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आर्यों का वज्रांगी, अनार्यों का शत्रु कँवल भारती
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राक्षस राष्ट्र और वानर राष्ट्र के बीच राजनैतिक शत्रुता ने ब्राह्मण साम्राज्य का रास्ता साफ किया। यह काम राष्ट्रवादियों ने चाहे दोनों के बीच फूट डाल कर किया या वानर राष्ट्र के मुखिया सुग्रीव को राजसिंहासन का लोभ देकर, पर यह निश्चित है कि यदि अनार्यों में इतनी गहरी फूट न होती और वानर समुदाय ने दासता के स्तर तक आर्यो की अधीनता स्वीकार न कर ली होती, तो लंका ब्राह्मण साम्राज्य का उपनिवेश कभी न बनता।
वीरेन्द्र सारंग के नये उपन्यास ’वज्रांगी‘ को पढते हुए लगा कि सारी घटनाएँ आँखों के सामने हो रही हैं। अगस्त ऋषि के नेतृत्व में जिस तरह सुदूर क्षेत्रों में नये-नये आश्रम स्थापित होते हैं, सूचना तन्त्र स्थापित होता है और जिस तरह उनके सैनिक अनार्यो के छोटे-छोटे राज्यों को कुचलते हुए ब्राह्मण साम्राज्यवाद को कायम करते हैं, उसे पढ कर भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के पैर किस तरह जमे, यह समझ में आने लगता है। शायद साम्राज्य इसी तरह छल-बल और व्यापक हिंसा से स्थापित होते है।
आर्य अर्थात् ब्राह्मण साम्राज्य की स्थापना के पीछे अगस्त्य ऋषि की योजना काम करती है। वे आर्यों को आर्य बनाने का काम करते हैं, इसलिए नहीं कि अनार्यों को आर्यों का दर्जा दिया जा सके, उन्हें अपनी संस्कृति में लाने के लिये भी नहीं, क्योंकि आर्यों की तो पशुबलि और यज्ञ के सिवा कोई संस्कृति ही नहीं थी, बल्कि इसलिये कि अनार्यों का संहार अनार्यों के द्वारा ही कराया जा सके। आश्रमों में प्रशिक्षित आचार्यों को विश्वामित्र निर्देश देते हैं-आप गा्रमों में जायें और विवेक से कार्य करें। अपने साहित्य और भाषा का गुण गायें। अनार्य की भाषा में दोष निकालें। उनकी प्रथाओं में अपना लाभ जोडते हुए प्रलोभन दें, उन्हें यह लगे कि जो आप कर या कह रहे हैं, वही उचित है।‘ (पृ. १५) तद्नुसार, आचार्यों की नियुक्ति होती है, सैनिक शिविर बनते हैं और अभियान शुरू हो जाता है। इस अभियान में जिन अनार्यों ने अधीनता स्वीकार नहीं की, उन्हें मार दिया गया या भगा दिया गया।
अगस्त्य के नेतृत्व में विश्वामित्र, वशिष्ठ, गौतम, वाल्मीकि, भारद्वाज, अत्रि, विभाण्डक और मातंग के आश्रम अनार्यों का मतान्तरण और उनको अपने अधीन करने का काम कर रहे थे। मातंग का आश्रम वानर क्षेत्र में था, जो शबरी आश्रम के नाम पर स्त्रियों का आश्रम था। इसमें स्त्रियों का मतान्तरण करने का काम किया जा रहा था। (पृ. ५५) क्या ब्रिटिश सरकार ने भी इसी तरह भारत में ईसाई मिशनरियों को भेजकर अपने साम्राज्य के लिये जमीन तैयार नहीं की थी ?
