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’साम्प्रदायिक सद्भाव और हिन्दी उपन्यास‘ पर जनवादी लेखक संघ की विचार-गोष्ठी
नन्दकिशोर नीलम

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अलवर के सूचना केन्द्र में प्रख्यात उपन्यासकार हरियश राय के उपन्यास ’नागफनी के जंगल में‘ पर केन्दि्रत ’साम्प्रदायिक सद्भाव और हिन्दी उपन्यास‘ विषय पर एक विचार-गोष्ठी का आयोजन किया गया।
विचार गोष्ठी में विशिष्ट अतिथि प्रो. जुगमंदिर तायल ने कहा कि इस उपन्यास की सफलता इस बात में है कि लेखक कई प्रश्न खडे करता है। शैली की दृष्टि से इस रचना को उपन्यास कहने में मुझे थोडी दिक्कत होती है। वास्तव में, यह एक नये तरह का रिपोर्ताज है। यह राही मासूम रजा के उपन्यासों का सुखद विस्तार है तथा धार्मिक कठमुल्लेपन की बारीकियों को समझाते हुए धर्म की मानवीय संदर्भों में व्याख्या करता है। यह रचना सोचने को मजबूर करती है और प्रश्नों का अंतहीन सिलसिला बनती है।
प्रख्यात आलोचक डॉ. जीवन सिंह ने इस उपन्यास पर विचार करते हुए कहा कि यह उपन्यास एक मुसलमान देशभक्त व्यक्ति के व्यक्तित्व को रेखांकित करता है। देशभक्ति की कसौटी जाति और संप्रदाय की सीमाओं से परे होती है। इस देश का हिन्दू जितना देशभक्त है, मुसलमान और ईसाई भी उतना ही देशभक्त है। जहाँ देशभक्ति का नारा बुलन्द करने वाले अनेक हिन्दू अमरीका के ग्रीन कार्ड के लिए ललचाते हैं,  वहीं यह पोथीवाला नाम का अद्भुत प्रतिभा का धनी मुसलमान इस देश की बेहतरी के लिए अमरीका की स्थायी नागरिकता ठुकरा आता है। ऐसे महान देशभक्त का घर भी साम्प्रदायिक दंगों में जला दिया जाता है। देशभक्ति, हिन्दुत्व और इस्लामियत का द्वंद्व बराबर धूँ-धूँ कर जलते हुए घर को देखकर अधिक मुखर होता है। डा. जीवन सिंह ने आगे कहा कि इस उपन्यास के नायक की अवधारणा यथार्थवादी है, इसलिए यह धीरोदात्त नायक की तरह जीवन में संवेदनों से रिक्त नहीं है। यही कारण है कि घर को जलते हुए देखकर वह विचलित होता है।
गोष्ठी के मुख्य अतिथि वरिष्ठ कवि एवं ’कृति ओर‘ के संपादक विजेन्द्र ने इस उपन्यास को सच्चे अर्थों में काव्यात्मक उपन्यास कहा। उन्होंने कहा कि नागफनी के जंगल में‘, यह नाम ही एक मेटाफर है। हमें उपन्यास की अण्डर टोन पर ध्यान देना चाहिए। उपन्यास की परख के पुराने औजारों से इसका मूल्यांकन नहीं हो सकता। यह उपन्यास हमारी सोशल डायनामिक्स को पहचानता है।
उपन्यासकार हरियशराय ने उपन्यास की रचना प्रक्रिया के बारे में कहा कि यह उपन्यास मेरे जीवन के बीस वर्षों के गुजरात प्रवास का प्रतिफलन है। साम्प्रदायिकता का जैसा जहर गुजरात की हवाओं में है, वैसा देश के किसी और राज्य में नहीं है। दुख की बात है कि राजस्थान जैसा शान्त प्रदेश भी पिछले ८-१० सालों में इन हवाओं की गिरफ्त में तेजी से आ रहा है। गुजरात के साम्प्रदायिक दंगों ने इस बात को सच कर दिखाया है कि वहाँ मनुष्यता जैसी चीज कहीं नहीं है। गुजरात में कोई भी व्यक्ति मनुष्य-रूप में जीवित नहीं रह सकता।
गुजरात में साम्प्रदायिक सोच गोधरा कांड से पूर्व भी पनपता रहा है, मुसलमानों के प्रति असहिष्णुता और अनाचार इससे पहले भी रहा है, पर गोधरा कांड के दौरान् जो साम्प्रदायिक हिंसा भडकी, उसने मुझे बहुत विचलित किया, यह भाव इस उपन्यास की पृष्ठभूमि में हैं। मुझे बराबर ये प्रश्न कचोटते रहे हैं कि देशभक्ति की कसौटी आख्ार है क्या? क्या देशभक्ति और हिन्दुत्व एक ही चीज हैं? क्या एक गैर-हिन्दू भारतीय देशभक्त नहीं हो सकता? ये सब इस उपन्यास की परिधि में है।
विचारगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए चिन्तक और आलोचक सुरेश पंडित ने कहा कि जब मुझे इस उपन्यास पर समीक्षा लिखने का प्रस्ताव मिला, तो शीर्षक देखकर ही मुझे यह उपन्यास एक साधारण तरह का साम्प्रदायिक समस्या केन्दि्रत उपन्यास लगा और मैंने समीक्षा लिखने से मना कर दिया। किन्तु, जब इस उपन्यास पर छपी समीक्षाओं, आयोजित हुई गोष्ठियों की रिपोर्ट्स को पढा और अलवर में संगोष्ठी-आयोजन के सिलसिले में जब जीवनसिंह जी ने इस उपन्यास के बारे में बताया, तब मैंने इस उपन्यास को पढा। उपन्यास पढने के बाद मेरी तमाम धारणाएँ बदलीं और मुझे अफसोस भी हुआ कि मैंने इस उपन्यास पर क्यों नहीं लिखा? खैर, साम्प्रदायिक समस्या पर लिखे हुए जितने भी उपन्यास अब तक मैंने पढे उन सब में यह अलग तरह का है।
विचार-गोष्ठी का संचालन  जलेस  के  जिला  उपाध्यक्ष डॉ. छंगाराम मीणा ने किया। रेवतीरमण शर्मा, मास्टर हरिनारायण सैनी आदि ने विचार व्यक्त किये। अन्त में, जनवादी लेखक संघ के जिला सचिव डॉ. नीलम ने विशिष्ट अतिथि, मुख्य अतिथि, मुख्यवक्ता, रचनाकार, गणमान्य नागरिकों, चिन्तकों और कॉलेज-विश्वविद्यालय के प्राध्यापकों का आभार प्रकट किया।



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