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कमलेश्वर-वर्तमान साहित्य-प्रेमचन्द कथा पुरस्कार
सीमा सगीर

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अलीगढ ः अपने समय के महान कथाकार कमलेश्वर द्वारा संस्थापित वर्तमान साहित्य ः प्रेमचन्द कहानी पुरस्कार श्रीमती गायत्री कमलेश्वर द्वारा श्री कमल और श्रीमती सुषमा मुनीन्द्र को प्रदान किया गया। इस अवसर पर दोनों कथाकारों को पांच हजार पांच सौ की धनराशि का चेक, प्रशस्ति पत्र तथा स्मृति चिन्ह प्रदान किये गये।
अलीगढ में आयोजित एक भव्य समारोह में इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में सुप्रसिद्ध लेखक और आलोचक प्रो. गंगा प्रसाद विमल ने हिन्दी कहानी के वर्तमान परिदृश्य पर बोलते हुए कहा कि वास्तव में मौलिक कहानी तो हिन्दी में ही लिखी जा रही है। समस्या केवल अनुवाद की है जहाँ नितान्त भारतीय परिवेश, संस्कृति और समाज की अपने समय की कहानियाँ दूसरी भारतीय भाषाओं के सामने तथा विश्व के सामने नहीं आ पाती हैं। हिन्दी कहानी किसी भी रूप में विश्व स्तर के कथा साहित्य के समकक्ष है। हिन्दी का सबसे सशक्त पक्ष है उसका अन्य भाषाओं से ग्रहण किया गया रंग रूप। विशेष कर उर्दू के साथ इसका नजदीकी रिश्ता। हिन्दी-उर्दू का मिला-जुला रूप भारतीय साहित्य और संस्कृति का सही रूप में प्रतिनिधित्व करते हैं।
कमलेश्वर-वर्तमान साहित्य-प्रेमचन्द कहानी प्रतियोगिता की योजना पर प्रकाश डालते हुए वर्तमान साहित्य की संपादक और संयोजक नमिता सिंह ने कहा कि इस प्रतियोगिता के आयोजन का उद्देश्य था अपने समय की पहचान कराने वाली सार्थक कहानियों की पहचान करना। आज विभिन्न विमर्शों को आधार बना कर लिखी जा रही कहानियों में बाजारवाद निरन्तर हावी हो रहा है जो साहित्य के मूल उद्देश्यों को उलझा रहा है और कहानी विधा जनसाधारण से दूर होती जा रही है। यह उत्साहवर्धक अनुभव था कि प्राप्त कहानियों के मूल में सामाजिक मुद्दे थे। आज प्रचलित चालू विमर्शों की कहानियाँ नहीं थीं। यह पद्धति साहित्य में संपादकों और आलोचकों की भूमिका के महत्व को भी रेखांकित करती है। जहाँ उनकी रुचि के अनुरूप कहानी बनाने की प्रवृत्ति चल पडी है।
आज की उर्दू कहानी की मूल प्रवृत्तियों पर प्रकाश डालते हुए प्रो. सगीर अफराहीम ने कहा कि उर्दू के युवा कथाकार न सिर्फ मुस्लिम समाज की अस्मिता बल्कि पूरे सामाजिक परिदृश्य को अपनी कथावस्तु बना रहे हैं। उर्दू कहानी आज यथार्थ के अधिक निकट है। हिन्दी के कथाकार डॉ. आशिक बालौत ने आज के सन्दर्भों में फार्मूलाबद्ध विमर्शों के स्थान पर आधुनिक जीवन के अंतर्विरोधों को कहानी का विषय बनाने की आवश्यकता पर बल दिया। समारोह की अध्यक्षता करते हुए उर्दू के सुप्रसिद्ध कथाकार काजी अब्दुल सत्तार ने कमलेश्वर के साथ अपने अत्यंत निकट संबंधों का जिक्र करते हुए कहा कि कमलेश्वर