दूसरी तरफ यही खूनी खेल रक्ष संस्कृति की स्थापना के लिये चलता है। रावण जहाँ जाता है, एक ही वाक्य दुहराता है-रक्ष संस्कृति अपनाओ, राक्षस बनो, वरना दण्ड भुगतो। नागवंशियों के राजा वज्रनाभ ने रावण की बात नहीं मानी। रावण ने तत्काल उसका वध कर दिया और नगर में शवों का ढेर लगा दिया। इस तरह तलवार के बल पर रावण का विस्तार दण्डक क्षेत्र तक हो गया। लेकिन वानर क्षेत्र में रावण का वश नहीं चला। वानर समाज पूरी आर्य-नीति का शिकार हो गया था और अगस्त्य ऋषि की अधीनता में था।
धार्मिक और सांस्कृतिक मतान्तरण के बाद साम्राज्य के लिये एक राजा की जरूरत होती है। इसके लिये ब्राह्मण ऋषि दशरथ पुत्र राम को नेतृत्व प्रदान करते हैं, हालांकि नियन्त्रण और संचालन ब्राह्मण ऋषियों के ही हाथों में रहता है। इस प्रसंग में, उपन्यास लेखक ने यहाँ पुत्रेष्टि यज्ञ का बहुत ही रोचक वर्णन किया है। दशरथ के कोई सन्तान नहीं थी। श्रृंग्य ऋषि इसके लिये औषधि तैयार करते हैं। यह औषधि बडी अद्भुत है-’जिस स्त्री में कोख न होगी, जिस पुरुष में वीर्य तक न बनता होगा, वह भी सन्तान-सुख से वंचित नहीं रह सकता।‘ शर्त थी-’स्त्री के योनि द्वार होने चाहिए, पुष्ट और विकसित। (पृ. ६९) तैयार की गयी औषधि के सेवन से दशरथ के पुत्रों का जन्म होता है। वाल्मीकि ने जिस ’पुत्रेष्टि यज्ञ‘ का वर्णन किया है, उसमें घोडे के साथ दशरथ की तीनों पत्नियों का सहवास दिखाया गया है। यह सचमुच अवैज्ञानिक है। लेखन ने इसे तार्किक रूप देकर ठीक ही किया है।
आगे आर्य-अनार्य के बीच भयानक युद्ध है। पर वास्तव में यह युद्ध अनार्य-अनार्य के बीच ही होता है। एक तरफ रावण की रक्ष संस्कृति वाले अनाय हैं और दूसरी ओर राम की दासता स्वीकार करने वाली अनार्य सेना है। अनार्य सेना अनार्य को रोंदती, कुचलती और मारती हुई आर्यों का साम्राज्य स्थापित करती हुई आगे बढती है। साम्राज्यवाद की अन्धता में राम स्त्रियों तक का निर्मम वध करते हैं और क्रूर अट्टहास के साथ ब्राह्मणवाद की विजय पताका फहराते चलते हैं। भारत में अंग्रेजों ने भी भारतीयों को भारतीयों से लडाया था। लाखों भारतीयों को मौत की नींद सुलाने में भारतीय सैनिकों ने ही भूमिका निभायी थी। ये भारतीय सैनिक अछूत जातियों के थे, जिन्होंने सामन्तों, ब्राह्मणों और साहूकारों के निरंकुश राज को मिटाने के लिए अंग्रेजों का साथ दिया था। रावण की दृष्टि में वानर भी नीच थे, शोषित और उपेक्षित थे। वीरेन्द्र सारंग ने हनुमान के मुंह से कहलवाया है-’हमें समाज में सबसे नीचे रहने वाले प्राणी की सहायता करनी है। पूरा ध्यान देना है उसके विकास हेतु उसकी प्रगति के लिये। हमें आपसी द्वन्द्व को समाप्त करना है। रावण वानरों, रीक्षों, ग्राद्धों को नीच समझता है। कोई रुद्र से जाकर पूछे कि हम नीच क्यों हैं ? हम पिछडे क्यों हैं ? हमें वही स्थान प्राप्त करना है, जहाँ कोई हमें नीच दरिद्र न कह सके। यह सब बालि की समझ के बाहर है। वे रावण के मित्र हैं। भला एक मित्र अपने मित्र की जाति को नीच जाति कहता है।‘‘ (पृ. १२४)
भारतीयों में जो भेदभाव अछूतों और सवर्णों के बीच है, सम्भवतः वही भदेभाव वानरों और राक्षसों के बीच रहा होगा। मूलवासियों में राक्षस वर्ग अभिजात वर्ग था, और वानर समाज उसके शोषण का शिकार था। इसलिये राक्षसों के विरूद्ध आर्य-अभियान में वानर समाज के सहयोग के मूल में अभिजात वर्ग के प्रति उनकी घृणा ही थी। हनुमान वानरों के नेता थे और लेखक ने उपन्यास में उसे विकास पुरुष दिखाया है। बालि के राज्य में उसने उपवनों, मार्गों, जलाशयों और प्रत्येक ग्राम में व्यायामशाला का निर्माण कराया है। लेखन ने हनुमान का जो क्रांतिकारी रूप उभारा है, वह उपन्यास