनकर्मी पुष्पराग ने अपनी बात की शुरूआत इस तरह से की, ’’जो लोग इतिहास से नहीं सीखते वह इतिहास दोहराने के लिए अभिशप्त होंगे। हमने १८५७ से कोई सबक नहीं सीखा जिसके कारण हमें आजादी ९० साल बाद मिली। दरअसल यह क्रांति १९४७ में भी सफल नहीं हुई और आजादी के ६० साल बाद भी हम अपने आपको सही मायने में आजाद नहीं मानते। आज भी हम गुलामी की बेडयों में जकडे हुए हैं। १८५७ की क्रांति से सबक लेकर हमें देश में एक बार फिर सिर उठा रहे नवउपनिवेशवाद के खिलाफ क्रांति के लिए तैयार होना चाहिए।
वरिष्ठ नवगीतकार विद्यानन्दन राजीव ने कहा, ’’१८५७ विद्रोह था या क्रांति ? लेकिन यह तय है कि इसने एक महान कार्य का बीजारोपण जरूर किया जिसके परिणामस्वरूप हमें कालांतर में आजादी मिली। १८५७ में हालांकि असंतोष व्यापक था लेकिन समन्वित प्रयास नहीं थे। हमारे पास शक्तिसम्पन्न नेतृत्व नहीं था। वरना हमें १८५७ में ही आजादी मिल जाती।‘‘ कार्यक्रम के अंत में आयोजन में शामिल हुए वक्ताओं और अतिथियों का आभार प्रदर्शन प्रलेस सचिव जाहिद खान ने किया।



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