स्वयम् अपने आप में एक आंदोलन थे। वर्तमान साहित्य के संपादक तथा अध्यक्षता कर रहे हिन्दी के सुप्रसिद्ध आलोचक प्रो. कुँवरपाल सिंह ने कहा कि कमलेश्वर हिन्दुस्तान में मिली जुली संस्कृति के पैरोकार थे। उनकी इच्छा थी कि आगे से इस कहानी प्रतियोगिता में हिन्दी के अलावा उन उर्दू की कहानियों को भी शामिल किया जाय जिसके अनुवाद हिन्दी में छपे हों। कमलेश्वर का उपन्यास ’कितने पाकिस्तान‘ उनकी संपूर्ण वैचारिकता और सामाजिक सोच का प्रतिनिधित्व करता है।
लंबे अरसे तक कमलेश्वर के साथ रहे हिन्दी के कथाकार प्रदीप मांडव ने कहा कि जाने से पहले कमलेश्वर की महत्वाकांक्षी योजना हिन्दी-उर्दू साहित्य का मिला जुला इतिहास लिखने की थी और वे इसका एक भाग पूरा कर चुके थे। उनके असमय दिवंगत हो जाने से एक अपूरणीय क्षति साहित्य जगत् की हुई है।
इस अवसर पर उपस्थित श्रीमती गायत्री कमलेश्वर का भावुक हो जाना बहुत स्वाभाविक था। उन्होंने उपस्थित प्रबुद्ध जनसमुदाय को आश्वस्त किया कि कमलेश्वर जी की इच्छा के अनुरूप यह आयोजन भविष्य में इसी रूप में चलता रहेगा। उन्होंने यह भी कहा कि कमलेश्वर जी को अलीगढ आना बहुत अच्छा लगता था और वे समझते थे कि यहाँ से एक नये सांस्कृतिक आन्दोलन की शुरूआत हो सकती है।
श्रीमती गायत्री कमलेश्वर के हाथों से कहानी प्रतियोगिता पुरस्कार ग्रहण करते हुए जमशेदपुर से आये कमल (कमलजीत सिंह) ने कहा कि उनकी कहानी ’प्रोजेक्ट ऑक्सीजन‘ लिखने में तीन महीने लग गये। यह विश्व बाजारवाद से उपजने वाली उन भयावह परिस्थितियों की ओर संकेत करती है जहाँ भविष्य में हवा, पानी सब विश्व के शक्तिशाली देशों के हाथों में व्यापार की वस्तु बन जायेंगे। कमल ने कहा कि बाजार के दबाव में थोक में किया जाने वाला लेखन अपनी अर्थवत्ता खो देता है और बिना विचार के रचा जाने वाला साहित्य निष्प्रभावी होता है।
सतना से पधारी दूसरी पुरस्कृत कहानी ’शो फ्लॉप‘ की लेखिका श्रीमती सुषमा मुनीन्द्र ने कहा कि वह परंपरागत परिवार में ढांचे की समर्थक हैं। यदि परिवार टूटेगा तो न समाज और न व्यक्ति बच सकेगा। बिखरते सामाजिक मूल्यों की पुनर्स्थापना आज के साहित्य का एक बडा उद्देश्य है।
गोष्ठी का संचालन करते हुए वर्तमान साहित्य के संपादक मंडल के सदस्य डॉ. अजय बिसारिया ने कहा कि कमलेश्वर ने कथा साहित्य में किस्सागोई और विचार को एक साथ इस तरह गूंथ दिया कि कहानी विधा ने एक अद्भुत रूप ग्रहण किया। उनकी वैचारिकता उनके लेखन में कथा की भांति प्रवाहमान होती थी और निरंतर समाज और संस्कृति को आंदोलनकारी रूप प्रदान करती थी।
इस आयोजन में बडी संख्या में लोग उपस्थित थे। दिल्ली से श्रीमती गायत्री कमलेश्वर के साथ आये श्री आलोक त्यागी, फिल्म लेखन से जुडे राजीव श्रीवास्तव, नीलाभ तथा प्रेमपाल की उपस्थिति महत्वपूर्ण थी।



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