की एक उपलब्धि है। लेकिन सामन्त राम की दासता का जो आदर्श हनुमान ने स्थापित किया, वह न तो संपूर्ण वानरों की मुक्ति का रास्ता था और न अब वह दलितों की मुक्ति का रास्ता हो सकता है। लेखक ने इस सत्य को एक जगह रेखांकित भी किया है-’’हनुमान का आर्य होना अनार्यों के लिये चुनौती तो थी ही, परन्तु अनार्यों की श्रेष्ठता के पतन का युग भी आरम्भ हो गया। ऐसा व्यवहार, ऐसी व्यवस्था रही तो अनार्य, आर्यों के दास, सेवक के अतिरिक्त कुछ न रह सकेंगे। भविष्य स्पष्ट था कि दीक्षित होते तो आर्य, शिक्षा आर्यों की ही दी जाती, वीर होते आर्य, युद्ध का प्रशिक्षण भी आर्यों को दिया जाता। राजा, अधिपति, राज्य के प्रमुख अधिकारी, सभी श्रेष्ठ पदों पर आर्य, और अनार्य कर्मशील शिल्पी। सही अर्थों में अनार्य ही जीवन की प्रगति के प्राण और इस पूरे भूखण्ड पर अनार्यों में ही कार्य का होना या करना पाया जाता है।.. यह हनुमान कहाँ समझ पाते ! यह तो राम समझ रहे थे, राम विज्ञ थे। राम की बुद्धि वर्तमान से दूर तक देखती और उसी देखने के अनुरूप सूत्र बनाते राम। उसी दृष्टि से बनतीं योजनाएँ और अनुमान वर्तमान भी ठीक-ठीक न देख पाते। शेष को तो पता ही नहीं, वर्तमान क्या ? भविष्य ?‘‘ (पृ. २५५)
वर्तमान में आर्य नीति के इस विपाक को हम आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र में देख सकते हैं, जहाँ संघ परिवार उन्हें हिन्दू फोल्ड में बनाये रखने की योजना पर काम कर रहा है। लेखक ने ठीक ही लिखा है कि ’हनुमान कहाँ समझ पाते!‘ अन्धी दासता बुद्धि को विकसित नहीं होने देती है और दास जीवन पर्यन्त मूढ ही बना रहता है। यही मूढता आज भी दलित-मुक्ति में सबसे बडी बाधा है।
राम ने बालि को धोखे से मार कर सुग्रीव को सम्राट बनाया और हनुमान को उसका सलाहकार। इस प्रकार आर्य संस्कृति का पहला ध्वज वानर राष्ट्र में लहराता है। लहूलुहान बाल मृत्यु के समय राम को फटकारते हैं-आपने जिस तरह मुझे छिपकर मारा है, इन्द्र को उसी तरह क्यों नहीं मारा ? आप इन्द्र का कुछ बिगाड नहीं सकते, क्योंकि वे देव हैं आपसे श्रेष्ठ। हम वानर हैं, निर्बल हैं, पिछडे और नीच हैं, अनार्य हैं, मात्र दास बनने की योग्यता है हममें। (पृ. २५९) लेकिन बालि के शब्द राम के ही नहीं, सुग्रीव और हनुमान के भी बहरे कानों में पडे थे।
उधर रावण के भाई विभीषण हनुमान आर्य पक्ष के साथ खडे हो जाते हैं और अपनी युक्तियों से राम के हाथों रावण का वध कराकर लंका का सम्राट बन आर्य साम्राज्य और आर्य संस्कृति की विजय पताका फहरा देते हैं।
यह उपन्यास आर्य-अनार्य-संघर्ष को एक साम्राज्यवादी नजरिये से देखता है और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से भी। इसमें हनुमान को नये रूप में प्रस्तुत किया गया है। वे आर्यों के लिये वज्रांगी थे, पर अनार्य जाति के सबसे बडे शत्रु थे, जिन्होंने अनार्य संस्कृति को धूल में मिलाने और अनार्यों को सामाजिक स्तर पर दीन-हीन बनाये रखने की क्रूर भूमिका निभायी थी। हनुमान की इस वज्रांगी बनाम क्रूर भूमिका को इस उपन्यास ने परत दर परत उधेडा है। हनुमान ने आर्य संस्कृति और आर्य साम्राज्य की लडाई लडी और अपने वानर समुदाय के सामाजिक और आर्थिक पिछडेपन की लडाई को भूल गये। आर्य साम्राज्य के बाद भी उन्होंने अपने लिये दासता का वरण किया और भूल गये कि वानरों के राजनैतिक अभ्युदय के लिये स्वतंत्रता की जरूरत थी।
यह उपन्यास पौराणिक ही सही, अतीत की यात्रा तो कराता ही है, उसके बरक्स वर्तमान-बोध भी कराता है। वीरेन्द्र सारंग ने जो संवेदनाएँ हमारे सामने रखी हैं, वे हमें वास्तव में अभिभूत करती हैं।
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