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बंबई के ’पृथ्वी थियेटर्स‘ ने स्व. पृथ्वीराज कपूर की जन्मशताब्दी के उपलक्ष्य में पूरे वर्ष उत्सव मनाने की संकल्पना के तहत पिछले दिनों ’कविता का रंगमंच‘ नाम से एक समायोजन किया, जिसके संपन्न होने पर आयोजिका सुश्री संजना कपूर ने कहा-’’शुरू करते हुए मुझे आशंका थी कि मैं ज्यादा ही उम्मीद लगा बैठी हूँ.... पर मैं कविता में समाये नाट्य तत्त्वों को थहाना चाहती थी और अभिव्यक्ति के स्तर पर कविता व थियेटर की केमिस्ट्री को समझना चाहती थी.... किंतु रंगकर्मियों के अद्भुत प्रदर्शनों ने ऐसा विश्वास दिया है कि अब मैं इसे सालाना आयोजन का रूप देने की सोच रही हूँ....।‘‘
कहने की बात नहीं कि संजना कपूर जो थहाना चाह रही थीं, वह रंगजगत् में सदियों से विद्यमान है-’काव्येषु नाटकं रम्यम्‘ को साकार करते हुए भास-कालिदासादि से लेकर हिन्दी में प्रसाद-भारती वगैरह तक....। अन्य भाषाओं में ऐसे प्रयोग भी होते ही रहे हैं। अब यदि उत्सवादि के रूप में इनके विशेष रूप से श्ाृंखलाबद्ध प्रदर्शन होंगे, तो अधिकाधिक लोगों तक पहुँचने से उनकी सार्थकता भी सिद्ध हो सकेगी।
इस काव्यनाट्योत्सव में अंग्रेजी-हिन्दी-मराठी-गुजराती (व कुछ अन्य भी) कविताओं से बने जो नाट्यरूप प्रस्तुत हुए, सब अपने-अपने तरह के अभिनव प्रयोग सिद्ध हुए। इसमें मात्र नाट्यमय अंदाज में पेश एक कवि (कबीर, संपूर्ण चटर्जी व रनजित आदि) की कविताएँ भी थीं और ’प्रतिरोध के स्वर‘ जैसे मुद्दों एवं ’पेड‘ तथा ’इंतजार करती नायिकाएँ‘.... जैसे विषयों पर कई कवियों की सम्मिलित व बहुभाषी प्रस्तुतियां भी। सब बडी नेकनीयती व मेहनत से तैयार की गयी थीं। इन्हें अपेक्षित सराहना भी मिली। यूँ तमाम को उत्सव के चलते फ्री शो के रूप में रखा गया था, पर दर्शक चुनिंदा ही आये....। उत्सव में ज्यादा लोकप्रिय एवं अधिक दिनों तक स्मृति में बसे रह जाने वाले नाटक वे ही रहे, जो बडी सुनियोजित तैयारी व बडी मेहनत से पूरे नाटक के रूप में तैयार किये गये थे। इनमें प्रमुख थे-गुलजार की लगभग दो दर्जन कविताओं पर बना हिन्दी नाटक ’रेशम का शायर‘ (विवेचना, जबलपुर), सूफी दार्शनिक कवि रूमी की ५२ कविताओं पर आधारित मराठी नाटक ’तू‘ (आसक्त, पुणे) और सबसे सराहनीय रहा-गुजरात के ’मध्यकालीन कवि नरसिंह मेहता से लेकर आधुनिक कवि मेघानी तक‘ की कविताओं पर तैयार किया गया गुजराती नाटक ’गुजरात नी अस्मिता‘ (आइडिया अनलिमिटेड, मबई)।
इन तीनों में हर दृष्टि से सबसे सुंदर बना है ’गुजरात नी अस्मिता‘। यह कल्पना बडी ऊंची है, फलक बडा व्यापक है और कार्य बडी जहानत का है जिसमें समूचे गुजरात की काव्यात्मक अस्मिता का निदर्शन हो। और वह बखूबी हुआ है....। इसमें गुजराती के आठ प्रमुख कवियों को समाहित किया गया, जिनमें मीराबाई भी शामिल हैं और रचना का विधान यूं बना कि हर कवि के जीवन का कोई अत्यंत लोकप्रिय, प्रेरणादायक प्रसंग उठाया गया है और उसी पर दृश्य बना दिया गया। फिर दृश्य के दौरान उसी