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Vartmaan Sahitya ::June, 2007 Sponsered by : Decor Home, Bikaner स्मरण : आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी एवं आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी प्रो. कमला प्रसाद
सृजन एक असाध्य साधन है।
अनुभूति की ऊँचाइयों पर जाकर ही इसे समझा जा सकता है।
साहित्य के माध्यम से हम इस बासी दुनिया को ताजा कर सकते हैं।
मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन के तत्वावधान में जन्मशताब्दी के अवसर पर आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी और आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी की स्मृति में दो दिवसीय समारोह भोपाल में आयोजित किया गया। प्रो. कमला प्रसाद ने इस आयोजन के महत्त्व के बारे में बताया। श्री राजेन्द्र शर्मा ने कार्यक्रम का प्रारंभ करते हुए सम्मेलन की रचनात्मक गतिविधियों पर प्रकाश डाला। श्री विश्वनाथ त्रिपाठी ने अपने उद्बोधन में कहा कि इन वरिष्ठ साहित्यकारों का अवदान साहित्य-जगत में सदैव स्मरणीय है और इनका व्यक्तित्व तथा कृतित्व अनुकरणीय है। इस अवसर पर ध्रुव शुक्ल ने आचार्य का स्मरण करते हुए कहा कि भावपूर्ण और संवेदनापूर्ण साहित्य ही मानवीय मूल्यों को बनाये रख सकेगा। राजेश जोशी ने कहा कि द्विवेदी जी के उपन्यासों में दर्शन प्रतिबिंबों के माध्यम से उभरकर आता है। सुधीर रंजन सिंह ने कहा कि द्विवेदी जी ने लोकहित में लिखा है, ऐसा साहित्य सदा अमर होता है। सुश्री राजमति ने कहा कि द्विवेदी जी परंपरा और संस्कृति का निर्वहन अपने साहित्य में करते हैं। रामप्रकाश त्रिपाठी ने संस्मरण सुनाते हुए कहा कि द्विवेदी जी कहते थे कि कविता से विज्ञान को भी समझा जा सकता है। श्री नामवर सिंह ने अपने वक्तव्य में कहा कि हजारीप्रसाद द्विवेदी का व्यक्तित्व सर्जनात्मक साहित्यकार का रहा है। साहित्य की सभी विधाओं में उनका प्रभावशाली कृतित्व मिलता है। उनका स्मरण हमें समग्र दृष्टि से करना चाहिए द्विवेदी जी अपने समस्त अस्तित्व और व्यक्तित्व के साथ छंद के रूप में अपने आप को साहित्य में प्रस्तुत करते थे। श्री नित्यानन्द तिवारी ने अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए कहा कि भारतीय साहित्य में कोई दूसरा इतना गहरा व्यक्ति पैदा हुआ नहीं दिखता, जितना द्विवेदी जी दिखते हैं। अलंकारशास्त्र को साहित्य का प्रेरणास्रोत होना चाहिए, तभी साहित्य अपने उच्चतम आयाम को प्राप्त कर सकता है। द्विवेदी जी कहते थे कि हमारे समूचे साहित्य का एक ऐसा संस्करण तैयार होना चाहिए, जो आज का आधुनिक समाज समझ सके।
दूसरे दिन नंददुलारे वाजपेयी का उनके जन्मशताब्दी वर्ष पर स्मरण किया गया। इस अवसर पर डॉ. नामवर सिंह, डॉ. नित्यानंद तिवारी एवं डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी विशेष रूप से मंच पर उपस्थित थे। राजेन्द्र शर्मा के प्रारंभिक स्वागत वक्तव्य के पश्चात डॉ. कमला प्रसाद ने कार्यक्रम की रूपरेखा पर प्रकाश डालते हुए आचार्य नंददुलारे वाजपेयी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व के साथ ही, साहित्य को उनके मूलभूत अवदान के बारे में बताया। श्री नित्यानंद तिवारी ने कहा कि वाजपेयी जी के साहित्यिक अवदान को कभी नहीं भुलाया जा सकता। उन्हें पहले आधुनिक आलोचक के रूप में याद किया जा सकता है। वाजपेयी जी ने आलोचना की स्वस्थ परंपरा डाली। साहित्य की मर्यादा ऐसी ही आलोचना से बन सकती है। अपने समय के साहित्य के संघर्ष पर उनकी व्यापक दृष्टि थी। समाजशास्त्र, मनोविज्ञान और संस्कृति का प्रयोग हमारी रचना में होना चाहिए। श्री मनोहर वर्मा ने इस अवसर पर बोलते हुए कहा कि उनमें राष्ट्रीयता, सांस्कृतिकता और आदर्शवादिता थी। उन्होंने पूर्व और पश्चिम की दृष्टियों का समन्वय किया। आनंद सिंह ने वाजपेयी जी को अपने समय का अतिप्रभावशाली साहित्यिक सर्जना का व्यक्तित्व बताया। डॉ. नामवर सिंह ने अपने उद्बोधन में कहा कि कृतित्व से ज्यादा लेखक का व्यक्तित्व महत्वपूर्ण होता है। उनकी दृष्टि में प्रखरता और वाणी में ओज था, उनका आलोचक जीवन संघर्षशील था। रमेश दवे ने कहा कि वाजपेयी जी ने अपने समय में साहित्य को नये आयाम दिये। डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि वाजपेयी जी ने आलोचना के सूत्र दिये हैं।
समारोह में बडी संख्या में साहित्यकार, संस्कृतिकर्मी तथा गणमान्य नागरिक सम्मिलित हुए।
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