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Vartmaan Sahitya :: June, 2007 Sponsered by : Decor Home, Bikaner |
झूठ को ढँकने वाला सच प्रमोद कुमार वर्णवाल
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हम एक ऐसे समय में हैं, जब झूठ का राज है और सच का संकट है। अगर कोई सच है, तो इतना रिलेटिव है कि झूठ का सगा भाई लगता है। कुछ ऐसे सच भी हैं, जो डराते हैं। जैसे-धार्मिक सच, पूंजी का सच, मुडा-तुडा सच, झूठ को ढँकने वाला सच। सुकरात ने हमें सिखाया था कि बुद्धिजीवी आत्मरक्षा की चिन्ता छोडकर सच कहेंगे, किन्तु बुद्धिजीवी सच से हट रहे हैं। वे जिनसे कहना चाहते हैं, वे सुनना नहीं चाहते और जो सुनना चाहते हैं, उनसे वे कहते नह।‘‘ ये विचार समालोचक मैनेजर पाण्डेय ने बी.एच.यू. के महिला महाविद्यालय द्वारा आयोजित ’एडवर्ड सईद ः समालोचना और प्रतिरोध‘ विषयक दो दिवसीय अखिल भारतीय संगोष्ठी में प्रकट किये।
उन्होंने कहा कि जो बुद्धिजीवी सत्ता से सुविधा चाहते हैं, वे दुविधा की भाषा में बोलते-लिखते हैं। दुविधा में लिखने का कारण है कि जो जैसा चाहे, वैसा समझ ले। जबकि सत्ता की स्थिति को सामने लाने और प्रतिरोध करने वाले ऐसा नहीं करते।
संगोष्ठी के समापन समारोह में उस्मानिया विश्वविद्यालय, हैदराबाद के प्रो. सुखबीर सिंह ने कहा कि एडवर्ड सईद के विचार उत्तर-आधुनिकता को रेखांकित करते दिखते हैं। सईद को समझने के लिए उनके प्राच्यवाद के सिद्धान्तों को भारतीय परिप्रेक्ष्य से देखना श्रेयस्कर होगा। यह ध्यान देना लाजमी है कि सईद का प्राच्यवाद अरब और अफ्रीका तक ही सीमित रहा।
संगोष्ठी में प्रो. लेले, प्रो. राजनाथ, प्रो. सुरेन्द्र सिंह कुशवाहा ने भी विचार रखे। समस्त कार्यं का संयोजन महिला महाविद्यालय की प्राचार्या प्रो. सुशीला सिंह ने किया।
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