प्रसंग पर आधारित या उसी पर सचमुच लिखी गयी उनकी कविता गायी गयी। गायन सामूहिक भी रहा व एकल भी-प्रसंग व भाव के अनुसार। इस तरह कवि का जीवन भी आता रहा व काव्य भी तथा उससे जुडे जनता के भाव भी....। इन सबकी संगति के साथ कहने की बात नहीं कि कलाकार को उस कवि जैसा वेश भी दिया गया और वैसा ही सधा अभिनय भी हुआ। इस प्रकार गुजराती कविता का पूरा का पूरा संसार साकार हो उठा है। अनजानों के लिए जानकारी भी मिली-जानकारों को आह्लाद भी....। देखते हुए बराबर यह सालता रहा कि हिन्दी में ऐसा कुछ क्यों नहीं होता। नामचीन धुरंधर तो करते ही नहीं, एन.एस.डी. भी नहीं करता। भारतेन्दु पर किया भी (अनंत राहें), तो कन्नड का रूपांतर और करने वाले भी हिन्दीतर भाषी (प्रसन्न) ने....। मनोज भाई ने जब मराठी का ’बेगम बर्वे‘ किया, तो भी गुजराती के जयशंकर सुंदरी को आधार बनाकर उसे अपने थियेटर की भांगवाडी वाली परंपरा से जोड दिया। जबकि वही जब हिन्दी में हुआ, तो ऐसा कुछ नहीं लिया गया हिन्दी या हिन्दीभाषी थियेटर-परंपरा से.... जबकि भिखारी ठाकुर या भारतेन्दुबाबू के प्रतीक से बात कही जा सकती थी-कही जानी चाहिए थी। लेकिन बनाने वाले (अमाल अल्लनादि) ही इस परंपरा के नहीं थे। ’कनुप्रिया‘ व ’कामायनी‘ पर नाट्यप्रस्तुतियां हुई हैं, पर ऐसे विरासती नाटक नहीं। ’अंधायुग‘ व ’कनुप्रिया‘ को मिलाकर ’एकजुट‘ के लिए नादिरा बब्बर ने ’इतिहास तुम्हें कहां ले गया कन्हैया....।‘‘ नामक नाटक तैयार किया था, पर ऐसी विरासत प्रेम की संवेदना व मकसद वहां भी न थे-वह अधिक चला भी नहीं। प्रयोग-बोझिल भी हो गया था। हिन्दीभाषी समाज क्यों कह-छोड रहा है अपनी विरासतों को, यह मुद्दा विचारणीय ही नहीं, ऐसी प्रवृत्ति को पनपाने के प्रयत्न बहुत जरूरी है....। और ’गुजरात नी अस्मिता‘ बनाने वाले मनोज शाह तो इस संवेदना के कुशल चितेरे हैं। गुजरात के गालिब कहे जाने वाले शायर मरीज पर इतना आलीशान नाटक लिखा है मनोजजी ने कि हम गैरगुजराती भाषी भी उसे बारंबार देखने को उत्सुक रहते हैं। एक कवि-दार्शनिक पर उनका नाटक ’अपूर्व अवसर‘ इसी महीने (अप्रैल, ०७) प्रदर्शित हुआ है। गुजराती में नौशिल मेहता ने कवि कलापी पर ऐसा ही खूबसूरत काम किया है। याने गुजरात-महाराष्ट्र में विरासतों से प्यार व उसके अवदानों का स्वीकार है....।
हिन्दी में ऐसा काम किसी हद तक करने वाले प्रायः एकमात्र अरुण पाण्डेय हैं। प्रदेश के लोक कवि ईसुरी एवं अपने शहर के रचनाकार परसाई जी पर उनके नाट्यकर्म इसके प्रमाण हैं। मैंने तो प्रेम निशीथ की अपनी बडी चहेती कविता ’किस्सा-ए-बडके दा‘ का विवेक पांडेय कृत एकल मंचन भी देखा है उनका। याने यह सेंसिबिलिटी उनमें है, जो उनके जहीन नाट्यकर्म का एक प्रमुख हिस्सा है। इस बार उन्होंने अपनी अनुज-वधू प्रगति पांडेय के निर्देशन में गुलजार जी की कविताओं पर ’रेशम का शायर‘ नाम से पूर्ण एवं गम्भीर नाटक तैयार कराया है, जो पसंद के साथ-साथ किंचित् लोकप्रियता का रहबर भी बन सकेगा। इसे ’कविता का रंगमंच‘ के मानक नाटक के रूप में देखा जा सकता है। गुलजार जी की कविताओं को इतनी सूझबूझ भरी काल्पनिकता के साथ सँजोया-पिरोया गया है कि एक मौलिक सृजन का नाट्यसंसार रच उठा है। मुक्तक कविताओं का बिना किसी कथा-तत्त्व के ऐसा प्रबंधत्व दुर्लभ है। फिर इस सृजन को साधने में जितनी मेहनत की गयी है, वह असंभव की साधना ही कही जानी चाहिए। इसके सिर्फ प्रवेश-निर्गम ही साधने के श्रम में एक आम नाटक बन सकता है। फिर बंधों-पंक्तियों को तोड-तोडकर संवाद और उस पर घटित बदलते क्रिया-व्यापार को उतने ही त्वरित भावाभिनय में साकार करना.... सब बहुत-बहुत कष्टसाध्य है, जिसे ’विवेचना‘ ही कर सकता है-और जबलपुर में ही। और इतना ही नहीं, कविताओं को भिन्न-भिन्न आंचलिक लय व धुनों में पिरोया भी गया है ’छैंया-छैंया....‘ का थियेट्रिकल प्रयोग फिल्म के मजे से अलग आनंद दे जाता है। ढाई दर्जन कलाकारों से सजी व बिना मध्यांतर के एकतान में चलती यह प्रस्तुति हर दृष्टि से बेजोड है। गुलजार जी ने भी कभी कल्पना न की होगी कि ऐसा भी हो सकता है उनकी कविताओं का नाट्य-प्रदर्शन....। इसके अधिकाधिक मंचन हो सकें पूरे देश में, तो ही सार्थक हो सकेगी इतनी मेहनत व लगन से बनी ऐसी नाट्यकला....। सूफी कवि रूमी की कविताओं पर बना मराठी नाटक भी भाषा की सामाओं को पार कर जाता है और सच्चे प्रेम को परिभाषित करता है जो निश्चित ही आत्म व अहम् के साथ भौतिक सत्ता के विसर्जन के बिना हो नहीं सकता। इसे इन कविताओं के जरिए प्रकट किया गया है-फकीर है नैरेटर व प्रेमीगण तो हैं ही। यह नाट्य रूपांतर भी सती ने बडा संश्लिष्ट किया है और सुना कि उपयुक्त संगीत देने के साथ निर्देशन भी करने वाले मोहित तकाल्कर यथार्थवाद से ऊबकर इस तरफ आये और विश्वास है कि फिर से ताजा होकर उबरे होंगे.... खुदा करे कि फिर-फिर वे ऐसे ऊबें व इस तरफ बहुरें....।
’एकजुट‘ की महत्त्वाकांक्षी प्रस्तुति ’रोशनी का सफर‘ भी उत्सव में खेली गयी। यह निर्देशक नादिराजी की अपनी प्रतिबद्धता के मुताबिक प्रगतिशील विचारधारा के कवियों व शायरों पर है। इसमें कबीर, बुल्लेशाह, गुरु नानक, ज्ञानेश्वर, नजीर, गालिब आदि से लेकर निराला, फैज, कैफी, अली सरदार जाफरी, सज्जाद जहीर, मजरूह सुल्तानपुरी, राजेश जोशी, जावेद अख्तर, वीरेन्द्र मिश्र जैसे तमाम कवियों की कविताओं की सुंदर प्रस्तुति हुई है। एक सीरीज सामने आती है प्रगतिशील सोच व काव्य-लेखन की। इसकी मंशा बहुत सही व उपयोगी है। थियेटरकर्म का सदुपयोग भी होता है, पर उसकी कला को कविता से साधने या कविता को नाट्यकला में ढालने का वैसा जहीन प्रयत्न कम है, जैसी की प्रतिभा व साधनसंपन्नता के चलते ’एकजुट‘ व नादिराजी से उम्मीद की जा सकती है....
इस प्रकार ग्याहर दिनों में ’पृथ्वी‘ नाट्यमंच पर कविता खेली गई.... कविता नाट्यमय होती रही और नाट्य काव्यमय होता रहा.... ऐसे प्रयत्नों की निरंतरता व सुखद भविष्य की प्रतीक्षा में हैं हम नाट्यप्रेमी....।
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