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अनिल त्रिपाठी को देवीशंकर अवस्थी स्मृति सम्मान गौरी अवस्थी
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हिन्दी के जाने माने आलोचक स्वर्गीय देवीशंकर अवस्थी की स्मृति में उनके जन्मदिन पर दिया जाने वाला ’देवीशंकर अवस्थी स्मृति सम्मान‘ इस बार युवा कवि-आलोचक अनिल त्रिपाठी को उनकी आलोचना पुस्तक ’नयी कविता और विजयदेव नारायण साही‘ (प्रकाशक ः शिल्पायन, १०२९५, गली नं. १, वैस्ट गोरखपार्क, शाहदरा, दिल्ली-३२) के लिए दिया गया है। साहित्य अकादमी के रवीन्द्र भवन सभागार में आयोजित एक भव्य समारोह में वरिष्ठ कवि-आलोचक श्री विष्णु खरे ने सम्मान स्वरूप अनिल को पाँच हजार एक रुपये की राशि, प्रशस्ति-पत्र और स्मृति-चिह्न प्रदान किया।
इस अवसर पर ’आज की आलोचना ः कवि का हस्तक्षेप‘ विषय पर विचार-गोष्ठी का भी आयोजन किया गया था। पुरस्कृत आलोचक अनिल त्रिपाठी ने अपने वक्तव्य में कहा कि पूँजी और तकनीक के इस उत्तर-युग में रचना के लिए हमें कवियों की लिखी हुई आलोचना की ओर लौटना होगा।
युवा आलोचक व्योमेश शुक्ल ने कहा कि आलोचना के साथ किसी भी अवधारणा के रिश्ते को हमेशा के लिए तय नहीं किया जा सकता। समीक्षा भी, जब साहित्य के अलावा किसी और चीज की ज्यादा तरफदार हो जाती है, तो उसके एकांगी और रूढ हो जाने का ख्ातरा होता है।
कवि-आलोचक विजय कुमार ने कहा कि नवें दशक में हुए विशद आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन के बाद भारतीय मनुष्य की आत्मा में हुआ संकोच एक ऐसी घटना है, जिसे समकालीन रचनाशीलता के प्रमुख मुद्दे की तरह लिया जाना चाहिए। महानगरों की साहित्यिक अभिरुचियाँ कस्बों-देहातों और छोटे शहरों की रचनाशीलता को बुरी तरह प्रभावित कर रही हैं और अनुभवों का मानकीकरण हो रहा है। एक मजबूत आलोचना ऐसे संकटों का सार्थक प्रतिरोध कर सकती है।
वरिष्ठ कवि-आलोचक विष्णु खरे ने अपने भाषण में कहा कि मुक्तिबोध के प्रचंड आलोचनात्मक उद्यम को केन्द्र में रखकर ही आधुनिक हिन्दी कविता का समूचा परिप्रेक्ष्य हमारे सामने स्पष्ट हो सकता है। उन्होंने एक कवि के रूप में अशोक वाजपेयी और मलयज के आलोचनात्मक संघर्ष को रेखांकित किया और कहा कि पेशेवर आलोचना, अपनी जडता और अहंकार में नवीनतम हिन्दी कविता की अन्तर्लयों को पहचानने में पूरी तरह विफल है और अविश्वसनीय भी हो गयी है।
संगोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह ने कहा कि आज की आलोचना के सामने समकालीन रचनाशीलता का परिप्रेक्ष्य निर्मित करने वाली अवधारणाओं के निर्माण और विकास का अपूर्व संकट है और हमें इस संकट को चुनौती की तरह लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि अपने समकाल को हम परम्परा के नैरंतर्य से अलग करके नहीं देख सकते। एक आलोचक को यदि अंतर्दृष्टियाँ हासिल करनी हैं तो अपनी साहित्य-परम्परा से एक लगातार संवाद उसे रखना ही होगा।
आयोजन की नियामिका डॉ. कमलेश अवस्थी ने चयन-प्रक्रिया पर प्रकाश डाला और पुरस्कृत आलोचक अनिल त्रिपाठी को दिये गये प्रशस्ति-पत्र का पाठ किया।
संगोष्ठि का संचालन पंकज पराशर ने किया।
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